Friday, 8 February 2019

दिल्ली के सरकारी स्कूल: नवउदारवाद की प्रयोगशाला


पिछले 4 सालों में दिल्ली के सरकारी स्कूलों की दसवीं व बारहवीं की नियमित कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में क्रमश: 43,540 व 53,431 की कमी आई है (स्रोत: शिक्षा निदेशालय की वार्षिक रपटें)I यह कमी दसवीं में 24% और बारहवीं में 32% है| यानी, दसवीं में हर चौथे व बारहवीं में हर तीसरे  विद्यार्थी को निकाल दिया गया है| एक तरफ बड़ी संख्या में विद्यार्थी कक्षा 9, 10, 11 में नियमित स्कूलों से बाहर हो रहे हैं, और दूसरी तरफ दिल्ली सरकार ओपन स्कूलिंग (NIOS) के साथ हाथ मिलाकर स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का भला करने की वाहवाही लूट रही है| प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट (White Paper, State of Public (School) Education in Delhi, Praja.org, Dec 2017) के अनुसार 2016 में दिल्ली में 85,000 बच्चे स्कूलों से बाहर हुए|  आख़िर अगर दिल्ली सरकार अपने स्कूलों में इतने कामयाब सुधार लाने का प्रचार कर रही है तो फिर विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के तो छोड़िये स्थिर रहने के प्रमाण भी क्यों नहीं मिल रहे हैं?

स्कूलों से बाहर होते बच्चे

दरअसल दिल्ली सरकार के स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए कक्षा 12 तक की शिक्षा पूरी करना मुश्किल होता जा रहा है| 2018-19 में कक्षा 9 से 12 तक में फेल हो जाने वाले कुल विद्यार्थियों में से 66% (1 लाख से ज़्यादा) को सरकारी स्कूलों में पुन:दाखिला नहीं दिया गया (RTI 15.11.18, वकील अशोक अग्रवाल)| अपने परिणाम सुधारने के लिए दिल्ली सरकार ने स्कूलों को निर्देश दिए कि कक्षा 9,10,11 में फ़ेल होने वाले विद्यार्थियों को नियमित स्कूल छोड़कर पत्राचार/ओपन में दाखिला लेने के लिए ‘प्रोत्साहित’ किया जाए| दिल्ली सरकार ने‘फेल ना करने की नीति’ को ख़त्म करने का फ़ैसला लेकर विद्यार्थियों के एक हिस्से को पाँचवीं कक्षा से ही स्कूलों से बाहर करने का इंतेज़ाम भी कर दिया है| 
हम इस कड़वी सच्चाई से वाकिफ़ हैं कि सरकारी स्कूलों में दाखिले आसान नहीं मुश्किल हुए हैं| शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों का दाखिला करना अनिवार्य है लेकिन सरकार के अपने आदेश नित नए कागज़ों - आधार कार्ड, पते का सबूत, बैंक अकाउंट आदि की मांग करते रहे हैं| यहाँ तक कि प्रवेश के लिए 'अंतिम तिथि' की ग़ैर-क़ानूनी शर्त थोप दी जाती है| 2017 में दिल्ली सरकार ने दाखिले की प्रक्रिया को ऑनलाइन करके अभिभावकों की मुश्किलों को कई गुना बढ़ाया थाI हमारे स्कूलों में जो बच्चे आ रहे हैं उनके अभिभावकों का इन्टरनेट कैफ़े जाकर फॉर्म भरने में बेशक़ीमती समय और पैसा लगा, गलतियां ठीक करवाने में जो मुश्किलें आईं वो अलग| कितने ही बच्चे तकनीकी समस्याओं के चलते बिना दाखिले के लौट गए| 
परिणामों को साम-दाम-दंड-भेद से बढ़ाकर दिखाने का खेल खेला जा रहा है| बच्चों को अलग-अलग स्तर के और दोयम दर्जे के टेस्ट दिए जा रहे हैं ताकि पास होने वाले बच्चों की संख्या बढ़कर दिखाई दे| शिक्षकों को मौखिक और लिखित धमकियां दी जा रही हैं जिसके चलते वो परीक्षा परिणामों को लेकर अनैतिक दबाव में हैं| बार-बार बच्चों के टेस्ट लेकर न केवल पढ़ने-पढ़ाने का समय बर्बाद किया जा रहा है बल्कि परिणाम-केन्द्रित शिक्षा का ऐसा संदर्भ तैयार किया जा रहा है जिसमें शिक्षा के बौद्धिक मूल्यों की जगह बचपन से ही कोचिंग, प्रतियोगितावाद और बाज़ार की दुनिया के लिए तैयार करने वाले बहुविकल्पीय प्रश्नों ने लेनी शुरु कर दी है|  
डाऐन रैविच जैसे स्कॉलर्स के अध्ययन व हमारा अनुभव भी यह पुष्ट करता है कि परिणाम-आधारित मूल्याँकन के इस दर्शन व व्यवस्था में एक समस्या यह भी है कि इससे तमाम तरह की विसंगतियाँ जन्म लेती हैं; जैसे - विषयवस्तु की गहराई में न जाना, टेस्ट नियंत्रित संकीर्ण शिक्षण-अध्ययन, परीक्षा-पत्रों से लेकर परिणामों तक को तैयार करने में एक छल व अमर्यादित चालाकी, प्रतियोगितावाद व उससे उपजती श्रेष्ठता-हीनता का भेदभाव, अपमान-पुरस्कार के बाह्य प्रेरकों पर निर्भरता आदिI

स्कूलों में वर्गीकृत होते बच्चे

दिल्ली सरकार के स्कूलों में थोपी गई चुनौती (2016) व मिशन बुनियाद (2018) नाम की योजनाओं के तहत पहले छठी से नौवीं तक, और बीते वर्ष तीसरी से ही, सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों को हिंदी-अंग्रेज़ी-गणित के 'मूलभूत कौशलों' का परीक्षण करने वाले टेस्टों के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटा व चिन्हित किया गया है। यह  एक ऐसी व्यवस्था है जो नस्लीय रंगभेद (अपार्थेड) व जातिगत भेदभाव के ढाँचों तथा विचार की याद दिलाती है। इस बँटवारे और बच्चों को चिन्हित करने की नीति के त्रासद व गहरे रूप से घातक असर हमने ख़ुद शिक्षकों और विद्यार्थियों के परस्पर व्यवहार, भाषा आदि में देखे हैं| कम उम्र के बच्चों में एक ओर कुछ ने इसे अपनी श्रेष्ठता के अलगाव के प्रतीक के रूप में लिया है तो अन्यों को इससे निराशा, हीनता व बहिष्करण का एहसास हुआ है| दोनों ही परिस्थितियों में बच्चों का अमानवीकरण हुआ है|
एक अन्य दृष्टि से भी यह मिशन शिक्षा के उद्देश्यों को हल्का करके स्कूलों को मात्र साक्षरता या ट्यूशन केंद्र बनाने की कवायद है| शिक्षा की जटिलताएं समझने वाले जानते हैं कि बच्चे ‘भाषा’संकल्पनाओं व जीवंत अनुभव के साथ ही सीखते हैंI मिशन बुनियाद की तर्ज पर भाषा को संदर्भविहीन करने का साफ़ मतलब है भाषा की शिक्षा से ज्ञान और चिंतन को खत्म करना| साक्षर बनाने के नाम पर जो धोखा बच्चों के साथ किया जा रहा है वह सोचने-समझने वाले दिमागों को खाली बर्तनों में तब्दील करने की साज़िश है|
मिशन बुनियाद के दौरान शिक्षकों को ट्रेनिंग मैन्युअल देकर उन्हें कार्यान्वित करने के निर्देश दिए गए| प्रत्येक स्कूल की प्रत्येक कक्षा की प्रत्येक गतिविधि पर नज़र रखने के लिए नए-नए यांत्रिक उपाय इजाद किए जा रहे हैं| इन योजनाओं को लागू करने में शिक्षकों का अपना अध्ययन और स्वायत्तता आड़े न आ जाए इसलिए स्कूलों में मेंटर टीचर्स और टीचर्स डेवलपमेंट कोऑर्डिनेटर की फ़ौज खड़ी की गई है जिनसे सूक्ष्म निगरानी रखना, सरकारी योजनाओं को लागू करवाना, शिक्षकों के व्यवहार को संचालित करना और उनमें आकाओं का डर बिठाना आदि अपेक्षित है|
दरअसल ऐसे ‘मिशन’ दुनियाभर में वैश्विक पूंजीवादी संस्थाओं के एजेंडे को पूरा करने के लिए चलाए जा रहे हैं ताकि ‘साक्षर लेकिन अशिक्षित मज़दूर’ तैयार किए जा सकें| दिल्ली सरकार ने भी इस मिशन में अपना पूरा दम झोंककर इन वैश्विक पूंजीवादी संस्थाओं के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित की है|
बच्चों के साथ-साथ स्कूलों का वर्गीकरण भी बढ़ा है| सरकार ने पहले अपने 54 स्कूलों को‘मॉडल ‘घोषित करके सरकारी स्कूलों की असमान परतों में एक विशिष्ट परत का इज़ाफ़ा किया (और बहुत सफाई से इनके संचालन में NGOs की पीपीपीवादी घुसपैठ करा दी), और फिर ‘schools of excellence’ के नाम से 5 नए स्कूलों की VVIP परत बिछा दी|

