Sunday, 20 May 2018

शिक्षा की बुनियाद को कमज़ोर करता ‘मिशन बुनियाद’




हाल में दिल्ली शिक्षा मंत्रालय ने अपनी सारी जान स्कूलों में मिशन बुनियाद चलाने में लगाई | यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो कहता है कि 30 जून 2018 तक कक्षा 3 - 9 के प्रत्येक विद्यार्थी को  हिंदी में सरल कहानी पढ़ना, 1-2 वाक्य लिखना और गणित में घटा व भाग के सवाल हल करना आ जाएगा | 30 जून तक हर स्कूल को लिखित में certify करना होगा कि उसका हर विद्यार्थी यह कर पा रहा है | और अगर किसी स्कूल में ऐसा नहीं हुआ तो उसके प्रधानाचार्य     और शिक्षक जवाबदेह होंगे कि ऐसा क्यों नहीं हो पाया तो इसमें समस्या क्या है? अगर प्रत्येक विद्यार्थी हिंदी पढ़ना-लिखना सीख जाए और घटा-भाग कर पाए तो इसमें समस्या क्या है?  

पहली समस्या: मिशन बुनियाद ‘शिक्षा की बुनियाद’ कमज़ोर करता है

मिशन बुनियाद की रूप रेखा तैयार करने वालों ने यह कैसे तय किया कि मौलिक कौशल केवल ‘भाषा और गणित’ में तय होने चाहिए? उन्होंने यह किस आधार पर तय किया कि ‘भाग कर पाना’ गणित का अंतिम टेस्ट है? इसके पीछे कौन-सी रिसर्च है कि हल्की-फुल्की कहानियाँ पढ़ाना हिंदी सिखाने का बढ़िया तरीका है? उनके पास क्या अनुभव है कि बच्चे बिना हिंदी लिखे पर्यावरण या इतिहास का बोध विकसित नहीं कर सकते?

अगर हम मिशन बुनियाद के तहत आईं हिंदी की कहानियों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि ये 1-2 पन्नों के अनुच्छेद ‘कहानी’ कहलाने के लायक नहीं हैं | अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने से पहले हमें स्वयं इन कहानियों का विश्लेषण करने की ज़रुरत है | क्या साहित्य में कहानी के कुछ मानक होते हैं? अगर हाँ, तो क्या ‘प्रथम’ की ये कहानियाँ उन मानकों पर खरी उतरती हैं? ये कहानियाँ संदर्भविहीन हैं जिनमें एक झूठी चमक, मुस्कराहट पैदा करने की कोशिश की जाती है | क्या इन कहानियों में सामाजिक सच्चाई की झलक मिलती है? अगर ये कहानियाँ बच्चों के स्मृतिकोष नहीं बढाएंगी तो ये खोखली और बनावटी हैं | हमें अपने अनुभव से याद करना होगा कि जीवन में श्रेष्ठ साहित्य का क्या महत्व है |

इन कहानियों से क्या मूल्य निकलते हैं? क्या ऐसी कहानियां पढ़कर हमारे विद्यार्थी सामाजिक सच्चाई को समझने और व्यक्त करने के औज़ार विकसित कर पाएंगे ? क्या ऐसी सामग्री उन्हें उच्चस्तरीय चिन्तन और संवाद करने में मदद करेगी ? कोई पाठ धाराप्रवाह पढ़ने का यह अर्थ नहीं होता कि उस पाठ का बोध भी हो जाए | क्या घटिया सामग्री पढ़ाकर हम अपने विद्यार्थियों में साहित्य के प्रति रूचि जगा सकते हैं ? बल्कि ऐसा करके तो हम अपने विद्यार्थियों को गहरी सामग्री पढ़ने की आदत से दूर ले जाएंगे | अगर साथ में विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, खेल, कला की शिक्षा चलती रहती तो कौन-सा समय निकल जाता? सरकार को किसको आंकड़ें पूरे करके दिखाने थे? हमें खोजना होगा कि प्रथम NGO और NCERT द्वारा कहानियों की छंटाई करने में क्या फ़र्क है | हर विषय का एक शिक्षादर्शन होता है जो उस विषय की पाठ्यचर्या का आधार होता है | प्रथम की इन किताबों का कोई शिक्षा दर्शन नहीं है |
     
