Wednesday, 7 August 2019

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रारूप पर एक प्रतिक्रिया


समय-समय पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा राजसत्ता यह स्पष्ट करती है कि देश में शिक्षा के क्या उद्देश्य होंगे, स्कूल-कॉलेजों का ढाँचा कैसा होगा, शिक्षा पद्धतियाँ कैसी होंगी, शिक्षा पर ख़र्च का स्वरूप कैसा होगा आदिI 1968 व 1986 के बाद देश के इतिहास में तीसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई जा रही है। ऐसे दस्तावेज़ सिर्फ़ भविष्य को लेकर सरकार की मंशा ही नहीं जताते, बल्कि पहले से लागू फ़ैसलों पर वैधानिकता की मुहर लगाने का काम भी करते हैं। इस नीति के संदर्भ में यह बात पहले से लागू जनविरोधी फैसलों के लिए सच जान पड़ती है| मई के अंत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप आया जो भविष्य में हर स्कूल, कॉलेज, शिक्षा संस्थान, विद्यार्थी, शिक्षक, यहाँ तक कि पूरे समाज को प्रभावित करेगा। (हालाँकि इसके अंदर के कुछ प्रस्तावों की समय-सारणी की असंगतता से स्पष्ट होता है कि इसे 2018 के अंत में ही तैयार कर लिया गया था!) इसलिए इस प्रारूप पर गहरे और निरंतर सोच-विचार की ज़रूरत हैI मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी इस पर सुझाव माँगे हैं, जिसकी अंतिम तिथि, कम समय को लेकर विरोध होने पर, पहले 30 जून से बढ़ाकर 31 जुलाई कर दी गई थी और फिर 15 अगस्त कर दी गईI इसी तरह, प्रारूप को महज़ हिंदी व अंग्रेज़ी में जारी किया गया है और अन्य भाषाओँ की अनदेखी होने की आलोचना के फलस्वरूप इसके सारांश को बाद में संविधान की 8वीं अनुसूची की अन्य भाषाओँ में जारी किया गया। इसमें भी भारत की अनेक जनभाषाओं को तो नज़रंदाज़ कर दिया गया लेकिन संस्कृत जैसी मुट्ठीभर लोगों व विशिष्ट वर्ग की भाषा का पूरा ख़याल रखा गया।    
हालाँकि हम जानते हैं कि शिक्षा के विभिन्न आयाम व स्तर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्हें अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता, फिर भी यहाँ हमने इस नीति के प्रारूप के स्कूली शिक्षा वाले हिस्से पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।  

3 से 6 साल के बच्चों का स्कूलीकरण  
यह नीति 3 से 6 साल की उम्र के बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने की बात तो करती है लेकिन मौजूदा स्वरूप में इसमें 3-6 साल के बच्चों के लिए ख़ुशी से ज़्यादा खतरे की खबर है (भाग 1, अध्याय 1)I इस उम्र के बच्चों की वास्तविक ज़रूरतें होती हैं: अच्छा पोषण, सुरक्षा, स्नेह, खेल और दुनिया को अपने ढंग और गति से जानने की आज़ादी। लेकिन इस नीति का पूरा ज़ोर इस उम्र को भी अनुशासित स्कूली ढाँचे में उतार लेने पर हैI इस उम्र की शैक्षिक ज़रूरतें अलग किस्म की होती हैं| छोटी उम्र के बच्चों की देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) के विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों का टॉप-डाउन, परिणामवादी माहौल इस उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य एवं विकास के खिलाफ होगा| उदाहरण के तौर पर, जैसे कक्षा 10 की पूरी पढ़ाई एक बोर्ड परीक्षा पार करने में झोंक दी जाती है, वैसे ही 6 साल से नीचे के बचपन को भी कक्षा 1 में प्रस्तावित 3 माह के ‘स्कूल तैयारी मॉड्यूल’ (2.11) के लिए ढाल दिया जाएगा| 

‘स्कूल काम्प्लेक्स’ (अध्याय 7) में प्री-प्राइमरी चलाने का प्रस्ताव इतने छोटे बच्चों को लम्बी दूरी तय करने पर मजबूर करेगा जिसके चलते या तो कई बच्चे इन कक्षाओं तक पहुँच ही नहीं पाएँगे या पास के प्राइवेट प्ले-स्कूलों में दाखिला लेने पर मजबूर हो जाएँगेI गली-महल्लों में आँगनवाड़ियां होने के कारण बच्चों का आना-जाना सुलभ होता है और माता-पिता का जुड़ाव भी अधिक होता है जो कि स्कूल कॉम्प्लेक्स के औपचारिक माहौल में संभव नहीं होगा| 
घर से दूरी के चलते आज जो प्राइवेट प्ले-स्कूलों का बाज़ार खड़ा है उसे न केवल वैधानिकता मिलेगी बल्कि फलने-फूलने का पूरा मौका मिलेगा और आँगनवाड़ी व्यवस्था ख़तरे में पड़ेगीI 
जबकि ज़रूरत इस बात की थी कि लाखों आँगनवाड़ियों को बढ़िया पोषण और संसाधनों से समृद्ध किये जाने के ठोस प्रस्ताव दिए जातेI राज्य आँगनवाड़ी महिलाओं को कर्मचारियों का दर्जा दे ताकि उन्हें न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और पेंशन आदि के लिए बार-बार सड़कों पर न उतरना पड़े, जैसा कि पंजाब, दिल्ली, बिहार आदि में होता आ रहा हैI ऐसी परिस्थितियों में इस नीति का यह दावा करना कि प्रशिक्षित नर्सरी शिक्षक रखे जाएँगे, मौजूदा कर्मियों की स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े करता हैI  

स्कूलों से बाहर धकेलती शिक्षा नीति  
सर्वप्रथम तो दस्तावेज़ का यह दावा ही झूठा है कि अब प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन लगभग 100% है (अध्याय 7)| दिल्ली में ही हज़ारों बच्चे आज भी स्कूलों से बाहर हैं, ऊपर से प्राथमिक कक्षाओं तक में दाखिले की शर्तें कठोर होती जा रही हैं| उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में न सिर्फ आधार कार्ड बल्कि दिल्ली की रिहाइश के पक्के सबूत की शर्त के चलते सैकड़ों बच्चों को दाखिला नहीं मिलता, लेकिन सरकारें 100% नामांकन के प्रचार के नीचे इस सच्चाई को दबा रही हैं|   

एक तरफ़ यह नीति 18 साल तक के सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने का प्रस्ताव रखती है और दूसरी तरफ कक्षा 8 के बाद बच्चों को स्कूल छोड़ने के रास्ते दिखाती है (भूमिका; अध्याय 3)I 'एक्ज़िट पॉइंट’ का प्रस्ताव कहता है कि कक्षा 9 से 12 के बीच स्कूल छोड़ने पर बच्चे सर्टिफिकेट प्राप्त कर सकते हैंI इन सर्टिफिकेट से बच्चों को  क्या हासिल होगा? आज तक भी तो बच्चों को स्कूल छोड़ने पर रिपोर्ट कार्ड मिल ही जाती थीं! दरअसल यह उनके स्कूल छोड़ने को लुभावना बनाने की एक चाल हैI क्या हम नहीं जानते कि इस देश में करोड़ों बच्चे - खासकर दलित, आदिवासी, मुस्लिम पृष्ठभूमियों से आने वाले और गरीब, लड़कियाँ, विकलाँग - पढ़ाई बीच में अपनी मर्ज़ी या शौक़ से नहीं, मजबूरी में छोड़ते हैं? आर्थिक असुरक्षा के चलते उन्हें कम उम्र से ही घर-बाहर की जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं, लड़कियों को घर बिठा लिया जाता है, एक बार फेल होने पर दूसरा मौका नहीं मिल पाता, हाई स्कूल घर से बहुत दूर होते हैं, कुपोषण के चलते वे कमज़ोरी या किसी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं आदिI यह नीति बड़ी चालाकी से इन विषमताओं से उपजने वाली व्यवस्थाजनक नाइंसाफ़ी को ‘मर्जी’ का जामा पहनाने की कोशिश कर रही हैI   
दूसरी तरफ़ आज स्कूलों में बच्चों का नाम काटने की होड़ लगी पड़ी है; कभी न्यूनतम उपस्थिति की शर्तों के चलते और कभी कम अंक प्राप्त करने वाले बच्चों को निकालकर स्कूल का रिजल्ट बढ़ाने के सरकारी दबाव के चलते I यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि ग्रामीण और शहरी मज़दूर वर्ग से आने वाले ज़्यादातर बच्चे अपने परिवारों से स्कूल जाने वाली पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं। ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि वे नियमित स्कूल आ सकें और ज़्यादा-से-ज़्यादा भावनात्मक और अकादमिक मदद पा सकेंI इसके बदले यह शिक्षा नीति उन्हें ‘एक्ज़िट’ होने का रास्ता दिखाती हैI क्या विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर सिस्टम और एक्ज़िट पाइंट्स जैसे बदलावों ने विद्यार्थियों का कोई भला किया है जो अब इन्हें स्कूलों में भी लागू किया जायेगा?

हाल में दिल्ली के ही सरकारी विद्यालयों की कक्षा 9 में फेल होने वाले विद्यार्थियों ने विरोध प्रदर्शन के दौरान बताया कि कैसे उनके स्कूल आधी-आधी पाली में चलते हैं और शिक्षकों की भारी कमी हैI पर जिस व्यवस्था को आठवीं से ऊपर पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ानी नहीं घटानी हो वो ही इन कमियों को आड़े हाथों लेने के बदले ओपन स्कूलिंग को मज़बूत करने की बात करेगी, जैसा कि इस दस्तावेज़ में किया भी गया है (3.11)I मतलब साफ़ है कि कक्षा 9 से 12 के बच्चों को शिक्षा का कागज़ी अधिकार मिलेगा और कुछ नहींI यह शिक्षा नीति आर्थिक चुनौतियों के सामने न केवल घुटने टेकती है बल्कि हमारी आँखों में धूल झोंकने की कोशिश भी करती हैI    
बच्चों को स्कूलों से बाहर धकेलने की एक और चाल का नाम है ‘स्कूल कॉम्पलेक्स’ (3.1 व अध्याय 7)I छोटे और पड़ोसी स्कूल बंद करके बड़े, केंद्रीकृत स्कूल कॉम्पलेक्स बनाने का विचार उसी कड़ी का हिस्सा है जिसके तहत केंद्र सरकार राज्यों के अधिकार हड़प रही है और हर सामाजिक हित वाले ढाँचे को बर्बाद कर रही हैI नीति का ड्राफ्ट कहता है कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि स्कूलों को बंद करने से बच्चों की पढ़ाई न छूटे, उन्हें साइकिल, यातायात भत्ता आदि दिया जाएगा। लेकिन यह भारत के पहाड़ी, वनीय, रेगिस्तानी जैसी दुर्गम भौगौलिक परिस्थितियों व विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के प्रति अज्ञानता और असंवेदनशीलता दर्शाता हैI पड़ोस का सरकारी स्कूल हर बच्चे का मौलिक हक़ है जिसके लिए बच्चों की संख्या की शर्त नहीं लगाई जा सकती|

