Thursday, 25 July 2013

AIFRTE Press Release on the tragic deaths of 23 school children in Bihar

अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच 
Secretariat: 306, Pleasant Apartments, Bazarghat, Hyderabad 500 004

सबको शिक्षा एक समान, मांग रहा है हिन्दुस्तान !
22ND July, 2013

Press Release on the tragic deaths
of 23 school children in Bihar

The tragic deaths of 23 children after consuming the mid-day meal served in a school in Chhapra, Bihar has sent shock waves through the entire country. Reports have come in of students and parents in many parts of the country refusing to let their children consume the school meal even though it comprises a substantial part of their nutritional intake for the majority of school-going children. Media is focusing attention on poor quality of the food served in many schools across the country, and the fact that its nutritional composition is lower than the specified norm.

The Bihar government’s inquiry and newspaper reports have blamed the Chhapra school principal for ignoring complaints by the cook, and protests by the students, about something being wrong with the oil and the taste of the food. Indeed this is unacceptable behavior and AIFRTE demands that accountability must be fixed. However, what is deplorable is the revelation that this appears to be a case of poisoning due to significant presence of insecticide in the food served. AIFRTE demands a thorough investigation so that criminal liability is established.

The mid-day meal scheme is an important component of the programme to ensure that children go to school. In fact it needs to be extended to include milk, egg or an equivalent protein source and fruit for morning and afternoon snack to ensure that no child is hungry or deprived of the necessary food intake to actively participate in learning and play/sports activities in the school. It is of course necessary to monitor the programme successfully for it to be effective.

Already, in most of the schools, School Management Committees or Women’s self-help saving Groups have been delegated responsibility, with the Head Teacher playing a key role, for monitoring the programme. In Bihar, the Head Teacher reports every afternoon through email/ mobile the precise purchase details, down to the expenditure on masalas and salt, apart from that on vegetables, flour, dal etc., to the state HQ in Patna which documents all these details in the HQ computer. There are well-defined rules and regulations.  Clearly, adding more agencies to monitor existing monitoring agencies is no solution to the problem. It is necessary to understand why the system is malfunctioning.

Why are those who are responsible for ensuring that children get a proper nutritious meal either resorting to corrupt practices or showing callous negligence or both? When these are not just individual aberrations but relatively widespread attitudes we need to go deeper to understand the cause. The fact that children attending government schools are from poor, deprived, schedule caste/tribe families or from minority communities is an important reason for prejudices dominating the conduct of school and local authorities towards them, and for the callous indifference towards their legitimate needs and rights.

The segregation of children in schools for the poor and schools for well-off elites, a segregation which shamefully has been turned into law by the Right to Education Act (2009) and reproduces the inequalities prevalent in our society, is the reason for the inability to successfully carry forward the mid-day meal scheme as part of an empowering system of education for all. Cutting budgetary costs by failing to provide adequate infrastructure (only a small proportion of schools have kitchens where cleanliness and hygiene can be ensured or where cooks are employed) or properly trained teachers who are adequately sensitized to meeting the needs of young children is the recipe for disasters like the one that has occurred in Bihar. This approach to the schooling of the vast majority of India’s children has to stop.

AIFRTE resolutely asserts that only a system of public-funded common neighbourhood schools, which are attended by children from all classes and backgrounds, can ensure that facilities intended for all children will be of quality and conform to the norms set down. In such institutions, the school management committees will be actively functional, parent-teacher interactions will be productive, and teachers and school authorities will be motivated and accountable. It is unfortunate that the present Bihar government which took the lead in setting up the only Common School Commission in the country when it came to power, allowed the report of the Commission to gather dust and no steps were taken to implement its recommendations. Had its recommendations been taken up for implementation twenty-three precious lives would have been saved and the right to quality education for all children would have become a reality.

AIFRTE condoles the tragic deaths of the children and calls upon all democratic sections to unite in the struggle for a national system of common neighborhood schools so that the sacrifice of their young lives does not go in vain.