बार-बार यह दोहरा कर कि बच्चों को कुछ नहीं आता हम उन्हें घटिया शिक्षा नहीं परोस सकते | शिक्षा को नीचे गिराकर ऊँचे अकादमिक उद्देश्य नहीं पा सकते | हमारा यह सोचना कि ऐसी किताबें मात्र 2 महीने पढ़ानी हैं हमारी भूल होगी | पिछले 2 सालों से हम प्रगति की किताबें पढ़ा रहे हैं और आगे भी किसी-न-किसी रूप में पढ़ाते रहेंगे | केवल सरल भाषा हो जाने से किताब अच्छी नहीं हो जाती | बार-बार यह कहने से कि सरकारी स्कुल के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे , यह अफ़वाह सच में नहीं बदल जायेगी | अगर 35-40 बच्चों की कक्षा में किन्हीं कारणवश 10-20 बच्चे अपनी कक्षा की किताब नहीं पढ़ पा रहे तो उन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है लेकिन उनकी शिक्षा के स्तर को गिराकर हम उनका भला नहीं कर रहे | सरकारों को अपने आंकड़ें प्रदर्शित करने होते हैं इसलिए वे ऐसे ही मानक चुनते हैं जिन्हें गिना और नापा जा सके इसलिए पूरी शिक्षा को सरल कहानी और भाग के प्रश्नों में सिकोड़ दिया गया है | हमें यह भी समझना होगा कि ऐसी घटिया किस्म की शिक्षा परोसने की योजना में दिल्ली सरकार और MCD में कोई मतभेद या टकराव क्यों नहीं है | 

दूसरी समस्या: मिशन बुनियाद बच्चों को अनिवार्यत: बांटकर पढ़ाने की हिमायत करता है

कक्षा III – IX के विद्यार्थियों को नवनिष्ठा, निष्ठा, प्रतिभा नाम के समूहों में बाँटकर उनकी कक्षाओं को तोड़ दिया गया है | यह शिक्षा में जातिवाद नहीं तो क्या है जहाँ 8 – 14 साल के बच्चों को ‘होशियार’ और ‘non readers’ में बाँट दिया गया है | सरकार अवश्य हर सेमिनार में यह कहे कि बच्चों के अंदर हीन भावना विकसित न होने दें पर जैसे मंत्रियों द्वारा कुछ दलितों के घर खाना खा लेने से दलित उत्पीड़न खत्म नहीं हो जाता, वैसे ही शब्दों के फ़ेर बदल करने से यह संस्थागत ऊँच-नीच खत्म नहीं हो जाती |

पिछले 2-3 सालों में कितने ही बच्चे अपने शिक्षकों के सामने गिड़गिडाएं हैं कि उन्हें निष्ठा/B सेक्शन में न डाला जाए | उन्होंने अपने शिक्षकों से धमकियाँ सुनी हैं कि तुम्हें ‘निष्ठा’ में डाल देंगे | बच्चों के मनोविज्ञान पर इससे जो क्षति पहुंची होगी उसे अभी लम्बे समय तक नहीं समझा जा सकता | कहाँ गया वो शिक्षा दर्शन जो कहता था कि बच्चे एक दुसरे से सीखते हैं, शिक्षा समतामूलक होनी चाहिए ? बच्चों को बाँट कर पढ़ाना उनके बीच ऊँच-नीच पैदा करने से कम नहीं है |

और तो और PTM को भी सरकारी प्रचार का प्लेटफार्म बना दिया गया है जिसमें हम अभिभावकों को मिशन बुनियाद, आधार संख्या, GST, छोटी बच्चियों के लिए प्रोविडेंट फण्ड आदि सरकारी कार्यक्रम बेच रहे होते हैं | हमारे समाज में आज भी अभिभावक अपने बच्चों के भले-बुरे के लिए शिक्षक की सलाह पर विश्वास करते हैं और शायद इसलिए सरकारें हमेशा शिक्षकों का इस्तेमाल सेल्सपर्सन्स की तरह करना चाहती हैं |

तीसरी समस्या : यह ‘शिक्षकों की बुनियाद’ को कमज़ोर करता है

इस कार्यक्रम का एक असर यह भी हो रहा है कि शिक्षक उदासीन महसूस कर रहे हैं, बोर हो रहे हैं क्योंकि उनके काम में कोई रस, कल्पनाशीलता तथा originality नहीं बची है | ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों को भी dumbify कर रहे हैं | हमारे हाथों में ट्रेनिंग मैन्युअल पकड़ा दिए गए हैं और हमारा काम केवल उन्हें कार्यान्वित करना है | एक-एक स्कूल की एक-एक कक्षा की एक-एक गतिविधि पर नज़र रखी जा रही है; यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि किस कक्षा में, किस दिन, क्या, कितना तथा कैसे पढ़ाया जाए | निरीक्षण का ऐसा भय बिठा दिया गया है कि शिक्षक आकाओं को खुश करने वाले बने-बनाए प्लान कॉपी-पेस्ट करने में लगे हैं |

