Wednesday, 21 February 2018

पर्चा: आइए, एकजुट होकर वेतन व गरिमा की लड़ाई लड़ें!!



साथियों,


यह घोर विडंबना है कि एक महाशक्ति और विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर देश की राजधानी तक में हम शिक्षकों को महीनों से समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा है और हम अपने वेतन की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। इससे न सिर्फ़ हमारा मनोबल टूट रहा है, बल्कि हम क़र्ज़ा लेने व लोन की क़िस्तें न भर पाने की स्थिति में आ गए हैं। स्कूलों को दलगत व क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बनाकर टेस्ट परिणामों और दिखावे के दबाव में राज्य सरकार व निगम के बीच जो खींचातानी चल रही है, उसका खामियाजा हम शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है। 
एक तरफ़ दिल्ली सरकार अपने शिक्षकों को परिणामों व हाज़िरी के आधार पर मेमो पर मेमो दिये जा रही है, दूसरी तरफ़ निगम भी दिल्ली सरकार की शिक्षा व बाल-विरोधी नीति की नक़ल करते हुये विद्यार्थियों को टेस्ट के आधार पर विभाजित करने और स्कूलों को केवल साक्षरता-केंद्र तक सीमित करने की योजना बना रहा है। इन्हीं टेस्ट्स के बहाने एनजीओ के धंधे और स्कूलों में अप्रशिक्षित वॉलंटियर की भूमिका को और बढ़ाया जाएगा। यह सबकुछ हम शिक्षकों को नाकाम, नाकारा बतलाकर किया जा रहा है। हमारी एसीआर में भी विद्यार्थियों द्वारा स्कूल छोड़ने के लिए हमें ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि हम जानते हैं कि इसके पीछे स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं की कमी, बच्चों के परिवारों के आर्थिक व शैक्षिक हालात और (विशेषकर लड़कियों के मामले में) सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ ज़िम्मेदार होती हैं।





डिजिटलाइज़ेशन के तहत हम लगातार अपनी कक्षाओं, विद्यार्थियों को छोड़कर ऑनलाइन आँकड़े भेजने में लगे रहते हैं। चाहे वो वैसे ही नाममात्र के वज़ीफ़े हों, प्रवेश प्रक्रिया हो या व्यवस्था के ईमानदार, पारदर्शी व सुलभ हो जाने के दावे, हम सब जानते हैं कि ऑनलाइन की हक़ीक़त क्या है। बच्चे व अभिभावक बैंकों के चक्कर लगाने और कतारों में लगकर अपना वक़्त और दिहाड़ी गँवाने को मजबूर किए जा रहे हैं। सुविधाएँ लोगों की पहुँच से दूर व जटिल होती जा रही हैं। शिक्षा अधिकार क़ानून चाहे काग़ज़ों में हमारे लिए ग़ैर-शैक्षणिक काम को प्रतिबंधित करता हो, इस लंबी होती सूची के लिए कोई कर्मचारी नहीं है। हाँ, नित नए आदेश भेजने और तत्काल रपट माँगने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था प्रशासन को ज़रूर जँचती है। 
सफ़ाई कर्मचारी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, मगर स्वच्छता का प्रदर्शन करने का इतना दबाव है कि हमने ख़ुद को ही नहीं बल्कि अपने विद्यार्थियों तक को उनकी पढ़ाई व स्वास्थ्य की क़ीमत पर झोंक दिया है। शौच जैसे निजी मामलों तक के लिए हमारे आत्म-सम्मान को कुचलकर हलफ़नामे भरवाये जा रहे हैं। हमारी तमाम निजी जानकारी को यू-डाइस पर भरवाया जा रहा है और हमारे निजता के अधिकार को कुचला जा रहा है। हमें इस लायक़ नहीं समझा जा रहा कि हम अपने प्रशिक्षण, पेशागत विवेक, अनुभव व अपनी योजना के हिसाब से शिक्षण और स्कूल की प्रक्रिया तय कर सकें। किस दिन विद्यार्थियों को कौन-सा भाषण जबरन पिलाना है, कौन-से दिन पढ़ाई नहीं करानी है, कौन-सा कार्यक्रम करना है, कौन-सी गतिविधि से कोई कार्यक्रम सम्पन्न करना है, यह सब हमें अनिवार्य आदेशों के तहत बताया जा रहा है। मानो स्कूलों व शिक्षकों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही न हो, हम महज़ एक मशीन के पुर्ज़े हों।
