Tuesday, 13 October 2026

निपुण भारत' के तहत स्कूलों में OMR शीट्स-युक्त मूल्याँकन प्रक्रिया पर शिक्षकों के सवाल

दिल्ली नगर निगम के एक शिक्षक का अनुभव 

हमारे स्कूल में कल होने वाली 'निपुण' परीक्षा के लिए पिछले लगभग 4 घंटों में कक्षा की एक विषय की OMR शीट्स भरने के दौरान मुझे 'दिन में तारे दिखना' (और रात में? सूरज?), 'नानी याद आना' जैसे मुहावरों के साक्षात दर्शन हुए। साथ ही, चार्ली चैपलिन की मॉडर्न टाइम्स का वो बहु-चर्चित सीन रह-रहकर याद आया जिसमें बतौर मशीनी श्रमिक चार्ली के हाथ असेंबली लाइन से हटने के बाद भी यांत्रिक तरीके से हिलते रहते हैं। मुझे भी लग रहा है: ख़बरदार! अगर इस वक़्त कोई मेरे सामने आया तो मैं उसके शरीर को bubbles (बबल्स/बुलबुलों) से छलनी कर दूँगा। 

अमरीका में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश तथा बिल क्लिंटन दोनों सरकारों में शिक्षा प्रशासन की सहायक सचिव रहीं Diane Ravitch की 2010 में प्रकाशित The death and life of the great American school system भी याद आई जिसमें उन्होंने ऐसे मूल्याँकन की अनुभवजनित आलोचना की है और दिखाया है कि कैसे देखते-देखते उत्कृष्टता के नाम पर लाया गया अभियान टेस्टिंग (मूल्याँकन) के सिलसिले में बदल गया। उन्होंने अपने लंबे और नज़दीकी (अंदरूनी) अवलोकन के आधार पर पाया कि इस तरह की नीति ने कमज़ोर पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को स्कूलों में दरकिनार या बाहर किया, अकादमिक रूप से बेहतर विद्यार्थियों के स्तर से समझौता किया और अंततः शिक्षा को वृहद तथा मापे न जा सकने वाले आयामों एवं विषयों के बदले गोले भरने तक सीमित कर दिया। इसका एक प्रमुख कारण स्कूलों तथा शिक्षकों पर येन-केन-प्रकारेण श्रेष्ठ परिणाम प्रस्तुत करने का दबाव था।  

मुझे पूरा विश्वास है कि इस तरह की केंद्रीकृत और मशीनी मूल्याँकन पर आधारित परीक्षा, गुणवत्ता की बात जाने दीजिए, ख़ुद मात्रात्मक मानकों पर ही - जिनमें कार्यक्षमता (efficiency व productivity) का दावा ठोककर तथा अधिक निर्विवादित रूप से पेश किया जाता है - ख़ारिज किए जाने योग्य है। अगर मानव श्रम, समय व संसाधनों का मात्रात्मक हिसाब लगाया जाएगा, तो निश्चित ही ये परीक्षा प्रणाली फ़ुज़ूलख़र्ची के कीर्तिमान स्थापित करती रंगे हाथों पकड़ी जाएगी। स्कूली शिक्षा/पाठ्यचर्या व शिक्षकों को अधिक ज़रूरी कार्यकलापों/गतिविधियों, योजनाओं व उद्देश्यों से दूर रखने की बात तो जाने ही दीजिए।

ऐसे दुर्लभ अनुभवों से ग़ुज़र रहे NEP 2020 के प्रशंसक व मंत्रमुग्ध साथियों से यही कहना है -                               इब्तदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या 
                           आगे-आगे देखिये, होता है क्या


दिल्ली सरकार की एक प्राथमिक शिक्षिका का अनुभव 

एक अन्य Training के दौरान मैंने ये सवाल पूछा कि क्या ऑब्जेक्टिव है, OMR sheets का? जवाब: आगे काम आएगी। 
सवाल: आगे कहाँ? पेपर तो online हो रहे हैं! 
जवाब : बड़ी क्लासेज़ के बच्चों को भी भरनी नहीं आती। 
सवाल : इसकी जरूरत क्या है? क्यों सीखनी है? 
जवाब : हमे भी इतना ही पता है। ऊपर से आया है।
जवाब : पिछली बार टीचर्स को ऑनलाइन काम में दिक़्क़तें आईं, हर सवाल का जवाब पोर्टल पर डालना था; ये काम गर्दन झुका कर करने वाला था। [शायद इससे प्रैक्टिस हो जाए!]
अन्य शिक्षका का सवाल: OMR किधर देख कर भरनी है? 
जवाब: 'इसका हम भी कुछ नहीं कर सकते, ये ऊपर से डिसाइड हुआ है।'
एक अन्य अध्यापिका ने पूछा: तो क्या आप सबका भी हम जैसा ही हाल है? 
जवाब: आपसे बुरा हाल हमारा है।