स्कूलों में तैयार होते सस्ते मज़दूर

बाज़ारवाद के तार 'कौशल विकास' की उस योजना से भी जुड़े हैं जिसके नाम पर सरकारी स्कूलों में अब नौवीं से ही विद्यार्थियों को वोकेशनल कोर्सों की तरफ़ धकेला जा रहा है। फिर ग्यारहवीं में बड़ी संख्या में, विद्यार्थियों को, उनकी पसंद या इच्छा के विपरीत वोकेशनल स्ट्रीम दी जा रही है। यह सरकारी स्कूलों के आकादमिक चरित्र पर एक सीधा हमला हैI इस तरह के कोर्सों का स्कूलों के अंदर एक जेंडर-आधारित बँटवारा भी है और इन्हें केवल सरकारी स्कूलों पर ही थोपा जा रहा है जहाँ विद्यार्थियों की अधिकांश संख्या मज़दूर, दलित, पिछड़ी, अल्पसंख्यक व विकलांग पृष्ठभूमि से आती है| यह वंचित जातियों व वर्गों के बच्चों के शैक्षिक-सामाजिक बहिष्करण का एक नया उपाय है।
मामला केवल मेहनतकश वर्ग के बच्चों को वोकेशनल शिक्षा की तरफ धकेलने का नहीं है बल्कि मज़दूर-विरोधी वोकेशनल शिक्षा देने का भी है जो उस वोकेशन के तकनीकी ज्ञान तक सीमित होगी और उसके सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक पहलूओं से वंचित होगी| इस वोकेशनल शिक्षा में मालिकों और उपभोक्ताओं को सर्वोच्च रखना सिखाया जा रहा है ताकि विद्यार्थी आदर्श सेवक बनें| यह शिक्षा उन्हें काम-धंधों के जाति और लिंगभेद पर आधारित इतिहास को समझना, शारीरिक और मानसिक श्रम के बंटवारे पर प्रश्न उठाना और पूंजीवाद के खिलाफ़ मज़दूर संघर्षों के पाठ नहीं सिखाएगी| मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा स्कूलों में NSQF (National Skills Qualifications Framework) नाम से चलाए जाने वाले कार्यक्रम में भी यही नीति प्रतिपादित होती है| इसके बारे में अनिल सदगोपाल अपने लेख Skill India or Deskilling India (EPW, August 2016) में लिखते हैं कि भविष्य में अकुशल कामों के लिए भी NSQF सर्टिफिकेट को अनिवार्य कर दिया जाएगा और क्योंकि अनेक कारणों से बच्चे कक्षा 8 से पहले ही स्कूल छोड़ने पर मजबूर होंगे इसलिए वे यह सर्टिफिकेट नहीं प्राप्त कर पाएंगे| नतीजा यह होगा कि वे अकुशल मज़दूर घोषित कर दिए जाएंगे जिनका शोषण करने के लिए Make In India के पास पूरी छूट होगी| 
दिल्ली सरकार ने इस नीति को अपने स्कूलों में तेज़ी व पूरी ताक़त से लागू किया है। आज हमारे स्कूलों में निजी संस्थाएं आकर निचली कक्षा से ही बच्चों के aptitude (अभिरुचि) टेस्ट लेती हैं, और बिना शिक्षकों की सक्रिय प्रतिभागिता के बच्चों को टेस्टों के आधार पर बांटकर वोकेशनल काम-धंधों के लिए प्रोत्साहित करती हैं|  
दिल्ली सरकार ने कोई नए कॉलेज तो नहीं खोले हैं और न ही शिक्षकों को तैयार करने वाले किसी भी स्तर के संस्थान खड़े किए हैं, मगर 'विश्व-स्तरीय' कौशल विकास केंद्र ज़रूर खोले हैं जिसका प्रचार भी बख़ूबी व गर्व से किया है। शिक्षक ट्रेनिंग भी विश्वविद्यालयों और SCERTs के क्षेत्र से निकालकर NGOs के हाथों में दी जा रही है|  इससे ज़्यादा हास्यास्पद क्या होगा कि जब पूरी अर्थव्यवस्था संकट से गुज़र रही है, सरकारी क्षेत्रों को सिकोड़ा जा रहा है, छोटे स्व-नियोजित व्यवसायों पर एक-के-बाद-एक चोट की जा रही है तब बच्चों को यह कहकर ‘मौलिक कौशल’ सिखाए जा रहे हैं कि लोग इसलिए बेरोजगार हैं क्योंकि उनके पास कौशल नहीं हैं| तो फिर स्कूलों की ज़रूरत ही क्या रह जाती है?   

गैर-अकादमिक होती पाठ्यचर्या

शिक्षा के शिथिलीकरण की कड़ी में दिल्ली सरकार कुछ और कार्यक्रम भी चला रही है; जैसे हैप्पीनेस करिकुलम (खुशी की पाठ्यचर्या; कक्षा -VIII), क्लीनलिनेस करिकुलम (स्वच्छता की पाठ्यचर्या) व अब entrepreneurship curriculum (निजी धंधे की पाठ्यचर्या; कक्षा IX-XII)| किसी भी तरह के गहन शिक्षा-सिद्धांत व अकादमिक प्रक्रिया को अपनाए बिना इन पाठ्यचर्याओं द्वारा हर बच्चे के स्कूली दिन के 40-50 मिनट ऐसे राजनीतिक कार्यक्रमों की बलि चढ़ा दिए गए हैं जो मूल रूप से बच्चों की चेतना को कुंद करने का काम करते हैं; जैसे खुशी, संतुष्टि, न्याय के सवालों को आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक धरातल व संदर्भ से काटकर देखने को प्रेरित करना| यह ज़रूर है कि ऐसे सतही व ग़लत विचारों को अमलीजामा पहनाकर सरकार के प्रचारतंत्र ने तालियाँ बंटोरने में सफलता हासिल की है| विद्या ज्योति जैसी आध्यात्मवादी संस्था को प्रारंभिक शिक्षक तैयार करने वाले ज़िला-स्तरीय संस्थानों में अहम भूमिका दी जा रही है| यह तय है कि ऐसी संस्थाएँ व कोर्स स्कूलों में ख़तरनाक रूप से रूढ़िवादी व विज्ञान-विरोधी विचारों को बढ़ावा देने का माध्यम बनेंगे। 