इससे बड़ी नाकामी और धूर्तता क्या हो सकती है कि जब सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम होती जा रही है तब स्कूलों को बंद करने की नीति को ही समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है! ऐसे तो सरकारें अपनी नाकामी को ही अपनी कामयाबी साबित कर देंगी। स्कूलों का विलय सीधे-सीधे घटिया स्तर के निजी स्कूलों के बाज़ार के फलने-फूलने की ज़मीन तैयार कर रहा है। आखि़र ये कॉम्पलेक्स किसकी सहूलियत के लिए बनाए जाएंगे; बच्चों की या प्रशासन की? जबकि ऐसे किन्हीं शोधों का उल्लेख नहीं किया गया है  जिनमें स्कूलों को बंद करने की नीतियों के परिणामों का अध्ययन हो|    
जितना ज़रूरी कक्षा 12 तक शिक्षा का अधिकार है उतना ही मौलिक रेगुलर कॉलेज शिक्षा का अधिकार हैI हर राज्य में पर्याप्त सरकारी कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय हों जहाँ दाखिला पाने के लिए विद्यार्थियों को ऑनलाइन फॉर्म भरने, गला-काट अंक लाने या कोई एंट्रेंस परीक्षाएं देने की आवश्यकता न होI हर विद्यार्थी जिसने कक्षा 12 पूरी कर ली हो, बिना किसी फीस के अपनी इच्छानुसार कोर्स में दाखिला ले सकेI युवाओं को वजीफें तथा उच्च शिक्षा भत्ता मिलने से उच्च शिक्षा वास्तविकता बनेगीI  

खोखली और शिक्षा विरोधी पाठ्यचर्या
इस नीति में सबसे ज़्यादा ज़ोर दो चीज़ों पर  है - कक्षा 8 से पहले शिक्षा के गहरे उद्देश्यों की जगह बच्चों को महज़ भाषा पढ़ना-लिखना और हिसाब-किताब सिखाने की चिंता (अध्याय 2) और कक्षा 8 के बाद बच्चों को वोकेशनल कोर्स में भेजने का उतावलापन (4.6.6 व अध्याय 20)I और ऐसा हो ही नहीं सकता कि जिस शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ज़्यादा-से-ज़्यादा बच्चों को वोकेशनल शिक्षा में भेजना हो, वो प्राथमिक या माध्यमिक स्तर पर भी बच्चों को गहन चिंतन वाली शिक्षा देगी इसलिए शिक्षा का खोखलापन निचली कक्षाओं से ही शुरू हो जाएगा|  उदाहरण के तौर पर, इस प्रारूप में राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा 3 की कसौटी उसकी पाठ्यचर्या नहीं सिर्फ आधारभूत पढ़ना-लिखना रखी गई है, यानी कि शिक्षा आगे की तरफ नहीं पीछे की ओर धकेली जा रही हैI एनजीओ द्वारा बनाए गए व निरंतर होने वाले टेस्टों के आधार पर ही यह साबित किया जाता है कि बच्चों के पास आधारभूत कौशल नहीं हैं और ये केवल साक्षरता के लायक हैंI करीब 20 साल पहले अमरीका में लागू की गई नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड (NCLB) की नीति इसी तर्ज पर आधारित थी और दिल्ली में कार्यान्वित मिशन बुनियाद भी इसी का उदाहरण है| ऐसे अध्ययनों की कमी नहीं है जो इस नीति के विनाशकारी परिणाम साबित करते हैं| 2012 में जब शिकागो शिक्षक यूनियन ने ऐसी कॉर्पोरेट मूल की नीतियों के खिलाफ आंदोलन किया तब अभिभावकों ने भी उनके साथ मिलकर अपने बच्चों पर थोपे जा रहे टेस्टिंग के चलन को खारिज किया|  


अगर प्रारंभिक साक्षरता व हिसाब-किताब ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है तो फिर एक सुविचारित पाठ्यचर्या व प्रशिक्षित शिक्षकों की ज़रूरत ही क्या है? ये काम तो ट्यूशन केंद्रों व कम शिक्षित, अप्रशिक्षित ट्यूटर्स द्वारा ही, वो भी सस्ते में, हो जायेगा। असल में यह नीति यही प्रस्तावित कर रही है (2.5, 2.6, 2.7) मगर केवल सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए जोकि देश के शोषित-वंचित तबक़ों से आते हैं।  
यह मज़दूर वर्ग पर सबसे बड़ा हमला है कि अब सरकारी स्कूल उनके बच्चों को सस्ते मज़दूर बनना ही सिखायेंगेI नहीं तो क्या आज तक बच्चे मकैनिकल/रिटेल/कंप्यूटर/ब्यूटी आदि के कोर्स स्कूल के बाद आईटीआई/पॉलिटेक्निक आदि में नहीं सीखते आए थे जो अब ये कोर्स कक्षा 9 से सिखाए जाने लगे हैं? स्कूलों का दायित्व तो यह है कि वो बच्चों को अकादमिक शिक्षा दें I यह बिना कारण नहीं है कि इस नीति में प्राथमिक स्तर पर परिवेश/पर्यावरण अध्ययन और आगे की कक्षाओं के संदर्भ में विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का ज़िक्र न के बराबर है लेकिन वोकेशनल शिक्षा हर स्कूल और कॉलेज के लिए अनिवार्य कर दी गयी है| यहाँ तक कि यह भी कहा गया है कि 2025 तक 50% कॉलेज युवाओं को भी वोकेशनल शिक्षा में शामिल किया जाएगा| और ये 50% विद्यार्थी कौन-से तबके से होंगे? हालांकि वोकेशनल शिक्षा को सरकारी और निजी सभी तरह के स्कूलों के लिए अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया गया है लेकिन हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि बड़े निजी स्कूलों, विदेशी बोर्ड के स्कूलों और सरकारी स्कूलों सभी में एक ही तरह के कोर्स पढ़ाए जाएंगे| आज सरकारी स्कूलों में वोकेशनल या एंटरप्रेनेयूरशिप कोर्स के नाम पर मेहंदी लगाना, सैलून में काम करना, कपड़ा काटना आदि सिखाया जाता है, जबकि यह तय है कि विशिष्ट निजी स्कूलों में इसके नाम पर फ़ैशन डिज़ाइनिंग और पायलट ट्रेनिंग की तैयारी कराई जाएगी|
क्या यह विद्यार्थियों की रुचि नहीं होनी चाहिए कि वे क्या विषय पढ़ना चाहते हैं? स्कूलों में वोकेशनल कोर्सों की वास्तविकता पर नज़र डालें तो समझ आता है कि अक्सर कक्षा 11 में बच्चों को भुलावे में रखकर, धमकाकर या शर्मिंदा करके, ज़बरदस्ती ये कोर्स दिए जाते हैं I आखिर क्यों विद्यार्थी वोकेशनल विकल्प लेने से कतराते हैं? क्योंकि वे इन विषयों की सीमाओं को जानते हैं| जब वोकेशनल विकल्प के बच्चे रेगुलर कॉलेजों में दाखिले के लिए आवेदन डालते हैं तो उन्हें धक्का लगता है कि उनके नंबर काट लिए जाते हैं और वो उच्च अकादमिक शिक्षा के लिए अयोग्य हो जाते हैंI   
जिस उम्र में विज्ञान और सामाजिक विज्ञान युवाओं के दिमाग में खलबली पैदा कर सकते थे, उसी उम्र में इन विषयों को उनकी दुनिया से गायब किया जा रहा हैI यहाँ तक कि भाषा शिक्षण को पढ़ने और बोलने की धाराप्रवाहिता (fluency) तक सीमित करना, भाषा की फूहड़ समझ पर आधारित है| ऐसी भाषा शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को महज़ बाज़ारी जरूरतों (functionality) के लिए तैयार करना है| साथ ही, ये उन्हें अपनी दुनिया समझने और विचार व्यक्त करने की ताकत से महरूम कर देगा|

दरअसल स्कूल इन बच्चों को वोकेशनल शिक्षा भी नहीं देंगे, वे दे ही नहीं सकते क्योंकि स्कूल जिस व्यवस्था का हिस्सा हैं वो स्वयं श्रम का सम्मान नहीं करती I वोकेशनल शिक्षा तो केवल बच्चों को सोचने और प्रश्न उठाने वाली शिक्षा से दूर करने का मुखौटा है, ताकि वे आगे चलकर ऐसे सवाल न पूछ पाएँ कि नौकरियों की तंगी क्यों हैं, उनकी मज़दूरियाँ कम क्यों हैं, मुनाफ़ा कहाँ जाता है, बुलेट ट्रेन ज़्यादा ज़रूरी है या देश-भर की स्वास्थ्य सुविधा। ऐसी शिक्षा युवाओं की बड़ी आबादी को भविष्य की असुरक्षित और स्थायी संकट से ग्रस्त ज़िंदगी के लिए मानसिक रूप से ढालने का काम करेगी| शिक्षा को नौकरीशुदा बनाने के जिस तर्क पर ये सारा ख़्वाब बेचा जा रहा है उसकी पोल इस बात से खुल जाती है कि जब आईटीआई किए हुए युवाओं को 10–12,000 की अस्थाई नौकरी से ज़्यादा कुछ नहीं मिलता है तो फिर 9वीं-10वीं के वोकेशनल कोर्सों के बाद किशोरों का क्या हश्र होगा| हाँ, इससे बाज़ार में श्रम की कीमत और घटेगी|
ज़रूरत है ऐसी शिक्षा की जो युवाओं को काम-धंधों के जाति और लिंगभेद पर आधारित इतिहास को समझने, शारीरिक और मानसिक श्रम के बँटवारे पर प्रश्न उठाने और पूँजीवाद के खिलाफ़ साझे संघर्ष खड़े करने के लिए तैयार करे I    
पाठ्यचर्या की चर्चा में दो और महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित हैं –
इसमें भारतीय परम्पराओं’ का महिमामंडन कुछ इस प्रकार है जैसे ये कोई बनी-बनाई इकाई हो जिसके अंदर कोई जातीय-लैंगिक-वर्गीय-क्षेत्रीय-धार्मिक विरोधाभास या द्वंद्व नहीं हैं| ‘भारतीयता’ की ऐसी परिभाषा वर्तमान परिस्थितियों में बहुसंख्यकवाद को मज़बूत करेगी| इसी सोच के तहत लड़कियों के शिक्षा से वंचित होने के पीछे पितृसत्ता एवं धर्म की भूमिका को नज़रअंदाज़ किया गया है| महिलाओं के अस्तित्व को परिवार व्यवस्था और मातृत्व के खांचे में रख कर देखा गया है (6.2)|    
हालांकि दिल्ली में तो कक्षा 6 से 8 की पाठ्यचर्या पहले ही कम की जा चुकी है, लेकिन ‘बोझ कम’ करने और ‘अनिवार्य बिंदुओं’ (essential learning) के नाम पर पाठ्यचर्या को कम करने का काम जब राष्ट्रीय स्तर पर अंजाम दिया जाएगा तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि पाठ्यचर्या के सामंती तथा ब्राह्मणवाद विरोधी तत्व घटाए जाएंगे और राष्ट्र की अंधभक्ति और वर्चस्वशाली संस्कृति के तत्व बढ़ाए जाएंगे| हल्की पाठ्यचर्या को स्वीकार्य बनाने के लिए बोर्ड परीक्षाओं को सरल करना प्रस्तावित गया है और इसका सीधा असर यह पड़ेगा कि अलग-अलग वर्ग (निजी/सरकारी स्कूलों) से आने वाले बच्चों के लिए अलग-अलग स्तर की परीक्षाएँ होंगी, जैसे गणित A और B|  



