Friday, 27 September 2013

फोटो : दिल्ली सरकार द्वारा सेवानिवृति में 5 साल विस्तार दिए जाने के विरोध में प्रदर्शन

14 सितम्बर के विरोध प्रदर्शन का बैनर 
विचार विमर्श करते शिक्षक साथी 




मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार के नाम खुला पत्र का पोस्टर

क्रांतिकारी गीत गाते साथी 

प्रेम चंद , महासचिव, आल इंडिया पब्लिक सर्वेंट फेदरेसन 

सत्येन्द्र नागर, संयोजक, नगर निगम शिक्षक संघ , शाहदरा दक्षिणी 

राघवेन्द्र प्रपन्ना, व्याख्याता,महर्षि बाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, दिल्ली विश्विद्यालय 


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Friday, 20 September 2013

ज्ञापन- उप-राज्यपाल को दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के पश्चात पांच साल सेवा विस्तार दिए जाने के फैसले के खिलाफ

माननीय उप-राज्यपाल                                                                   दिनांक : 14 सितम्बर, 2013
दिल्ली सरकार
राजनिवास, राजनिवास मार्ग
दिल्ली-110054

विषयः दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के पश्चात पांच साल सेवा विस्तार दिए जाने के फैसले के खिलाफ ज्ञापन

महोदय,
           शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) के अवसर पर इस बार दिल्ली सरकार ने शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 वर्ष करने की घोषणा की है। हम उम्मीद कर रहे थे कि शिक्षकों की रिक्तियों के कारण सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिए शिक्षकों की भर्ती की और बड़ी संख्या में अनियमित कार्यरत शिक्षकों को नियमित करने की घोषणा की जायेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सेवानिवृत्ति की उम्र को 65 वर्ष तक विस्तारित करना नई भर्ती पर रोक लगाना भी है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नए शिक्षकों की भर्ती दिल्ली के छात्रों की शिक्षा के लिए आवश्यक शर्त है। दिल्ली में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल खोलने की जरूरत है। आज शैक्षिक अर्हता और प्रशिक्षण पाए ऊर्जावान युवा लोगों की एक बड़ी संख्या स्कूलों में अपना योगदान देने की राह देख रही है। शिक्षक दिवस पर बड़े पैमाने पर शिक्षको की नियमित भर्ती की घोषणा से दिल्ली की सरकारी स्कूल व्यवस्था में बेहतर शैक्षिक माहौल बनता और समाज में आशा का संचार होता। हम मांग करते हैं कि इस सन्दर्भ में नियमित शिक्षकों की भर्ती के अभियान की घोषणा जल्द से जल्द की जाए।
संविधान के तहत सामाजिक न्याय के आधार पर नए शिक्षकों की भर्ती से समाज के वंचित तबकों को अधिकार-सम्मत प्रतिनिधित्व मिलता। आमतौर पर जिस उम्र के लोगों को सेवानिवृत्ति की उम्र विस्तार की कथित सुविधा दी गयी है, उनमें दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों की भागीदारी बहुत कम है। नयी भर्ती की प्रक्रिया के टलने से दिल्ली सरकार के घोषित सामाजिक न्याय के उद्देश्य को फलीभूत करने में रूकावट आएगी। कृपया इस विरोधाभासी स्थिति को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
पुनश्चः

हम मांग करते हैं कि

1 सेवानिवृत्ति की उम्र विस्तारित न की जाए।
2 सेवानिवृत्त शिक्षकों को पेंशन, पारिवारिक सुरक्षा व अन्य गतिविधियों के लिए सुविधाएं प्रदान की जाएं।
3 प्रत्येक सत्र में नए शिक्षकों की नियुिक्त की व्यवस्था की जाए।
4 अनियमित व संविदा शिक्षकों को नियमित किया जाए।
5 नए सरकारी स्कूलों का निर्माण किया जाए और छात्रों को सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जाएं।
6 स्कूलों में स्वयं सेवी संस्थाओं के प्रवेश को रोका जाए।
7 शिक्षकों को गैरशैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाए।