                                Sd/---------------------             Sd/-------------------
                               Prof. Meher Engineer            Ms. Madhu Prasad                     
                                      Chairperson,                        Spokesperson,
                                        AIFRTE                                AIFRTE

Wednesday, 17 July 2013

लेख - नए दौर में प्राथमिक शिक्षा के पुराने सवाल

अरुण कुमार 

देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के साथ प्राथमिक शिक्षा में कुछ नई परिघटनाओं ने जन्म लिया. सभी को शिक्षा देने के लिए नए-नए अभियानों और कार्यक्रमों की शुरुआत हुई. सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाए उपलब्ध कराने और खाली पड़े शिक्षकों के पदों को भरे जाने का निर्देश दिया है.
कोर्ट-कचहरी में शिक्षा से जुड़े विवादों के बढ़ते मामलों ने कानून की पढाई में इस अधिकार पर पाठ्यक्रम शामिल करा दिया है.प्राइवेट विद्यालयों में गरीब बच्चों के एडमिशन में आरक्षण को हरी झंडी मिल चुकी है. शिक्षा को गुणवत्ता पूर्ण बनाने के लिए इस क्षेत्र में काम करने वाली सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में 'अध्यापक की भूमिका और सीखने-सिखाने का तरीका' केंद्रीय प्रश्न बनकर उभरा है.पुरानी शिक्षण पद्धति सवालों के घेरे में खड़ी हुई है .

परी सतह पर दिखाई पड़ने वाला प्राथमिक शिक्षा का यह खुशनुमा रंग भविष्य की वास्तविक सच्चाई से कितना मेल खाता है यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन परीक्षा केन्द्रित जीवन के सफलता की हकीकत और गरीब बच्चों को दिए जाने वाले शिक्षा के अधिकार में कोई सेतु दिखाई नहीं पड़ रहा है. बुनियादी शिक्षा की पुरानी पद्धति अपने मूल प्रवृत्तियां के साथ बदलाव की राह में सबसे बड़ी बाधा के साथ खड़ी है. परीक्षाओं और नीतियों ने शिक्षा और शिक्षक दोनों को सिर के बल उल्टा खड़ा कर दिया है. समाज में सरकारी स्कूलों की मान्यता ज्यों की त्यों बनी हुई है.

हावत है कि खोजने से भगवान भी मिल जाते हैं, लेकिन परीक्षा के दबाव से मुक्त बच्चा मिलना मुश्किल है. अभी तक हमारे स्कूलों और अध्यापकों की मुख्य भूमिका बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार करना रहा है. कोई बच्चा फेल नहीं होगा ऐसा नियम तो बन गया, लेकिन परीक्षाओं का अब भी हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का सिद्दांत और व्यवहार में कोई स्पष्ट स्वरूप दिखाई नहीं पड़ रहा है. व्यावहारिक धरातल पर मूल्यांकन की नई समझ विकसित होती नज़र नहीं आ रही है.

ध्यापक के मन में, आदत में और उसके सीखने-सिखाने के तरीके में परीक्षा केन्द्रित पढ़ने-पढ़ाने की सांस्कृतिक जड़े काफी गहरी हैं. सभी नियम, तरीका, कार्यक्रम, पद्दति और सिद्धांत अन्ततोगत्वा परिक्षाओं की पुरानी दृष्टि के अंतर्गत व्यवहारित की जा रही है. अतीत और वर्तमान जीवन में परीक्षा केन्द्रित सफलता इस आधार को निरंतर मजबूत बना रही है. जीवन के हालात, समाज की प्रवृत्तियाँ स्कूलों को प्रभावित कर रही हैं. अध्यापक और अभिभावक जीवन में परीक्षाओं पर जिस समझ और जरूरत से जुड़ा है उसकी अभिव्यक्ति स्कूलों में होना स्वाभाविक है.एक तरफ बच्चों को दबाव मुक्त शिक्षा देने में परीक्षाएं सबसे अधिक चिंता का कारण बनी हुई है, दूसरी तरफ समाज में परीक्षाओं के नए- नए रूप सामने आ रहे हैं.

RTE के अनुसार अध्यापक और छात्र का अनुपात 1:30 होने से पूरे देश में भारी संख्या में नए शिक्षकों की भर्तियाँ शुरू की गई हैं. केंद्र सरकार ने कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के स्कूलों में अध्यापक बनने के लिये अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य कर दिया है. यह परीक्षा केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर आयोजित की जा रही है. विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता से हताश निराश युवाओं ने मास्टर बनने के आखिरी विकल्प की तरफ रुख किया है. दरअसल देश भर में परीक्षाओं का यह दौर स्कूलों में योग्य अध्यापकों की खोज के लिए अपनाया गया है, जबकि प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक को मध्यवर्ग की दहलीज़ से बाहर निकाल दिया गया है. अब मध्यवर्गीय युवाओं का सपना अध्यापक बनना नहीं रह गया है .

