Wednesday, 17 July 2013

लेख - नए दौर में प्राथमिक शिक्षा के पुराने सवाल

अरुण कुमार 

देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के साथ प्राथमिक शिक्षा में कुछ नई परिघटनाओं ने जन्म लिया. सभी को शिक्षा देने के लिए नए-नए अभियानों और कार्यक्रमों की शुरुआत हुई. सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाए उपलब्ध कराने और खाली पड़े शिक्षकों के पदों को भरे जाने का निर्देश दिया है.
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कोर्ट-कचहरी में शिक्षा से जुड़े विवादों के बढ़ते मामलों ने कानून की पढाई में इस अधिकार पर पाठ्यक्रम शामिल करा दिया है.प्राइवेट विद्यालयों में गरीब बच्चों के एडमिशन में आरक्षण को हरी झंडी मिल चुकी है. शिक्षा को गुणवत्ता पूर्ण बनाने के लिए इस क्षेत्र में काम करने वाली सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में 'अध्यापक की भूमिका और सीखने-सिखाने का तरीका' केंद्रीय प्रश्न बनकर उभरा है.पुरानी शिक्षण पद्धति सवालों के घेरे में खड़ी हुई है .

परी सतह पर दिखाई पड़ने वाला प्राथमिक शिक्षा का यह खुशनुमा रंग भविष्य की वास्तविक सच्चाई से कितना मेल खाता है यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन परीक्षा केन्द्रित जीवन के सफलता की हकीकत और गरीब बच्चों को दिए जाने वाले शिक्षा के अधिकार में कोई सेतु दिखाई नहीं पड़ रहा है. बुनियादी शिक्षा की पुरानी पद्धति अपने मूल प्रवृत्तियां के साथ बदलाव की राह में सबसे बड़ी बाधा के साथ खड़ी है. परीक्षाओं और नीतियों ने शिक्षा और शिक्षक दोनों को सिर के बल उल्टा खड़ा कर दिया है. समाज में सरकारी स्कूलों की मान्यता ज्यों की त्यों बनी हुई है.

हावत है कि खोजने से भगवान भी मिल जाते हैं, लेकिन परीक्षा के दबाव से मुक्त बच्चा मिलना मुश्किल है. अभी तक हमारे स्कूलों और अध्यापकों की मुख्य भूमिका बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार करना रहा है. कोई बच्चा फेल नहीं होगा ऐसा नियम तो बन गया, लेकिन परीक्षाओं का अब भी हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का सिद्दांत और व्यवहार में कोई स्पष्ट स्वरूप दिखाई नहीं पड़ रहा है. व्यावहारिक धरातल पर मूल्यांकन की नई समझ विकसित होती नज़र नहीं आ रही है.

ध्यापक के मन में, आदत में और उसके सीखने-सिखाने के तरीके में परीक्षा केन्द्रित पढ़ने-पढ़ाने की सांस्कृतिक जड़े काफी गहरी हैं. सभी नियम, तरीका, कार्यक्रम, पद्दति और सिद्धांत अन्ततोगत्वा परिक्षाओं की पुरानी दृष्टि के अंतर्गत व्यवहारित की जा रही है. अतीत और वर्तमान जीवन में परीक्षा केन्द्रित सफलता इस आधार को निरंतर मजबूत बना रही है. जीवन के हालात, समाज की प्रवृत्तियाँ स्कूलों को प्रभावित कर रही हैं. अध्यापक और अभिभावक जीवन में परीक्षाओं पर जिस समझ और जरूरत से जुड़ा है उसकी अभिव्यक्ति स्कूलों में होना स्वाभाविक है.एक तरफ बच्चों को दबाव मुक्त शिक्षा देने में परीक्षाएं सबसे अधिक चिंता का कारण बनी हुई है, दूसरी तरफ समाज में परीक्षाओं के नए- नए रूप सामने आ रहे हैं.

RTE के अनुसार अध्यापक और छात्र का अनुपात 1:30 होने से पूरे देश में भारी संख्या में नए शिक्षकों की भर्तियाँ शुरू की गई हैं. केंद्र सरकार ने कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के स्कूलों में अध्यापक बनने के लिये अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य कर दिया है. यह परीक्षा केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर आयोजित की जा रही है. विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता से हताश निराश युवाओं ने मास्टर बनने के आखिरी विकल्प की तरफ रुख किया है. दरअसल देश भर में परीक्षाओं का यह दौर स्कूलों में योग्य अध्यापकों की खोज के लिए अपनाया गया है, जबकि प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक को मध्यवर्ग की दहलीज़ से बाहर निकाल दिया गया है. अब मध्यवर्गीय युवाओं का सपना अध्यापक बनना नहीं रह गया है .