शिक्षक वर्ग से छिनती सुरक्षा तथा स्वायत्तता   
स्कूलों  का विलय, स्कूल कॉम्प्लेक्स और वोकेशनल कोर्सों को शामिल करने के नतीजतन शिक्षकों के नियमित पदों की संख्या में भारी कमी आएगी। इससे शिक्षकों की सांगठनिक और लड़ने की ताक़त और कमज़ोर पड़ेगी। हालांकि शिक्षकों के दस लाख पद खाली हैं लेकिन इस वास्तविकता को पलटने के लिए कोई ठोस योजना नहीं सुझाई गई हैI यह रोचक है कि जिस नीति में बीसियों डेडलाइंस उल्लिखित हैं उसमें नियमित भर्तियों के लिए किसी समय-सीमा का ज़िक्र नहीं है| जिस दौर में ठेकाकरण बढ़ रहा है, सरकारी स्कूलों का विलय किया जा रहा है, निजी मैनेजमेंट के हाथों में सौंपा जा रहा है, उस दौर में स्थाई नियुक्तियाँ जुमला जान पड़ती  हैंI पक्की भर्तियों की लड़ाई ज़मीन पर लोगों को ख़ुद लड़नी होगी, ये ऊपर से किसी नीति की भेंट नहीं आयेंगी I   
इस नीति में सुझाए गए कई उपायों का आधार 'लर्निंग क्राइसिस' का हौवा है| विश्व बैंक, ’प्रथम’ जैसी संस्थाओं ने बच्चों के ’नहीं सीखने’ के संकट को बहुत गंभीर समस्या बनाकर पेश किया है| अव्वल तो स्कूली पाठ्यचर्या में सीखने जैसी प्रक्रिया को बच्चों की आर्थिक-सामाजिक असुरक्षा एवं आपातकाल की स्थितियों से काटकर नहीं देखा जा सकता|

यह विडम्बना ही है कि एक तरफ तो बच्चों के नहीं सीख पाने के संकट की चिंता जताई जा रही है और दूसरी तरफ अप्रशिक्षित लोगों को स्कूलों में पढ़ाने का काम दिया जायेगा (2.5, 2.6, 2.7, 2.8)| भले ही स्कूलों में शिक्षा अधिकार कानून एवं समग्र शिक्षा अभियान के तहत पीछे छूट गए बच्चों को कक्षा के स्तर तक लाने के लिए प्रशिक्षित व्यक्तियों को औपचारिक रूप से रखने का प्रावधान लागू है लेकिन इस नीति में इसको मज़बूत करने की बात तो दूर इसका ज़िक्र भी नहीं है| बल्कि यह एनजीओ व कॉर्पोरेट संस्थाओं के अप्रशिक्षित लोगों को नैशनल ट्यूटर्स प्रोग्राम, वालंटियर्स, रेमेडियल इंस्ट्रक्शनल एड्स प्रोग्राम आदि के नाम पर स्कूलों में घुसाएगा| यहाँ तक कि सेना जैसे रेजीमेंटेड पृष्ठभूमि के अधिकारियों का उल्लेख भी योग्य वालंटियर्स के रूप में किया गया है| ऐसे तदर्थ व कामचलाऊ उपायों से ‘गंभीर’ चिंताएँ हल नहीं होतीं| इससे भविष्य में न शिक्षण को अकादमिक काम समझा जाएगा और न शिक्षकों को पेशागत बुद्धिजीवी| बल्कि ये शिक्षण को झोलाछाप पेशे में बदलने की कवायद है|    
इसी चिंता के नाम पर शिक्षकों के ऊपर ’नहीं पढ़ाने/नहीं पढ़ा सकने’ के लाँछन ने ज़ोर पकड़ा जिसका इलाज भी कॉर्पोरेटवादियों के पास तैयार था - टेक्नोलॉजी की मदद से निगरानी रखना, बने-बनाए लेसन प्लान देना, छोटी कक्षाओं से ही केंद्रीकृत परीक्षा-पत्र दिए जाना आदि| इस नीति में तो ऊपर से टाइम-टेबल निर्धारित करके यह तक तय करने की बात की गई है कि शिक्षक किस दिन, किस घंटे, क्या और कैसे पढ़ायें। ऐसी मशीनी, केंद्रीकृत व पूर्व-निर्धारित व्यवस्था में शिक्षक विवेकशील, प्रबुद्ध कर्ता नहीं, सिर्फ़ डिजिटल क्लर्क बनकर रह जायेंगे। 
इस प्रारूप में शिक्षकों के लिए और भी कई चिंताजनक सुझाव हैं। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जैसी केंद्रीकृत संस्थाओं के पास सभी परीक्षाओं का अख्तियार होगा और MCQ  आधारित कंप्यूटर टेस्टों को अनिवार्य करके बौद्धिक स्वायत्तता कमज़ोर की जाएगी (4.9)I मेरिट आधारित मूल्याँकन से शिक्षकों की तरक़्क़ी व वेतन आदि तय करने की बात की गई है  (अध्याय 5)I इसका मतलब है कि शिक्षकों को मिलने वाली प्रोन्नति और वेतन वृद्धि के लिए वरिष्ठता तथा सामाजिक न्याय के उसूलों को दरकिनार करके तथाकथित मेरिट मात्र के मापदंडों को प्रस्तावित किया गया है। शिक्षकों की ACR के नए स्वरूप में शिक्षा के इस बाज़ारवादी प्रबंधन की झलक देखी जा सकती है। क्या सरकार द्वारा ख़ुद ही ऊँच-नीच में बाँटे गए स्कूलों व अलग-अलग परिस्थितियों की कक्षाओं में पढ़ा रहे शिक्षकों के काम को उनके विद्यार्थियों के परिणामों के आधार पर एक ही तराज़ू में तौलना कहीं से भी न्यायोचित है? एक संभ्रांत इलाके के स्कूल और एक विषम इलाक़े के स्कूल में काम करने वाले शिक्षकों की पेशागत तरक़्क़ी आदि के लिए इस तरह से फ़ैक्ट्री मॉडल के उत्पादन का मूल्याँकन करना शिक्षा की फूहड़ समझ दर्शाता है और शिक्षकों के साथ अन्यायपूर्ण भी है।
हम जानते हैं कि निजी कंपनियों में इस तरह के मूल्याँकन का मतलब होता है कि सवाल खड़े करने, अपनी सोच रखने और आकाओं की जी-हुजूरी न करके ईमानदारी से काम करने वालों पर सत्ता के कोप की तलवार लटकती रहती है। क्या हम अपने स्कूलों और कॉलेजों में भी यही माहौल चाहते हैं? निजी स्कूलों में पढ़ाने वालों के साथ होने वाले शोषण और उनकी नाज़ुक व लाचारी की परिस्थितियों की तो बात ही नहीं की गई है। इससे भी नीति निर्माताओं की पूँजी-परस्त प्रतिबद्धता ज़ाहिर होती है।
स्कूलों में पहले से ही कॉर्पोरेट एनजीओ द्वारा बनाए जा रहे प्रोग्राम और मॉड्यूल पढ़ाने और उनके अप्रशिक्षित वालंटियर्स को स्कूलों में पढ़ाने का काम देने पर इतना ज़ोर है कि शिक्षकों की स्वायत्तता कमज़ोर होती जा रही है। ई-गवर्नेंस, आईटी व डिजिटलीकरण को थोपकर शिक्षकों के शिक्षण को ऊपर से निर्धारित किया जा रहा है और अन्य कामों को बढाया जा रहा है। आज स्कूलों को बेशर्मी से दलगत, ग़ैर-आकादमिक व शिक्षा-विरोधी उद्देश्यों/कार्यक्रमों का केंद्र बनाया जा रहा है और इसमें शिक्षकों के श्रम, उनकी पेशागत भूमिका को इस्तेमाल किया जा रहा है। नीति में इसके प्रति कोई चिंता दिखाई नहीं देती है, जिसका मतलब है कि इन विकृतियों में तेज़ी ही आएगी।   
हमारे स्कूलों की एक सच्चाई यह भी है कि एक ओर ई-गवर्नेंस, डिजिटलीकरण के पेशवाई फ़रमानों के तहत शिक्षकों का ग़ैर-शैक्षणिक काम बढ़ाया जा रहा है, दूसरी ओर लाखों स्कूलों में आईटी कर्मचारी का कोई पद ही नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी के ज़रिये शिक्षकों से तमाम तरह के आँकड़े इकट्ठे करवाकर भी, जोकि प्रशासनिक दबाव के कारण अक़्सर ग़लत भी होते हैं, आज सरकार या तो इन आँकड़ों को सार्वजनिक ही नहीं कर रही है या फिर उनकी बाज़ीगरी करके अपने पक्ष में और हक़ीक़त से परे तस्वीर पेश करती है। इस रवैये का परिणाम यह है कि तमाम ज़मीनी हक़ीक़त के बावजूद सरकार यह मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि उसकी इन नीतियों से बच्चों और उनके परिवारों को पढ़ाई, समय, मेहनत और पैसे का बेइंतहा नुक़सान उठाना पड़ रहा है। मगर नीति इस वास्तविकता से अनजान ही नज़र नहीं आती है, बल्कि उस तकनीकी को ही रामबाण की तरह पेश करती है जिसके तले बच्चों के हक़ कुचले जा रहे हैं (अध्याय 19)। जिस नीति में लोगों की परेशानियाँ ही दर्ज न हों, उससे उन परेशानियों के इलाज की उम्मीद करना बेकार है। हाँ, ऐसी अज्ञानता व असंवेदनशीलता से बनाई गई नीतियों से हमारे मर्ज़ ज़रूर बढ़ते जायेंगे।    
स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक सभी शिक्षकों का प्रोबेशन काल 3 साल का होगा और उनके ठेके को बढ़ाने/नहीं बढ़ाने के फैसले केवल ‘मेरिट’ के आधार पर किए जाएँगे (5.4)। इस तरह यह नीति अमरीका जैसे पूँजीवादी देशों की तर्ज पर शिक्षकों को विभिन्न प्रकार के ठेकों पर रखने का रास्ता साफ़ कर रही है। एक ही संस्थान में, एक ही क़ाबिलियत, एक ही अनुभव के शिक्षकों की अलग-अलग कार्यपरिस्थितियां व वेतन होंगे। स्कूली शिक्षक बनने के लिए बारहवीं के बाद चार साल का कोर्स करना होगा (अध्याय 15)। शिक्षा के बढ़ते निजीकरण व सरकारी संस्थानों में भी बेतहाशा महँगी होती उच्च-शिक्षा के दौर में देश का एक बड़ा वर्ग अब शिक्षण कोर्स करने के लिए और भी असमर्थ कर दिया जाएगा। इससे हमारे स्कूलों में शिक्षकों व विद्यार्थियों के बीच वर्गीय दूरी और बढ़ेगी।