बिहार में दो कदम और आगे निकलकर हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट के अध्यापकों के लिए भी अध्यापक पात्रता परीक्षा का आयोजन कराया जा चुका है. यहाँ पहले भी मुखिया और पंचायत के द्वारा नियुक्त पांच हजार रुपये की पगार पर प्राथमिक शिक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षकों की एक बड़ी संख्या मौजूद है. इनके अप्रशिक्षित होने और योग्यता को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं.

से अध्यापकों की योग्यता परखने के लिए यहाँ दक्षता परीक्षा का आयोजन किया जाता है और इसमें पास होने पर पगार में मामूली बढ़ोत्तरी के लालच को भी जोड़ दिया गया है. दक्षता परीक्षा के आयोजन के समय अख़बारों में शिक्षकों के नक़ल करने की कहानी सबसे अधिक छपती रही है, जिसे लेकर इस पेशागत समूह का भरपूर माखौल उड़ाया जाता रहा है. देश में बहुत से विभागों में परीक्षा और प्रमोशन के नियम काम करते हैं.आजकल अख़बारों में मुन्ना भाई के किस्से भी आये दिन छपते रहते हैं, लेकिन अध्यापकों का जो स्वरूप पेश किया जा रहा है उसका कोई दूसरा उदहारण नहीं मिलता. 

रअसल, मौजूदा परीक्षाओं का बुनियादी चरित्र ही नक़ल की संस्कृति को जन्म देता है. सृजनशील ज्ञान के निर्माण में सबसे अधिक बाधक हमारी परीक्षा प्रणाली हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि इन्ही परीक्षाओं के जरिये योग्य शिक्षकों की तलाश की जा रही है. बिहार में भी TET रूपी नई परीक्षा के साथ शिक्षक भर्ती प्रक्रिया जारी है, ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है कि परीक्षाओं की वैतरणी पार करके आने वाला शिक्षक प्राथमिक शिक्षण में चमत्कार करेगा.

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता और बेरोजगारी से जूझते अस्मिताविहीन, अल्पवेतनभोगी शिक्षक के पेशे का चुनाव करने वाले किसी इन्सान की मनोदशा कैसी बनगी, वह अपने पेशे के प्रति कितना न्याय करेगा, बच्चों को परीक्षा के दबाव से मुक्त रखकर सीखने-सिखाने की सृजनशीलता को कैसे आत्मसात करेगा? यह विचारणीय प्रश्न है. शिक्षा के अधिकार का व्याहारिक रूप इस तरह फलीभूत होना त्रासदी ही है, लेकिन इन्ही यक्ष प्रश्नों के साथ प्राथमिक शिक्षण का भविष्य हमारा स्वागत करने के लिए तैयार है .

प्रो. कृष्ण कुमार के अनुसार NCF-2005 के निर्माण में काम कर रही कमेटी के सामने जो विकट प्रश्न मौजूद था कि "पाठ्यचर्या का निर्माण कर भी लिया जाय तो उसको जीवन देने वाले अध्यापकों के प्रशिक्षण का क्या होगा, हमारी परीक्षा प्रणाली का क्या होगा" वास्तव में वह और अधिक प्रासंगिक होकर हमारे सामने उपस्थित हुआ है. NCF -2005 के निर्माण के बाद बिहार अपनी विशेष सामाजिक-आर्थिक परस्थितियों के तर्क के साथ BCF-2008 का निर्माण करने वाला पहला राज्य था. जिसके निर्माण के साथ अध्यापकों से अपेक्षा की गई थी कि वे इन सिद्धांतों के अनुरूप शिक्षण की प्रक्रिया को अंजाम दे, लेकिन यहाँ अध्यापक को जन्म देने वाले सरकारी प्रशिक्षण संस्थान एक तो जरूरतों के हिसाब से बहुत कम थे और जो थे उनमें भी लकीर की फकीरी ही चल रही थी. दूसरी तरफ प्राइवेट प्रशिक्षण कालेज धीरे-धीरे मुनाफा पैदा करने वाले उद्योग बन बैठे थे.