 प्रोपगंडा के केंद्र बनते स्कूल

दिल्ली सरकार ने साझा मंच नाम के एनजीओ के साथ मिलकर SMC के चुनाव करवाने और मासिक बैठकें करवाने की प्रक्रिया शुरु की| लेकिन इसके साथ-साथ शुरु हुआ SMC पर केंद्रीकृत एजेंडा थोपना और SMC को गैर-आकादमिक उदेश्यों के लिए इस्तेमाल करना| उदाहरण के तौर पर, दिल्ली सरकार ने आठवीं तक फेल न करने की नीति को बच्चों के परिणामों के लिए दोष देते हुए स्कूलों को एक निर्देश जारी किया जिसमें विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक में अभिभावकों को यह समझाने के लिए कहा गया कि कैसे उनके बच्चों के खराब परिणामों का मुख्य कारण यह नीति है| अब इन बैठकों में शिक्षकों और अभिभावकों के बीच स्वच्छन्द बात-चीत के अवसर नहीं रह गए हैं, बल्कि इन्हें सरकारी कार्यक्रमों जैसे मिशन बुनियाद, आधार, GST, छोटी बच्चियों के लिए प्रोविडेंट फण्ड आदि बेचने के मौके बना दिया गया है|हमारे समाज में आज भी अभिभावक अपने बच्चों के भले-बुरे के लिए शिक्षक की सलाह पर विश्वास करते हैं और शायद इसलिए ही सरकारें स्कूलों और शिक्षकों का इस्तेमाल सेल्सपर्सन्स की तरह करने लगी हैं| हाल में 28 जनवरी 2019 को दिल्ली सरकार के स्कूलों में आयोजित मेगा पीटीएम के अवसर को खुले तौर पर दलगत प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया| स्कूलों में 'दिल्ली सरकार द्वारा 11,000 कमरों का निर्माण' का ऐलान करते जो बोर्ड्स लगाये गए थे वो कोई जनहित संबंधित घोषणा नहीं थी, बल्कि आत्म-प्रचार था, वो भी एक ऐसे काम का जो अभी शुरु भी नहीं हुआ है| शिक्षकों के बीच भी यह बेचैनी बढ़ने लगी है कि उनका इस्तेमाल दलगत प्रोपगंडा के लिए किया जा रहा है|
एक स्कूल की SMC के MLA प्रतिनिधि ने VIP संस्कृति का परिचय देते हुए एक कर्मचारी के काम में कमी पाए जाने के बहाने पर बिना किसी उचित प्रक्रिया का पालन करे उसे तुरंत नौकरी से निकालने की धमकी दी, वहीं एक अन्य स्कूल में एक SMC सदस्य द्वारा महिला शिक्षिकाओं को दुपट्टा ओढ़ने की हिदायत दी गईI अगर SMC और शिक्षकों के बीच संबंध केंद्रीकृत एजेंडा से निर्धारित होंगे तो समुदाय प्रतिभागिता के सही मूल्य कार्यान्वित नहीं हो पाएँगे|
डाटा उत्पादन के केंद्र बनते स्कूल

सरकारी स्कूलों की बदलती भूमिका का एक और पहलू यह है कि इन्हें विभिन्न तरह के डाटा इकट्ठा करने के केन्द्रों में तब्दील किया जा रहा है| उदाहरण के तौर पर यह सरकार स्कूलों को निर्देश देती है कि बच्चों के परिवारों के सभी सदस्यों की तरह-तरह की निजी जानकारियाँ (जैसे, वोटर कार्ड, आधार कार्ड, फ़ोन नम्बर, शैक्षिक योग्यता, मकान का मालिकाना स्वरूप आदि) इकट्ठी करें। अदालत में इस बारे में सवाल पूछे जाने पर इसके उद्देश्य के रूप में सरकार ने विभिन्न योजनायें बनाने का गोलमोल जवाब दिया, लेकिन उस थर्ड पार्टी का खुलासा नहीं कर पायी जिसे इस पूरे डाटा को सौंपा जाना है। अदालती चुनौती के चलते ही सरकार ने माँगी गई जानकारी को घटा दिया लेकिन प्रिंसिपल व शिक्षकों पर ज़बरदस्त प्रशासनिक दबाव बनाकर तथा उनसे बिना भरपाई के ओवरटाइम कराकर बहुत-सा डाटा प्राप्त करके उसे अपलोड भी करा दिया है। फिर बच्चों के माता-पिता के उन फ़ोन पर जोकि उन्होंने जागरूकता की कमी व विश्वास के चलते स्कूल से साझा किए थे, बच्चों के जन्मदिन की बधाई के संदेश आते हैं जिनमें शिक्षा मंत्री अपने नाम से उन्हें यह शुभकामना देते हैं कि वो बड़े होकर देश के लिए आम आदमी पार्टी जैसा अच्छा काम करें! प्रतिदिन स्कूलों में आंकड़ों का आपातकाल खड़ा किया जाता है और जो शिक्षक डाटा समय पर नहीं दे पाते उनकी पेशी की जाती है| डाटा की यह भूख बढ़ती जा रही है जो न केवल शिक्षकों पर गैर-अकादमिक कार्यों का बोझ बढ़ा रही है बल्कि स्कूलों को डाटा व्यवसाय के स्थल भी बना रही है| स्कूलों से बच्चों की महत्वपूर्ण व्यक्तिगत जानकारियाँ मांग ली जाती हैं लेकिन न उनके कारण बताए जाते हैं, न यह बताया जाता है कि यह डाटा किन हाथों में जा रहा है और न यह कि इनसे क्या निष्कर्ष निकाले जाएंगे| इस डाटा उत्पादन को उसी कड़ी में समझने की ज़रूरत है जिसमें दुनियाभर की नवउदारवादी सरकारें नागरिकों के आँकड़ों को अपने प्रचार और लोगों की एक-एक बात पर नज़र रखने और नियन्त्रण करने के लिए इस्तेमाल कर रही हैंI

शिक्षा-विरोधी एजेंडे के तहत बढ़ता शिक्षा बजट

बजट का बढ़ना नये कमरों के बनने, एक ही परिसर में नया ब्लॉक खड़ा करने व पुराने भवनों के पुनर्निर्माण में तो नज़र आता है मगर यह भी सभी स्कूलों या इलाक़ों की ज़रूरत के अनुसार नहीं हुआ है| इसके अलावा, नये स्कूलों को खड़ा करने की विफलता और सरकार की नित नई घोषणाएँ बताती हैं कि इस बढ़े हुए बजट का उपयोग ग़ैर-ज़रूरी कामों और निजी समूहों को लाभ पहुँचाने के लिए  हुआ है| यह ग़ौरतलब है कि मीडिया में भी उन चंदेक स्कूलों की ख़ूब वाहवाही वाली रिपोर्टिंग हुई है जहाँ ‘विश्वस्तरीय’ स्वीमिंग पूल बना दिए गये हैं, बिना इसकी तफ़्तीश किये कि अधिकतर स्कूलों में तो खेल के मैदान ही विलुप्त होते जा रहे हैं और पाँच प्रतिशत से भी कम स्कूलों की पाँच-सितारा सुविधाओं को कितने बच्चे इस्तेमाल कर पा रहे हैं तथा असल में कौन चाँदी काट रहा है| जहाँ CCTV पर 670 करोड़ खर्च किया जा रहा है व शिक्षकों को टैब खरीदवाने पर अनुमानित 75 करोड़ का बजट दिया गया है, वहीं कक्षा 9 से 12 तक के बच्चों की सीबीएसई फ़ीस माफ़ करने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई| PPP के सूत्र के तहत कुछ स्कूलों के मैदानों को खेल की निजी कोचिंग अकादमियों को छुट्टी के दिनों में अपने सेंटर चलाने के लिए सौंप दिया गया है| इस योजना को स्वीकार्य बनाने के लिए सरकार ने कहा है कि ये खेल अकादमियाँ 50% सीटें सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए मुफ़्त रखेंगी और बाक़ी बच्चों से फ़ीस लेकर मुनाफ़ा कमाने के लिए स्वतंत्र रहेंगीI  
एक तरफ़ बोलचाल की अंग्रेज़ी सिखाने के नाम पर ब्रिटिश काउंसिल जैसी संस्थाओं को स्कूलों में छात्र-छात्राओं को कोर्सों में नामांकित करने के अवसर प्रदान किये गये हैं जिससे न केवल अंग्रेज़ी विषय के बारे में आकादमिक विचार के बदले एक बाज़ार की ज़रूरत के भाव का संप्रेषण हुआ है, बल्कि स्कूलों को अनैतिक रूप से निजी संस्थाओं के कारोबार के लिए इस्तेमाल किया गया है| ‘ग़रीब’ बच्चों की मदद करने के नाम पर सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की प्रतियोगितावादी कोचिंग के लिए बड़े-बड़े सेंटर्स के साथ समझौते करके उन्हें फ़ायदा पहुँचाया गया है और स्कूलों की नियमित पढ़ाई की गंभीरता को भी परोक्ष रूप से कमतर किया गया हैI इसी तर्ज पर दिल्ली सरकार ने उच्च-शिक्षा के लिए ऋण उपलब्ध कराने में मदद करने के नाम पर बैंक के समक्ष गारन्टर की भूमिका निभाने की नीति की घोषणा करके एक तरफ़ अपनी‘उदारता’ दिखाने की कोशिश की है, वहीं दूसरी तरफ़ नव-उदारवादी एजेंडे के तहत उच्च-शिक्षा को बाज़ार व निजी मुनाफ़े के जायज़ विषय के रूप में स्थापित करने का काम भी किया हैI यानी, एक तीर से दो निशाने!
इस बिना पर दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षा के बजट में कई गुना बढ़ोतरी किये जाने को हम एक सबक़ की तरह लेते हैं। यह दिखाता है कि नव-उदारवादी पैंतरे के तहत यह मुमकिन है कि मीडिया व जनता को भरमाने के लिए शिक्षा का घोषित बजट बढ़ा दिया जाये और नव-उदारवाद के अजेंडे को भी आगे बढ़ाया जाये।