दमघोटू केन्द्रीकरण 
प्रारूप का भाग 4 राष्ट्रीय शिक्षा आयोग नाम के एक नए ढाँचे की प्रस्तावना को समर्पित है जोकि शिक्षा के सभी पहलुओं को निर्धारित करेगा। यह केन्द्रीकरण न केवल देश के संघीय चरित्र और विविधता के विरुद्ध है बल्कि इससे निरंकुश सत्ता के हाथ और मजबूत होंगे। एक तरफ शिक्षा के लिए बजट घटाया जा रहा है, दूसरी तरफ शिक्षा संस्थानों पर तानाशाही अंकुश बढ़ाया जा रहा है। जबकि CABE  (केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड) में सभी राज्यों के शिक्षा मंत्री होते हैं, यह राज्यों को सलाह देती है और इसकी रपटें संसद में पेश की जाती हैं, RSA  (राष्ट्रीय शिक्षा आयोग) द्वारा आदेशों को सख्ती से लागू तक करवाया जाएगा, इसमें कुछ ही राज्यों के शिक्षा मंत्री बारी-बारी से शामिल होंगे और संसद के प्रति इसकी कोई जवाबदेही नहीं होगी। बिना किसी संवैधानिक दर्जे के, यह असंवैधानिक और मनमानी ताकतों से लैस होकर काम करेगा। यही नहीं, न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के सिद्धांत को धता बताते हुये यह प्रस्तावित किया गया है कि आयोग की कार्यकारिणी इसकी कार्रवाई के लिए न्यायपालिका से भी सहयोग प्राप्त करेगी (23.7)! चूँकि इसके लिए अफसरों एवं टेक्नोक्रेट्स की कई परतों का एक ’मज़बूत सचिवालय’ बनाया जाएगा, इसके मायने हैं कि स्कूलों को तरह-तरह की रपटें जमा करने, निर्देशित कार्यक्रम आयोजित करने व निजी संस्थानों से सहयोग करने की सरकारी धमकियों में और तेज़ी आएगी। 
स्कूली शिक्षा राज्यों और नगर निगमों के कार्यक्षेत्र का मामला है और केंद्र सरकार को कोई हक़ नहीं है कि वो राज्यों को स्कूल बंद करने की नीति लागू करने पर मजबूर करे। स्कूलों में भी हम देखते हैं कि कैसे प्रशासन के केंद्रीकृत होते जाने से बच्चों के दस्तावेज़ों में जायज़ सुधारों के लिए भी हमारे हाथ बंध गए हैं और बच्चे तथा माता-पिता किस तरह धक्के खा रहे हैं। वहीं हम यह भी जानते हैं कि प्रशासनिक केंद्र जितनी दूर और ऊँचा होता है, उतना ही हम पर दिखावे, लीपापोती और जी-हुज़ूरी का दबाव बनाया जाता है।
राष्ट्रीय शिक्षा आयोग द्वारा समस्त शिक्षा व्यवस्था के हर महत्वपूर्ण निर्णय का संकेन्द्रीकरण किया जाएगा। उदाहरण के लिए, यह आयोग तय करेगा कि कौन-सी उथल-पुथल मचाने वाली तकनीकी (disruptive technology) को स्कूलों में नैतिकता व समसामयिक घटनाओं की चर्चा में शामिल किया जाए (19.7)! इसमें ज़िला अधिकारी (डीएम) की अध्यक्षता में ज़िला शिक्षा परिषद नाम की इकाइयों का प्रस्ताव भी शामिल है| यह स्कूलों को गैर-अकादमिक और केंद्रीकृत अफ़सरशाही के और भी अधीन ले आएंगी|   


निष्कर्ष
ऐसा क्यों है कि वैश्विक पूँजी केन्द्रीकरण को पसन्द करती है और ’कार्यकुशलता’ के बहाने इसकी वकालत करती है? सत्ता के केन्द्रीकरण से पूँजीवादी ताकतों के लिए किसी भी देश के अंदर मौजूद विविधता और लोकतांत्रिक दबावों को दरकिनार करना आसान हो जाता है, जिसे आजकल व्यापार की सुगमता (ease of doing business) के नाम से प्रचारित किया जाता है। दलालों के लिए एक केंद्रीय सत्ता से तोलमोल करके, अपनी पहुँच, नियंत्रण और मुनाफा बढ़ाना ज़्यादा आसान होता है। इसलिए जबकि विरोध प्रर्दाशन में मजदूरों की मांग होती है कि कोई भी बातचीत सबके सामने हो, ‘मालिक’ चाहते हैं कि वो बन्द कमरों में, कुछ-एक नुमाइन्दों से बात करें।
ऐसा नहीं है कि ऐसी नीतियों का ज़ोर केवल दिल्ली या भारत में ही हैI अंतर्राष्ट्रीय और बड़ी-बड़ी कंपनियों के हितों को साधने के लिए दुनियाभर में शिक्षा के चरित्र और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर शिकंजा कसा जा रहा हैI विश्व व्यापार संगठन (WTO) में GATS  समझौते पर सहमति जताकर भारत सरकार वैश्विक पूँजीवादी शक्तियों से यह वादा कर चुकी है कि