हम सब जानते हैं कि निगम से लेकर राज्य व केंद्र सरकार तक को शिक्षा में न तो आकादमिक गहराई की चिंता है और न ही सब बच्चों को समान अधिकार देने की। हाँ, अगर ऑनलाइन डाटा न भरा-भेजा जाये तो हम पर ज़रूर कार्रवाई होती है। शिक्षकों पर अपराधी की तरह नज़र रखने की दृष्टि से कक्षाओं में सीसीटीवी लगाने की घोषणा दिल्ली सरकार कर ही चुकी है, कई राज्यों में – दिल्ली के कुछ स्कूलों में भी – बायोमेट्रिक हाज़िरी से निगरानी रखी जाने लगी है। आज न सिर्फ़ बड़ी-बड़ी कंपनियाँ निजी डाटा का कारोबार करती हैं, बल्कि यह हमारी सरकारों के लिए नागरिकों की जासूसी करने व हमको क़ाबू में रखने का औज़ार भी है। इस क्रम में हम पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साथियों द्वारा ऑनलाइन कार्य का बहिष्कार करने के फैसले का स्वागत करते हैं।
चाहे वो न्यूनतम वेतन हो या ठेके पर नियुक्तियाँ या यूनियन बनाने पर बढ़ती पाबन्दियाँ, साम्राज्यवादी-पूंजीवादी ताक़तों के ये हमले केवल शिक्षा पर नहीं हो रहे, बल्कि इनकी मार मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों पर भी पड़ रही है और जनता के जल-जंगल-ज़मीन व संसाधनों को अपनी लालच की हवस का निशाना बना रही है। और ये हमले केवल भारत में ही नहीं,
बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च-शिक्षा तक में जन-विरोधी और पूँजी को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ अपनाई जा रही हैं। सार्वजनिक यूनिवर्सिटी-कॉलेज को कहा जा रहा है कि वो फ़ीस बढ़ाकर और निजी कंपनियों से क़रार करके अपने ख़र्चे का एक बड़ा हिस्सा ख़ुद जुटाएँ। ज़ाहिर है कि एक तरफ़ इससे शिक्षा उन वर्गों से दूर होती जाएगी जिनकी पहुँच आज भी बेहद सीमित है, बल्कि जब निजी कंपनियों की जरूरतों के मुताबिक़ पढ़ाया जाएगा तो शिक्षा का चरित्र जनविरोधी और ज्ञानविरोधी भी होता जाएगा। अगर हमने आज कमर कसकर इन नीतियों का विरोध नहीं किया तो कल हमारे पास न सार्वजनिक स्कूल बचेंगे और न हमारे पेशे की गरिमा और आज़ादी|
हम माँग करते हैं कि
Ø  तुरंत प्रभाव से शिक्षकों के वेतन, एरियर्स व फंडस के नियमित भुगतान की व्यवस्था की जाए।
Ø  शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले सीसीटीवी व बायोमेट्रिक हाज़िरी के फ़रमान को वापस लिया जाये।
Ø  स्कूलों में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नियुक्ति की जाए और शिक्षकों से यह काम न लिया जाए।
Ø  टेस्ट परिणामों, एसीआर, मेमो, स्वच्छता अभियान का तानाशाही दबाव तुरंत हटाया जाए।
Ø  आउटसोर्सिंग, पीपीपी, एनजीओकरण आदि के ज़रिये निजीकरण करने की नीति को बंद किया जाए।
Ø  शिक्षा व्यवस्था को समानता व सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों पर मज़बूती से खड़ा किया जाए।