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के साथ जब बड़ी संख्या में शिक्षकों की जरूरत सामने आयी तो बिहार ने अपने हाथ सबसे पहले खड़ा कर दिया कि हमारे पास इतने प्रशिक्षित नहीं हैं और अप्रशिक्षितों को शिक्षक नियुक्त करने की छूट दी जाय.ऐसे हालात और प्राथमिकता वाले संस्थाओं से आये हुए प्रशिक्षितों और बिना प्रशिक्षण नियुक्त होने वाले शिक्षकों से NCF और BCF की भावना के अनुरूप अध्यापन की अपेक्षा करना कितना न्यायसंगत है. महज किसी दक्षता परीक्षा द्वारा योग्य शिक्षकों की तलाश से हालात में सुधार की कोई गुजाइश नहीं बनती है. भविष्य के शिक्षकों को तैयार करने के लिए किसी प्रभावी नीति और जिम्मेदारी का न होना वर्तमान हालत की उपज का प्रमुख कारण है. आज शिक्षक स्वाभिमान के साथ अध्यापन पेशे से जुड़कर पहचान पाने से वंचित हो गए हैं. वेतन भत्ते की संरचना भी किसी प्रेरणा की जगह उन्हें घुटन में ले जाने का बेहतर आधार तैयार कर रही है.

प्राथमिक शिक्षा में पुराने प्रश्न हल नहीं होते कि नई चुनौतियाँ सामने खड़ी हो जा रही है अभी बच्चों को केंद्र में लाने के प्रयास चल ही रहे है कि नई परिस्थितियों में अध्यापक की अस्मिता और गरिमा के रूप में नई परिघटना सामने आ गई है. गैर सरकारी संस्थाओं का सापेक्षत एक छोटा तबका विभिन्न परियोजना के माध्यम से इस क्षेत्र में काम कर रहा है लेकिन ऐसी परियोजनाओं की निरन्तरता का अपना संकट है.इन संस्थाओं ने पुरानी शिक्षण पद्धति को कटघरे में खड़ा किया है. सीखने-सिखाने में स्कूल, अध्यापक और बच्चे को समझने की एक नई दृष्टि पैदा की है.

प्राथमिक शिक्षा पर NCF-2005 की गाइड लाईन और शिक्षा का अधिकार जैसा कानून आ चुका है, लेकिन सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और अध्यापकों की छवि समाज में सुधरती नज़र नहीं आ रही है. ये घटनाएं इस तरफ इशारा करती है कि समस्याएं जिस जमीन से पैदा हो रही हैं, उस जमीन की हकीकत को सामने लाने और उनसे जूझने के लिए जिन रास्तों की आवश्यकता है उसका प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहा है, सभी प्रयासों में सुधार के कार्यक्रमों की भरमार है लेकिन बदलाव की रोशनी दिखाई नहीं पड़ रही है.

नियम और कानून का जोर फाइल पूरा होने में प्रतिफलित हो रहा है, जबाबदेही की सुनिश्चितता यहीं तक सिमट रही है.परियोजनाओं में समझ और बदलाव की प्रक्रिया शुरु होते होते रिपोर्ट छोड़कर विदा लेने का वक्त आ जाता है. प्राथमिक शिक्षा में बदलाव हेतु प्रयोग में लाये जाने वाले तरीके और जबाबदेही को सुनिश्चित करने में नए मैकेनिजम की जरूरत दिखाई पड़ती है. इसे अनुशासन के मातहती से बाहर निकालकर पहचान, अस्मिता दायित्व और समझ के साथ जोड़ने का काम खो सा गया है. शिक्षण की आधुनिक विचारधारा के इस अहम् पक्ष के साथ काम नहीं हो पा रहा है.