नव-उदारवाद की प्रयोगशाला बनते स्कूल

शिक्षा पर नव-उदारवाद के इस कसते शिकंजे के प्रमुख कर्ता-धर्त्ता हैं एनजीओ जिन्हें दिल्ली सरकार ने अपने दफ्तर और नीति निर्माण में प्रमुख स्थान दिया है| एक तरफ़ प्रथम नाम के एनजीओ के टेस्ट इस्तेमाल करके बच्चों के कौशल जांचे जा रहे हैं, एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों को हाशिये पर डाल कर इनके द्वारा तैयार की गई हल्की व घटिया स्तर की सामग्री (प्रगति किताबों) को स्कूलों पर थोपा जा रहा है और दूसरी तरफ सेन्टर स्क्वायर फाउंडेशन नाम की कॉर्पोरेटवादी संस्था को बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) के साथ स्कूलों की ग्रेडिंग रिपोर्ट बनाने की भूमिका दी गई है| यह वही संस्था है जिसका मुक्त-बाज़ारवादी घोषित मन्त्र ही यह है कि सरकारों को स्कूल नहीं खोलने-चलाने चाहिए, बल्कि बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए वाउचर देने चाहिए (फंड चिल्ड्रन, नॉट स्कूल्स)। दुनियाभर में ऐसी ताक़तों द्वारा प्रायोजित शोधों व कार्यक्रमों में क्राइसिस ऑफ़ लर्निंग (अधिगम का संकट यानी बच्चे ‘सीख’ नहीं रहे हैं) का जो हौवा खड़ा किया गया है उसका एक उद्देश्य सार्वजनिक स्कूली व्यवस्था को बदनाम करके नाकारा व विफल घोषित करना है ताकि शिक्षा के बाज़ार का रास्ता साफ़ किया जा सके। यानी, पहले यही संस्थाएं सर्वे करवाकर सरकारी स्कूलों, विशेषकर शिक्षकों, को नाकारा साबित करती हैं, फिर अपनी किताबें, ट्रेनर्स, टेस्ट लाकर सरकार से पैसे बंटोरती हैं, फिर सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में सौंपने के रास्ते तैयार करती हैं| यह तर्क देना मक्कारी है कि परिणामों के लिए शिक्षक एकाकी रूप से ज़िम्मेदार हैं, जबकि बच्चों के सीखने और परिणामों पर उनकी आर्थिक-सामाजिक व स्कूलों की परिस्थितियाँ भी प्रभाव डालती है और इन दोनों की ही ज़िम्मेदारी राज्य पर है।
जहाँ दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में प्रथम के वरिष्ठ पदाधिकारी को औपचारिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गई है, वहीं इसी संस्था की एक अन्य नामी हस्ती को केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बैठकों में बुलाया जाता रहा है। इससे स्पष्ट है कि केंद्र और दिल्ली सरकार को चलाने वाले हाथ अलग नहीं हैं|
निजी संस्थाओं को महत्वपूर्ण अधिकार व भूमिकाएँ देकर, सरकार ने SCERT जैसे सार्वजानिक संस्थानों को कमज़ोर किया है| मुख्यमंत्री व शिक्षा-मंत्री बुद्धिजीवियों की आलोचना को ख़ारिज करके एक सतही समझ को लोकप्रियता का जामा पहनाकर महिमामंडित करते रहे हैं|
महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी स्कूलों को नव-उदारवाद की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है| आज इन स्कूलों में मेहनतकश वर्ग के बच्चे पढ़ रहे हैं और उनके समय को कई तरीकों से बर्बाद किया जा रहा है और उनकी शिक्षा से अकादमिक हिस्सा कम किया जा रहा है| स्कूलों का भविष्य इस बात पर निर्भर होता चला जा रहा है कि वे दक्षता से डाटा इकट्ठा करें, इसे कंप्यूटर पर चढ़ाएं, नित नई शिक्षा-विरोधी नीतियों और योजनाओं को कार्यान्वित करें और इनकी रिपोर्ट सरकार को भेजें| इसके लिए दिल्ली सरकार के स्कूलों में प्रत्येक शिक्षक को टैब दिया जा रहा है कि वे कुशलता का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करें कि नए- नए विक्रेताओं की लाइन लग जाए| अगर केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारों की नीतियों पर नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि एफिशिएंसी के नाम पर एक तरफ सरकारें शिक्षा में बजट से खिलवाड़ कर रही हैं और दूसरी तरफ सार्वजनिक व्यवस्था व उसके कर्मचारियों पर दोषारोपण करके अपनी नीतियों का ठीकरा फोड़ती हैं| मंत्रियों और अफसरों के ‘अघोषित इंस्पेक्शन, शिक्षकों को निलंबित करने, नए टेस्ट शुरु करने’ आदि से सम्बन्धित बयान आते रहते हैं| प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण के बजाए ऐसे परिणाम आधारित मूल्यांकन के खाके तैयार किया जाते हैं जो वस्तुपरक होने का दावा करते हैं| दरअसल यह ऑडिटिंग और जवाबदेही बढ़ाने का स्वांग नवउदारवादी सरकारों का अपनी नाकामियां और विफलताएं ढांपने का तरीका है| अब तो यह स्पष्ट होता चला जा रहा है कि नव-उदारवादी सरकारों के शासन में स्कूल न केवल पूंजीवाद की आवश्यकतानुसार श्रमिकों की फ़ौज तैयार करेंगे बल्कि सरकारी स्कूलों का इस्तेमाल स्थानीय तथा विशेषकर वैश्विक पूंजी के विभिन्न उपयोगों के लिए किया जाएगा| यह सारा खेल सार्वजनिक शिक्षा को मज़बूत करने का नहीं है बल्कि कुशल शासन का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करने का है जो वैश्विक पूंजी के काम आए| आगे-पीछे सभी राज्यों और केंद्र सरकार को यह करके दिखाना ही होगा नहीं तो एजेंट्स बदल दिए जाएंगे| 

लोक शिक्षक मंच शिक्षा के इस बदलते स्वरूप को और गहराई से समझने और इसके खिलाफ़ संघर्ष को मज़बूत करने के लिए एक पुस्तिका लाने के लिए प्रयासरत है| अगर आप पुस्तिका की प्रति प्राप्त करना चाहें तो हमें lokshikshmanch@gmail.com पर अपना संपर्क भेज सकते हैं|