Thursday, 8 February 2018

दिल्ली सरकार के नाम विरोध पत्र


लोक शिक्षक मंच, जोकि शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षा के शोधार्थियों का संगठन है, दिल्ली सरकार द्वारा स्कूलों के सभी कमरों में सीसीटीवी लगाने की घोषणा की कड़ी शब्दों में निंदा करता है। साल के शुरु होते ही दिल्ली सरकार द्वारा घोषणा की गयी कि स्कूलों के सभी कमरों में सीसीटीवी कैमरे लगाये जायेंगे। मुख्यमंत्री ने बयान दिया कि इससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और अभिभावकों को कक्षाओं का सीधा प्रसारण उपलब्ध होगा जिससे वो पढ़ाई पर भी नज़र रख पायेंगे।   
यह योजना न सिर्फ़ शिक्षक-विरोधी है बल्कि मूलतः शिक्षा व स्कूलों की ग़लत समझ पर भी आधारित है। स्कूल आकादमिक स्थल हैं जिनमें शिक्षक एक बौद्धिक-नैतिक ज़िम्मेदारी के साथ काम करते हैं और बच्चे एक खुले माहौल में सीखते हैं। चाहे यह शिक्षकों पर नज़र रखने के लिए हो या बच्चों पर, कक्षा में कैमरे लगाने का मतलब शिक्षकों व बच्चों पर अविश्वास करना और उन्हें अपमानित करना है। कैमरे की उपस्थिति प्रायः जो डर व दबाव पैदा करती है वो बेहतर शिक्षण-अधिगम के प्रतिकूल है। यह शिक्षा का मशीनीकरण करेगा और शिक्षण प्रक्रिया को प्रदर्शनमुख बनाएगा। हमारे स्कूलों में शारीरिक दंड का गिरता चलन और इसके प्रति बदला रवैया यह बताता है कि हिंसा के प्रश्न को पुलिसिया निगरानी से नहीं बल्कि सांस्कृतिक-राजनैतिक बदलाव से निपटना होगा। ऐसा भी नहीं है कि स्कूलों में बच्चों या शिक्षकों के बीच जो तरह-तरह की समस्याएँ आती हैं उनसे जूझने के लिए हमारे पास सिर्फ़ तथाकथित अपराधी की पहचान करने और उसे पकड़ने के ही विकल्प रहते हैं। स्कूलों में अगर समस्यायेँ हैं भी तो हम उनका अपराधिकरण करके उनसे पुलिस की तरह नहीं निपटते बल्कि अपने विवेक, मानवीकरण और संवाद का इस्तेमाल करते हैं। शिक्षक होने के नाते हमारे पास कई बारीक, शिक्षागत और परिपक्व तौर-तरीक़े होते हैं। केवल अपराधी को पकड़ने वाले उपायों पर ज़ोर देने से हम कभी भी यह पड़ताल नहीं कर पायेंगे कि आख़िर वो कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जिनसे कुछ किशोरों के व्यवहार में एक ख़ास संकट व्यक्त हो रहा है या इस संकट का चरित्र और मूल क्या है। फिर हर सीसीटीवी फ़ूटेज व्यापक संदर्भ से कटा होता है और क्षणभर या घटना विशेष के विडियो पर फ़ोकस करके उन परिस्थितियों को हमारी नज़रों से ओझल कर दिया जाता है जो उसके लिए ज़िम्मेदार हैं। एक तरफ़ हम शिक्षकों को सुरक्षा और जवाबदेही के नाम पर मकड़जाल में फंसाया जा रहा है, दूसरी तरफ़ जनता को सुधार के सब्ज़बाग़ दिखाये जा रहे हैं।     
क्या सरकार यह कहना चाहती है कि उसके स्कूलों के हर विद्यार्थी के अभिभावक के पास स्मार्ट-फ़ोन होना चाहिए? क्या कक्षा का लाइव-फ़ीड देने से इस संभावना को पूरी तरह नकारा जा सकता है कि छात्र-छात्राओं के उठने-बैठने तथा निजी व उन्मुक्त पलों के विडियो का दुरुपयोग नहीं होगा? क्या सरकार को यह अधिकार है कि वो उन बच्चे-बच्चियों की विडियो रिकॉर्डिंग करके उसे प्रसारित कर दे जो एक विश्वास के तहत उसके स्कूलों में आ रहे हैं? हमारे घर-परिवारों से भी हिंसक घटनाओं की खबरें आती रहती हैं, तो क्या कल हम सभी घरों में कैमरे लगाकर उनका लाइव फ़ूटेज सार्वजनिक करने का उपाय अपनाएँगे? ख़ुद विद्यार्थियों, विशेषकर छात्राओं द्वारा आपसी चर्चा में इसे बिग बॉस रूपी जासूसी की तरह देखा जा रहा है। जिस दमघोंटू सामाजिक माहौल से छात्राएँ आती हैं उस संदर्भ में उन्हें स्कूलों से विश्वास और सहयोग की ज़रूरत है न कि और अधिक निगरानी की। इसकी संभावना प्रबल है कि जब कक्षाओं में विद्यार्थियों की