फिरोज अहमद            राजेश

लोक शिक्षक मंच के लिए
बी आठ नीलकंठ अपार्टमेंट
संतनगर, बुराड़ी
दिल्ली-110084

संलग्नकः हस्ताक्षर अभियान की मूल काॅपी

Tuesday, 17 September 2013

रिपोर्ट: शिक्षकों के सेवा-विस्तार की उम्र बढ़ाने के विरोध में प्रदर्शन


                                                                                                                                                                         
दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों के सेवा विस्तार की उम्र 65 तक बढाने के फ़ैसले के विरोध में लोक शिक्षक मंच द्वारा 14 सितम्बर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन आयोजित किया गया. प्रदर्शन लगभग 10 बजे सरकार के फैसले के खिलाफ जोशीले नारों की हुँकार से शुरु हुआ। मंच संचालन की ज़िम्मेदारी राजेश ने निभाई। उन्होंने उपस्थित साथियों को अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया। राजीव (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने विभिन्न देशों के सेवानिवृत्ति सम्बन्धी आंकड़े रखकर यह साबित किया कि कैसे सरकार का उक्त फैसला तर्कसंगत नहीं है। उनका मत था कि शिक्षण के कार्य में विशेष कौशल के अतिरिक्त ऊर्जा की भी ज़रूरत होती है जोकि, उन्हें लगता है, उम्र के साथ प्रभावित होने लगती है। इसके बाद राजेश की अगुवाई में लोक शिक्षक मंच के साथियों द्वारा 'तू जिंदा है...' गीत गाकर उत्साह प्रवाहित किया गया। 
एक अध्यापक तरुण कुमार ने पहले की सेवानिवृत्ति की उम्र, 58 वर्ष, को सही ठहराया। उनका कहना था कि आजकल तरह-तरह की बीमारियों से जल्दी ग्रस्त होने की सम्भावना बढ़ गई है जिस कारण भी सरकार का यह फैसला ग़लत है। 
डॉ. जी. पी. ध्यानी ( पी.जी.टी , दिल्ली सरकार ) ने कहा कि इस निर्णय से युवा-वर्ग के हित प्रभावित होंगे। उन्होंने आश्चर्य जताया कि जिस निर्णय से सरकार की वित्तीय हालत भी नहीं सुधरेगी, उसे नियमित शिक्षकों की पदोन्नति और अतिथि शिक्षकों की नियमित नियुक्ति की संभावनाओं की बलि देकर कैसे लिया गया। उनका मानना था कि यह एक विशेष समूह की सलाह पर लिया गया ग़लत फैसला है। उन्होंने प्रदर्शन के आयोजकों का ध्यान देर से सूचना देने और तालमेल की कमी की ओर भी खींचा।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय ने अपनी राय रखते हुए कहा कि ऐसे में जब प्रशिक्षित युवक-युवतियां उपलब्ध हैं, इस फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता। उनका कहना था कि इससे बराबरी और समाजवाद के मूल्यों की अनदेखी हुई है। मंच के साथियों ने 'इसलिए राह संघर्ष की हम चुने' गीत गाकर आन्दोलन के प्रेरक मूल्यों को सामने रखा।
गौरव (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने फैसले को राजनैतिक स्टंट बताया। उन्होंने कहा कि इससे युवा साथियों का मनोबल गिरेगा और वे शिक्षण छोड़कर दूसरे विकल्पों की तलाश करेंगे जिससे कि शिक्षकों की संख्या व गुणवता दोनों में कमी आएगी। निर्णय के पक्ष में दिए जाने वाले आंकड़ों और तर्कों को उन्होंने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनका वज़न तभी है जब स्कूलों में पूर्ण नियुक्तियां हों। इस मुद्दे पर उन्होंने व्यापक संवाद और एकजुटता की ज़रूरत को रेखांकित किया।
ज्योति (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर अधिकतर शिक्षक हमसे सहमत हैं और स्थल पर उपस्थिति से समर्थन आंकना ग़लत होगा।
राजेश ( लोक शिक्षक मंच ) ने प्रदर्शन के राजनैतिक चेतना के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा कि परिणामों से परे यह संघर्ष जारी रखने की परंपरा का भी निर्वाह है। उनका विश्लेषण था कि छठे वेतन आयोग से बढ़ी तनख्वाहों से शिक्षकों के संघर्ष करने की परम्परा को तोड़ने की कोशिश की गयी है।यहाँ उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को कॉरपोरेट घरानों और उनके NGOs को सौंप कर बर्बाद करने की राजनीति पर ध्यान खींचते हुए दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को निजी संस्थाओं को 'गोद' देने के फैसले के खिलाफ मंच द्वारा लड़ाई लड़ने की मंशा ज़ाहिर की और अन्य उपस्थित साथियों को इसमें भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।
वही GSTA के जिला संयोजक ने नयी पीढ़ी के उदासीन रवैये पर निराशा प्रकट की। उन्होंने कहा कि वे शिक्षक संघ की भूमिका के प्रति सीमित सोच रखते हैं जिस कारण वे अपने व्यापक हितों की रक्षा में एकजुट नहीं हो पा रहे। उन्होंने यह मानने से इंकार किया कि बढ़े वेतन कमज़ोर आन्दोलन के लिए ज़िम्मेदार हैं। NGOs के विरोध से भी वे सहमत नहीं थे। फैसले को सरकार की साज़िश बताते हुए उन्होंने इसके विरुद्ध अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत और अपनी मंशा बताई।  
राजीव ( निगम शिक्षक ) ने संविदा पर शिक्षकों को रखने की नीति की आलोचना करते हुए इसे शिक्षा के पतन और शिक्षा व्यवस्था के विनाश के लिए दोषी करार दिया। उनका मानना था कि ठेके की इस व्यवस्था से शासन-प्रशासन की निरंकुश हुकूमत कायम रहती है। सुरजीत सिंह रावत ( भूतपूर्व सैनिक तथा वर्तमान में निगम शिक्षक ) ने मुद्दे की अहमियत स्वीकारते हुए इस बात पर अफ़सोस जताया कि शिक्षक की नौकरी पाने का इंतज़ार करते वो युवा जो इससे सीधे प्रभावित हैं बड़ी संख्या में प्रदर्शन में नहीं आये। उन्होंने कुछ NGOs के सकारात्मक पक्षों का हवाला दिया। उन्होंने फैसले पर रची अपनी एक व्यंगात्मक कविता प्रस्तुत की।