कुछ ट्रेनिंग, वर्कशाप, गोष्ठी-सेमीनार करा लेने और पाठ्यचर्या को लिख लेने से चुनौती कहीं अधिक कठिन हैं. प्राथमिक शिक्षण में लगी इतनी बड़ी मानवीय ऊर्जा और संसाधन के बेहतर उपयोग की कुशलता को उन्नत बनाने में जिस ऊर्जा, क्षमता, चिंतन और सृजनशीलता की आवश्यकता है उसके निर्माण की प्रक्रिया और निरंतरता नदारद है. डंडे के जोर पर पशुओं को नियंत्रित किया जा सकता है, इंसानों को नहीं. प्राथमिक शिक्षा की समस्याएं कहीं अधिक गहराई से जुड़ने की मांग कर रही हैं. 
जनज्वार से साभार  

Monday, 15 July 2013

शिक्षक डायरी - चुनावी ड्यूटी में पिसते शिक्षक

                                                                                                                                   मनोज कुमार जाटव 

एक कहावत तो आप ने सुनी होगी '' गरीब की बीवी सब की भाभी '' नगर निगम के शिक्षको की हालत भी कुछ ऐसी ही है . जब मन करता है cencus वाले कहते है cencus करो .और चुनाव वालो के तो हम स्थाई नौकर है . एक पैसा तो देते नहीं मगर जरा सी गलती होते ही नोकरी खाने की धमकी . और निगम का हाल ये है की अगर कोई झूटी शिकायत भी कर दे यहाँ से तो कानूनी परकारिया तो छोड़िये सीधी r .d .a . inquary कॉल कर देंगे मेमो या नोटिस तो देने की जरुरत ही क्या है . हम जो cencus और चुनाव का कार्य करते है वो हमारा व्यक्तिगत कार्य तो है नहीं . बिना पूरी जानकारी और साधनों के हमें छोड़ दिया जाता है पागल जनता के सामने। अब सबको संभालो और जनता का ये हाल है की सब खुद को अब केजरीवाल समझाने लगे है . जिसकी नजरो मैं सब सरकारी कर्मचारी चोर है , वो टीचर भी जो फ्री मैं अपनी जेब से पैसे खर्च करके ये ड्यूटी करता है . कल सनिवार तेरह तारीख को मेरे साथ ऐसा ही वाकिया घटित हुआ मैं अपने स्कुल मैं चुनाव का कार्य कर रहा था जिसमे लोगो से विभिन्न प्रकार के फॉर्म लेने थे और उनकी मदद करनी थी . एक अजीब सा व्यक्ति मेरे पास आया और कहा 6 फॉर्म दो . मैंने पुछा की भाई इतने फॉर्म का क्या करोगे तो उसने मुझे अपशब्द कहने सुरु करे दिए की तू फॉर्म दे फालतू मत बोल . मैंने चुप चाप 6 फॉर्म दे दिए . फिर बोल की फॉर्म no 6 भी दे मैंने पूछा की भाई किसका बनवाना है तो बोल 35 साल की महिला का मैंने पूछा भाई इतनी बड़ी औरत का पहले भी बना होगा वो कैंसिल करवा दिया न। वो कैंसिल स्लिप लगा देना . इतना ही बोल वो पागल हो गया और मुझे गली देना सुरु हो गया और फालतू की बहस करने लगा की तुम लोग हो क्या ( वाही केजरीवाल इफ़ेक्ट ) अभी तुझे ठीक करता हूँ . वो कई जगह फ़ोन करने लगा मैंने कहा की कर ले भाई . अचानक उसे क्या हुआ वो अपने मोबाइल से मेरी फोटो खीचने लगा . अब ये मेरी निजता का हनन था मैंने तुरंत कहा की मेरी फोटो delet करो उसने मना कर दिया . मैं उसका फ़ोन ले लिया और कहा की फ़ोन तभी मिलेगा जब मेरा फोटो delet होगा , उसने क्या किया सीधा अपने घर फ़ोन किया और पुलिस को फ़ोन कर दिया की मेरा फ़ोन चोरी कर लिया . उसके घर से सात आठ लोग आ गए और मैं अकेला . वो तो मरने ही आये थे मगर मेरा डील दॉल देख कर झिझक गए मगर खूबअपशब्दों का प्रयोग किया . 3 जिप्सी स्कुल मैं आ गई दस बारह पुलिस वाले . अब पुलिस का ड्रामा देखिये उन्हें ये पता नहीं की ये काम सरकारी है या प्राइवेट वो बोलने लगे की आप पर भी केस होगा और उस आदमी पर भी . मैंने उनके शैक्षिक स्तर को देखते हुए समझाया की भाई ये काम सरकारी है। तब जा कर उन्हें समझ मैं आया मैंने अपना वैयक्तिगत प्रभाव का भी प्रयोग किया तब जा कर पुलिस थोड़ी ठंडी हुई और उस आदमी को और उसके गुंडों को बहार निकल और समझोता करवा दिया . मैंने aero को फ़ोन किया तो महोदय ने कहा की भाई ये तो होता ही रहता है खुद देख लो . और पुलिस को फ़ोन कर दो बताओ ये वो ही चुनाव आयोग के अधिकारी है जो बात बात पर नोकरी खाने की धमकी देते है . मेरे लाख कहने पर भी aero महोदय नहीं आये . जब की सेण्टर पर tention थी . कितनी शर्म की बात है की लोक तंत्र का आधार चुनाव का कार्य टीचर अपनी जान का जोखिम मैं डाल कर रहा है . अकेला टीचर सेण्टर पर बैठता है कोई भाई आये कुछ भी करे और हम सिर्फ सुने . चुनाव आयोग की कोई जिम्मेदारी नहीं . और हमारा डिपार्टमेंट तो बस सिकायत हो जाये r .d .a . inquary तुरंत रेडी है . हमारा विभाग कभी पूछता है चुनाव आयोग से की जो आप बेगार करवाते हो हमारे टीचर्स से उनकी सुरक्षा के लिए कुछ आप ने किया है . नहीं बस शिकायत पर एक तरफ़ा कार्यवाही . अब देखते है की आगे क्या होता है वैसे aero को लिखित मैं तो दे दिया है . मगर पता नहीं की क्या होगा हम है ही '' गरीब की बीवी सब की भाभी ''.शर्म शर्म और सिर्फ शर्म ............