गतिविधियाँ उनके अभिभावकों की नज़रों में रहेंगी तो वो अपने बच्चे-बच्चियों की पढ़ाई ही नहीं बल्कि दोस्ती, बातचीत, आपसी व्यवहार और मेल-मिलाप पर और भी प्रतिकूल दबाव डालने की स्थिति में होंगे। हमारे परिवारों का सामंती-पितृसत्तात्मक चरित्र कक्षा के सीसीटीवी फ़ूटेज से और मज़बूत होगा जोकि विशेषकर लड़कियों की आज़ादी और सीमित करेगा। स्कूलों में विद्यार्थियों को एक ऐसा सार्वजनिक स्थल मिलता है जहाँ वो जाति-धर्म की जकड़नों से परे जाकर आधुनिकता से प्रेरित मित्रता गढ़ सकते हैं। सीसीटीवी से स्कूलों की संस्कृति और भूमिका और अधिक प्रतिक्रियावादी तथा छात्र/छात्रा विरोधी हो जाएगी।     
कैमरों का इस्तेमाल जेलों में क़ैदियों की निगरानी रखने के लिए किया जाता है। यह इन्सानों की गरिमा पर एक निष्ठुर व निरंकुश सत्ता का हमला है जिसे हम शिक्षक स्वीकार नहीं कर सकते हैं। चाहे वो हिंसा का सवाल हो या शिक्षा के तथाकथित स्तर का, इनकी जड़ें समाज के अमानवीय ढाँचे और संस्कृति में हैं। निजी स्कूलों के अनुभव बताते हैं कि प्रशासन द्वारा कैमरे का इस्तेमाल स्कूलों में भी उसी तरह से होता है जिस तरह दुकानों व कारख़ानों में कर्मचारियों/मज़दूरों के शोषण के लिए होता है – कहीं कुर्सी पर बैठने पर रोक लगा दी जाती है, कहीं कपड़ों पर सवाल खड़े कर दिये जाते हैं। सीसीटीवी लगाने से यह सत्ता मज़बूत ही होगी। अगर सरकार को समाज के कमज़ोर-मेहनतकश वर्गों की सुरक्षा की इतनी ही चिंता होती तो वो उन कारख़ानों की अमानवीय व ग़ैर-कानूनी परिस्थितियों पर नज़र रखती जिनमें मज़दूरों का शोषण होता है। फिर शायद बवाना में उन दर्जनों महिलाओं व बच्चों की मौत नहीं हुई होती जो कारखाने की आग में जलकर राख हो गए। रहा स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा का सवाल तो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार, की एक रिपोर्ट के अनुसार स्कूल बच्चों के लिए आज भी सबसे सुरक्षित स्थल हैं।
ज़रूरत इस बात की है कि स्कूलों में सभी पदों पर नियमित नियुक्तियाँ की जाएँ, एक भय व शोषण मुक्त संस्कृति का निर्माण किया जाए और बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े क़ानूनों – POCSO (The Protection of Children from Sexual Offences Act), 2012 और POSH (Sexual Harassment of Women at Workplace Act), 2013 – को लागू करके उनके प्रावधानों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाये। शिक्षा विभाग के सभी स्तरों पर शोषण-विरोधी समितियों का गठन किया जाये। जहाँ सरकार जनता का इतना पैसा ऐसे उपकरण पर ख़र्च करके निजी कंपनियों को मुनाफ़ा दिलाने पर उतारू है वहाँ यह पूछने की भी जरूरत है कि वो कौन-से अन्य तरीक़े हो सकते हैं जिनसे स्कूलों में बेहतर ढंग से एक स्वस्थ माहौल बनाया जा सके। यह तो ऐसा है कि हम एक समस्या से जूझने के लिए उससे बड़ी एक अन्य समस्या खड़ी कर लें।      
सीसीटीवी का यह बेहूदा प्रस्ताव सरकार के इस दावे को भी ख़ारिज करता है कि उसका शिक्षा-दर्शन व नीति केंद्र सरकार से अलग या अधिक प्रगतिशील है। सच तो यह है कि चाहे वो स्कूलों की रैंकिंग करना हो या school of excellence के नाम से शिक्षा में ग़ैर-बराबरी की एक और परत बनाकर अपनी सार्वजनिक ज़िम्मेदारी से पलटना हो, दिल्ली सरकार की नीतियाँ कहीं से भी केंद्र सरकार की मंशाओं से जुदा नज़र नहीं आती हैं। ये सभी उदाहरण साबित करते हैं कि केंद्र सरकार की तरह ही दिल्ली सरकार की शिक्षा नीतियाँ भी नवउदारवाद की चाकरी कर रही हैं।           
लोक शिक्षक मंच आपसे अपील करता है कि दिल्ली सरकार की इन शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ लामबंद होकर पुरजोर विरोध करें।