दुनियाभर में एनजीओ यह साबित करने में लगे हैं कि स्कूलों में DIET, B.El.Ed., B.Ed. आदि कोर्स पढ़कर आए शिक्षकों की नहीं बल्कि ऐसे कर्मचारियों की ज़रुरत है जो उनके बनाए lesson plans deliver कर सकें | एक दिन वे यह भी साबित करेंगे कि उनके action plans इतने फूलप्रूफ हैं कि होटल या बैंक कर्मचारी भी कक्षाओं में कार्यान्वित कर सकते हैं | इसलिए शिक्षक कोई ऐसा विशेष मानसिक श्रम नहीं कर रहे जिसके लिए उन्हें ज़्यादा तनख्वाहें दी जाएं|

‘बुनियाद’ में प्रदर्शन के आधार पर ACR में प्रविष्टियाँ दर्ज करने और शिक्षक दिवस पर पुरस्कृत किये जाने की बात करना ऐसे प्रायोजित कार्यक्रमों की मक्कारी उजागर करता है | यह मैच फिक्स्ड है| अगर आप इस मॉड्यूल से सिखा नहीं पाते हैं तो आपके प्रयास में कमी है और अगर सिखा देते हैं तो यह मॉड्यूल की सफलता है और फिर शिक्षा व शिक्षकों की क़ब्र खोदने के लिए देशभर में इसका प्रचार-प्रसार किया जायेगाI

हमें भुला दिया गया है कि शिक्षक के उद्देश्य कक्षानुसार या उससे भी ऊपर होने चाहियें | आज हम यह सोच कर जश्न मनाने लगे हैं कि मेरे बच्चों को ‘भाग’ आ गया | ये तो कभी भी हमारे मानक नहीं थे ! यह हमारी शब्दावली और सोच पर गहरी चोट छोड़ देने वाला प्रहार है | हमें भुला दिया गया है कि सीखना-सिखाना एक जटिल प्रक्रिया है जो फ़ास्ट-फॉरवर्ड नहीं की जा सकती |

हमारे बीच कुछ शिक्षक बीमार हो रहे हैं, स्ट्रेस में हैं क्योंकि उनके सामने 8-9 साल के ऐसे बच्चे भी हैं जो विभिन्न कारणों से कक्षानुसार नहीं सीख पाएं ; अनुपस्थिति, विशेष ज़रूरतों वाले बच्चे, अपनी दुनिया में मस्त रहने वाले बच्चे आदि | कहा जाता है कि शिक्षण तो ऐसा पेशा है जिसमें बच्चे अपनी गति से, समय से सीखते हैं लेकिन मिशन बुनियाद इस सच्चाई को नकारता है | इसके अंतर्गत बच्चों के बीच व्यक्तिगत विभेद सराहनीय नहीं डरावने तथा अवांछनीय हैं | अगर हम शिक्षकों को इतना स्ट्रेस है तो बच्चों के मानस पर इसका क्या असर हो रहा होगा ? क्या हम विद्यार्थियों से यह पूछ पाने की स्थिति में हैं कि ‘क्या वे एक ही ढंग से एक ही तरह की कहानियाँ पढ़ कर बोर हो गए हैं, रोज़ एक ही तरह के प्रश्न करके बोर तो नहीं हो गए ?’ अगर नहीं, तो हम अपने विद्यार्थियों के साथ अपना स्वायत्त रिश्ता खो रहे हैं | हमारी हालत नोटबंदी के दौरान उन बैंक कर्मचारियों की तरह हो गयी है, जिन्हें बैंकिंग के अलावा सरे अन्य काम करने में खपा दिया गया था |

अगर कोई शिक्षिका अपने विवेक से आपत्ति उठाए तो एक जवाब अटल सत्य की तरह तैयार खड़ा है  ‘हम सरकारी नौकर हैं इसलिए आँख बंद करके आदेशों का पालन करना होगा | अगर निरीक्षण हुआ तो आपका काम नहीं आपका आज्ञापालन जांचा जाएगा’ | ऐसे गुलाम शिक्षकों के बच्चे क्या आज़ाद परिंदे हो सकते हैं? ऐसे डरे हुए शिक्षक क्या कक्षा में बच्चों को भयमुक्त माहौल दे सकते हैं?

