साथियों,
यह घोर विडंबना है कि एक ‘महाशक्ति’ और ‘विश्वगुरु’ बनने की ओर अग्रसर देश की राजधानी तक में हम शिक्षकों को महीनों से समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा है और हम अपने वेतन की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। इससे न सिर्फ़ हमारा मनोबल टूट रहा है, बल्कि हम क़र्ज़ा लेने व लोन की क़िस्तें न भर पाने की स्थिति में आ गए हैं। स्कूलों को दलगत व क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बनाकर टेस्ट परिणामों और दिखावे के दबाव में राज्य सरकार व निगम के बीच जो खींचातानी चल रही है, उसका खामियाजा हम शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है।


सफ़ाई कर्मचारी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, मगर
स्वच्छता का प्रदर्शन करने का इतना दबाव है कि हमने ख़ुद को ही नहीं बल्कि अपने
विद्यार्थियों तक को उनकी पढ़ाई व स्वास्थ्य की क़ीमत पर झोंक दिया है। शौच जैसे निजी
मामलों तक के लिए हमारे आत्म-सम्मान को कुचलकर हलफ़नामे भरवाये जा रहे हैं। हमारी
तमाम निजी जानकारी को यू-डाइस पर भरवाया जा रहा है और हमारे निजता के अधिकार को
कुचला जा रहा है। हमें इस लायक़ नहीं समझा जा रहा कि हम अपने प्रशिक्षण, पेशागत विवेक, अनुभव व अपनी योजना के हिसाब से
शिक्षण और स्कूल की प्रक्रिया तय कर सकें। किस दिन विद्यार्थियों को कौन-सा भाषण
जबरन पिलाना है, कौन-से दिन पढ़ाई नहीं करानी है, कौन-सा कार्यक्रम करना है, कौन-सी गतिविधि से कोई
कार्यक्रम सम्पन्न करना है, यह सब हमें अनिवार्य आदेशों के
तहत बताया जा रहा है। मानो स्कूलों व शिक्षकों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही न हो, हम महज़ एक मशीन के पुर्ज़े हों।

चाहे वो न्यूनतम वेतन हो या ठेके पर नियुक्तियाँ या
यूनियन बनाने पर बढ़ती पाबन्दियाँ, साम्राज्यवादी-पूंजीवादी ताक़तों के ये हमले केवल शिक्षा पर
नहीं हो रहे, बल्कि इनकी मार मज़दूरों,
किसानों, आदिवासियों पर भी पड़ रही है और जनता के
जल-जंगल-ज़मीन व संसाधनों को अपनी लालच की हवस का निशाना बना रही है। और ये हमले
केवल भारत में ही नहीं,
बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च-शिक्षा तक में जन-विरोधी और पूँजी को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। सार्वजनिक यूनिवर्सिटी-कॉलेज को कहा जा रहा है कि वो फ़ीस बढ़ाकर और निजी कंपनियों से क़रार करके अपने ख़र्चे का एक बड़ा हिस्सा ख़ुद जुटाएँ। ज़ाहिर है कि एक तरफ़ इससे शिक्षा उन वर्गों से दूर होती जाएगी जिनकी पहुँच आज भी बेहद सीमित है, बल्कि जब निजी कंपनियों की जरूरतों के मुताबिक़ पढ़ाया जाएगा तो शिक्षा का चरित्र जनविरोधी और ज्ञानविरोधी भी होता जाएगा। अगर हमने आज कमर कसकर इन नीतियों का विरोध नहीं किया तो कल हमारे पास न सार्वजनिक स्कूल बचेंगे और न हमारे पेशे की गरिमा और आज़ादी|
बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च-शिक्षा तक में जन-विरोधी और पूँजी को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। सार्वजनिक यूनिवर्सिटी-कॉलेज को कहा जा रहा है कि वो फ़ीस बढ़ाकर और निजी कंपनियों से क़रार करके अपने ख़र्चे का एक बड़ा हिस्सा ख़ुद जुटाएँ। ज़ाहिर है कि एक तरफ़ इससे शिक्षा उन वर्गों से दूर होती जाएगी जिनकी पहुँच आज भी बेहद सीमित है, बल्कि जब निजी कंपनियों की जरूरतों के मुताबिक़ पढ़ाया जाएगा तो शिक्षा का चरित्र जनविरोधी और ज्ञानविरोधी भी होता जाएगा। अगर हमने आज कमर कसकर इन नीतियों का विरोध नहीं किया तो कल हमारे पास न सार्वजनिक स्कूल बचेंगे और न हमारे पेशे की गरिमा और आज़ादी|
हम माँग करते हैं कि
Ø तुरंत प्रभाव से शिक्षकों के वेतन, एरियर्स व फंडस के नियमित भुगतान की
व्यवस्था की जाए।
Ø शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले
सीसीटीवी व बायोमेट्रिक हाज़िरी के फ़रमान को वापस लिया जाये।
Ø स्कूलों में डाटा एंट्री ऑपरेटर की
नियुक्ति की जाए और शिक्षकों से यह काम न लिया जाए।
Ø टेस्ट परिणामों, एसीआर, मेमो, स्वच्छता अभियान का तानाशाही दबाव तुरंत हटाया जाए।
Ø आउटसोर्सिंग, पीपीपी,
एनजीओकरण आदि के ज़रिये निजीकरण करने की नीति को बंद किया जाए।
Ø शिक्षा व्यवस्था को समानता व सामाजिक
न्याय के संवैधानिक मूल्यों पर मज़बूती से खड़ा किया जाए।
1 comment:
Aap ke sangharsh ka samarthan karte huye, yah asha karti hoon, ki aap safal honge!
Swati, AIFRTE
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