Saturday, 30 December 2017

स्कूलों को कंक्रीट बनने से बचाएँ!

यह खुला पत्र एक विद्यालय में मैदान को खत्म करने के प्रस्ताव के विरोध में उस विद्यालय के कुछ शिक्षकों ने लिखा व शिक्षक साथियों में वितरित किया। यह पत्र इस बात का प्रमाण है कि किस प्रकार शिक्षक अपने विद्यार्थियों के खेलने के अधिकार और पर्यावरण के प्रति  जागरूक हैं। 

साथियों,
कई अन्य स्कूलों के मैदानों का जो हश्र हुआ है उसी तर्ज पर हमारे स्कूल के मैदान को भी सीमेंट अथवा टाइल्स से सपाट बना देने का विचार चर्चा में है। हालाँकि, इस प्रस्ताव (या फिर निर्देश/आदेश) का स्रोत स्पष्ट नहीं है। हमें इस विचार और इसके संभावित परिणामों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। सर्वप्रथम, कच्चे मैदान को कंक्रीट में बदल देने से हमारे विद्यार्थियों के निर्बाध खेल-कूद में बाधा पहुँचेगी। आज इस कच्चे मैदान पर जिस उन्मुक्त तरीक़े से वो खेल पाते हैं, उस आज़ादी से वो कंक्रीट पर नहीं खेल सकेंगे। फिर, कंक्रीट पर बहुत-से खेल, विशेषकर देशज क़िस्म के व बच्चों को सुलभ खेल, जैसे खो-खो, कबड्डी, स्टापू, दौड़, कूद आदि तो वैसे ही नहीं खेले जा सकेंगे। इस तरह से यह परिवर्तन बच्चों के खेलने के हक़ पर कुठाराघात करेगा। साथ ही, पक्के फ़र्श पर खेलने से बच्चों के चोटिल होने की संभावना काफ़ी बढ़ जाएगी 
हम अच्छी तरह जानते हैं कि धरती को लगातार कंक्रीट से पाटना पर्यावरण व जीवन के लिए किस हद तक घातक है। यह सबक़ तो हमारी शिक्षा व किताबों तक में शामिल है। पाँचवीं कक्षा की पर्यावरण अध्ययन की पुस्तक के 16वें पाठ 'पानी रे पानी' में 'धरती की गुल्लक' संबोधन इसी संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है। आज हमारे शहर व देश-दुनिया में बढ़ता जल-संकट और ग्लोबल वॉर्मिंग आमजन से लेकर सरकारों तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों तक के लिए चिंता के विषय और चुनौती बने हुए हैं। छोटे स्तर पर ही सही, हमारे स्कूल का मैदान भी पर्यावरण का एक रक्षक है, जिसकी हमें हिफ़ाज़त करनी चाहिए। यह बच्चों के सीखने, उनकी शिक्षा का भी एक बढ़िया माध्यम है। कंक्रीट बिछाने से बच्चे प्रकृति से और दूर होते जायेंगे और कृत्रिम आकर्षण के जाल में फँसकर इस विनाशकारी विकास के ख़तरों को समझना उनके लिए और भी मुश्किल हो जायेगा। 
आज शहर में वैसे भी खुली जगहों, मैदानों, पार्कों आदि की कमी होती जा रही है। अगर यमुना के किनारे के खेतों को छोड़ दें, तो हमारे इलाक़े की बाक़ी रिहाइशी कॉलोनियों के बारे में तो यह बात और भी सच है। शहर के कई पुराने पार्कों-सार्वजनिक स्थलों में आने-जाने, उठने-बैठने पर रोकटोक बढ़ती जा रही है, बच्चों का खेलना-कूदना वर्जित किया जा रहा है। जब से दिल्ली यूनिवर्सिटी ग्राउंड को स्टेडियम बनाकर उसका 'विकास' किया गया है तब से वहाँ यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों के परिवारों के सदस्यों तक का घूमना-फिरना तो दूर, प्रवेश भी बाधित हो चुका है। इसी तरह कनॉट प्लेस के उस सादे व खुले पार्क के 'विकसित' हो जाने से, जो पहले रात भर बेघरों, मुसाफ़िरों और सभी का स्वागत करता था तथा उन्हें पनाह देता था, आज सूरज ढलते ही थके-हारे व आराम-चैन चाह रहे लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। ज़ाहिर है, बच्चे शारीरिक गतिविधियों और खेल-कूद से वंचित होते जा रहे हैं। छोटी उम्र के बच्चों को तो वैसे भी घर से दूर जाकर खेलने के अवसर नहीं मिल पाते हैं। बढ़ती यौन-हिंसा व सामाजिक रोक-टोक के चलते बहुत-सी लड़कियाँ तो घर की चारदीवारी में ही क़ैद होकर रह जाती हैं। ऐसे में जबकि हमारे क्षेत्र में कोई भी खुला मैदान बच्चों को उनके पड़ोस में उपलब्ध नहीं है, स्कूल का मैदान ही उनके खेल का सहारा है। लड़कियों के लिए स्कूल का मैदान इसलिए और भी महत्व रखता है क्योंकि लड़कों को तो घर से दूर जाकर खेलने के मौक़े मिल भी जाते हैं।  
आज हमारे स्कूल में एक व्यवस्थित बग़ीचा-क्यारी है - जिसके लिए विभाग के सहयोग के अतिरिक्त कुछ शिक्षकों ने जी-तोड़ मेहनत की है - और कुछ हिस्सा टाइल्स एवं फ़र्श से युक्त है। ले-देकर क़रीब आधे क्षेत्र में खेल का मैदान है। देखा जाये, तो इसे हम एक संतुलन की स्थिति भी मान सकते हैं - बग़ीचा, फ़र्श व मैदान। हमें इस संतुलन को बचाने की ज़रूरत है, न कि इसे और एक-तरफ़ा करने या बिगाड़ देने की। 