चौथी समस्या : मिशन बुनियाद अत्यधिक केन्द्रीकरण और निगरानी पर आधारित है 

जैसे अंग्रेजों ने अपनी नीतियाँ सफल बनाने के लिए वफ़ादार ज़मींदारों की फ़ौज खड़ी की थी, वैसे ही दिल्ली सरकार ने अपनी नीतियाँ सफ़ल बनाने के लिए मेंटर टीचर्स और TDC आदि की फ़ौज खड़ी की है जिनसे अपेक्षित है सूक्ष्म निगरानी रखना, योजनाओं को लागू करवाना, शिक्षकों के व्यवहार को संचालित करना, आकाओं का डर बिठाना आदि | अगर कोई शिक्षिका अपने विवेक से आपत्ति उठाए तो एक जवाब अटल सत्य की तरह तैयार खड़ा है  ‘हम सरकारी नौकर हैं इसलिए आँख बंद करके आदेशों का पालन करना होगा | अगर निरीक्षण हुआ तो आपका काम नहीं आपका आज्ञापालन जांचा जाएगा’ | ऐसे गुलाम शिक्षकों के बच्चे क्या आज़ाद परिंदे हो सकते हैं? ऐसे डरे हुए शिक्षक क्या कक्षा में बच्चों को भयमुक्त माहौल दे सकते हैं?
अक्सर यह सुनने में आता है कि बहुत से शिक्षक अपने काम को लेकर ईमानदार नहीं हैं, ठीक से पढ़ाते नहीं है और उनकी वजह से ऐसे कार्यक्रम शुरू करने पड़ते हैं | पर सवाल यह उठता है कि कामचोर लोग तो हर पेशे में होते हैं; नेता, प्रशासक, डॉक्टर आदि तो क्या उन्हें केंद्र में रखकर पेशे के उद्देश्य दोयम दर्जे के बनाना सही है? क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है कि शिक्षित-प्रशिक्षित डॉक्टरों को कोई एनजीओ यह बताये कि वो इलाज कैसे करें? तो फिर हम प्रशिक्षित शिक्षकों को क्यों ये एनजीओ बताने पर तुले हैं कि कैसे पढ़ाएँ?

जैसे पितृसत्ता व सामंती ताक़तें बलात्कार की पीड़िता को ही दोष देती हैं, उसी तर्ज पर यह संदेश दिया जा रहा है कि अगर बच्चे नहीं सीख पा रहे हैं तो यह उनका दोष है और अगर शिक्षक सिखा नहीं पा रहे हैं तो यह उनकी कमी हैI इसमें व्यवस्था की ख़ामियों, भाषाई भेदभाव, आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियों को सत्ता की सहूलियत के लिए विश्लेषण से दोषमुक्त कर दिया जाता हैI

पांचवी समस्या : समानांतर संस्थाएं खड़ी करना

आख़िर ‘प्रथम’ की शैक्षिक योग्यता क्या है और फिर अगर ऐसी संस्थाओं के आसरे ही शिक्षा नीति तैयार करनी है तो फिर NCERT, SCERT जैसे समर्पित अकादमिक संस्थानों का औचित्य ही क्या रह जाता है? इस दौर में सरकारें ऑटोनोमस संस्थाओं को कमज़ोर कर, बिना वैधानिक अथवा अकादमिक रूप से अनिवार्य प्रक्रियायें अपनाए अपनी विचारधारा के तहत शिक्षा को तोड़ने-मोड़ने का काम कर रही हैं | देश-भर में कहीं इतिहास की किताबें बदली जा रही हैं, कहीं व्यक्ति का महिमामंडल करती प्राइवेट पब्लिशर की किताबें अनिवार्य की जा रही हैं, कहीं शिक्षा दर्शन का मज़ाक उड़ातीं प्रगति किताबें पढ़वाई जा रही हैं | आज PPP मात्र स्कूल-कॉलेज की इमारतें बनाने, उनमें ‘सुविधाएं’ देने या ठेके पर नौकरियाँ देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस मक्कारी ने शिक्षा की आत्मा - पाठ्यचर्या - पर भी अपने पंजे गड़ा दिए हैं|

क्या सरकार को ये सब नहीं पता ?