( यह आवश्यक नहीं है कि इस लेख  में दर्ज विचारों से मंच की सहमति हो।)

Saturday, 6 July 2013

शिक्षक डायरी : परीक्षा परिणामों के लिए भ्रष्टाचार , शिक्षक संघों की चुप्पी


जब मैं लखनऊ में था तो उन्ही दिनों उत्तर-प्रदेश बोर्ड के परिणाम घोषित किये गए थे. अखबार में कुछ ख़बरें पढ़ने को मिलीं . 'Teachers blame the CCE pattern ( introduced by the UP board in 2010-11) for improved performance of private schools.' ये वहां के ToI में 9 जून को एक खबर का शीर्षक था . इस रिपोर्ट में UP माध्यमिक शिक्षक संघ के सचिव का ये बयान भी छपा था कि private schools में लगभग सभी विद्यार्थियों को स्कूल-स्तर की परीक्षा में पूरे अंक दिए जाते हैं क्योंकि इसमें शिक्षा-माफिया उनसे पैसे ऐंठ कर उन्हें सफलता सुनिश्चित कराता है . हांलाकि रिपोर्ट के अनुसार तीनों तरह के स्कूलों के परिणाम प्रतिशत में 1-2 % का ही अंतर था . एक और रिपोर्ट ( ToI, जून 6 ) में उन्हीं शिक्षक प्रतिनिधि का ये कथन छपा था कि अब समाजवादी पार्टी के सत्ता में वापिस आने से स्कूलों में नक़ल बहुत बढ़ गयी है . 