यह बात उत्साहवर्धक है कि लगभग सभी शिक्षक-शिक्षिकायें खेल के मैदान के वर्तमान स्वरूप को बनाये रखने के पक्ष में हैं। हम शिक्षकों का दायित्व है कि हम बच्चों और लोगों को स्कूल में खेल के मैदान और पर्यावरण के महत्व के बारे में समझायें व जागरूक करें, न कि अपनी बौद्धिक भूमिका का परित्याग कर दें। यह एक विडंबना और घोर त्रासदी है कि आज हमारे स्कूलों से मैदानों को ख़त्म किया जा रहा है और इसे 'विकास' की तरह परोसा जा रहा है। शिक्षक बनने की प्रक्रिया में जो शिक्षा हमने प्राप्त की है उसमें और देश की तमाम शिक्षा नीतियों व स्कूल से संबंधित मानकों में यह सिद्धांत समान रूप से स्थापित रहा है कि खेल के मैदान के बिना एक स्कूल की - प्राथमिक स्तर पर तो और भी - कल्पना ही नहीं की जा सकती। खेल के मैदानों को खोकर हम अपने स्कूलों को और निर्जीव स्थल बना देंगे तथा अपने विद्यार्थियों के साथ अन्याय करेंगे। 
यह सच है कि आज हमारे स्कूलों के प्रधानाचार्यों व शिक्षक-शिक्षिकाओं पर स्वच्छता को लेकर अति दबाव की स्थिति है। यही कारण है कि बच्चों व स्कूल के लिए खेल के कच्चे मैदान का महत्व मानते हुए भी हममें से कुछ साथी पक्के फ़र्श बिछाये जाने के विचार को मजबूरी में स्वीकार करते हैं। प्रशासन अपने ही नियमों के अनुसार उचित संख्या में सफ़ाई कर्मचारियों की नियुक्ति व तैनाती नहीं करता है, बल्कि हम पर दबाव बनाया जाता है कि येन-केन-प्रकारेण सफ़ाई का एक कृत्रिम, दिखावटी चित्र प्रस्तुत करें। हमें उस सोच पर भी सवाल उठाने की ज़रूरत है जो पत्तों और घास तक को कूड़ा मानती है। आख़िर हम जिस भौगोलिक क्षेत्र में रह रहे हैं उसमें श्रेष्ठ प्रयास के बावजूद कुछ धूल-मिट्टी का होना स्वाभाविक ही है। धूल-मिट्टी को पूरी तरह हटाने के लिए जो रासायनिक व यांत्रिक इंतेज़ाम किये जाते हैं वो न सिर्फ़ बहुत महँगे हैं, बल्कि ख़ुद पर्यावरण-विरोधी हैं। चकाचौंध करने वाले कृत्रिम प्रांगण अवैज्ञानिक व अस्वस्थ सोच पर टिके हैं।
तथापि खेल व सफ़ाई में कोई विरोधाभास नहीं है। वैसे तो मूलतः खेल खेलने वालों को सहज आनंद से भर देने का स्रोत हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त हम खेल से ईमानदारी (खेल भावना), अनुशासन (नियमबद्धता), सहयोग (टीम तालमेल) व मित्रता के मूल्य भी ग्रहण करते हैं। प्रायः यह देखने में आता है कि खेलों के शौक़ीन बच्चे शारीरिक रूप से ही स्वस्थ नहीं रहते बल्कि ख़ुशमिजाज़ भी होते हैं और अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। इसी कड़ी में विद्यार्थियों में यह भावना विकसित की जा सकती है कि ख़ासतौर से खेलने से पहले व बाद में वो अपने मैदान को तैयार करके खेलने के उपयुक्त बनायें। हमें विद्यार्थियों में खेल के मैदान के प्रति एक लगाव पैदा करना होगा जिससे वो समय-समय पर इसमें फैले हुए कंकड़-पत्थर हटाने को प्रेरित हों। शायद हम भी खेल को उचित तरजीह व समय नहीं दे पाते हैं। ख़ुद अपने कक्षाई स्तर पर भी हमें, मौसम व विद्यार्थियों की उम्र के अनुसार, खेलों को ज़िंदा रखना होगा। (हालाँकि, यह भी सच है कि तरह-तरह की और नित बढ़ती ग़ैर-शैक्षणिक ज़िम्मेदारियों के चलते अब जुटकर पढ़ाना भी दुश्वार होता जा रहा है।) मैदान के आसपास उपयुक्त डिज़ाइन के कूड़ेदान की व्यवस्था करने से भी मैदान को साफ़ रखना आसान होगा। निःसंदेह सफ़ाई का अपना महत्व है और यह मूल्य भी हमारी शिक्षा का अभिन्न अंग है, मगर क्या यह न्यायसंगत होगा कि एक ऊपरी/बनावटी दृश्य के लिए हम बच्चों के खेलकूद व पर्यावरण को दरकिनार कर दें? एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कच्चे मैदान को कंक्रीट बना देना एक अपरिवर्तनीय प्रक्रिया है। अनुभव गवाह है कि हम बहुत आसानी से इधर से उधर जा सकते हैं लेकिन बाद में संभल कर वापस पलटना बेहद मुश्किल व महँगा होता है। 
तो आइये, हम सब मिलकर अपने स्कूल, बच्चों और पर्यावरण के पक्ष में सोचें और, हम जहाँ भी और जिस पद पर भी होंसमय पड़ने पर सही फ़ैसले लेने में अपनी भूमिका निभायें। 