क) शिक्षा को समाज कल्याण या जन-अधिकार का मामला मानने के बदले विदेशी पूँजी के निवेश और मुनाफ़े के लिए खोल दिया जायेगा, और
ख) सरकार ऐसे कोई क़ानून या नियम लागू नहीं करेगी जिनसे निजी व सरकारी शिक्षा संस्थानों के बीच कोई भेदभाव हो, क्योंकि ऐसा करना मुक्त बाज़ार में ’बराबर की प्रतिस्पर्धा’ के सिद्धांत के विरुद्ध होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का यह प्रारूप यही ऐलान करता है (18. 6), जिसका मतलब है कि सरकारी शिक्षा संस्थानों व इनके विद्यार्थियों के लिए सब्सिडी, वज़ीफ़े, अनुदान आदि ख़त्म कर दिए जायेंगे। मगर हाँ, विश्वविद्यालयों में कौन से विषयों पर शोध किये जायेंगे यह सरकार व उद्योग जगत तय करेंगे (अध्याय 14)! ज्ञान के निर्माण के लिए तो स्वतंत्र व निरपेक्ष माहौल चाहिए, दबाव तथा प्रलोभन की चारदीवारी की क़ैद में किसके हितों को साधता, कैसा ज्ञान पैदा किया जायेगा, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। जिस आर्थिक नीति के तहत यह शिक्षा नीति लाई जा रही है उसमें शिक्षा को हल्का व विकृत करना तथा सरकारी स्कूल-कॉलेजों को बंद करना तय है। इसी कड़ी में स्कूलों के विलयन के समान उच्च-शिक्षा में भी संस्थानों की संख्या को घटाकर 13,000 तक लाने का स्पष्ट प्रस्ताव दिया गया है।     
प्रारूप में कहीं भी 'आधार', वज़ीफ़ों के लिए  बैंक खातों की अनिवार्यता थोपने व विद्यार्थियों को सामग्री न देकर राशि देने जैसी राज्य की नीतियों के घातक परिणामों को दर्ज तक नहीं किया गया है। जबकि इन नीतियों ने मेहनतकश वर्गों के करोड़ों विद्यार्थियों के प्रवेश व शिक्षा जारी रखने के अधिकार में गंभीर रोड़े अटकाए हैं और उनके परिवारों को परेशान करके उनसे भारी क़ीमत वसूली है। इसी तरह, यह अविश्वसनीय है कि शिक्षा की राष्ट्रीय नीति के दस्तावेज़ में राष्ट्रीय व राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोगों को मज़बूत करने की बात तो छोड़िये, उनका कोई ज़िक्र तक नहीं है, जबकि ये संस्थाएँ बच्चों के शिक्षा के अधिकार की पालक की भूमिका निभाने के लिए बनाई गई थीं।      
प्रारूप की भूमिका में शिक्षा की प्रेरक दृष्टि के संदर्भ में संविधान का कोई ज़िक्र तक नहीं किया गया है| इसी तरह ‘भारतीय विरासत’ एवं ‘प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था’ की चर्चा से जाति-विरोधी आंदोलनों को सिरे से गायब कर दिया गया है और ‘नैतिकता एवं राजनीतिक व्यवस्था’ वाले हिस्से में शोषण व न्याय के सवालों को दरकिनार किया गया है| सांस्कृतिक मान्यताओं को नैतिकता के पर्याय के रूप में पेश करते हुये सार्वभौमिक मूल्यों को भारतीय मूल्य के रूप में देखा गया है। ज्ञान का ऐसा ‘भारतीयकरण’ न सिर्फ संकीर्ण है बल्कि भ्रामक भी है|      
दस्तावेज़ का विरोधाभासों से भरा होना भी इसके निर्माताओं की वैचारिक तैयारी की कमी दिखाता है। जैसे, एक तरफ़ पाठ्यचर्या के बोझ का रोना रोया गया है, मगर दूसरी तरफ़ प्रारंभिक वर्षों से ही तीन भाषाओँ के संपर्क, कक्षा 6-8 में एक-वर्षीय कोर्सों की भरमार (जिससे भाषाएँ 4 तक पहुँच सकती हैं) और कक्षा 9-12 में 40 से अधिक कोर्स पेपर प्रस्तावित किये गए हैं (अध्याय 4)। बच्चों के सीखने के स्थापित व मान्य सिद्धांतों को अनदेखा करते हुए ये प्रस्ताव एक सतही व अंततः घटिया स्तर की स्कूली शिक्षा की ओर ले जायेंगे। ऐसे में कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि जगह-जगह पर भारतीय भाषाओँ व ज्ञान परंपराओं की 'समृद्धि' व 'वैज्ञानिकता' का बखान करती यह नीति उनमें शामिल स्त्री-विरोधी व जातिगत भेदभाव के तत्वों पर ऐसे ही चुप्पी साध जाती है जैसे 'डिजिटल युग' का गुणगान करते हुए इसके निजता, बराबरी, बहिष्करण, निगरानी, नियंत्रण व प्रति-बौद्धिकता आदि से जुड़े ख़तरों को अहमियत नहीं देती है। इसी तरह खेलों और कला संबंधित जुमलों पर विश्वास करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि इस दस्तावेज़ में विद्यालयों के लिये अनिवार्य ‘इनपुट’ (मैदान, लैब, संगीत कक्ष आदि) की ज़रूरत को ही ख़ारिज किया गया है|        
असल में इस नीति के माध्यम से सरकार द्वारा पहले-से ही लागू तमाम अवैध और शिक्षा-विरोधी फ़ैसलों को वैधानिकता प्रदान की जाएगी। इनमें कम उम्र से ही विद्यार्थियों को टेस्टों के अंबार से ग़ुज़ारना, उन्हें चिन्हित करके विभाजित करके पढ़ाना, स्कूलों का एनजीओकरण करना, पाठ्यचर्या व मापदंडों को कमज़ोर करना तथा शिक्षण को ग़ैर-पेशागत व ग़ैर-आकादमिक बनाना शामिल है। शिक्षा की एक केंद्रीकृत, अति-नियंत्रित, ग़ैर-बौद्धिक व सपाट व्यवस्था निरंकुश राज्य, वर्चस्वशाली संस्कृति तथा वैश्विक पूँजी के हितों को सुहाती है। इस नीति में शिक्षा की यही संकल्पना प्रस्तावित की गई है।     
संसद में सर्व-सम्मति से पारित शिक्षा अधिकार क़ानून राज्य द्वारा स्कूल खोलने के लिए किसी आबादी या रिहाइश में बच्चों की न्यूनतम संख्या की शर्त नहीं रखता है। वैसे भी, किसी मौलिक अधिकार को इस तरह सीमित नहीं किया जा सकता है। यह सुनिश्चित है कि स्कूल विलयन व कॉम्प्लेक्स की नीतियाँ इस पहले-से ही कमज़ोर क़ानून की रही-सही धज्जियाँ भी उड़ा देंगी। इसकी तुलना हम श्रमिक सुरक्षा क़ानूनों में लाये जा रहे उन संशोधनों से कर सकते हैं जिनमें क़ानूनी संरक्षण प्राप्त करने के लिए किसी इकाई में मज़दूरों की एक न्यूनतम संख्या की शर्तों को और कड़ा किया जा रहा है।  
राष्ट्रीय एकता के नाम पर ’एक देश, एक चुनाव, एक टैक्स....’ जैसे केंद्रीकृत निज़ाम लागू करने वाले ’समान स्कूल व्यवस्था’ का न केवल ज़िक्र तक नहीं करते हैं, बल्कि निजी स्कूलों की ’अच्छाई’ के गुण गाते हुए इस विचार को पूरी तरह दफ़्न करने की कोशिश करते हैं। आखि़र वो कौन सी सत्ता है जिसे विविधता से तो डर लगता है मगर असमानता बहुत भाती है? 
इस दस्तावेज़ में ’21वीं शताब्दी के कौशल’, ‘राष्ट्रीय विकास’ और ‘उच्च-गुणवत्ता’ जैसी शब्दावली का बहुतायत में लेकिन बिना परिभाषित इस्तेमाल भी नव-उदारवाद के उस पैंतरे का उदाहरण है जिसमें जुमलों की आड़ में मेहनतकश लोगों से ख़ुद उनकी कड़वी हक़ीक़त छुपाने की कोशिश की जाती है।
इस नीति में प्रत्येक विद्यार्थी की उसके समस्त छात्र जीवन के दौरान ट्रैकिंग का प्रस्ताव है जिसके लिए आधार जैसी तकनीकी का प्रयोग किया जाएगा| यह राज्य की नागरिकों पर बढ़ती सूक्ष्म निगरानी का वीभत्स उदाहरण है|  
हम एक बेहद असमान और अन्यायपूर्ण व्यवस्था में जी रहे हैं I ऐसे में हम शिक्षा से यह उम्मीद करते हैं कि वो इस व्यवस्था को बदलने और समानता, इंसाफ़, भाईचारे जैसे मूल्यों को हासिल करने का ज़रिया बनेगी I इसके लिए पूरी तरह से सरकारी खर्चे पर चलने वाली मुफ़्त और समान स्कूल व्यवस्था एक कारगर उपाय हैI इसके बदले सरकारी स्कूलों के बीच में तरह-तरह की ऊँच-नीच खड़ी की जा रही है (जैसे  प्रतिभा, केन्द्रीय विद्यालय, मॉडल, स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस आदि)I यह दस्तावेज़ इस बारे में केवल मौन ही धारण नहीं करता है, बल्कि निजी क्षेत्र की तारीफ़ और निजी स्कूलों पर लगी छिटपुट व दिखावे की कानूनी पाबंदियों पर भी अफ़सोस जताकर उन्हें पूरी छूट देने की वकालत करता हैI इस कड़ी में यह प्राइवेट स्कूलों को कानूनी बंदिशों के अधीन लाकर नियंत्रित करने के बदले उनकी स्व-घोषणाओं को ही पर्याप्त अंकुश मानता है| हम देखते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में NAAC जैसी संस्था केंद्रीकृत, सतही पैमानों पर कॉलेजों को रैंक करती हैं, उसी तरह स्कूलों की रैंकिंग भी बढ़ेगी| प्रत्यायन (accreditation) के ज़रिए निजी स्कूलों की अपनी मनमानी करने की छूट मिल जाएगी वहीं सरकारी स्कूलों को रैंकिंग की दौड़ में, लेकिन संसाधनों व स्वायत्तता के बिना, खुद को साबित करना होगा (अध्याय 8)I क्या हमें अपने आस-पास वो प्राइवेट स्कूल दिखते हैं जिनकी परोपकारिता के क़सीदे यह नीति बार-बार पढ़ती है? एक तरफ़ ‘सीखने की विभिन्न राहों’ (3.11) के बहाने ओपन स्कूलिंग को मज़बूत करने और यहाँ तक कि कक्षा 3, 5 व 8 के लिए मुक्त व दूरस्थ शिक्षा के कोर्स रचने के प्रस्ताव दिये गए हैं, वहीं ‘स्कूलों के विभिन्न प्रकारों’ (3.12) को फलने-फूलने की इजाज़त देने के बहाने निजी स्कूलों को शिक्षा अधिकार कानून की इनपुट संबंधी शर्तों से मुक्त करने की ज़रूरत बताई गई है। ज़ाहिर है कि इन प्रस्तावों का मक़सद देश की मेहनतकश आवाम के बच्चों को नियमित स्कूली शिक्षा से बाहर करना और शिक्षा के निजीकरण का रास्ता साफ़ करना है।    
शिक्षा के अपने अंदरूनी सरोकार भी होते हैं जो काल, स्थान से परे जाकर भी उद्देश्यों व मूल्यों को बुनते हैं। शिक्षा का एक आंतरिक तर्क, नैतिकता और गरिमा भी है, जबकि आज इसे निजी हितों को साधने के लिए बाह्य व जन-विरोधी तत्वों की चाकरी के लिए ढाला जा रहा है। हम शिक्षा और इसको लेकर बनने वाली राष्ट्रीय नीतियों से उम्मीद करते हैं कि वह विद्यार्थियों को सामाजिक तथा आर्थिक असमानता व अन्याय को चुनौती देने और पलटने के लिए तैयार करेगी। इसके विपरीत आज की नीतियों में सगर्व घोषित किया जा रहा है कि शिक्षा विद्यार्थियों को उद्योग जगत व वैश्विक बाज़ार के सस्ते श्रमिक व उपभोक्ता बनने के लिए (असल में पूंजीपतियों के मुनाफ़े बढ़ाने के लिए) तैयार करेगी। एक ऐसी शिक्षा जो खुद सत्ता को सलाम ठोकना सिखाती है, आखिर किस तरह की नैतिकता व आदर्शों की उम्मीद दिला सकती है? 