एक वक्ता जगदीश ममगइ ने कहा कि उन्होंने पाया कि वो लोग भी जो इसका समर्थन कर रहे हैं बातचीत और समझाने के बाद पुनर्विचार करते हैं। सरकार की संविदा व outsourcing की नीतियों में खोट मानते हुए उन्होंने कहा कि इनसे केवल शिक्षक ही नहीं सभी कामगार वर्ग प्रभावित हो रहे हैं जिस कारण एक बड़ी लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है।
सतिन्द्र नागर ( संयोजक , MCTA, शाहदरा दक्षिण ) ने मुद्दे को उठाने के लिए मंच को धन्यवाद दिया। नयी शिक्षा नीतियों को विदेशी ताकतों से संचालित मानते हुए उन्होंने इनकी भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि शिक्षकों में नए नेतृत्व की ज़रूरत है जोकि तात्कालिक लाभ के परे जाकर सरकार के फैसलों को परख पाए। उनकी राय थी कि उम्र के साथ कार्यक्षमता घटती है। उन्होंने भी प्रदर्शन में उपस्थित नौजवान साथियों की संख्या पर अफ़सोस जताया।
साथी प्रेमचंद (महासचिव ,इंडियन पब्लिक सर्विस एम्प्लोई फेदरेसन ) ने लोक शिक्षक मंच को धन्यवाद दिया कि उसने इस मुद्दे को उठाकर तमाम संगठनों पर दबाव बनाया कि वो अपनी स्थिति स्पष्ट करें। उनका कहना था कि आन्दोलनों में संख्या के अलावा माहौल बनाने की भूमिका भी निभानी ज़रूरी होती है। उन्होंने माना कि जो लोग सरकार के इस फैसले का इसलिए समर्थन करते हैं कि उन्हें खुद पुनर्नियुक्त होकर परिवार के प्रति अपनी शेष ज़िम्मेदारी निभाने का मौक़ा मिलेगा, वे व्यापक स्तर पर नयी पीढ़ी के हितों से इसके अंतर्विरोधों को नज़रंदाज़ करते हैं। सरकार की नव-उदारवादी नीतियों में ठेका व्यवस्था की धुन को पहचानते हुए उन्होंने अपील की कि इसके खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई को अपने व्यक्तिगत हितों के लिए संघर्ष की तरह देखा जाये। उन्होंने कहा कि न सिर्फ इन नीतियों के खिलाफ सतत संघर्ष करना होगा बल्कि इनका स्वरूप ही ऐसा है कि लड़ाई खुद हमें मजबूर करेगी। सेवानिवृत्ति के बाद ठेके पर फिर नियुक्त होने से कर्मचारियों के विरोध और संघर्ष की क्षमताओं के कुंद होने की संभावनाओं की तरफ भी उन्होंने ध्यान दिलाया।
 नरेन्द्र कुमार ( SC/ST शिक्षक संघ, शाहदरा दक्षिणी ) ने इस बात की ओर इशारा किया कि शिक्षकों के कई गुटों द्वारा इस फैसले का समर्थन न करने का कारण उनके नेतृत्व के निजी स्वार्थों से जुड़ा हुआ है। युवा वर्ग की नौकरियों और पदोन्नति की संभावनाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ को शिक्षण संस्थानों में ले जाने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि NGOs के कॉरपोरेट चरित्र और एजेंडे के कारण स्कूली व्यवस्था में इनके बढ़ते हस्तक्षेप को संदेह से ही देखा जाना चाहिए। उन्होंने आशा से कम उपस्थिति पर अफ़सोस जताया।
अध्यापिका अंजलि भारद्वाज ने इस फैसले को रोज़गार के कम होते अवसरों और अपराध की बढ़ती घटनाओं से जोड़ कर देखने को कहा। विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते क्रम को समाज में व्याप्त हताशा और कुंठा का परिणाम मानते हुए उनका कहना था कि ये नीतियाँ एक साजिश के तहत लागू की जा रही हैं ताकि हालात इतने बिगड़ जाएँ कि साम्राज्यवादी ताकतों को देश की कमान मिल जाये। आगे की लड़ाई में सहयोग देने के आश्वासन के साथ उन्होंने अपनी बात समाप्त की। इसके बाद मंच के साथियों ने 'ले मशालें चल पड़े हैं... '  गीत गाकर उम्मीद का जज़्बा और विश्वास जगाया ।        
 राघवेन्द्र प्रपन्न ( प्राध्यापक, महर्षि बाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, दिल्ली विश्विद्यालय ) ने कहा कि एक तरीका इस फैसले को ऐसे देखने का है जोकि आक्षेप तक रुक जाता है जबकि ज़रूरत है कि दोष का निर्धारण सही ढंग से किया जाये। इसके लिए बड़ी तस्वीर को समझकर राजनैतिक विश्लेषण की ज़रूरत है। उन्होंने बताया कि कैसे PPP के ज़रिये, पीछे के रास्ते से, बिना संवैधानिक प्रक्रिया अपनाये, सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से पलट रही हैं।  उन्होंने कहा कि नियमित शिक्षकों के कैडर को खत्म करने की शुरुआत तो 1990 के दशक में नव-उदारीकरण की नीति अपनाने से ही हो गई थी। इसमें ठेका व्यवस्था एक चरण है। उनका विश्लेषण था कि सरकार के इस फैसले से इन नीतियों द्वारा और आघात पहुँचाने के लिए अनुकूल समय मिलेगा। शिक्षक साथियों को संबोधित करते हुए उन्होंने उस षड्यंत्र के प्रति सचेत रहने को कहा जिसके तहत शिक्षण को ग़ैर-पेशेवर काम में बदलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में शिक्षा और शिक्षण का लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के मंचों से तय हो रहा है जिनका उद्देश्य यह है कि शिक्षकों की पहचान बौद्धिक वर्ग के बदले मात्र दिए गए पैकेज को लागू करने वाले कर्मचारी की रह जाये। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पीअरसन नाम की कंपनी का उल्लेख किया जोकि CCE जैसी योजनाओं के स्वरूप को प्रायोजित तथा तय कर रही है।
  