बिहार में दो कदम और आगे निकलकर हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट के अध्यापकों के लिए भी अध्यापक पात्रता परीक्षा का आयोजन कराया जा चुका है. यहाँ पहले भी मुखिया और पंचायत के द्वारा नियुक्त पांच हजार रुपये की पगार पर प्राथमिक शिक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षकों की एक बड़ी संख्या मौजूद है. इनके अप्रशिक्षित होने और योग्यता को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं.

से अध्यापकों की योग्यता परखने के लिए यहाँ दक्षता परीक्षा का आयोजन किया जाता है और इसमें पास होने पर पगार में मामूली बढ़ोत्तरी के लालच को भी जोड़ दिया गया है. दक्षता परीक्षा के आयोजन के समय अख़बारों में शिक्षकों के नक़ल करने की कहानी सबसे अधिक छपती रही है, जिसे लेकर इस पेशागत समूह का भरपूर माखौल उड़ाया जाता रहा है. देश में बहुत से विभागों में परीक्षा और प्रमोशन के नियम काम करते हैं.आजकल अख़बारों में मुन्ना भाई के किस्से भी आये दिन छपते रहते हैं, लेकिन अध्यापकों का जो स्वरूप पेश किया जा रहा है उसका कोई दूसरा उदहारण नहीं मिलता. 

रअसल, मौजूदा परीक्षाओं का बुनियादी चरित्र ही नक़ल की संस्कृति को जन्म देता है. सृजनशील ज्ञान के निर्माण में सबसे अधिक बाधक हमारी परीक्षा प्रणाली हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि इन्ही परीक्षाओं के जरिये योग्य शिक्षकों की तलाश की जा रही है. बिहार में भी TET रूपी नई परीक्षा के साथ शिक्षक भर्ती प्रक्रिया जारी है, ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है कि परीक्षाओं की वैतरणी पार करके आने वाला शिक्षक प्राथमिक शिक्षण में चमत्कार करेगा.

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता और बेरोजगारी से जूझते अस्मिताविहीन, अल्पवेतनभोगी शिक्षक के पेशे का चुनाव करने वाले किसी इन्सान की मनोदशा कैसी बनगी, वह अपने पेशे के प्रति कितना न्याय करेगा, बच्चों को परीक्षा के दबाव से मुक्त रखकर सीखने-सिखाने की सृजनशीलता को कैसे आत्मसात करेगा? यह विचारणीय प्रश्न है. शिक्षा के अधिकार का व्याहारिक रूप इस तरह फलीभूत होना त्रासदी ही है, लेकिन इन्ही यक्ष प्रश्नों के साथ प्राथमिक शिक्षण का भविष्य हमारा स्वागत करने के लिए तैयार है .

प्रो. कृष्ण कुमार के अनुसार NCF-2005 के निर्माण में काम कर रही कमेटी के सामने जो विकट प्रश्न मौजूद था कि "पाठ्यचर्या का निर्माण कर भी लिया जाय तो उसको जीवन देने वाले अध्यापकों के प्रशिक्षण का क्या होगा, हमारी परीक्षा प्रणाली का क्या होगा" वास्तव में वह और अधिक प्रासंगिक होकर हमारे सामने उपस्थित हुआ है. NCF -2005 के निर्माण के बाद बिहार अपनी विशेष सामाजिक-आर्थिक परस्थितियों के तर्क के साथ BCF-2008 का निर्माण करने वाला पहला राज्य था. जिसके निर्माण के साथ अध्यापकों से अपेक्षा की गई थी कि वे इन सिद्धांतों के अनुरूप शिक्षण की प्रक्रिया को अंजाम दे, लेकिन यहाँ अध्यापक को जन्म देने वाले सरकारी प्रशिक्षण संस्थान एक तो जरूरतों के हिसाब से बहुत कम थे और जो थे उनमें भी लकीर की फकीरी ही चल रही थी. दूसरी तरफ प्राइवेट प्रशिक्षण कालेज धीरे-धीरे मुनाफा पैदा करने वाले उद्योग बन बैठे थे.