Monday, 25 December 2017

स्कूलों के खेल के मैदानों को ख़त्म करने की नीति के विरोध में पत्र

यह पत्र लोक शिक्षक मंच ने निगम स्कूलों में मैदान को खत्म करने की नीति के विरोध में अध्यक्ष, शिक्षा समिति उत्तरी दिल्ली नगर निगम को दिया गया ।

Øe lañ लो॰शि॰मं॰/01/दिसम्बर/2017                                                         fnukad %20 दिसम्बर,2017                                                          

प्रति
   अध्यक्ष, शिक्षा समिति
   उत्तरी दिल्ली नगर निगम
   दिल्ली  

विषय: निगम स्कूलों के खेल के मैदानों को ख़त्म करने की नीति के विरोध में
महोदय,
      लोक शिक्षक मंच सार्वजनिक शिक्षा और शिक्षा के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों का संगठन है। हम आपके समक्ष निगम स्कूलों व उनके विद्यार्थियों की एक गंभीर समस्या रखना चाहते हैं। ऐसा देखने में आ रहा है कि एक तरफ़ निगम के कई स्कूलों में खेल के मैदान की भी जगह नहीं है, वहीं न सिर्फ़ कई नए स्कूलों के प्रांगणों में सारी खुली जगह को कंक्रीट से पक्का रूप दिया जा रहा है बल्कि कई पुराने स्कूलों में मौजूद खेल के कच्चे मैदानों को भी टाइल्स या सीमेंट से पाटा जा रहा है। स्पष्ट है कि जब स्कूलों में खेल के कच्चे या घास के मैदान नहीं बचेंगे तो वहाँ पढ़ने वाले बच्चे कई तरह के खेल (उदाहरण के लिए, खो-खो व कबड्डी जैसे देशज खेल और कूद, दौड़ जैसे एथलेटिक खेल) खेलने से वंचित हो जायेंगे। फिर पक्के फ़र्श पर खेलने से बच्चों के चोटिल होने की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे में जबकि हमारे शहर में बच्चों के खेलने की खुली व सुरक्षित जगहें लगातार सिकुड़ती जा रही हैं, हमारे स्कूलों के मैदान मेहनतकश तबक़ों के बच्चों के बचपन का सहारा हैं। विशेषकर छात्राओं के लिए उनके स्कूल के मैदान ही वो स्थल हैं जहाँ वो खुलकर खेल पाने के अवसर पाती हैं। निगम के स्कूलों में खेलकूद की एक गौरवशाली परंपरा रही है। निगम से पढ़े/निकले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तरों तक निगम का नाम रौशन किया है, जिसमें ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार जैसे खिलाड़ी भी शामिल हैं। खेल के मैदान ख़त्म करने से स्कूलों के इस सुंदर व अनिवार्य अंग पर विराम लग जाएगा।
देश की तमाम शिक्षा नीतियों, शिक्षाशास्त्र व सभी शिक्षाविदों के अनुसार भी मैदान व खेलकूद के बिना एक स्कूल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि बच्चों के खेलकूद से उनके स्वास्थ्य व शिक्षा की बेहतरी का भी सीधा संबंध है। खेल बच्चों का अधिकार है, स्कूलों की पाठ्यचर्या का अभिन्न हिस्सा है और खुशहाल बचपन व सुंदर स्कूल के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
उपरोक्त चिंताओं के अलावा, स्कूल के मैदानों/स्थलों को पक्का करना पर्यावरण की दृष्टि से भी विनाशकारी है। इससे जनता के बहुमूल्य संसाधनों का दोहन होगा, भूजल संकट बढ़ेगा, शहर के स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि होगी और स्कूल का वातावरण निर्जीव व कृत्रिम हो जाएगा। अंततः, इन सबका खामियाज़ा मासूम बच्चों को अपने स्वास्थ्य की बलि देकर भुगतना पड़ेगा।
इस संदर्भ में हम आपसे अपील करते हैं कि निगम के स्तर पर एक ठोस नीति का क्रियान्वयन करके यह सुनिश्चित करें कि सभी स्कूलों में खेल के लिए कच्चे मैदान उपलब्ध हों और किसी भी स्कूल में खेल के कच्चे मैदान को पक्का न किया जाए।          

सकारात्मक कदम की उम्मीद के साथ 

Wednesday, 29 November 2017

नशा


दीपक कटारिया 
                   एम. एड. प्रथम वर्ष 
    (केंद्रीय शिक्षा संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय)       

शास्त्री पार्क रेड लाइट के पास ज्यों ही माल से भरा एक रिक्शा कार के ऊपर पलट कर गिरा, त्यों ही एक साहब बाहर निकले और निकलते ही रिक्शे वाले को ऐसा तेज़ थप्पड़ मारा कि उसका होंठ फट गया और अमीरों के पीने की सबसे पसंदीदा चीज़ उसके फटे होंठ से बहने लगी। थप्पड़ मारते ही साहब बोले, 'साले चरसी, इतना बोझ ले जाया नहीं जाता तो भरते क्यों हो रिक्शे में? अभी भी गांजे के नशे में लग रहा है। लेक्चर के लिए यूनिवर्सिटी जाना है, उसके लिए भी लेट हो गया', प्रोफ़ेसर साहब ने झुंझलाकर कहा। 
उधर से रिक्शे वाले ने कहा, 'साहब, गांजा पीते हैं क्योंकि इतना वज़न खींचने के कारण पूरे शरीर में दर्द रहता है! और इतना बोझ इसलिए ले जा रहा हूँ ताकि अपनी बच्ची के लिए किताबें ला सकूँ और वो अगली जमात में पढ़ सके। पर, अगर पढ़ाई इस तरह का नशा देती है जिसमें एक इंसान दूसरे इंसान को इंसान ही न समझे तो इससे भला तो हमारा गांजे का ही नशा है।'
                   