विभा सिंह ( पूर्व सचिव, नगर निगम शिक्षक संघ ) ने भी लोक शिक्षक मंच को फैसले के विरोध में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए बधाई दी। उनका कहना था कि इस लड़ाई में संविदा शिक्षकों के हित तो हैं ही, पदोन्नति की घटती सम्भावना के कारण नियमित शिक्षकों के हित भी शामिल हैं। सेवानिवृत्त शिक्षकों के हितों से सहानुभूति जताते हुए उन्होंने कहा कि पुनर्नियुक्ति की कई शर्तें उनके खुद के भी खिलाफ हैं और वो इस फैसले का स्वागत इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे इन शर्तों से अनजान हैं। प्रदर्शन में नौजवानों की कम उपस्थिति का कारण उन्होंने उनका शिक्षक के पद की गरिमा को न समझना बताया। उन्होंने अपील की कि इस फैसले को पार्टी लाइन के परे जाके देखें। 
फ़िरोज़ ( लोक शिक्षक मंच ) ने अंत में प्रदर्शन में भाग लेने वाले सभी साथियों का मंच की ओर से धन्यवाद किया और उनके द्वारा की गई आलोचनाओं और सुझावों पर ग़ौर करने का आश्वासन दिया। दिल्ली सरकार के इस फैसले के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को PPP के तहत दिए जाने वाले फैसले को पलटवाने की लड़ाई लड़ने के इरादे की घोषणा के साथ प्रदर्शन समाप्त हुआ। प्रदर्शन के बाद एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई और उप-राज्यपाल, दिल्ली सरकार  को एक ज्ञापन सौंपा गया जिसमें सैंकड़ों शिक्षकों, शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों व अन्य लोगों के हस्ताक्षर संलग्न थे और दिल्ली सरकार के फैसले के विरोध के कारणों को प्रस्तुत करके उसे वापिस लेने की मांग की गई।

आय - व्यय का ब्यौरा 

कुल आय :
सभा में उपस्थित साथियों से प्राप्त - 2100
मंच के एक साथी से प्राप्त             - 1000