                                     17.02.2019


Saturday, 2 February 2019

MR टीकाकरण को “अनिवार्य” राष्ट्रव्यापी अभियान बनाने व इसे स्कूलों के ज़रिये चलाने के बारे में बयान




पिछले दो सालों से भारत में WHO के सहयोग से MR टीकाकरण का राष्ट्रीय अभियान चलाया जा रहा है| भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी दस्तावेज़ों के अनुसार
·         खसरा तथा रुबैला के प्रति सुरक्षा प्रदान करने के लिए यह टीका स्कूलों तथा आउटरीच सत्रों में दिया जा रहा है|
·         इस अभियान के अंतर्गत 9 माह से 15 वर्ष तक के आयु वर्ग के बच्चों को यह टीका लगाया जाना है|
·         यह दोनों ही वायरस द्वारा फैलने वाले रोग हैं| बच्चों में खसरे के कारण विक्लांगता तथा असमय म्रत्यु हो सकती है, वहीँ रुबैला एक संक्रामक रोग है जिसके लक्षण खसरे जैसे होते हैं| यदि कोई महिला गर्भावस्था के शुरूआती चरण में इससे संक्रमित हो जाए तो कंजेनिटल रुबैला सिंड्रोम (CRS) हो सकता है जो उसके भ्रूण तथा नवजात शिशु के लिए घातक सिद्ध हो सकता है| 

दिसम्बर 2018 में शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी एक सर्कुलर के अनुसार इस अभियान को दिल्ली के स्कूलों में 16 जनवरी 2019 से शुरु किया जाना था| लेकिन डीपीएस स्कूल के कुछ छात्रों ने इस टीकाकरण अभियान को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी| याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि अभिभावकों की लिखित रज़ामंदी ज़रूरी है| गौरतलब है कि यह अभियान अधिकतर राज्यों में चलाया जा चुका है और रिपोर्टों के अनुसार सिवाय केरल के इसे कहीं और वैधानिक चुनौती नहीं दी गयी है|  

इस टीकाकरण अभियान के स्कूली संदर्भ को लेकर हम कुछ शंकाएं और आपत्तियां साझा कर रहे हैं - 

स्वास्थ्य से संबंधित शंकाएं  

·         यह स्पष्ट नहीं है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी किस आपात स्थिति के चलते सरकार ने MR टीकाकरण शुरु किया है|
·         क्योंकि कोई भी राष्ट्रीय अभियान जनता के पैसे से चलाया जाता है इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि वे कौन-से घोषित पैमाने (व्यापकता, गंभीरता, संक्रमण दर आदि) हैं जिनके आधार पर किसी बीमारी को राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के लिए चिन्हित किया जाता है|
·         दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा 20/12/18 को जारी सर्कुलर में इस टीकाकरण के 95% संतुष्टि दर का उल्लेख किया गया है| इसके क्या मायने हैं?
·         जब खसरा का टीका पहले ही सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत बच्चों को शिशु अवस्था में लगाया जाता है और रुबैला के घातक परिणाम गर्भवती महिला के होने वाले बच्चे पर पड़ते हैं, तब यह स्पष्ट नहीं है कि MR टीके को 9 महीने से 15 साल तक के उम्र के बच्चों को क्यों लगाया जा रहा है| यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि मेडिकल विज्ञान में एक मत यह भी है कि सामान्यत: रुबैला एक ऐसा रोग है जो बचपन में लगभग सभी को होता है और इसके प्राकृतिक रूप से हो जाने से हमारा शरीर इससे लड़ने की पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है| इस मत के अनुसार, बचपन में ही रुबैला का टीका लगाने के कारण यह स्वत: विकसित होने वाली प्रतिरोधक प्रक्रिया रुक जाएगी तथा भविष्य में यह बीमारी गम्भीर रूप भी ले सकती है| इसी राय के अनुसार रुबैला की रोकथाम के लिए टीका 12-13 साल की उम्र के बाद ही लगाना बेहतर होगा|


स्कूलों को केंद्र बनाने से संबंधित कुछ शंकाएं और सवाल

चूँकि इस अभियान में शिक्षकों और स्कूलों की वैधता का प्रयोग किया जा रहा है इसलिए हम अपनी भूमिका को लेकर सतर्क रहना ज़रूरी समझते हैं|     

·         जब आज तक बच्चों से जुड़े तरह-तरह के टीकाकरण व अन्य स्वास्थ्य अभियान अस्पतालों, स्वास्थ्य केन्द्रों, आशा कर्मियों आदि के माध्यम से अंजाम दिए जाते रहे हैं तो आख़िर किन कारणों से MR टीकाकरण को स्कूलों में करवाया जा रहा है? स्कूलों में बच्चों की उपलब्द्धता को टीकाकरण के लिए आसानी से मिलने वाले मजबूर प्रतिभागी (कैप्टिव ऑडियंस) की तरह देखा जा रहा है|
·         टीकाकरण के बाद जो निगरानी और मॉनीटरिंग शिक्षकों द्वारा की जाएगी, क्या यह मूलत: स्वास्थ्य विभाग की ज़िम्मेदारी नहीं थी जो शिक्षकों को आउटसोर्स कर दी गयी है?
·         जिस तरह पिछले दिनों स्कूलों को आधार, बैंक खाते, वोटर कार्ड बनवाने जैसे गैर-शैक्षणिक कामों के लिए इस्तेमाल किया गया है, इस टीकाकरण अभियान को भी उसी कड़ी में देखने की ज़रूरत है| ऐसे अनेक कार्यक्रमों व अभियानों को स्कूलों के माध्यम से अंजाम दिया जा रहा है जो स्कूलों की शैक्षिक पहचान को नेपथ्य में धकेल रहे हैं|
·         ऐसे अभियानों में स्थानीय प्रशासन द्वारा अनैतिक तौर-तरीक़े अपनाने की आशंका को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता हैI इसका एक चिंताजनक उदाहरण मेघालय के एक स्कूल की खबर से मिलता है जिसके अनुसार प्रशासन ने केवल इस कारण विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम रोकने के आदेश दिए क्योंकि उन्होंने (अथवा उनके अभिभावकों ने) इस टीकाकरण में भाग नहीं लियाI (School results withheld due to poor MR vaccination, The Hindu, November 23, 2018)
·         हम शिक्षकों के पास ऐसा कोई मेडिकल ज्ञान तथा प्राधिकार नहीं है जिसके तहत हमसे प्रार्थना सभा तथा SMC मीटिंग में इस वैक्सीन का प्रचार करवाया जा रहा है|
·         शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत शिक्षकों को टीकाकरण प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए बाध्य करना गैर-शैक्षणिक कार्य की श्रेणी में आता है| क्या ऐसे कार्यक्रमों को स्कूलों में आयोजित करने से पढ़ाई की नियमित प्रक्रिया बाधित नहीं होगी?
·         प्रधानाचार्य मिड-डे-मील का वितरण तो सुनिश्चित कर सकते हैं लेकिन प्रत्येक बच्चे का पेट भरा हो इसे शिक्षक कैसे सुनिश्चित करेंगे? इसी तरह, हर बच्चे के बारे में शिक्षक यह जानने की स्थिति में नहीं होते हैं कि उन्हें टीकाकरण को लेकर आशंकित रहने वाली कोई पूर्व मेडिकल अवस्था है या नहींI    
·         कक्षा 9 और 10 के विद्यार्थियों के लिए मिड-डे-मील की व्यवस्था SMC फण्ड से करने का निर्देश दिया गया है| SMC फण्ड के इस इस्तेमाल को लेकर ऐसे केंद्रीकृत निर्णय SMC की स्वायत्तता को चोट पहुंचाते हैं|

बच्चों की अच्छी सेहत के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की ज़रूरत के सम्पूर्ण पक्षधर होते हुए, हम इस अभियान के मॉडल के प्रति आश्वस्त नहीं हैं| विभिन्न राज्यों से आई चिंताजनक ख़बरों (जिनमें कुछ घटनाओं के फलस्वरूप लोगों की आशंकाएं व्यक्त हुई हैं), मेडिकल विज्ञान में ही इसको लेकर असहमति तथा सरकारों द्वारा स्कूलों तथा शिक्षकों के गैर-अकादमिक इस्तेमाल के बढ़ते चलन के संदर्भ में हमें ऐसे अभियानों पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है|        