दरअसल इन सब निर्णयों के पीछे न तो कोई शिक्षा दर्शन है, न कोई रिसर्च और न ही शिक्षाविद्द अनुभव | यह एजेंडा भारत या दिल्ली सरकार ने नहीं वैश्विक पूंजीवादी संस्थाओं ने बहुत पहले ही तय कर दिया था | नवउदारवादी दौर में सरकारें इन संस्थाओं की एजेंट मात्र बनकर काम कर रही हैं |

विश्व बैंक ने 1980 के दशक में ही यह तय करके विभिन्न देशों की सरकारों को बताना शुरू कर दिया था कि उसे जो सस्ते मज़दूर चाहिए उन्हें इतनी भाषा आती हो कि वे मालिकों के दिशानिर्देश समझ पाएं, जिस तरफ बताया जाए उस तरफ़ मशीन के पुर्ज़े घुमा सकें, विज्ञापनों में जो बेचा जाए उसे समझ सकें | ऐसी संस्थाओं ने भारत जैसे देशों पर कर्ज़े चढ़ाकर और यहाँ के मालिकों से हाथ मिलाकर यह तय किया कि ऐसे ‘साक्षर लेकिन अशिक्षित मज़दूर’ तैयार करने का काम स्कूलों को दिया जाए, विशेषकर सरकारी स्कूलों को जहाँ मजदूरों व छोटे किसानों के बच्चे पढ़ते हैं, जो बिना प्रश्न उठाए काम करते जाएं| | वे चाहते हैं कि भाषा को संदर्भविहीन करके पढाया जाए जिसका सीधा-सीधा मतलब है भाषा की शिक्षा से’ ज्ञान और चिंतन’ खत्म कर देना| यह शिक्षा नहीं, प्रति-शिक्षा है; कौश्लीकरण नहीं अकुशल बनाना है; सोचने-समझने वाले दिमागों को खाली बर्तनों में तब्दील करना है| शिक्षा के उद्देश्यों को हल्का करके स्कूलों को मात्र साक्षरता/ट्यूशन केंद्र बनाना है |

चाहे पूर्व-आधुनिक काल हो या औपनिवेशिक काल शासक वर्ग हमेशा शिक्षा के उद्देश्यों को अपने फ़ायदे के अनुसार तय करता है | ब्राह्मणों ने कहा उनके अलावा कोई वेद नहीं सीख सकता, अंग्रेज़ों ने कहा हिन्दुस्तानी क्लर्कगिरी से ज़्यादा कुछ नहीं सीख सकते और अब नव उदारवादी सरकारें यह साबित करने में लगी हैं कि ये मज़दूरों के बच्चे जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, सरल हिंदी और गणित से ज़्यादा कुछ नहीं सीख सकते | दिल्ली सरकार ने जिन संस्थाओं के साथ क़रार किया है उनमें प्रथम, टीच फ़ॉर इंडिया और सेंटर स्क्वायर फाउंडेशन शामिल हैं I इनके दस्तावेज़ व कार्यक्रम ख़ुद बयान करते हैं कि इनके वैचारिक व वित्तीय तार वैश्विक पूँजी के हितों से जुड़े हैं I 

आज सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के लिए शिक्षा के उद्देश्य बदल चुके हैं| बड़े, प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को उच्चशिक्षा के ज़रिये वाइट कॉलर नौकरियां करनी हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को सस्ते, अनुशासित श्रमिक बनाना है|चाहे वो किताबों के पाठ काटकर कोर्स आधा करना हो, मौलिक कौशल के नाम पर कोर्स हल्का करना हो या फिर सरकारी स्कूलों के बच्चों पर जबरन वोकेशनल कोर्स थोपना हो, इन सबका उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से ग़ैर-बराबरी बनाये रखना हैI  

इस फैक्ट्री व्यवस्था में 30 जून तक हर बच्चे को मशीन से तय माल की तरह तैयार होकर निकालना है | अगर हम मिशन बुनियाद को शिक्षा के लिए ख़तरनाक मानते हैं तो हमें इसे नकारने के लिए रचनात्मक और सशक्त तरीके ढूँढने होंगे| हमें याद करना होगा कि जोतिबा फूले, सावित्री बाई, गिजूभाई, रबिन्द्रनाथ टैगोर, अम्बेडकर, भगत सिंह, गांधी, पॉल फ्रेरे, जॉन टेलर जैसे चिंतकों ने शिक्षा से किस ज़िम्मेदारी की उम्मीद की थी ? हमें रेखांकित करने की ज़रूरत है कि शिक्षा क्या है और क्या नहीं |

मिशन बुनियाद और केंद्र और दिल्ली सरकार की अन्य शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा | कृपया अपने विचार/टिप्पणियाँ साझा करके इस आलोचना को और मज़बूत करने में हमारी मदद करें |