यहाँ अपनी तरफ से में दो अवलोकन रख रहा हूँ, बिना ये दावा किये कि इनका कोई सीधा सम्बन्ध उपरोक्त रिपोर्टों से है . UP में अधिकतर स्थापित व आधुनिक पेशों की तरह शिक्षक संघों की कमान भी द्विज कहे जाने वाले जाति-समूहों के पास है . दूसरी ओर, यहाँ शिक्षकों व आम लोगों की भी ये मान्यता आपको अक्सर सुनने को मिलेगी कि यहाँ स्कूल की पढ़ाई और परीक्षा का स्तर CBSE से कहीं कठिन है . ऐसा वे एक गर्व तथा श्रेष्ठता के भाव से ही कहते हैं .यहाँ ये तथ्य भी मौज़ू हो सकता है कि NCERT की हाल ही की राष्ट्रीय उपलब्धि रिपोर्ट में UP के प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों का स्तर लगभग सबसे ऊपर पाया गया है .  
अब मैं दिल्ली के सरकारी स्कूलों के सुधरते बोर्ड परिणामों के सन्दर्भ में अपने कुछ साथियों के अनुभव प्रस्तुत करूँगा . यहाँ हमें याद रखना चाहिए कि दिल्ली सरकार ने, जिसमें मुख्यमंत्री खासतौर से शामिल हैं, इन तेज़ी से सुधरे परिणामों का काफी प्रचार किया है और इन्हें चुनावी लाभ के लिए भी इस्तेमाल करने की कोशिश की है . साथ ही,जिस बात की ओर ये अनुभव इशारा करते हैं वो कोई राज़ नहीं है, बल्कि जगजाहिर है .एक मित्र ने बताया कि प्रिन्सिपल्स की एक औपचारिक बैठक में शिक्षा अधिकारी ने उनसे कहा कि वे उस स्कूल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे जिसका परिणाम कम आएगा, बल्कि कार्रवाई उस स्कूल के खिलाफ होगी जहाँ उक्त स्कूल का बोर्ड केंद्र पड़ा होगा . ( बाद में सुनने में आया कि उस अधिकारी के क्षेत्र में सबसे बढ़िया परिणाम रहने के कारण उसे पुरस्कार-स्वरूप शैक्षिक-सम्मलेन के लिए विदेश भेजा गया ! ) एक अन्य साथी ने बताया कि इस बार परिणाम में सुधार होने पर उनकी प्रिंसिपल ने इस बात पर राहत जताई कि उन्हें अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक में कम-से-कम सबसे पीछे की पंक्ति में बैठने पे मजबूर करके बेइज्ज़त तो नहीं किया जायेगा . ( साफ़ है कि इस घटिया व्यवस्था में कुछ लोगों को तो हमेशा ज़लील होना पड़ेगा क्योंकि सभी अग्रणी नहीं हो सकते और वैसे भी इसका उद्देश्य ही अपमानित व भयभीत करके चाटुकार तथा ग़ुलाम तैयार करना है .) ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है . आलम ये है कि जहाँ शिक्षक बोर्ड केन्द्रों पर नियम के विरुद्ध जाकर विद्यार्थियों से संपर्क स्थापित करने को उनका 'मनोबल' बढ़ाना कहते हैं, वहीं अधिकतर विद्यार्थी ऐसी 'मदद' को अनुचित मानने की संज्ञानात्मक व भावनात्मक क्षमता खो चुके हैं . अगर ये इतना गंभीर मुद्दा नहीं होता तो हम निश्चित ही उस साथी के अनुभव पे हँस सकते थे जिन्होंने देखा कि प्रिंसिपल के द्वारा एक विषय के परिणाम पे चिंता जताने पर एक शिक्षिका ने बहुत ही गंभीरता से ये कहते हुए 'ज़िम्मेदारी' ली कि उनकी दोस्त बोर्ड केंद्र पड़ने वाले स्कूल में पढ़ाती है !
यहाँ मैं उपरोक्त दृष्टान्तों का विश्लेषण नहीं करूँगा . वर्ग, जाति, राजनीति- चुनावी व वृहत - आदि सन्दर्भों में इन अवलोकनों को समझा जा सकता है . आपसे मेरा मुख्य सवाल यह है कि वो कौन सी परिस्थितियाँ व कारक हैं जिनके चलते UP और दिल्ली के शिक्षक संगठनों में इस बात पर इतना अंतर है कि जहाँ एक इसका खुलकर विरोध कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ एक समझौतापरस्त, आत्मसमर्पण वाली चुप्पी और मिलीभगत है . क्या ऐसा ही फर्क हरियाणा के शिक्षक संगठनों के सन्दर्भ में भी है, जोकि न सिर्फ स्कूलों के निजीकरण के खिलाफ तथा PPP के प्रस्ताव को रद्द करने के लिए आंदोलनरत हैं, बल्कि साथ ही प्राथमिक स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं जैसे पानी, बेंचों की व्यवस्था आदि के लिए भी संघर्षरत दिखते हैं ? क्या इन दोनों अंतरों में कोई सम्बन्ध है ?

इसी सन्दर्भ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट को भी पढ़ा जा सकता है। रिपोर्ट को पढने के लिए निचे दिए गये लिंक को क्लिक करें .

‘Govt prods unfair means in schools’