Saturday, 20 July 2019

मीज़ल्स-रुबेला टीकाकरण अभियान: कुछ अनुत्तरित सवाल


देशभर के स्कूलों में चलाए जाने वाले राष्ट्रीय MR (measles – rubella) टीकाकरण अभियान को लेकर कुछ शंकाओं पर बातचीत करने के लिए कुछ शिक्षक साथी कुछ माह पूर्व एक डॉक्टर से मिलने गए थे| वे बच्चों के इलाज के विशेषज्ञ (pediatrician) हैं और टीकाकरण पर भी उनका लंबा शोध-अध्ययन रहा है। उनसे हुई बातचीत के आधार पर हम चिंता के निम्नलिखित बिंदु व सवाल साझा कर रहे हैं -  
1. नैतिक और कानूनी दोनों ही रूप से अभिभावकों को अपने बच्चों को यह टीका लगवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता| उन्होंने Parental consent पर ज़ोर दिया|
हम यह जानते हैं कि अभिभावकों और शिक्षक साथियों से consent लेना मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गया है । अत: ज़रूरी है कि informed consent के निर्माण के लिए हम अपनी भूमिका निभाएं| अगर निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से consent फॉर्म भरवाए जाते हैं तो क्या फिर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से यह औपचारिकता भी नहीं निभाई जाएगी?
2. अगर शिशु सुरक्षा की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के तहत measles वैक्सीन सभी बच्चों को पहले ही दी जा चुकी है तो measles वैक्सीन के इस dose की क्या ज़रूरत है? क्योंकि rubella के साधारण बीमारी होने की वजह से शुद्ध मेडिकल आधार पर इस का यूनिवर्सल टीकाकरण करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हैं, तो क्या फिर इसलिए इस वैक्सीन को measles के साथ जोड़कर दिया जा रहा है?
3. उनके अनुसार rubella एक ऐसी साधारण बीमारी है जिसमें ज़ुकाम, बुख़ार, rash आदि होता है; यहाँ तक कि कई दफ़ा आपको पता भी नहीं लगेगा कि आपको यह हुआ हैI बचपन में लगभग सभी को यह होता है और इसका होना अच्छा है क्योंकि इसके प्राकृतिक रूप से फैलने से शरीर इससे लड़ने के लिए पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है|
4. अगर बचपन में यह बीमारी न हो और इसके खिलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो तो गर्भवती महिला को पहले 3 महीनों में कंजेनिटल rubella से ग्रस्त होने की संभावना हो सकती है जिससे नवजात को कंजेनिटल मोतियाबिंद (एक प्रकार का मोतियाबिन्द) हो सकता है, हालांकि इसकी सम्भावना बहुत ही न्यून है|
5. rubella भारतीय जनसंख्या में इतनी कम मात्रा में है कि इस पर कोई आंकड़े इकट्ठा करने की ज़रूरत नहीं महसूस की गई है और अपने अभियान में भी सरकार इस बीमारी के आंकड़े नहीं बता पाई है|
6. जो कीटाणु अब तक प्राकृतिक रूप से फैलते थे उनके खिलाफ़ हमारे शरीर खुद-ब-खुद प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित करते थे; इस टीके के कारण यह स्वत: होने वाली प्रक्रिया रुक जाएगी| तथा जो भी लोग इस टीके से छूट जायेंगे उनके लिए यह साधारण बीमारी गम्भीर रूप ले लेगी|
7. कहने का मतलब है कि rubella जैसी एक साधारण बीमारी को राष्ट्रीय अभियान के तहत टीकाकरण में समाहित करने का एक दुष्परिणाम यह होगा कि rubella के गंभीर परिणाम वाले cases बढ़ जाएंगे|
यह एक दुष्चक्र/चक्रव्यूह जैसा है|  
8. डॉक्टर का कहना था कि अगर इस बीमारी से समस्या गर्भवती महिला को हो सकती है तो बेहतर यह होता कि rubella के खिलाफ़ टीकाकरण 13 साल की उम्र के बाद किया जाता ताकि प्राकृतिक बीमारी को फैलने और प्रतिरोधक क्षमता को स्वत: विकसित होने का अवसर मिल चुका होता|
(इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि एक ज़माने में measles भी एक साधारण बीमारी थी लेकिन अब नहीं रही| जब एक प्राकृतिक बीमारी खत्म होती है तो booster डोज़ की आवश्यकता भी बढ़ जाती है।)       
9. सामान्यत: इस टीके के दुष्प्रभाव (side effects) नहीं होते लेकिन उत्तर प्रदेश में कुछ बच्चों ने टीके के बाद कुछ दिक्कतों की शिकायत की| और जैसा कि सामान्यत: होता है, इन तथ्यों और खबरों को दबाने की कोशिश की गई है|
10. उनका यह कहना था कि DPT , टेटनस, पोलियो जैसी ख़तरनाक बीमारियों के खिलाफ़ टीके उपयोगी (तथा सस्ते) थे लेकिन Hep B, HIB, रोटा वायरस आदि के नाम पर दिए जाने वाले टीके वैज्ञानिक ज़रूरत (sufficiently useful/essential and cost benefit assessment) पर कम खरे उतरते हैं और दवा कंपनियों के बाज़ारवादी एजेंडा का नतीजा ज़्यादा हैं| सरकार के साथ मिलकर ये कंपनियां लोगों के डर और जानकारी की कमी का फ़ायदा उठा रही हैं|   
उनके साथ हुई बातचीत के अतिरिक्त शिक्षक होने के नाते हमारी एक बड़ी चिंता यह भी है कि कैसे स्कूलों को तरह-तरह के अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है|
इस वैक्सीन अभियान को सफल बनाने में जब हम शिक्षक सहायता करेंगे तो क्या हम जाने-अनजाने निजी दवा कम्पनियों के एजेंट की भूमिका नहीं निभा रहे होंगे?
टीकाकरण से जुड़ी सूचना का अधिकार अर्ज़ी - नादारद जवाब
मीज़ल्स-रुबेला टीकाकरण का दिल्ली चरण 16 जनवरी 2019 से शुरु होना था। जब इस टीका अभियान को लेकर कुछ सवाल उठने शुरु हुए और सरकार के रवैये से उन्होंने आशंकाओं का रूप ले लिया तो शिक्षा निदेशालय के एक आदेश में यह दावा किया गया इस टीकाकरण के राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा होने के चलते इसके लिए विद्यार्थियों के अभिभावकों की सहमति लेनी ज़रूरी नहीं है। जबकि उन अभिभावकों से जिनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, सहमति के हस्ताक्षर लिए गए। इस बीच विभिन्न राज्यों से टीकाकरण के बाद बच्चों के अस्वस्थ होने की छिटपुट ख़बरें आ रही थीं। इसमें NDTV पर आई एक रपट भी शामिल थी। स्कूलों को मिले पर्चे में कहा गया था कि टीके के बाद होने वाले किसी भी साइड इफ़ेक्ट (प्रतिकूल प्रभाव) के लिए मेडिकल सहायता के लिए निकट के स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध रहेंगे। ज़ाहिर है कि यह किसी भी प्रकार से अतिरिक्त सहायता का वायदा नहीं था और न ही, विशेषकर कई स्कूलों में बच्चों की बड़ी संख्या के संदर्भ में, किसी भी संभावित आपातकालीन परिस्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त इंतेज़ाम।
   
इस सिलसले में हमने पिछले वर्ष के अंत में दिल्ली सरकार तथा केंद्र सरकार, दोनों के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों में सूचना अधिकार अधिनियम (2005) के तहत अर्ज़ियाँ डाली थीं। दोनों से ही निश्चित समय में जवाब प्राप्त नहीं हुए। अलबत्ता, दिल्ली सरकार के उक्त निदेशालय ने हमारी अर्ज़ी विभिन्न अस्पतालों को अग्रेषित कर दी और फिर हमें, लगभग दो महीनों की अवधि के बीच, दिल्ली के 24 सार्वजनिक अस्पतालों से जवाब प्राप्त हुए। इसके अलावा, दिल्ली सरकार के परिवार कल्याण निदेशालय से एक पत्र, दिनांकित 13 फ़रवरी 2019, प्राप्त हुआ। इसमें बताया गया कि दिल्ली में 2016, 2017 व 2018 में मीज़ल्स से क्रमशः 7, 3 और 10 मौतें हुई थीं। ये आँकड़े भी WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन)-NPSP (राष्ट्रीय पोलियो निगरानी परियोजना) के हवाले से दिए गए थे। रुबेला से हुई मौतों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं होने का जवाब दिया गया, जबकि अभियान पर होने वाले ख़र्चे को यह कहकर शून्य बताया गया कि इसे केंद्र सरकार वहन कर रही है। हमें जिन 24 अस्पतालों/मेडिकल संस्थानों से जवाब मिले उनमें से 13 ने कहा कि उनके पास पिछले तीन सालों में रुबेला का एक भी गंभीर अथवा जानलेवा केस दर्ज नहीं हुआ था; 2 के अनुसार अर्ज़ी की लिखावट साफ़ नहीं थी; 5 ने बताया कि उनके विशेष चरित्र/फ़ोकस के चलते उनके पास ऐसे केस आते ही नहीं हैं (उदाहरण के तौर पर, नेत्र चिकित्सालय); 3 ने कहा कि उनके पास ऐसे कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं; और एक ने अस्पताल आकर संबद्ध फ़ाइलें देखने के लिए निमंत्रित किया। कुल मिलाकर, RTI अर्ज़ी से प्राप्त ये जवाब बताते हैं कि पिछले तीन सालों में दिल्ली में रुबेला का एक भी जानलेवा अथवा गंभीर केस भी दर्ज नहीं हुआ है। इसके बावजूद इस अभियान को बच्चों व स्कूलों पर, उनकी सहमति/असहमति के हक़ का सम्मान किये बिना, जबरन थोपा गया।   

उधर केंद्र सरकार के मंत्रालय में भेजी गई अर्ज़ी में हमने अधिक विस्तृत सूचना माँगी थी। इसमें हमने देशभर में मिलाकर क्रमशः पिछले तीन वर्षों में रुबेला के जानलेवा केसों के आँकड़े, इस टीके के प्रयोग की रपटें, प्रतिकूल प्रभावों के लिए अपनाया जाने वाला मेडिकल प्रोटोकॉल (दिशा-निर्देश), प्रतिकूल प्रभावों के एवज़ में देय हर्जाने/मुआवज़े की राशि के प्रावधान, टीकाकरण के लिए अनिच्छुक व्यक्तियों के ख़िलाफ़ संभावित क़ानूनी कार्रवाइयों का ब्यौरा, टीका बनाने वाली कंपनी का नाम तथा इसकी एक ख़ुराक की क़ीमत की जानकारी माँगी थी। जैसा कि ऊपर बताया गया, केंद्र से जवाब समयावधि के काफ़ी ग़ुज़र जाने तक भी नहीं आया। अंततः 12 फ़रवरी 2019 का दिनांकित एक पत्र मार्च में जाकर मिला जिसमें किसी भी सवाल का उत्तर नहीं दिया गया था, सिवाय इसके कि एक टीके का मूल्य 37.4199 रुपये है। एक मोटे अनुमान के हिसाब से भारत में 15 साल तक की उम्र के बच्चों की संख्या 40 करोड़ से कम नहीं है। इस हिसाब से टीके की ख़रीद पर ही कुल व्यय 1,500 करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। यहाँ भी केंद्र सरकार रुबेला के जानलेवा अथवा गंभीर केसों के बारे में कोई आँकड़ा पेश नहीं कर सकी। बिना तथ्यों के योजना बनाना, उसे थोपना, फिर जबरन मनवाना, ये सब आज की सरकारों की तानाशाही का परिचायक हो गया है। इससे लोकतंत्र में उनके आधार और आस्था, दोनों की बची-खुची शिनाख़्त भी हो जाती है। क्या यह उचित है कि सरकारें पहले अपर्याप्त या गडमड आधार पर कोई अभियान/योजना लागू करें तथा फिर उसपर किये गए ख़र्च को जायज़ ठहराने के लिए उसे अनिवार्य बनाकर सब पर थोप दें? उचित हो या अनुचित, वैश्विक पूँजी की ग़ुलाम सरकारों के लिए आज यह संभव ज़रूर है। संभव ही नहीं, बल्कि उनकी सामान्य परिपाटी का हिस्सा। आख़िर, 'आधार' के मामले में भी तो सरकार ने यही किया है।   
  