Thursday, 31 January 2019

स्कूलों को दलगत राजनीति के प्रचार केन्द्र बनाने के खिलाफ बयान



लोक शिक्षक मंच, दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल द्वारा 28 जनवरी को दिल्ली सरकार के स्कूलों में आयोजित मेगा पीटीएम के अवसर पर दिए गए दलगत प्रचारी संबोधन पर कड़ा ऐतराज़ और रोष ज़ाहिर करता है। कार्यक्रम के संदर्भ में स्कूलों में उपस्थित विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों तथा शहर के अन्य नागरिकों से उनकी पार्टी के पक्ष में और नाम लेकर अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी के ख़िलाफ़ वोट देने की अपील करके मुख्यमंत्री ने अपने प्रोपागैंडा युक्त भाषण से न सिर्फ़ सार्वजनिक स्कूलों तथा अपने पद की मर्यादा को कुचलने का काम किया है, बल्कि तमाम संवैधानिक उसूलों की भी धज्जियाँ उड़ा दी हैं।  
साफ़ है कि चाहे वो लोगों का डाटा इकट्ठा करना हो या फिर अबतक सामान्य व सहज ढंग से होते आये कार्यक्रमों को मेगा आयोजनों में बदलना, सरकार की इन नीतियों से सत्ता का केन्द्रीकरण बढ़ रहा है तथा वो और निरंकुश हो रही है। इन क़वायदों का उद्देश्य न जनहित है और न ही लोकतंत्र को मज़बूत करना। दरअसल, मेगा पीटीएम के बहाने यह शिक्षक-अभिभावक सभाओं को सत्ता पक्ष द्वारा अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए अगवा करने की खुली साज़िश है। शिक्षक-अभिभावक संघ के रूप में जिस संस्था को शिक्षकों व अभिभावकों के विचार-विमर्श व मेलजोल का मंच होना चाहिए और जिसकी सभाएँ व कार्यक्रम आयोजित करने का फ़ैसला स्कूली स्तर पर, स्कूल की ज़रूरत के अनुसार होना चाहिए, मेगा पीटीएम सरीख़े सरकारी आदेशों द्वारा उसे दलगत प्रचार के लिए बंधक बनाया जा रहा है। यही  नहीं, निजी स्वार्थ के इस काम में सार्वजनिक फ़ंड्स व टेक्नोलॉजी का मनचाहा इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में हम इन दोनों ही क्षेत्रों में सरकार की उपलब्धियों व आदेशों को संदेह से ही नहीं बल्कि जन व शिक्षा विरोधी नीति के रूप में देखते हैं। सभी स्कूलों में नेताओं के प्रसारण का अनिवार्य इंतज़ाम करने व इश्तेहार लगाने के आदेशों को लागू करने में जनता की ख़ून-पसीने की कमाई की बेहिसाब बर्बादी होती है। वो भी एक ऐसे काम में जो न सिर्फ़ जनहित में नहीं है, बल्कि असल में शिक्षा-विरोधी है और ख़ालिस रूप से दलगत, चुनावी प्रचार व सत्ता की राजनीति से प्रेरित है। स्कूलों में 'दिल्ली सरकार द्वारा 11,000 कमरों का निर्माण' का ऐलान करते जो बोर्ड्स लगाये गए थे वो कोई जनहित  संबंधित घोषणा नहीं थी बल्कि स्व-विज्ञापन था, वो भी एक ऐसे काम का जो अभी शुरु भी नहीं हुआ है|    

मुख्यमंत्री द्वारा सरकारी स्कूलों के प्राँगण व शिक्षक-अभिभावक संघ के मंच का अपने चुनावी प्रचार के लिए इस्तेमाल करना न केवल स्कूलों व पीटीएम के दलगत रूप से निर्पेक्ष चरित्र पर सीधा हमला है, बल्कि यह उन नागरिकों के साथ भी एक भद्दा मज़ाक व धोखा है जिन्हें ऐसे कार्यक्रमों में अपने समय व दिहाड़ी की क़ीमत चुकाकर आना पड़ता है। इस तरह के छल का एक दुष्परिणाम अभिभावकों व अन्य नागरिकों के बीच सार्वजनिक स्कूलों व शिक्षकों पर से भरोसा उठने में भी प्रकट होगा। ऐसे आयोजनों के अनुभव के चलते वो कैसे यक़ीन करेंगे कि स्कूल में उन्हें जायज़ उद्देश्य व काम से बुलाया जा रहा है? दूसरी तरफ़, इस कार्यक्रम के आयोजन के माध्यम से दलगत प्रचार के लिए सिर्फ़ सरकारी स्कूलों के संसाधन, समय व स्थान का ही नहीं, बल्कि शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों के श्रम का भी अवैधानिक व अनैतिक दोहन किया गया। सरकारी कर्मचारी के रूप में शिक्षकों को बंधुआ मानकर, एक प्रशासनिक आयोजन के बहाने से वस्तुतः उनसे जबरन एक दलीय कार्यक्रम के लिए काम लिया गया है। शिक्षकों ने दर्ज किया कि कैसे उन्हें उनकी समझ और सहमति के ख़िलाफ़ दलगत प्रचार के लिए इस्तेमाल किए जाने का अपमानजनक एहसास हुआ| ऐसे क़दम निष्पक्ष कार्यपालिका के संवैधानिक मूल्य पर चोट करते हैं| बार-बार यह दबाव बनाकर कि सरकारी कर्मचारी होने के नाते हम प्रत्येक विभागीय आदेश मानने के लिए बाध्य हैं, हमें अनुचित आदेशों का पालन करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता| साथ ही, ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों की पढ़ाई का अपूर्णीय नुक़सान हुआ है। लगातार होते ऐसे आयोजनों से होने वाले शैक्षिक नुक़सान से बेपरवाही शिक्षा के प्रति सरकार की गंभीरता का छद्मावरण उघाड़ देती है। 
चाहे वो प्रधानमंत्री के तयशुदा कथानक का अनिवार्य प्रसारण हो या फिर मुख्यमंत्री का विद्यार्थियों के माध्यम से दलगत चुनावी अपील करना, स्पष्ट है कि सत्ताधारी ताक़तें, सभी नैतिक-संवैधानिक मूल्यों को ताक़ पर रखकर, सार्वजनिक स्कूलों को अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने पर आमादा हैं। एक तरफ़ तो यह हमारे सामने मुख्यधारा की चुनावी राजनीति के घटिया स्तर का उदाहरण पेश करता है, वहीं दूसरी तरफ़ यह चलन न सिर्फ़ हमारे स्कूलों व शिक्षा की गरिमा और स्वायत्तता पर कुठाराघात कर रहा है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ें भी खोखली कर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री के साथ बच्चों के बीच एक सार्वजनिक कार्यक्रम को उनकी किताब की सेल्समैनशिप से जोड़ दिया जाता है और बच्चों से उनके नाम का सामूहिक जाप कराया जाता है, दूसरी ओर एक सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अभिभावकों को उनके बेटों के भविष्य की भावनात्मक दुहाई देते हुए अपनी पार्टी के प्रचारक की भूमिका निभाते हैं। ज़ाहिर है कि जनकोष से और सरकारी स्थलों पर आयोजित इन कार्यक्रमों से वर्तमान व भावी मतदाताओं में ओछे प्रचार का काम लिया जा रहा है। स्कूलों को इस तरह से राजनेताओं व सत्ताधारी दल के निजी प्रचार के स्थल में बदल दिए जाने को इस दौर में सार्वजनिक व संवैधानिक संस्थानों को कमज़ोर-बर्बाद करने वाले हमलों की कड़ी में देखने की ज़रूरत है। यह आचरण या तो राजनैतिक अपरिपक्वता दर्शाता है या फिर निर्लज्जता। दोनों ही स्थितियों में देश के शीर्ष नेतृत्व का यह बेहूदा व्यवहार लोकतंत्र के लिए बेहद ख़तरनाक है। छल-बल से बच्चों के बीच अपनी या अपने दल की हीरोनुमा छवि स्थापित करना राजनैतिक अश्लीलता है। जब यह कृत्य संवैधानिक मापदंडों के विरुद्ध जाकर और सार्वजनिक संसाधनों को इस्तेमाल करके किया जाये तब सत्ता का यह तानाशाही दुरुपयोग एक अपराध भी हो जाता है। 
   