Sunday, 1 April 2018

अनुवादित लेख: अंडमान का आश्रम


                                                                                                                                  अजय सैनी 


आज, सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ जिसमें SC/ST एक्ट को कमज़ोर करने वाले निर्देश दिए गए हैं कई दलित-आदिवासी व सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया है I हम अपनी एकजुटता जताते हुए इस मौके पर एक अखबारी लेख का अनुवाद पेश कर रहे हैं जोकि न केवल हाशियाकृत वर्गों के प्रति हिंसा को दर्ज करता है, बल्कि संस्थाई क्रूरता के उदाहरण के तौर पर हमारे स्कूलों और शिक्षा से भी कई सवाल पूछता है..  
संपादक 

                                                                      

(अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की 25 मार्च की संडे मैगज़ीन में छपे लेख, The ashram in the Andamans, का अनुवाद)

आश्रम में शाम की पूजा के लिए सबकुछ तैयार है। लड़के पंक्तिबद्ध खड़े हैं, देखरेख करने वाले ने उनके धोती-कुर्तों की जाँच कर ली है और अब वो धैर्यपूर्वक पुजारी के, जोकि फ़ोन पर बात कर रहा है, निर्देशों का इंतज़ार कर रहे हैं। 
मैं आश्रम के मुख्य द्वार पर खड़ा सोच रहा हूँ कि पुजारी मुझे अंदर आने देगा या नहीं। मैं सकुचाते हुए प्रवेश करता हूँ मगर वो अपनेपन से मुस्कुराता है और एक ख़ाली कुर्सी की तरफ़ इशारा करता है। आश्रम दक्षिण अंडमान द्वीप पर स्थित है। 6 से 16 साल तक के तक़रीबन 80 'बेसहारा' या अनाथ लड़के यहाँ रहते हैं। यहाँ वो मुफ़्त आश्रय, भोजन, कपड़े, शिक्षा एवं धार्मिक अथवा आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।  
कुछ वर्ष पूर्व द्वीप के प्रशासन ने दो छोटे लड़के आश्रम को सौंपे थे। ये बच्चे अंडमानी जनजाति से थे जोकि अंडमान द्वीप समूह का एक ऐतिहासिक रूप से अलग-थलग समुदाय रहा है और 2013 में जिसकी कुल आबादी मात्र 57 थी। 
जल्दी-ही आश्रम ने लड़कों को वापस भेजने का फ़ैसला किया। "वो बाक़ी बच्चों से पूरी तरह अलग थे। हमने पाया कि उन्हें संभालना व अनुशासित करना बेहद मुश्किल था", पुजारी ने मुझे बताया। एक दिन ये बच्चे आश्रम के छात्रावास से नादारद मिले। आख़िरकार वो एक तालाब के किनारे मिले जहाँ वो बिना पकी मछली का मज़ा ले रहे थे। पुजारी ने ठाना कि वो ख़ुद ऐसे व्यवहार को 'सुधारेगा', मगर सब व्यर्थ था। 
उसने उनसे हिंदी में जवाबतलब किया, "कच्ची मछली भी कोई खाने की चीज़ है? क्या तुमने आश्रम के किसी भी लड़के को मछली को कच्चा खाते हुए देखा है?" बड़े लड़के ने प्रतिरोध के स्वर में जवाब दिया कि जब उन्हें पता चलेगा कि कच्ची मछली का स्वाद कितना अच्छा होता है तो सभी मछली को बिना पकाये ही खाने लगेंगे। 
छोटा अंडमानी लड़का महज़ 7 या 8 साल का था। आश्रम के खाने से उसका हाज़मा ख़राब हो जाता था। वो अक़सर दिन में अपनी पैंट गंदी कर देता था और रात में अपना बिस्तर गीला कर देता था। बाक़ी निवासी चिढ़ गए थे और आश्रम ने फ़ैसला किया कि वक़्त आ गया था कि द्वीप प्रशासन उन्हें वापस ले जाये। 