कुल प्राप्ति                                  - 3100

कुल व्यय :
माइक -टेंट                                  - 4000
पर्चे                                             - 400
बेनर                                            -280
अन्य                                           - 246

कुल खर्च                                      - 4926 

Saturday, 7 September 2013

पर्चा: शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाए जाने के खिलाफ


साथियों,

दिल्ली सरकार ने शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 65 वर्ष करने का फैसला किया है। लोक शिक्षक मंच सरकार के इस फैसले पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करता है। इस समय जहाँ दिल्ली ही नहीं वरन् देश भर में बड़ी संख्या में बेरोजगार युवक-युवतियाँ बी०एड०, बी० एल० एड० तथा ई०टी०ई० (डाइट) आदि शिक्षण प्रशिक्षण कोर्स करके सरकारी नौकरियों के इंतजार में हैं, सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ते ही आगामी वर्षों में होने वाली नई नियुक्तियों की संभावना खत्म हो जाएगी। दिल्ली में ही पिछले कई सालों से शिक्षकों के कई हजार पद खाली पड़े हैं और सरकार नियमित शिक्षकों की बहाली करने के बजाय इन्हें लगातार संविदा, अतिथि आदि, अनियमित व कम वेतन वाले पदों में परिवर्तित कर रही है। इस नीति से युवा पीढ़ी के भविष्य की संभावनाएं खतरे में पड़ जाएंगी। यह एक ही स्कूल व्यवस्था के भीतर गैर-बराबरी की कार्य-शर्तों पर काम करने वाले शिक्षकों के भिन्न वर्ग निर्मित कर शिक्षकों के बीच की एकजुटता को तोड़ने का प्रयास है। साथ ही सरकार की जनविरोधी शिक्षा नीतियों का प्रतिरोध करने की क्षमता को कुंद करने की भी साजिश है। इस निर्णय की हम इसलिए भी निंदा करते हैं क्योंकि इससे भावी व सेवानिवृत्त न होने वाले शिक्षकों के हितों के बीच आपसी टकराव पैदा होगा।

                    इस निर्णय को हम सरकार द्वारा अपनाई जा रही नवउदारवादी नीतियों के क्रम में देखते हैं, जिनका उद्देश्य सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करना है। इनके तहत सरकार अपने स्कूलों को तथाकथित स्वयं सेवी संस्थाओं, निजी व कॉर्पोरेट ताकतों को सौंपकर शिक्षा को बाजारू माल बनाना चाहती है। इसी कड़ी में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम 50 प्राथमिक स्कूलों को इन ताकतों को सौंपने का निर्णय भी ले चुकी है। यह सब कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा पोषित पी.पी.पी. की नीति की आड़ में हो रहा है। इस नीति का उद्देश्य दिल्ली ही नहीं वरन् देश के सभी शिक्षण प्रशिक्षण संस्थानों से निकले भावी शिक्षकों को निजी स्कूलों में पढ़ाने और एन.जी.ओ. में काम करने के लिए विवश करना है। इससे एक तरफ शिक्षा को बेच कर मुनाफा कमाने वाले निजी स्कूल प्रशिक्षित शिक्षकों को अपनी शोषण की शर्तों पर नियुक्त कर पाएंगे और नव शिक्षक समझौता करने को मजबूर होंगे। इस तरह पी.पी.पी. के तहत दिए जा रहे दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के 50 स्कूल और इस तरह के नित नए खुलते अन्य निजी स्कूलों की जरूरतों को पूरा किया जाएगा। यह नव-उदारवाद के तहत सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में जनता के संसाधनों से तैयार हो रहे शिक्षकों की मूल्यवान क्षमता को निजी पूंजी के अधीन चल रहे मुनाफा कमाने वाले स्कूलों को हस्तांतरित करने की साजिश है। 

लोक शिक्षक मंच अपील करता है कि सरकार की इस जन विरोधी योजना का एकजुट होकर विरोध करें और दिल्ली सरकार से मांग करें कि इस फैसले को तत्काल प्रभाव से वापस ले। इस संदर्भ में होने वाले विरोध प्रदर्शन में आप अपनी सहभागिता प्रदर्शित करके सरकार को इस फैसले को वापिस लेने के लिए मजबूर करें। 

विरोध प्रदर्शन

स्थानः जंतर मंतर, दिल्ली
दिनांक: 14 सितम्बर, 2013 (शनिवार)
समयः प्रातः 9:30 से 1:00 बजे तक

इस अभियान में आप सभी आमंत्रित हैं!