हम माँग करते हैं कि 
  • ·         स्कूलों को चुनावी व दलगत प्रचार के लिए इस्तेमाल करने पर तत्काल व पूर्णतः रोक लगाई जाए। 
  • ·         स्कूलों पर केंद्रीकृत कार्यक्रम व आयोजन थोपना तथा उन्हें अनिवार्य बनाना बंद किया जाए।   
  • ·         स्कूलों के स्थानिक चरित्र व स्वायत्तता की इज़्ज़त व हिफ़ाज़त की जाए।   

  
                  हम शिक्षक साथियों व लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सार्वजनिक शिक्षा की गरिमा में यक़ीन रखने वाले तमाम लोगों से अपील करते हैं कि वे स्कूलों को दलगत व चुनावी प्रचार के लिए इस्तेमाल करने वाले आदेशों, व्यवहारों तथा आयोजनों का विरोध करें।    


Thursday, 24 January 2019

पत्र: परीक्षा फीस भरने में विद्यार्थियों को आती कठिनाईयाँ


प्रति,
मानव संसाधन विकास मंत्री
शास्त्री भवन
दिल्ली – 01

विषय: कक्षा 10 और कक्षा 12 में CBSE परीक्षा फीस भरने में विद्यार्थियों को आती कठिनाईयाँ

महोदय,
हम आपका ध्यान इस ओर खींचना चाहते हैं कि सत्र 2018 में कक्षा 10 के विद्यार्थियों से 500 रुपए और कक्षा 12 के विद्यार्थियों से 1000-1200 रुपए तक CBSE परीक्षा फीस के रूप में मांगे गए| शिक्षक होने के नाते हमने विद्यार्थियों को इतनी फीस मांगे जाने पर होने वाली परेशानियों से जूझते हुए करीब से देखा| बढ़ती हुई फीस के चलते सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आते विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों, की पढ़ाई छूटने का खतरा है|
एक तरफ भारत सरकार जगह-जगह ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के पोस्टर लगा रही है और दूसरी तरफ छात्राओं को 12वीं तक की मुफ़्त शिक्षा का अधिकार नहीं प्रदान कर रही|
हमारा आपसे अनुरोध है कि -
·         कक्षा 10 और कक्षा 12 की CBSE परीक्षा फीस बच्चों से न मांगी जाए बल्कि इसका इंतज़ाम सरकार स्वयं करे| 

·         कक्षा 12 तक की शिक्षा पूर्णत: मुफ़्त की जाए | 


प्रति,
शिक्षा मंत्री
दिल्ली सरकार, दिल्ली

विषय: कक्षा 10 और कक्षा 12 में CBSE परीक्षा फीस भरने में विद्यार्थियों को आती कठिनाईयाँ

महोदय,

हम आपका ध्यान इस ओर खींचना चाहते हैं कि सत्र 2018 में कक्षा 10 के विद्यार्थियों से 500 रुपए और कक्षा 12 के विद्यार्थियों से 1000-1200 रुपए तक CBSE परीक्षा फीस के रूप में मांगे गए| शिक्षक होने के नाते हमने विद्यार्थियों को इतनी फीस मांगे जाने पर होने वाली परेशानियों से जूझते हुए करीब से देखा| बढ़ती हुई फीस के चलते सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आते विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों, की पढ़ाई छूटने का खतरा है|
दिल्ली सरकार ने शिक्षा बजट में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है लेकिन 12वीं तक की शिक्षा को नि:शुल्क करने जैसी मौलिक ज़रुरत को प्राथमिकता नहीं दी|

हमारा आपसे अनुरोध है कि -
·         कक्षा 10 और कक्षा 12 की CBSE परीक्षा फीस बच्चों से न मांगी जाए बल्कि इसका इंतज़ाम सरकार स्वयं करे|  
·         कक्षा 12 तक की शिक्षा पूर्णत: मुफ़्त की जाए|  

“नो-फ़ेल पॉलिसी तालीम का नहीं देश की सुरक्षा का मसला है”