जनवरी में दिल्ली के एक बड़े निजी स्कूल, डीपीएस, के कुछ विद्यार्थियों द्वारा इस टीकाकरण की अनिवार्यता को अदालत में दी गई चुनौती के संदर्भ में उच्च न्यायालय ने सरकार को नोटिस जारी करते हुए इस पर तब तक रोक लगा दी जब तक वो घोषित सहमति लेने और संभावित दुष्परिणामों की जानकारी देने को अपनी योजना में शामिल न कर ले। इसके पूर्व दिल्ली सरकार ने, इसके राष्ट्रीय अभियान होने और अन्य राज्यों में संपन्न चरणों का हवाला देते हुए अभिभावकों की मूक/मान्य सहमति निहित होने का तर्क दिया था। न्यायालय में यह भी बताया गया कि कैसे देश के विभिन्न राज्यों में 22 करोड़ से अधिक बच्चों को यह टीका पहले ही लगाया जा चुका है। न्यायालय ने मूक सहमति के इस तर्क को मानव अधिकार व शरीर की निजता का उल्लंघन क़रार देते हुए ख़ारिज कर दिया। अख़बारों के अनुसार दिल्ली-गुड़गाँव के सैकड़ों निजी स्कूलों की तरफ़ से अभियान को लेकर आपत्ति/असहयोग दर्ज किया गया था। यह स्पष्ट नहीं है कि दिल्ली सरकार ने इस फ़ैसले के बाद नई योजना बनाने पर काम किया है या इसे चुनौती दी है। वैसे, चुनौती देने का संकेत ख़बरों में था। कुछ भी हो, तब से लेकर अब तक इस बारे में सरकार की ओर से कोई ताज़ा आदेश नहीं आये हैं। मगर हम इस मुग़ालते में नहीं हैं कि कहानी का अंत हो गया है। हमें पता है कि नए संस्करण में सरकार अपनी योजनाएँ और वीभत्स रूप में लाएगी। इसमें सहमति, मानवाधिकार, निजता, गरिमा, अंतःकरण जैसे कोमल शब्दों व मूल्यों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। फिर चाहे वो उसी संविधान के मूलमंत्र हों जिसके आगे शीश नवाकर उसके बहुरूपिये स्वांग रचते हैं। इस बीच, पिछले कुछ हफ़्तों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से मीज़ल्स के केसों में बढ़ोतरी होने की ख़बरें आई हैं। इसमें वो देश प्रमुखता से शामिल हैं जहाँ टीकाकरण का दर 80-90% से भी ज़्यादा है और धार्मिक (अंतःकरण की) आज़ादी के आधार पर टीका नहीं लगवाने वालों को मिलने वाली अपवादजनक छूट के अलावा कई सार्वजनिक सेवाओं के लिए टीका लगवाना अनिवार्य तक है। फिर भी इन रपटों में उस मेडिकल शंका का रत्तीभर ज़िक्र नहीं था जिसके अनुसार सार्वभौमिक टीकाकरण से आबादी की प्रतिरोधक क्षमता व छूट गए लोगों में गंभीर केसों की संख्या में इज़ाफ़ा हो सकता है। इसके उलट, सभी अख़बारी रपटों में यह 'सुखद' निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया कि टीकाकरण के दर को और बढ़ाने व 100% तक लाने की ज़रूरत है! इससे इन रपटों के मासूम होने के प्रति शंका होती है। क्या गारंटी है कि ये दवा कंपनियों के किसी वैश्विक अजेंडे को बढ़ाती प्रायोजित रपटें न हों? हमें याद रखना चाहिए कि ये सभी रपटें मीज़ल्स की हैं। यानी, इनके आधार पर भी रुबेला के टीके की ज़रूरत के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। उधर, दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बारे में आई रपटों में, बिना किसी अधिकृत हवाले से, भारत में रुबेला के गंभीर केसों की वार्षिक संख्या 40,000 बताई गई थी। लेकिन कुछ देशों से मीज़ल्स के बढ़ते केसों की आई हालिया रपटों ने इच्छुक तत्वों (स्वास्थ्य संगठन, बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों, अधिकारियों आदि) को अपने अजेंडा को बढ़ाने के लिए एक स्वागतयोग्य संदर्भ उपलब्ध करा दिया है। अब वो जन-स्वास्थ्य के लिए इस उभरते 'ख़तरे' (मीज़ल्स) की आड़ में रुबेला के टीकाकरण की ज़रूरत के गुण और बढ़-चढ़कर गा सकते हैं। और इस तरह, सच्चाई, जन-संसाधन व जन-स्वास्थ्य की क़ीमत पर, निजी स्वार्थों की पूर्ति को अंजाम दे सकते हैं। हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि अगर संकट मीज़ल्स का है तो आप उसमें रुबेला का टीका क्यों जोड़ देते हैं और आख़िर रुबेला के आँकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किये जा रहे हैं। ये सब सवाल पूछते हुए हमें याद रखना होगा कि आज हमें एक ऐसे युग में धकेला जा रहा हैं जिसमें शिक्षा का अर्थ विवेक-समर्पण, मीडिया का अर्थ प्रायोजित व झूठी ख़बरें, कला का अर्थ राज-प्रशस्ति गान, लोकतंत्र का अर्थ तानाशाह व दमनकारी सरकार का चुनाव तथा चुनाव का अर्थ धोखाधड़ी, प्रशासनिक दबंगई व आर्थिक शक्ति प्रदर्शन से सत्ता हथियाना होगा। हमारे पास कोई कारण नहीं है कि ऐसे में हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी पूँजी का हित साधती कंपनियों और उनकी चाकरी करती सरकारों की योजनाओं, अभियानों व नीतियों को शक से न देखें। और जब सवाल अनुत्तरित रह जाएँ तो अपने लब खोलें, आवाज़ बुलंद करें, विरोध करें। वर्ना, ज़ंजीरों के अलावा खोने के लिए कुछ नहीं बचेगा।    

शिक्षकों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ए सी आर)