दिल्ली सरकार की एक अन्य प्राथमिक शिक्षिका के विचार 

शोध की दुनिया में प्रचलित शब्द प्रतिमान अंग्रेजी के ‘पैराडाइम’ शब्द का हिंदी अनुवाद है. शिक्षण के क्षेत्र में यह शब्द वर्तमान में अपने भीतर बाल-केंद्रित शिक्षण, लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित शिक्षण, समझ-आधारित तथा विवेचनकारी शिक्षण आदि समेटे हुए है.
शिक्षण और सीखने का यह प्रतिमान माँग करता है कि कक्षा में सूचनाओं, विचारों और दृष्टियों को मात्र पूर्व प्रदत्त ज्ञान की तरह स्स्वीकार न किया जाए, बल्कि विवेचना की जाए.  
ज्ञान की विवेचना किसी तरह का ‘रैपिडफायर' कतई नहीं है जोकि एकदम से कुछ दिनों, हफ़्तों और महीनों की कठोर तयशुदा (पूर्व-निर्धारित) शिक्षण योजनाओं द्वारा हू-ब-हू प्राप्त कर ली जाए. विवेचना समय और ठहराव की मांग करती है, विचारों की उथल-पुथल की माँग करती है और प्रश्नों की माँग करती है. आखिरकार शैक्षिक जगत के तमाम तरह के प्रचलित दर्शन, मनोवैज्ञानिक अवधारणाएं और साहित्य रातों-रात उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि समय, सवाल तथा विचार-विमर्शों के परिणामस्वरूप सृजित हुए हैं. सूचनाओं और ध्वनियों के यांत्रिक शिक्षण-अधिगम से न तो कभी साहित्य सृजित हो पाया है और न ही रचनात्मक ज्ञान पोषित हो पाया है. 

फिर मैं यहाँ क्या कर रही हूँ? क्या मैं अपने विद्यार्थियों को उपरोक्त बातें सिखा रही हूँ? मैं तो पिछले कई दिनों से इन OMR शीट्स को भरने में व्यस्त हूँ। घंटों के इस OMR-भरण प्रक्रिया से क्या मेरे विद्यार्थी कक्षा में कुछ सृजित करना सीखेंगे? मैं सुबह से दोपहर, स्कूल खत्म होने तक - और उसके बाद घर पर भी - अँगुली की पोर से भी छोटे गोलों में पेंसिल घुमाने में व्यस्त हूँ!

OMR शीट में कक्षा दो से आठ के बच्चों की पठन एवं अंक गणना में दक्षता को जाँचने के लिए ‘रुब्रिक’ पर आधारित सवाल क्या मुझे दिमागी रूप से पंगु और मेरे छात्रों को रोबोटिक बना रहे हैं?

पिछले एक हफ्ते से मैं खुद को समेटे हुए, सिर्फ़ OMR पर लिखे अंकों और उन अंकों के नीचे खाली पड़ी जगह (गोलाकार) को देख रही हूँ। 
हालाँकि, यह दावा किया गया है कि भारत अब डिजिटल हो गया है। फिर भी, अपनी कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी की सभी सूचनाएं मुझे हाथ से OMR के इन अंगुली के पोर से भी छोटे गोलों में क्यों भरनी पड़ रही हैं? 
क्या यह हमारे विद्यार्थियों से बड़ी बेईमानी नहीं है कि हम उन्हें सोचने-समझने, विचार-विमर्श से दूर, सिर्फ़ अक्षरों और अंकों की कोरी पहचान को दिमाग़ में ठूंसकर, OMR शीट में दिए गए विकल्पों में उड़ेलने की कंडीशनिंग कर रहे हैं? और क्या यह हम शिक्षकों के साथ एक बड़ी धोखेबाज़ी नहीं है कि हमें शिक्षण की बजाय एक और सुन्न, विचारहीन, यांत्रिक काम में धकेल दिया गया है?

यह सार्वजनिक स्कूली शिक्षा का भौंडापन है कि मजदूरों (जिसमें प्रत्येक कामकाजी व्यक्ति शामिल है - दिमागी और शारीरिक मेहनतकश, दोनों) की कड़ी मेहनत का पैसा (जिससे एक व्यवस्था को चलाया जाता है), उनके बच्चों को मजदूर बनाने के लिए, सरकारों द्वारा निपुण जैसे दोयम दर्जे के कार्यक्रमों पर बिना विचार झोंका रहा है. शिक्षकों की सृजनात्मक उर्जा को चूस लेने वाले इन कार्यक्रमों में शिक्षकों की बौद्धिक क्षमताओं की आहुति चढ़ा दी गई है. और शिक्षण का पूरा प्रक्रम धुआँ-धुआँ हो रहा है जिसमें हम सब बस कुछ स्पष्ट दिखने-देखने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं. 

अंत में, एक अन्य साथी शिक्षिका के शब्दों में, 

शायद सरकार एक दिन हमें जवाब दे कि शिक्षित-प्रशिक्षित तथा अनुभवी अध्यापकों से गोले भरवाने के इस कार्य ने आखिर कितना मज़बूत किया शिक्षा व्यवस्था को! 

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