Monday, 21 September 2026

इस खुले झूठ को, ज़हन की लूट को ............हम नहीं मानते, हम नहीं जानते!

 लोक शिक्षक मंच उन तमाम राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के शिक्षा विभागों तथा ऐसे सभी शिक्षा संस्थानों के उन आदेशों की कड़ी निंदा करता है जिनके तहत कर्मियों, शिक्षकों व विद्यार्थियों को 17 सितंबर की शाम 6 से 7/8 बजे के बीच शिक्षा परिसर में उपस्थित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर 'आशीर्वाद' के दीये जलाने को कहा गया था। इस संबंध में समय पूर्व औपचारिक आदेश जारी न करने और फिर अंतिम समय पर अनर्गल व आँखों-ही-आँखों में इशारा करने वाले आदेश जारी करने का अंततः नाकाम उद्देश्य फ़ज़ीहत व जनता के रोष से बचना ही था। निर्लज्ज, अमर्यादित व पाखंडी सत्ता के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त करते हुए, इस आयोजन के लिए शिक्षा विभागों द्वारा राजकीय कोष से दीये, तेल व बाती उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की गई थी। शिक्षा संस्थानों, शिक्षकों, विद्यार्थियों व अन्य कर्मियों के समय, ऊर्जा तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जो जबरन बलि ली गई, वो अपने आप में एक आपातकालीन प्रशासन के एक और घृणित उदाहरण के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।  

इस आदेश ने स्कूलों व उच्च शिक्षा के संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप की क्षुद्रता, तानाशाही व चाटुकारिता की ऐसी मिसाल पेश की है कि किसी भी सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए इसका समर्थन करना तो दूर, इसका बचाव करना भी बेहद शर्मसार करने वाला विचार है। हम इसका विरोध करने के कारणों का हवाला देने की भी ज़रूरत महसूस नहीं करते। ऐसे बेहूदा आदेश का विरोध करने के पक्ष में तर्क देना भी शिक्षकों की बुद्धिमता, विवेक व आत्मसम्मान की तौहीन होगी। प्रशासन और सरकार भले ही शिक्षकों को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते रहें, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब तानाशाहों ने छल और बल से अपनी झूठी शान में भीड़ जुटाई है (चाहे शिक्षक, चाहे आंगनवाड़ी महिलाएँ, चाहे स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी), तब-तब उनकी पोल खुलने और सिंहासन हिलने में ज़्यादा समय नहीं लगा है। हम उन सभी कर्मियों, विद्यार्थियों व शिक्षकों का अभिनंदन करते हैं जिन्होंने इस अनैतिक व तानाशाही आदेश का पालन न करते हुए अपने संस्थानों में जबरन थोपे गए 'आशीर्वाद' कार्यक्रम का बहिष्कार किया। 

जैसा कि तय था, इस आदेश का पालन न करने या इसका विरोध करने पर अब शिक्षा संस्थानों द्वारा विद्यार्थियों, शिक्षकों के ख़िलाफ़ दमनकारी प्रशासनिक प्रताड़ना की ख़बरें आनी शुरु हो गई हैं। उदाहरण के लिए, एक तरफ़ जम्मू आईआईएम प्रशासन ने उन विद्यार्थियों पर 500 रुपये का जुर्माना लगाते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है जो 17 सितंबर की शाम परिसर में दीप जलाने के कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए थे; दूसरी तरफ़, बिहार के मुज़्ज़फ़्फ़रपुर ज़िले में ऐसे स्कूली शिक्षकों से जवाब तलब किया गया है जो इस कार्यक्रम में अनुपस्थित रहे। 'आशीर्वाद' नाम के इस कार्यक्रम ने कई संस्थानों में ऐसा माहौल विकसित किया जिसके तहत मौखिक रूप से ग़ैर-शैक्षणिक कर्मियों को बिना किसी भरपाई के स्कूल की छुट्टी के बाद भाजपा नेताओं जैसे 'गणमान्य मेहमानों' की आवभगत में व्यवस्था देखने के लिए लगभग पूरे एक स्कूली दिवस अतिरिक्त उपस्थित रहने के श्राप के भागी होने को बाध्य किया गया।  

हम याद दिलाना चाहते हैं कि शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही सत्ता या उसके चाटुकारों के प्रति नहीं, बल्कि जनता व शिक्षा के मूल्यों के प्रति है। सत्ता के आशीर्वाद का लाभ उठाने के लिए सांस्थानिक राजनीतिक निरपेक्षता को तिलांजलि देना शिक्षा संस्थानों की गरिमा व न्यूनतम नियमित कामकाज तक के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। 
लोक शिक्षक मंच जम्मू आईआईएम के संबंधित अधिकारी, बिहार के विभिन्न ज़िलों के शिक्षा पदाधिकारियों तथा ऐसे तमाम शिक्षा संस्थानों के अधिकारियों के उपरोक्त उल्लिखित आदेशों पर अपनी घोर आपत्ति दर्ज करते हुए उन्हें तत्काल वापस लेने और संबंधित विद्यार्थियों, कर्मियों तथा शिक्षकों से माफ़ी माँगने और उपस्थित रहे कर्मियों को उसके एवज़ में छुट्टी प्रदान करने की माँग करता है। साथ ही, मंच शिक्षा संस्थानों को चेताता है कि वो लोकतांत्रिक प्रशासन की मर्यादा का पालन करें और कर्मियों, विद्यार्थियों तथा शिक्षकों को प्रचारवादी अशैक्षिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए बाध्य करने एवं उनके ख़िलाफ़ किसी भी प्रताड़ना की कार्रवाई करने से बाज़ आएँ।    
               
             हम शिक्षक ग़ुलाम रोबोट और ज़िंदा लाश बनने से इंकार करते हैं!   

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