लोक शिक्षक मंच
सम्पर्कः lokshikshakmanch@gmail.com, 9968716544, 9911612445
ब्लागः lokshikshakmanch.blogspot.in 

Tuesday, 3 September 2013

विज्ञप्ति: दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाये जाने के खिलाफ

लोक शिक्षक मंच दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति  की उम्र 65 वर्ष तक बढाने पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करता है. इस समय जहाँ दिल्ली ही नहीं वरन देश भर में बड़ी संख्या में बेरोजगार युवक-युवतियां बी०एड० तथा ई०टी०ई० (डाइट) आदि शिक्षण-प्रशिक्षण कोर्स करके नौकरियों का इंतजार कर रहे हैं, ऐसे में सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ते ही आगामी वर्षों में होने वाली नई नियुक्तियों की संभावना खत्म हो जाएगी। दिल्ली में ही पिछले कई सालो से शिक्षकों के कई हजार पद खाली पड़े हैं और सरकार नियमित शिक्षकों की बहाली करने के बजाय इन्हें लगातार संविदा, अतिथि आदि अनियमित व कम वेतन वाले पदों में परिवर्तित कर रही है. इस नीति से युवा पीढ़ी के भविष्य की संभावनाएं और अधिक खतरे में पड़ जाएँगी। यह एक ही स्कूल व्यवस्था के भीतर गैर-बराबरी की कार्य-शर्तो पर काम करने वाले शिक्षकों के  भिन्न वर्ग निर्मित कर शिक्षकों की एकजुटता को तोड़ने तथा सरकार की जनविरोधी शिक्षा नीतियों का प्रतिरोध करने की क्षमता को कुंद करने की साजिश है. इस निर्णय की हम इसलिए भी निंदा करते है क्योंकि इससे भावी  व सेवानिवृत्त न होने वाले शिक्षकों के  हितों के बीच आपसी टकराव पैदा होगा। इस निर्णय को हम सरकारों द्वारा अपनाई जा रही नवउदारवादी नीतियों के क्रम में देखते है जिनका उद्देश्य सार्वजानिक शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करना है. इनके तहत सरकार अपने स्कूलों को तथाकथित 'स्वयं सेवी संस्थाओं' तथा निजी व कॉर्पोरेट ताकतों को सौंपकर शिक्षा को बाजारू माल बनाना चाहती है. इसी कड़ी में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम अपने 50 स्कूल इन ताकतों को सौंपने का निर्णय भी ले चुका है. और यह सब कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा पोषित पीपीपी की नीति की आड़ में हो रहा है।  
  लोक शिक्षक मंच शिक्षक साथियों से अपील करता है कि सरकार की इस जन विरोधी योजना का एकजुट होकर विरोध करें और दिल्ली सरकार से मांग करता है कि इस फैसले को तत्काल वापिस ले।