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के साथ जब बड़ी संख्या में शिक्षकों की जरूरत सामने आयी तो बिहार ने अपने हाथ सबसे पहले खड़ा कर दिया कि हमारे पास इतने प्रशिक्षित नहीं हैं और अप्रशिक्षितों को शिक्षक नियुक्त करने की छूट दी जाय.ऐसे हालात और प्राथमिकता वाले संस्थाओं से आये हुए प्रशिक्षितों और बिना प्रशिक्षण नियुक्त होने वाले शिक्षकों से NCF और BCF की भावना के अनुरूप अध्यापन की अपेक्षा करना कितना न्यायसंगत है. महज किसी दक्षता परीक्षा द्वारा योग्य शिक्षकों की तलाश से हालात में सुधार की कोई गुजाइश नहीं बनती है. भविष्य के शिक्षकों को तैयार करने के लिए किसी प्रभावी नीति और जिम्मेदारी का न होना वर्तमान हालत की उपज का प्रमुख कारण है. आज शिक्षक स्वाभिमान के साथ अध्यापन पेशे से जुड़कर पहचान पाने से वंचित हो गए हैं. वेतन भत्ते की संरचना भी किसी प्रेरणा की जगह उन्हें घुटन में ले जाने का बेहतर आधार तैयार कर रही है.

प्राथमिक शिक्षा में पुराने प्रश्न हल नहीं होते कि नई चुनौतियाँ सामने खड़ी हो जा रही है अभी बच्चों को केंद्र में लाने के प्रयास चल ही रहे है कि नई परिस्थितियों में अध्यापक की अस्मिता और गरिमा के रूप में नई परिघटना सामने आ गई है. गैर सरकारी संस्थाओं का सापेक्षत एक छोटा तबका विभिन्न परियोजना के माध्यम से इस क्षेत्र में काम कर रहा है लेकिन ऐसी परियोजनाओं की निरन्तरता का अपना संकट है.इन संस्थाओं ने पुरानी शिक्षण पद्धति को कटघरे में खड़ा किया है. सीखने-सिखाने में स्कूल, अध्यापक और बच्चे को समझने की एक नई दृष्टि पैदा की है.

प्राथमिक शिक्षा पर NCF-2005 की गाइड लाईन और शिक्षा का अधिकार जैसा कानून आ चुका है, लेकिन सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और अध्यापकों की छवि समाज में सुधरती नज़र नहीं आ रही है. ये घटनाएं इस तरफ इशारा करती है कि समस्याएं जिस जमीन से पैदा हो रही हैं, उस जमीन की हकीकत को सामने लाने और उनसे जूझने के लिए जिन रास्तों की आवश्यकता है उसका प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहा है, सभी प्रयासों में सुधार के कार्यक्रमों की भरमार है लेकिन बदलाव की रोशनी दिखाई नहीं पड़ रही है.

नियम और कानून का जोर फाइल पूरा होने में प्रतिफलित हो रहा है, जबाबदेही की सुनिश्चितता यहीं तक सिमट रही है.परियोजनाओं में समझ और बदलाव की प्रक्रिया शुरु होते होते रिपोर्ट छोड़कर विदा लेने का वक्त आ जाता है. प्राथमिक शिक्षा में बदलाव हेतु प्रयोग में लाये जाने वाले तरीके और जबाबदेही को सुनिश्चित करने में नए मैकेनिजम की जरूरत दिखाई पड़ती है. इसे अनुशासन के मातहती से बाहर निकालकर पहचान, अस्मिता दायित्व और समझ के साथ जोड़ने का काम खो सा गया है. शिक्षण की आधुनिक विचारधारा के इस अहम् पक्ष के साथ काम नहीं हो पा रहा है.

कुछ ट्रेनिंग, वर्कशाप, गोष्ठी-सेमीनार करा लेने और पाठ्यचर्या को लिख लेने से चुनौती कहीं अधिक कठिन हैं. प्राथमिक शिक्षण में लगी इतनी बड़ी मानवीय ऊर्जा और संसाधन के बेहतर उपयोग की कुशलता को उन्नत बनाने में जिस ऊर्जा, क्षमता, चिंतन और सृजनशीलता की आवश्यकता है उसके निर्माण की प्रक्रिया और निरंतरता नदारद है. डंडे के जोर पर पशुओं को नियंत्रित किया जा सकता है, इंसानों को नहीं. प्राथमिक शिक्षा की समस्याएं कहीं अधिक गहराई से जुड़ने की मांग कर रही हैं. 
जनज्वार से साभार  

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