लोकेश मालती प्रकाश

{हाल ही में संसद ने शिक्षा अधिकार कानून में संशोधन कर कानून में बच्चों को आठवीं तक फ़ेल नहीं करने की नीति को बदल दिया। अब राज्य चाहें तो बच्चों को आठवीं कक्षा से पहले भी परीक्षा लेकर फ़ेल करने का नियम बना सकते हैं। इस मामले में सरकार ने दुनिया भर के तमाम अनुभवों, शोधों और शिक्षाविदों की सलाह को ताक पर रख कर बच्चों को स्कूल में सीखने-सिखाने का बेहतर माहौल देने की बजाय उनको फ़ेल कर स्कूल से बाहर करने का आसान रास्ता चुन लिया। प्रस्तुत व्यंग्य इस मामले में हमारे सार्वजनिक व नीतिगत विमर्श की दरिद्रता को रेखांकित करता है।} संपादक
अब हम बच्चों को फ़ेल करेंगे। बिना फ़ेल किए भला पढ़ाई-लिखाई होती है? बच्चे फ़ेल होने के डर से ही पढ़ते हैं। नो- फ़ेल का मतलब है नो-पढ़ाई। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया कष्टप्रद होनी चाहिए। यह मज़े-मज़े की पढ़ाई में बच्चे बिगड़ रहे हैं। और तो और, इससे शिक्षक भी बिगड़ रहे हैं – फ़ेल नहीं करना है तो पढ़ा कर क्या होगा! मास्टरों की पोल तभी खुलेगी जब बच्चे फ़ेल होंगे।
देश अब तक परीक्षा और फ़ेल होने के गूढ़ व दूरगामी प्रभावों को समझ नहीं सका है। इन्हें सामने लाना बेहद ज़रूरी है ताकि इस मसले पर सहीं मायने में एक सुलझी हुई व गम्भीर राष्ट्रीय बहस हो।
सबसे ज़रूरी बात तो यह है कि परीक्षा का डर बच्चों को देश का सच्चा नागरिक बनाता है। असल में,स्कूलों का सबसे बड़ा काम बच्चों को यह सिखाना है कि वे डरें -परीक्षा से, टीचर से, प्रिंसीपल से, फ़ेल होने से। नो- फ़ेल पॉलिसी से इस तरह के तमाम भय अपना प्रभाव खो रहे हैं। बच्चे बिगड़ रहे हैं। वे ढंग से डरना नहीं सीख रहे हैं।
भाषा,गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, वगैरह वगैरह यह सब ऊपरी ज्ञान है जो इंसान कभी भी सीख सकता है और न भी सीखे तो कोई बहुत बड़ी बात तो नहीं। और इस नीति से पहले बच्चे यह सब अच्छे से सीख रहे थे इसका भी कोई पुख्ता सबूत नहीं। सो उसकी बात करना बेमानी है। असल बात है कि नो- फ़ेल पॉलिसी से बच्चों में स्कूलों और तालीम का डर कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ रहा है जो देश के लिए डरावना है।
डरे हुए लोग ही देश के सबसे अच्छे नागरिक होते हैं। निडर नागरिक देश के लिए खतरा होते हैं। आजकल के पैमाने पर तो वे देशद्रोही हैं। नागरिकों का निडर हो जाना राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल देगा। देश की एकता और अखण्डता चरमराने लगेगी। मिसाल के लिए,अगर खाकी वर्दी का ख़ौफ़ न हो तो अराजकता नहीं आ जाएगी? अभी तो बस अपराधियों के हौसले बुलंद हैं कल को हर ऐरे-गैरे के हौसले आसमान छूने लगेंगे।
निडर लोग सवाल उठाने लगेंगे। सोचने लगेंगे और अपने लिए फ़ैसले लेने की जुर्रत करेंगे। अगर ऐसा हुआ तो संविधान की कसमें खाकर बनी सरकारें क्या करेंगी? इतनी लम्बी-चौड़ी-फैली शासन व्यवस्था,नेता, मंत्री, अफ़सर – ये सब क्या करेंगे? यह सब इसी लिए तो है कि लोकतंत्र का लोक फ़ैसले लेने का काम तंत्र (और उसके नियंताओं) पर छोड़ दे। बड़ी मेहनत से यह सब खड़ा किया गया है।
नो-फ़ेल पॉलिसी से ये सारा ताना-बाना ही बिखरने की कगार पर आ सकता है। पता नहीं किसी ने अब तक यह तर्क क्यों नहीं दिया मगर नो-फ़ेल पॉलिसी महज़ तालीम का नहीं देश की हिफाज़त का, राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है।
कम-से-कम भाजपा से उम्मीद थी कि वह इस पक्ष की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करती ताकि इस नीति पर वाकई एक गंभीर और सार्थक राष्ट्रीय बहस हो सके। इतने विकट राष्ट्रवादियों से ऐसी भूल हो जाना अपनेआप में बेहद खतरनाक संकेत है। मोदी जी को इसके लिए नैतिक आधार पर तत्काल इस्तीफा देना चाहिए। (चूंकि नैतिक आधार पर इस्तीफा देने का नैतिकता से कोई असल सम्बन्ध नहीं होता इसलिए इसमें कोई मुश्किल नहीं।)
मेरा तो यह भी मानना है कि नो-फ़ेल पॉलिसी देश की परम्परा के साथ भी खिलवाड़ कर रही है। (संस्कृति रक्षक दल के लोग यहाँ भी चूक गए। हद है!)। जब हम बच्चों को परीक्षा के मैदान में उतारते हैं तो उनको समझ में आता है कि उनका असल तारणहार भगवान ही है। परीक्षा के मौसम में लोगों की ईश्वर भक्ति बढ़ जाती है। अास्था मजबूत हो जाती है। जैसे गर्मी में लू चलती है वैसे ही परीक्षा के मौसम में भक्ति और ईश्वर प्रेम की सामूहिक लहर चलती है।
फिर जो परीक्षा में पास होते हैं वे ईश्वर को धन्यवाद देते हैं और जो फ़ेल होते हैं वे अपने भाग्य को कोसते हैं। होनी को कौन टाल सकता है! नियति के लिखे को कौन बदल सकता है! और फिर पिछले जन्मों के कर्म भी तो अपना कमाल दिखाएँगे ही! जी हाँ, फ़ेल होना पूर्व-जन्म के कर्मों का फल है। फ़ेल होने वाले पूर्व-जन्मों के पापी हैं। उनको सज़ा मिलनी ही चाहिए।
देश की शिक्षा व्यवस्था इतने सालों से यह काम बखूबी कर रही है। नो-फ़ेल पॉलिसी शिक्षा व्यवस्था के इस पारलौकिक उद्देश्य के साथ खिलवाड़ है। अगर स्कूल फ़ेल नहीं करेंगे तो आने वाली नस्लों का ईश्वर, भाग्य और पूर्व-जन्म के कर्मों के फल जैसी सनातन धारणाओं से विश्वास उठ जाएगा। देश की संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी।
फ़ेल होने की व्यवस्था का विभागीय अनुशासन को मजबूत करने में भी अहम योगदान होता है। जब ढेर सारे बच्चे फ़ेल होते हैं तो अधिकारी मास्टरों को नोटिस जारी करते हैं। कारण बताओ कि तुम्हारी कक्षा के इतने बच्चे कैसे फ़ेल हुए?
नोटिस का कारण-वारण जानने से कोई लेना-देना नहीं। जान कर भी क्या करना? विधि के विधान से छेड़छाड़ कौन कर सकता है?
बात यह है कि नोटिस से मास्टरों के मन में भय पनपता है और उन पर विभाग का और अधिकारियों का दबदबा मजबूत होता है। नो-फ़ेल पॉलिसी इस विभागीय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रही है।
कुछ बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों का कहना है कि बच्चों को सिखाने की व्यवस्था होनी चाहिए न कि फ़ेल करने की। ये लोग सीखने के लिए स्कूलों में उन्मुक्त वातावरण की वकालत करते हैं। स्कूलों में लाइब्रेरी, सीखने-सिखाने के बेहतर तरीकों और बढ़िया सामग्री, खेल-कूद के सामान, कम शिक्षक-छात्र अनुपात, आकर्षक जगह आदि जैसी चीज़ों की बात करते हैं। कहते हैं कि सरकार तालीम पर पैसा ज़्यादा खर्च करे। शिक्षकों को बेहतर शिक्षा दे। सीखने की प्रक्रिया में बच्चों को मज़ा आना चाहिए। वगैरह वगैरह। लम्बी लिस्ट है। ऐसी गैर-ज़रूरी बातों की लिस्ट आमतौर पर लम्बी ही होती है ताकि असल मुद्दों से ध्यान भटक जाए।
इन फालतू बातों को छोड़िए। सबसे पहले तो ऐसे लोगों की जाँच होनी चाहिए। ये या तो खुद गुमराह हैं या देश को गुमराह कर रहे हैं। जो बातें देश के नागरिकों को सीखनी चाहिए वह तो स्कूल सिखा रहे हैं। बाकी रट-पिट कर डाक्टरी, इंजीनियरी आदि कि पढ़ाई भी थोड़े बहुत कर ही लेते हैं। उससे देश का काम चल ही रहा है (हम महाशक्ति ऐसे ही बन गए हैं क्या!)।
स्कूल क्या कोई सर्कस है कि वहाँ बच्चों को मज़ा आना चाहिए? उन्मुक्त वातावरण के चलते जेएनयू देशद्रोहियों का अड्डा बन गया और आप स्कूलों को भी वैसा ही बनाना चाहते हैं? आप चाहते क्या हैं? स्कूलों का काम डरी हुई राष्ट्रभक्त क़ौम पैदा करना है न कि उन्मुक्त ख़यालों के देशद्रोही व अराजक तत्व।
सरकार तालीम पर ज़्यादा खर्च करे?क्यों करे? जिनके भाग्य में पढ़ाई लिखी ही नहीं है उन पर खर्च करना देश के पैसे की बरबादी है। बल्कि इस एंगल से देखें तो बच्चों को फ़ेल करना राष्ट्रीय बचत के लिए ज़रूरी है। पैसा बचेगा तभी तो रॉफेल आएगा। देश बम बनाएगा। दुश्मनों को डराएगा। राष्ट्रवाद की भावना मजबूत होगी।
तो जो लोग बिना डर की तालीम की बात कर रहे हैं वे तो देश की सुरक्षा और संस्कृति के सबसे बड़े दुश्मन हैं। यह भी सवाल उठता है कि हमारी इतनी मुकम्मल शिक्षा व्यवस्था के बावजूद ऐसे तर्क देने वाले कहाँ से आ जाते हैं। इनके शिक्षा विरोधी और राष्ट्र विरोधी विचारों का स्रोत क्या है? इन्हें कौन फंड दे रहा है? द नेशन वॉन्ट्स टू नो!
अंत में इतना ही कहना है कि असफलता ही सफलता की सीढ़ी है। जो असफल नहीं होगा वह कभी सफल भी नहीं होगा। जो परीक्षा में फ़ेल नहीं होगा वह ज़िन्दगी में पास नहीं होगा। फ़ेल होना ही सबसे बड़ी सीख है। देश के नौनिहालों को फिर से फ़ेल करने की सरकार की मुहिम में उम्मीद है राज्य सरकारें और देश का प्रबुद्ध वर्ग सभी असहमतियों को एक तरफ रख कर एकजुट हो जाएगा। यह नए साल का सबसे बड़ा तोहफ़ा होगा जो हम अपने बच्चों को देंगे।
(samkaleenjanmat.in से साभार)