उसे जाना ही था  

अपने मोबाइल पर लड़के की एकमात्र फ़ोटो दिखाते हुए पुजारी उत्तेजना में कहता है, "देखो, यह रहा वो, अपने बर्थडे केक के साथ फ़ोटो के लिए पोज़ देते हुए। हम उसे प्यार करते थे, पर दुर्गंध असहनीय थी।" अपने छोटे साथी के जाने के बाद बड़ा लड़का अकेला और उदास रहने लगा। उसने रात में आश्रम से भागने के कई प्रयास किये और अंततः द्वीप प्रशासन उसे वापस ले गया। अचानक, हमारी बातचीत को किसी घटना से व्यवधान पहुँचता है। मैं मुड़ता हूँ और पाता हूँ कि देखरेख करने वाले ने अभी-अभी एक छोटे लड़के को मारा है। ऐसा प्रतीत होता है कि लड़के ने अपनी धोती ठीक से नहीं बाँधी थी। वो अब अपनी धोती सही करता है और दोबारा पंक्ति में लग जाता है।  
"इन्हें बहुत अनुशासन की ज़रूरत है", पुजारी शांत स्वर में कहता है। 
मैं स्कूल में लड़कों की शैक्षिक प्रगति के बारे  पूछता हूँ। वो बताता है, "इनमें से अधिकतर को पढ़ाया नहीं जा सकता है।"
मैं बहस करने की कोशिश करता हूँ। पुजारी पूछता है, "क्या आप जानते हैं कि ये लड़के कौन हैं? अंग्रेज़ों ने दो तरह के लोगों को काला पानी का निर्वास दिया था - स्वतंत्रता सेनानी और छँटे-हुए अपराधी। इनमें से अधिकांश लड़के इन अपराधियों के ही वंशज हैं। आख़िर हम ऐसे समूह से उम्मीद भी क्या कर सकते हैं?"
इतना कहने के बाद पुजारी लड़कों को आगे बढ़ने का इशारा करता है। बाल-प्रमुख दल को मंदिर तक ले जाता है जहाँ सभी दो आयु-वर्गों में क़ालीन पर बैठ जाते हैं। उनके बीच में कुछ पुजारी बैठते हैं, मगर विशेष प्रकार की पूजा चटाइयों पर। एक लड़का हारमोनियम और एक पुजारी तबला बजाता है। प्रमुख-पुजारी आरती प्रारंभ करता है और सभी उसमें शामिल हो जाते हैं। 
आरती ख़त्म होने के बाद प्रमुख-पुजारी प्रवचन शुरु करता है। छोटे लड़कों का ध्यान जल्दी-ही भंग हो जाता है। वो एक-दूसरे को छेड़ते हैं, अपना सर या काँख खुजाते हैं, नाक में उँगली डालते हैं, दाँतों से नाख़ून कुतरते हैं....

इनके भाग्य में श्रम करना ही बदा है 

जब पुजारी मुझे मंदिर के द्वार तक छोड़ने आता है तब मैं उससे इन लड़कों के भविष्य के बारे में पूछता हूँ। वो जवाब देता है, "16 की उम्र के बाद, ये घर जायेंगे और अपने परिवारों को आर्थिक सहयोग देना शुरु करेंगे। इनमें से सभी की क़िस्मत में दिहाड़ी मज़दूर बनना लिखा है। हमारी आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा से ये कम-से-कम अच्छे और ईमानदार मज़दूर तो बन पायेंगे।"
एक छोटा लड़का, जिसने हमारी बातचीत सुन ली है, संकोचवश सामने आता है और मुझे बताशे के दो टुकड़े देता है। वो पीछे क़दम हटाकर स्थिर खड़ा हो जाता है, मुझसे नज़रें चुराता हुआ। लड़का मेरे बचपन की एक याद ताज़ा कर देता है: एक गणित के अध्यापक ने मेरे पिता को सुझाव दिया था कि स्कूल में वक़्त 'बर्बाद' करने के बदले मैं खेत में काम करूँ। उस बोझिल संवाद का एक-एक पल मुझे अनंत काल का लगा था। 
मैं पुजारी को बताना चाहता हूँ कि अगर वो अपने पूर्वाग्रहों और अज्ञान को त्याग देगा तो ये लड़के 'ईमानदार मज़दूरों' के अलावा बहुत-कुछ बन सकते हैं। मगर मुझसे इतना ही हो पाता है कि एक अटपटी ख़ामोशी से अपनी बातचीत समाप्त कर दूँ।     

(लेखक टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं।) 
(द हिन्दू से साभार) 

Wednesday, 28 March 2018

स्कूलों में सीसीटीवी लगाने और बायोमेट्रिक हाज़िरी लागू करने के विरोध में हस्ताक्षर अभियान

लोक शिक्षक मंच द्वारा दिल्ली सरकार व  दिल्ली नगर निगम  स्कूलों में सीसीटीवी लगाने और आधार युक्त बायोमेट्रिक हाज़िरी लागू  करने के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया  जा रहा है,  अभियान के पहले पड़ाव को मंच  के साथियों ने उप-राज्यपाल महोदय तथा सम्बन्धित जनप्रतिनिधियों को दिया।  