Saturday, 17 August 2013

शिक्षक डायरी- यौन शिक्षा का सवाल

 
                                                                                                            कमलेश मेहरोल

यौन शिक्षा स्कूलों में होना चाहिए कि नहीं ? इस बात पर काफी बहस है। मैं दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में पढ़ी हूं। मुझे याद है कि विज्ञान के एक अध्याय को टीचर घर से पढ़कर आने के लिए कहती थी, उसमें बालक - बालिकाओं में होने वाले शारीरिक परिवर्तन, हारमोंस परिवर्तन, माहवारी जैसी बातों का जिक्र रहता था। हम सब उसे खुद से पढ़कर आ जाते थे और आपस में कानाफूसी कर लेते थे। टीचर उस अध्याय को छोड़कर आगे बढ़ जाती थी और फिर उस अध्याय के बारे में कोई बात नहीं होती थी। हमारी बहूत सारी जिज्ञासाएं रहती थीं जिसे हम पूछने में झिझकते थे, हम आपस में ही आधी-अधूरी जानकारी बांट लेते थे। मुझे याद है कि जब हम पांचवी में थे तो हमारी टीचर हमसे स्टेफ्री का पैकेट मंगवाती थी, शायद उन्हें खुद से लेने में शर्म आती थी। हम बहुत सारी जिज्ञासाए लेकर बड़े हुए, जैसे बच्चे कैसे पैदा होते हैं ? बच्चे स्त्री से ही क्यों पैदा होते है? हमें खास उम्र में हर महीने माहवारी क्यों होती है? ऐसा लड़को को नही क्यों होता है? माहवारी के दिनों में हमसे भेदभाव क्यों किया जाता है? जैसे ही हम बड़े होते है तो हमारा घर से निकलना बंद हो जाता है जबकि वही लडको पर इस तरह की कोई बंदिशे नहीं लगाई जातीं। इन्हीं सारी तमाम बातों के बीच मैं बड़ी हुई। घर में कभी इन बातों को पूछने की हिम्मत नहीं हुई और स्कूल में शिक्षिकाओं ने ऐसा भरोसा पैदा नहीं किया कि कभी उनसे खुलकर कुछ पूछ पाते। आज मैं भी एक शिक्षिका हूं और स्थिति कमोबेश वही है। पिछले साल मेरे स्कूल की एक छात्रा ने अपनी बोर्ड की परीक्षाओं के दौरान आत्महत्या कर ली थी, वजह पता चला कि वह तीन महीने की गर्भवती थी। जाहिर है समाज के भय से उसने यह कदम उठाया था। वही पढ़ाई के दौरान एक छात्रा का गर्भपात हुआ। इस तरह के असुरक्षित यौन संबंधो से अनचाहे गर्भ की संभावना बढ़ जाती है और खामियाजा शारीरिक और मानसिक तौर पर हमेशा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। समाज उसे ही दोषी ठहराता है, उसकी पढ़ाई छुड़वा दी जाती है, उसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगता है। माता - पिता से भी उसे किसी तरह का भावनात्मक सहयोग नहीं मिलता है। किशोरावस्था में स्त्री-पुरूष आकर्षण सहज है। अगर समाज में इसे सहज रूप से लिया जाए और स्वस्थ तरीके से जानकारी का आदान - प्रदान किया जाए, तो शायद इस तरह की घटनाएं कम घटेंगी। मैंने देखा कि मेरे स्कूल की लड़कियां आठवें पीरियड में संजने संवरने लगती हैं। वे घर से छुपाकर मेकअप का सामान ले आती हैं। बाहर लड़के उनका इंतजार करते हैं। वे छुपाकर मोबाइल लाती हैं और अलग-अलग सिम रखती हैं। स्कूल के प्रसाधन कक्ष में जाकर बारी -बारी से फोन का इस्तेमाल करती हैं। मुझे नहीं पता वे किससे और क्या बात करती हैं पर स्कूल की शिक्षिकाओं में यह आम धारणा व्याप्त है कि वे अपने ब्यायफ्रैंड से बात करती हैं। किशोरावस्था का आकर्षण आवश्यक नहीं कि प्रेम ही हो, पर जब कोई लड़का किसी लड़की के लिए अपनी कलाई काट ले तो लड़की यही समझ बैठती है कि वही उसका सच्चा प्रेमी है। समय की गति के साथ पसंदगी का दायरा बदलता रहता है। हाल ही में आई फिल्म ’रांझना’ में ऐसा ही कुछ देखने को मिला जिसमें नायिका जब स्कूल की छात्रा होती है, नायक द्धारा कलाई काट लिए जाने पर उस पर मर मिटती है। यह बात जब उसके प्रोफेसर पिता को पता चलती है तो वह उसे पढ़ने के लिए शहर से बाहर भेज देता है। नायिका समय के साथ उसके लिए कलाई काटने वाले लड़के को भूल जाती है और उसका प्रेम विस्तार पाकर नया प्रेमी चुनता है। हालांकि कई बार किशोरावस्था का प्रेम सारी उम्र का प्रेम भी बना रह सकता है। पर अहम सवाल यह है कि हमें चुनाव की आजादी कहां है? हमारे यहां स्त्री-पुरूष सदैव एक दूसरे के लिए रहस्य का विषय बने रहते हैं। इस रहस्य को जानने के लिए हमारी युवा पीढ़ी अश्लील वीडियो, पत्रिकाएं आदि का सहारा लेती हैं। इन साधनों से प्राप्त जानकारी सदैव उनके लिए घातक सिद्ध होती है। स्कूल की दीवारों पर, सार्वजनिक स्थलों, ट्रेन, बस इत्यादि स्थलों पर उकेरे गए अश्लील चित्रों और कथनों का क्या मतलब निकाला जाए? क्या ये दमित कामभावना का परिणाम नहीं है? घर, स्कूल व इससे बाहर की दुनियां में यौन विषय पर स्वस्थ तरीके से बात नहीं होती है, क्यों? मुझे इस विषय पर विचारक ओशो की बात शत-प्रतिशत सही लगती है कि बालक-बालिकाओं के साथ हमें यौन को लेकर स्वस्थ और उचित तरीके से बातचीत करनी चाहिए। हम उन पर जितना रोक लगाएंगे, वे उतना ही हमारे खिलाफ जाकर गलत तरीके से अपने मन की जुगुप्सा को शांत करने का प्रयास करेंगे।

(लोक शिक्षक मंच ब्लॉग के लिए शिक्षक साथियों को अपने विद्यालयी अनुभव साझा करने को आमंत्रित करता है। यह आवश्यक नहीं है कि इस लेख में दर्ज विचारों से मंच की सहमति हो।)