Sunday, 5 November 2017

बदलते समाज में बदला पुस्तकालय का स्वरुप

सनुज यादव 
लेखक केंद्रीय शिक्षा संस्थान में एम. एड के विद्यार्थी हैं 

मैं दिल्ली के ढाका गाँव में रहता हूँ । यह मुख़र्जी नगर से यह लगभग दो किलोमीटर दूर है, जो मुख्यतः सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कराने के लिए कोचिंग संस्थानों का गढ़ माना जाता है । पिछले कुछ समय से मैं यहाँ एक नए तरीके की संस्था का उदय देख रहा हूँ, जिसके मूल में केवल बाजारवाद है । यह है पुस्तकालय या लाइब्रेरी ।
वैसे तो पुस्तकालय को हम अपने विद्याथी(स्कूली) जीवन से सुनते आ रहे हैं और उसकी एक छवि हमने अपने मन में संजोये हुए हैं । पर जिस तरीके से बाज़ार ने इस संस्था का स्वरुप और संरचना में परिवर्तन ला रहा है यह मेरे लिए विचारणीय बिन्दु है । शिक्षा संकाय का विद्यार्थी होने के नाते ऐसे संस्थानों की संकल्पना में हो रहे बदलाव को जानना और उनमें हो रहे परिवर्तन को समझना मेरे लिए आवश्यक हो जाता है। एस.आर.रंगनाथन, जिन्हें भारत में पुस्तकालय विज्ञान के पिता के रूप में हम जानते हैं, उनके शब्दों में कहूँ तो “देश की सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक विकास में पुस्तकालयों का योगदान अहम होता है । ” परन्तु आज़ादी के बाद विकास के नाम पर जिस तरीके से सार्वजनिक पुस्तकालयों का गला घोटा जा रहा है ये एक चिंता का विषय है ।
आज हमारे आस-पास सार्वजनिक पुस्तकालय विरले ही देखने को मिलते हैं । जो हैं भी उनकी स्थिति काफी दयनीय है या वे आतिक्रमण का शिकार है । जब मुझे अपने कुछ दोस्तों से यह पता चला कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में नामांकन केवल कॉलेज की लाइब्रेरी की सुविधा(बैठकर पढने के लिए)लेने के लिए लेते है तो मुझे शुरुआत में उन दोस्तों पर गुस्सा आया पर जब इस पर विचार किया तो पाया कि अन्य सभी कारणों में एक कारण उनके घर के आस-पास सार्वजनिक पुस्तकालयों ना होना भी हो सकता है । इनकी जगह यह नए तथाकथित पुस्तकालय अपनी जगह बना रहे हैं, जो पुस्तकालय के नाम पर एयर कंडीशन, वाई-फाई सुविधा, लड़के-लडकियों के अलग स्टडी रूम, चाय-कॉफ़ी की सुविधा, कैमरे से निगरानी इत्यादि सुविधा देने का प्रचार करते हैं ।
क्या हम इन्हें सही मायने में लाइब्रेरी कह सकते हैं या नहीं ? मेरे अनुसार पुस्तकालय वह जगह होती है, जो आपको अपनी स्वेच्छा से पढने, लिखने,पुस्तकों के चुनाव की स्वतंत्रता, स्वछन्दता प्रदान करती है । विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, शोध संस्थानों में पुस्तकालयों की भूमिका कितनी अहम है, यह हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं । इनकी बढती संख्या से मेरे मन में दो सवाल उठते हैं । पहला, इन इलाकों में इस प्रकार के पुस्तकालयों की स्थापना के पीछे क्या सोच रही होगी ? मेरे विचार से जिस तेजी से शिक्षा का बाजारीकरण हुआ या हो रहा है, उस परिस्थिति में मुख़र्जी नगर और आस-पास के इलाको में दिल्ली के दूरदराज़ के इलाकों से आने वाले प्रतियोगियों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई है, जिसका एकमात्र कारण सरकारी नौकरी पाने की लालसा है । वहाँ ऐसी निजी दूकान प्रतियोगियों को यह विश्वास दिला पाती हैं कि वह अगर वे उन सुविधाओं का उपभोग करें जो वे मुहैया करा रहे हैं, तब वह अपनी तय्यारी को अन्य प्रतियोगियों से अलग कर पाएंगे और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे ।
ऐसी स्थिति में जब अर्थव्यवस्था ढलान पर है और नौकरियों की भारी कमी से हमारा देश जूझ रहा है, वहाँ पढने वाले छात्र-छात्राएँ सरकार से सार्वजनिक पुस्तकालयों की बदहाली पर बिना कोई सवाल किये इस नवउदित व्यवस्था का हिस्सा बनाते जा रहे हैं । उनकी आँखों के सामने सार्वजनिक पुस्तकालयों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है ।
दूसरा अहम सवाल यह है कि इन तरीकों के पुस्तकालय किस तरह के ज्ञान का सृजन कर रहे है ? कर भी रहे हैं या नहीं ? आज हम सूचनाओं के दौर में जी रहे हैं । इन सूचनाओं से ज्ञान का सृजन और उस ज्ञान से बुद्धिमत्ता तक का सफ़र एक जटिल प्रक्रिया है । समाज में हरेक समुदाय के ज्ञान की सृजनशीलता को सराहना और उसको बाकियों से साझा करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पुस्तकालय एक सशक्त माध्यम है । परन्तु यह पुस्तकालय किताबों को छोड़कर सारी सुख-सुविधा दे रहे हैं तब ज्ञान का उत्पादन भी संकीर्ण मायने में ही रहता है । जिसका लाभ गिने-चुने लोगो को मिलता है । मेरी समझ में एक बेहतर समाज की संकल्पना वह हो सकती है, जब हम पुस्तकालय जैसे सामाजिक संस्था को उसके वास्तविक स्वरुप में बचा पाएंगे क्योंकि पुस्तकालय आधुनिक समाज की रीढ़ की तरह है और इस रीढ़ तोड़ने वाली व्यवस्था को बाज़ार के हवाले करने की साजिश को बेनकाब करना ही होगा ।