Saturday, 3 March 2018

सैलरी संकट के दौर में अवार्ड की ख़ुशी


दिल्ली के तीन निगमों में से दो में कर्मचारियों को महीनों से देरी से वेतन दिया जा रहा हैI इन विकट आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में निगम प्रशासन व राज्य सरकार के ख़िलाफ़ निगम कर्मचारी लगातार आंदोलनरत हैं – कभी धरना प्रदर्शन करके तो कभी रैली निकालकरI ये सिलसिला पिछले कई वर्षों से जारी है और मामला अदालत में भी ले जाया गया है जहाँ निगम को कड़ी फटकार लगाई गई हैI लेकिन निगम व राज्य सरकार में शासन कर रहे दलों की आपसी खींचातानी के चलते कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल रहा हैI इस बीच सफ़ाई कर्मचारी समय-समय पर हड़ताल पर जा चुके हैं, जिसके दबाव में उन्हें तत्काल राहत भी मिली हैI शिक्षकों की ओर से अभी निगम के विभिन्न कार्यक्रमों/आयोजनों का बहिष्कार व हड़ताल का कोई फ़ैसला नहीं किया गया हैI ऐसे में जबकि निगम के सभी कर्मचारियों के बीच एकजुटता और समन्वय की ज़रूरत है, हम एक शिक्षक साथी द्वारा दर्ज एक हालिया अनुभव साझा कर रहे हैंI                  

                                                                 .............. सम्पादक



अंकल आज बहुत खुश हैंI आज ही उन्हें ऑफिस से पत्र मिला है जिसमें लिखा है कि कल उन्हें उनके काम के लिए जोनल अवार्ड दिया जायेगाI खुश हों भी क्यों न, पूरे जोन से साल में सिर्फ एक सफाईकर्मी को यह अवार्ड दिया जाता हैI अंकल बहुत ही मेहनती हैं, पूरे दिन झाड़ू उनके हाथ से छूटती नहीं हैI छूटे भी कैसे, स्कूल इतना बड़ा जो है और निगम की ओर से वो स्कूल में अकेले सफाईकर्मी हैंI आज जैसे ही उनको अवार्ड मिलने की खबर पता चली, उन्होंने स्कूल के सभी लोगों से अवार्ड फंक्शन में चलने का अनुरोध कियाI पर इस ख़ुशी के पीछे वो थोड़ा परेशान भी दिखे,  हालाँकि उन्होंने खुद कोई बात नहीं बताईI मेरे साथ ही वो अक्सर छुट्टी के समय स्कूल से मेन रोड तक आते हैंI आज उनके चेहरे का रंग उतरा हुआ देखकर मैंने ही बात शुरु कीI मैं बोला, “आज तो आप बहुत खुश होंगे, कल आपको अवार्ड मिलेगा”I इसपर वो बोले, “सर! ख़ुशी तो हो रही हैI आपके काम की लोग तारीफ करते हैं तो अच्छा तो लगता हैI” अचानक उन्होंने बीच में ही रुकने को कहाI मैंने पूछा, “क्या हुआ अंकल, आज रास्ते में ही उतर रहे हैंI” इसके जबाव में उन्होंने जो कहा वो मुझे अन्दर तक हिला गयाI वो बोले, “सर! कल अवार्ड मिलेगा, इसलिए मैं उधार लेने जा रहा हूँI वहां स्कूल का स्टाफ भी होगा और मेरे अन्य साथी भी होंगेI उनके लिए कम-से-कम मिठाई का इंतजाम तो करना पड़ेगाI तनख्वाह तीन महीने से नहीं आयी हैI घर पर तो कोई भी देखने नहीं आता है पर वहां तो खाली हाथ नहीं जा सकते नI हम लोग तो कोई और काम भी नहीं कर सकते, इस सैलरी पर ही पूरी तरह निर्भर हैंI एमसीडी के दूसरे सफाई वाले तो आन्दोलन करके सैलरी जबरदस्ती ले लेते हैं पर हम स्कूल वालों को देखने वाला कोई भी नहीं हैI” मैं सोचता रहा कि दिल्ली की राजनीति किस स्तर पर पहुँच गयी है, जहाँ आपके कर्मचारी की परेशानियाँ आपकी चिंता के केंद्र में नहीं हैं मगर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में आप किसी भी हद तक गिर सकते हैंI ऐसी परिस्थितियों में क्या पुरस्कार देने का कोई औचित्य है?