Thursday, 15 August 2013

खबरों से: पीपीपी की भेंट चढ़ता गरीब बच्चों का भविष्य

पंजाब के गरीब बच्चों को बेहतर शिक्षा की सुविधा मुहैया करवाने की तत्कालीन सरकार की कोशिशे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। बादल ड्रीम के नाम से शुरू किए गए आदर्श स्कूलों में 24 में से 10 स्कूल योजना के आरंभ होने के कुछ दिन बाद ही बंद कर दिए गए और 12 बंद होने की कगार पर है। जो स्कूल अभी चल रहें है उनमें आधारभूत सुविधाएं नदारद है। प्रदेश की शिरोमणी अकाली दल और भाजपा गठबंधन की सरकार ने पंजाब शिक्षा विकास बोर्ड के तहत इन आदर्श स्कूलों की स्थापना की थी। यहां निजी भागीदार भारती एंटरप्राइजेज है। इसके सीइओ का कहना है कि सराकरी शिक्षा व्यवस्था में बड़ी खामियां है इसलिए पीपीपी स्कूल ही देश का भविष्य है। पंजाब के ये स्कूल पब्लिक-प्राइवेट साझोदारी (पीपीपी) के तहत शुरू किए गए। प्रदेश शिक्षा विभाग ने प्रति छात्र 1680 रू प्रति माह ओपरेटिंग कॉस्ट तय की थी, जिसे सरकार और निजी निवेशेकों के बीच 70 और 30 के अनुपात में व्यय किया जाना था और इन स्कूलों के लिए जमीने पंचायत से 99 वर्ष के लीज पर ली गई। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी में पाया गया की पंचायतों के साथ सरकार ने विश्वासघात करते हुए जमीनों के मालिकाने के साथ स्कूल भी निजी हाथों में सौंप दिए। बच्चों की शिक्षा के लिए मिला फंड भी डकार गए। ये स्कूल गरीब बच्चों को मुफ्त व बेहतर शिक्षा देने के लिए खोले गए थे जबकि आडिट के दौरान पाया गया कि यहां बच्चों से ऊँची फीस वसूली गई। जो स्कूल बंद कर दिए गए वहां से तमाम जरूरी जानकारियां और स्कूली संपत्ति जैसे की बसें और फर्नीचर गायब पाए गए। बच्चों के भविष्य के साथ जो खिलवाड़ हुआ वो तो हुआ ही साथ ही शिक्षको  और गैर शिक्षकीय विभाग का भी शोषण किया गया, उन्हें मैंनेजमेंट के तहत खोले गए दूसरे पोलिटेक्निक कॉलेजों के प्रचार प्रसार में लगाया गया, उनके वेतन में कटौती की गई। जिन अध्यापकों ने बगावत की उन्हें निकाल दिया गया। तो यह हाल है इन आदर्श स्कूलों का, न मालूम ये कौन से आदर्श स्थापित कर रहें है? इन स्कूलों की स्थापना पब्लिक -प्राइवेट साझोदारी के तहत ग्रामीण बच्चों को मुफ्त व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की लिए की गई थी पर इसकी परिणति आपके सामने हैं। पंजाब ही नहीं दूसरे राज्यों में भी इस तरह के प्रयोग किए जा रहें है और बच्चों के भविष्य पर दाव लगाया जा रहा है, सारे प्रयोग इन गरीब व सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चों पर ही क्यों किए जाते है? स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग, भारत सरकार क़ी देश में पीपीपी माडल के तहत 2500 स्कूल सन 2015-16 तक खोलने की योजना है। पीपीपी की संकल्पना ऊपर से देखने पर बड़ी भली लगती है और सरकार ने इसकी संकल्पना भी बड़ी खूबसूरती से पेश की है पर असलियत यह है कि शिक्षा को निजी हाथों में पूरी तरह से सौंप दिए जाने की मंशा है। हमारे देश के कानून में शिक्षा को लाभ से दूर रखने की बात कही गई है पर हो कुछ और ही हो रहा है। वैसे सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों का चलन तो पहले से ही है पर मॉडल स्कूलों में नई बात यह होगी की निजी संस्थाओं को स्कूली जमीन का अपने दूसरे उह्नेश्यों जैसे की वोकेशनल ट्रेनिंग व दूसरी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने की छूट रहेगी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके प्रावधानों में कहा गया है कि 40 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए होंगी और 60 प्रतिशत सीटें निजी भागीदार तय करेगी। उन 40 प्रतिशत बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाएगी और बाकी बच्चों की फीस निजी भागीदार तय करेगी तो क्या हम यह अंदाजा नहीं लगा सकते जैसा कि देश के प्रमुख शिक्षाविद कह रहे हैं कि इससे निजीकरण और व्यवसायीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
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