जैसे-जैसे शिक्षा नीतियों को बाज़ार के प्रबंधन मॉडल की तर्ज पर निर्मित किया जा रहा है, वैसे-वैसे हमारे सामने विकृतियों के नए उदाहरण प्रकट हो रहे हैं। इनमें से कई बदलाव ऐसे रहे हैं जिनका संज्ञान लेकर शिक्षकों द्वारा विरोध हुआ है। वहीं, कुछ महत्वपूर्ण फेरबदल बिना किसी विरोध के स्वर के लागू किये जा चुके हैं। विरोध नहीं होने के कई कारण तलाशे जा सकते हैं। बहुत संभव है कि शिक्षा के बौद्धिक व सार्वजनिक उद्देश्यों से बेमेल आदेशों की जैसी बाढ़ पिछले कुछ सालों में आई है, उसमें हर निर्णय पर प्रतिक्रिया देना मुश्किल हो गया है। दूसरी तरफ़, हम इसे शिक्षक समुदाय की वर्गीय/राजनैतिक चेतना में आ रहे बदलावों व शिक्षक यूनियनों के कमज़ोर पड़ते जाने की निशानी के रूप में भी देख सकते हैं। जो भी हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज पूँजीवाद के तहत वैश्विक निगमों ने न सिर्फ़ चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता में आने का दंभ भरने वाली सरकारों को अपने अधीन कर लिया है, बल्कि संस्कृति का एक संसार रचकर बहुत बड़े स्तर पर लोगों के दिलो-दिमाग़ पर भी प्रभाव जमा लिया है। इसका एक असर सिद्धांतों व आदर्शों के मूल्य को नकारने में प्रकट हुआ है। सरकार से लेकर आमजन में एक धारणा मज़बूत हुई है कि साध्य और साधन की संगतता अपरिहार्य नहीं है तथा साधन को उसके परिणाम की सफलता से आँकना चाहिए। यह 'कामयाबी' का बाज़ारवादी दर्शन है। जो 'कामयाब' है, वही सही है; बाक़ी उचित-अनुचित की बहस निरर्थक है। इसी दर्शन के आधार पर पठन व गणना के 'मूलभूत' कौशलों की परीक्षा लेकर स्कूलों में बच्चों को उनके तथाकथित स्तर के हिसाब से चिन्हित व बाँट करके पढ़ाया जा रहा है। यही दलील देकर बच्चों को फ़ेल करने की नीति को वापस लाया जा रहा है। सवाल सिर्फ़ ये नहीं है कि यहाँ 'कामयाबी' से क्या मतलब है और वो असल में किसके हित में है। (उदाहरण के तौर पर, सफ़ाई कर्मचारी व संसाधनों की अनुपलब्धता के संदर्भ में भी एक स्कूल का 'साफ़-सुथरा' दिखना उसके प्रशासन की कामयाबी प्रदर्शित कर सकता है, मगर हमें जानना होगा कि इसकी क़ीमत कितने और कौन-से बच्चों ने अपनी पढ़ाई व सेहत गँवाकर चुकाई है।) मगर हक़ीक़त ये भी है कि क्योंकि 'कामयाबी' के ये पैमाने और मूल्याँकन ख़ुद तथ्यों से जुदा हैं, इसलिए अक़्सर ये अपनी ही घोषित ज़मीन पर असफल सिद्ध होते हैं। समस्या ये है कि 'सच' व 'सिद्धांत' जैसे मूल्यों के प्रति कोई निष्ठा न होने के चलते, सत्ता द्वारा इस नाकामी को सामने नहीं आने दिया जाता है या स्वीकारा नहीं जाता है। 
आलोचना के उपरोक्त संदर्भ में हम यहाँ एक ऐसे मौलिक नीतिगत बदलाव का उदाहरण लेंगे जो सीधा शिक्षकों की उन परिस्थितियों से जुड़ा है जिसको लेकर आंदोलित होना यूनियनों के प्रथम दायित्वों में शामिल रहा है। हम जिस बदलाव की बात कर रहे हैं वो शिक्षकों की वार्षिक मूल्याँकन रपट (ACR) के स्वरूप में आया है। नई शिक्षा नीति के बनने से पहले ही इसे लागू करना यह भी दिखाता है कि आज सरकारों के लिए नीति निर्माण, विमर्श, लोकतांत्रिक चलन-प्रक्रियाएँ कोई मायने नहीं रखते हैं। उसे जो निर्णय लागू करने होंगे उन्हें प्रशासनिक आदेशों के तहत थोप दिया जायेगा। निगम में यह बदलाव पिछले तीन सालों से लागू है, मगर इसका विरोध क्या, इसकी चर्चा भी कम ही सुनने को मिली है। जबकि ACR के पैमानों में किये गए ये बदलाव केवल सैद्धांतिक तौर पर ही आपत्तिजनक नहीं हैं, बल्कि शिक्षकों की कार्य-परिस्थितियों, मुख्यतः प्रोन्नति की संभावनाओं पर इनका एक व्यावहारिक (नकारात्मक) असर भी पड़ेगा, और पड़ रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि किसी भी पेशागत सांगठनिक हस्तक्षेप के लिए उसूलों की समझ व व्याख्या का कितना महत्व है। 
                            रपट के पुराने स्वरूप के पहले खंड में शिक्षक द्वारा पढ़ाई कक्षा के वार्षिक परिणाम के अतिरिक्त 13 बिंदु थे, जबकि अब इस हिस्से में 11 ही हैं। इस खंड के बिंदुओं के लिए कोई अंक नहीं मिलता है। इसका मतलब है कि ये दर्ज तो होते हैं, मगर इनका मूल्याँकन नहीं होता। वैसे तो पुराने व वर्तमान दोनों ही स्वरूपों के इस पहले खंड में अधिकांशतः शिक्षक की निजी जानकारी मात्र होती थी, फिर भी इसमें कुछ ठोस परिवर्तन हुए हैं। अव्वल तो अब शिक्षक की लिखाई व निजी स्वास्थ्य के बिंदुओं को इस खंड से ही नहीं, बल्कि रपट से ही बाहर कर दिया गया है। दूसरी तरफ़, कक्षा परिणाम को, जोकि पहले केवल दर्ज होता था, वर्तमान स्वरूप में 5 अंकों के मूल्य के साथ अगले हिस्से में रखा गया है। अब इस हिस्से में शिक्षक की बायोमेट्रिक पहचान संख्या दर्ज होती है, जोकि पहले नहीं होती थी। स्पष्ट है कि अब राज्य को अपने कर्मचारी की स्वास्थ्य-स्थिति जानने में भी दिलचस्पी नहीं है, मगर बायोमेट्रिक आई डी जानने में ज़रूर है। साथ ही, नवउदारवादी नीतियों के तहत शिक्षकों को परिणाम-आधारित मूल्याँकन के अधीन ले आया गया है। इसकी पैरवी पूँजीवादी 'विचारक', कॉरपोरेट नेतृत्व, 'अधिगम के संकट' (क्राइसिस ऑफ़ लर्निंग) की ग़लत विवेचना पर पाठ्य-सामग्री, परीक्षण व मूल्याँकन का वैश्विक बाजार खड़ा करती कंपनियों से लेकर निर्माणाधीन नई शिक्षा नीति द्वारा ज़ोर-शोर से होती रही है। यह बच्चों के परिणामों का ठीकरा शिक्षकों पर फोड़ कर व्यवस्था की नाकामी पर पर्दा डालने का उपाय है। एक तरफ़ इससे लोगों, विशेषकर मध्यवर्ग में सरकार के गंभीर होने का संदेश जाता है, दूसरी तरफ़ इससे सत्ता को शिक्षकों को दबाने का एक और व ख़तरनाक हथियार हासिल होता है।              
पूर्व की रपट में निजी जानकारी वाले खंड क के अलावा 5 खंड और थे - 'गुण तथा विशेषताएँ' (12 बिंदु, 41 अंक), संबंध (4 बिंदु, 14 अंक), 'विद्यालय अभिलेख का रखरखाव' (5 बिंदु, 16 अंक), 'मूल्याँकन तथा अनुसरण' (2 बिंदु, 5 अंक) एवं 'कक्षा का निरीक्षण' (5 बिंदु, 20 अंक)। इस तरह पिछली रपट में 5 खंडों में विभाजित 28 बिंदुओं के आधार पर शिक्षकों का मूल्याँकन कुल 96 अंकों में से होता था। इसके विपरीत, रपट के नए स्वरूप में, निजी जानकारी वाले पहले हिस्से के 10 बिंदुओं के अतिरिक्त 24 बिंदु और हैं मगर इन्हें खंडों में विभाजित नहीं किया गया है और अब आँकलन 100 में से  होता है। इसका मतलब है कि, अगर हम परीक्षा परिणाम के बिंदु की स्थिति बदले जाने पर ग़ौर करें, तो असल में 5 बिंदु कम हुए हैं। हम कह सकते हैं कि ACR के पिछले स्वरूप के मुक़ाबले नए स्वरूप को कम बारीकी व गहराई से तैयार किया गया है। इसे हम एक उदाहरण से और बेहतर समझ सकते हैं। मूल्याँकन रपट को शिक्षण से संबद्ध विभिन्न ज़िम्मेदारियों/कौशलों में विभाजित करने से एक शिक्षक को यह आसानी से समझ आ सकता है कि उसे किस क्षेत्र में कम-ज़्यादा समस्या आ रही है। बल्कि, मूल्याँकन करने वालों के लिए भी यह तार्किक वर्गीकरण सुसंगत विश्लेषण करने व फ़ीडबैक देने का ज़रिया मुहैया कराता है। तो, कम-से-कम प्रथमदृष्ट्या, रपट का नया स्वरूप मूल्याँकन का बेहतर औज़ार उपलब्ध नहीं कराता है। बल्कि, लगता है कि इसे जल्दबाज़ी में, महज़ किसी प्रशासनिक आदेश के समयबद्ध पालन के दबाव में, बिना पर्याप्त शैक्षिक विमर्श व समझदारी के तैयार किया गया है। 
एक समग्र आलोचना प्रस्तुत करने से पहले हम कुछ ऐसे बिंदुओं पर ग़ौर करेंगे जिन्हें या तो हटा दिया गया है या जोड़ा गया है। निम्नलिखित 15 बिंदु पुरानी मूल्याँकन रपट में शामिल थे, लेकिन अब नहीं हैं -
शिक्षक की अपनी 'स्वच्छ्ता व शुद्धता', उत्साह, आचार-व्यवहार, निजी स्वास्थ्य, भावनात्मक स्थिरता, कार्य में रुचि, अनुशासन, लिखाई, पहल करने की योग्यता, व्यावसायिक उन्नति, विद्यार्थियों के साथ संबंध, परीक्षाओं का मूल्याँकन, परीक्षाओं के फलस्वरूप अनुसरण, कार्य योजना व प्रस्तुतिकरण का निरीक्षण और कार्यानुभव में रुचि। इसी प्रकार, निम्नलिखित 10 बिंदु नई मूल्याँकन रपट में शामिल हैं, लेकिन पहले नहीं थे -
परीक्षा में 60% से अधिक अंक लाने वाले विद्यार्थियों की संख्या/मेधावी छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या, विद्यालय छोड़कर जाने वाले बच्चों की संख्या, डायरी का साप्ताहिक मूल्याँकन, चार्ज रिकॉर्ड का रखरखाव, श्रुतलेख, पुस्तकालय का प्रयोग, स्कूली आयोजनों में कक्षा की भागीदारी, क्षेत्रीय/वार्ड स्तरीय आयोजनों में कक्षा की भागीदारी, पर्यावरण व समुदाय सेवा के प्रति जागरूकता और शिक्षक-अभिभावक बैठक का आयोजन।
उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कुछ सरसरी टिप्पणियाँ कर सकते हैं। 
1. शिक्षकों के मूल्याँकन के लिए उत्साह, रुचि, पहल करना, भावनात्मक स्थिरता, व्यावसायिक उन्नति (जिसमें पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन व सेमिनार में भागीदारी शामिल था) जैसे कारकों को नकारने का मतलब है शिक्षण के कर्म व पेशे को मनःस्थिति तथा बौद्धिकता से काटकर परिभाषित करना। यह पूँजीवादी प्रबंधन के उस मॉडल पर आधारित है जिसमें हर उस चीज़ का कोई स्थान/मूल्य नहीं है जो कर्मी की अपनी इच्छा-रुचि ज़ाहिर करती है तथा जिसे नापा नहीं जा सकता है। विडंबना यह है कि न सिर्फ़ उत्साह व रुचि जैसे सूक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण तत्वों को नज़रंदाज़ कर दिया गया है, बल्कि शिक्षण जैसे बौद्धिक कर्म के लिए पढ़ने-लिखने व अध्ययन करने तक को अनावश्यक क़रार दे दिया गया है। इस तरह यह भी प्रतिपादित किया जा रहा है कि शिक्षण के काम को बिना किसी आंतरिक प्रेरणा के बख़ूबी अंजाम दिया जा सकता है। हम जानते हैं कि यह झूठ है। चूँकि आंतरिक प्रेरणा कोई आसमान से नहीं टपकती, इसलिए इस झूठ को रपट में स्थान देने का अर्थ यह भी है कि सार्वजनिक प्रबंधन के इस नए मॉडल में व्यवस्था उन परिस्थितियों के निर्माण की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त हो जाती है जो असल में किसी श्रेष्ठ आंतरिक प्रेरणा को जन्म देने के लिए ज़रूरी हैं। मूल्याँकन के इस नए मॉडल में आपको परिणाम दिखाने ही हैं, भले ही आपकी अपनी (आंतरिक) व व्यवस्था की (बाह्य) परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों।
2. जहाँ पिछली मूल्याँकन रपट में शिक्षक के विद्यार्थियों के साथ संबंधों को 4 अंकों की तरजीह दी गई थी, वहीं अब इस संबंध के महत्व को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया गया है। यह रोचक है क्योंकि अधिकारियों, साथी शिक्षकों व अभिभावकों के साथ संबंधों को पहले जितना ही महत्व दिया गया है। ज़ाहिर है कि मूल्याँकन की इस नई प्रणाली में शिक्षक केवल विद्यार्थियों के परीक्षा परिणामों के लिए ज़िम्मेदार है, उनके साथ जीवंत संबंध बनाने के लिए नहीं। अब शिक्षक को, अर्जुन की तरह, केवल निशाने पर नज़रें गड़ानी हैं, इधर-उधर की बातों पर समय नष्ट नहीं करना है। जबकि अधिकतर शिक्षक इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि विद्यार्थियों के साथ उनका रिश्ता न केवल उनके शिक्षण में बेशक़ीमती भूमिका अदा करता है बल्कि यह उन्हें, ख़ासतौर से कठिन दिनों में, अपने पेशे में जिलाये रखता है। इस रिश्ते को नकारने का अर्थ है शिक्षण को उसके मानवीय स्पर्श से अलहदा कर देना। 
3. एक तरफ़ चारों ओर से शिक्षक पर परीक्षा परिणाम सुधारने का दबाव डाला जा रहा है, दूसरी तरफ़ नई ACR में शिक्षक द्वारा परीक्षाओं के मूल्याँकन व उसके नतीजे में अनुसरण करने को मूल्याँकन के क़ाबिल नहीं समझा गया है! प्रथमदृष्टि में यह एक विरोधाभास लग सकता है, मगर शिक्षा नीति के विमर्श पर नज़र डालने से हमें समझ आता है कि इसमें एक तारतम्यता है। नई शिक्षा नीति के प्रायोगिक दस्तावेज़ों में और शिक्षा अधिकार अधिनियम के फ़ेल न करने वाले नियम को ख़ारिज करने वाले संशोधन के विमर्श में यह प्रस्तावित किया गया है कि बच्चों की 'असल' परीक्षा स्कूली स्तर पर नहीं बल्कि एक तरह से आउटसोर्स्ड/केंद्रीकृत होगी। आशय यह है कि बच्चों के सीखने को लेकर शिक्षकों द्वारा स्कूली स्तर पर तैयार प्रश्न-पत्र व उनका मूल्याँकन स्वार्थपूर्ण भी हो सकता है और निम्नस्तरीय भी। संभवतः इसीलिए इसे ACR में स्थान देने की ज़रूरत नहीं समझी गई क्योंकि अब यह काम शिक्षकों के ज़िम्मे, विकेन्द्रीकृत ढंग से नहीं होगा।
4. इसी कड़ी में, अधिगम की चिंता का शोरग़ुल मचाती नई शिक्षा नीतियों के विमर्श के दौरान कक्षाई शिक्षण प्रक्रिया के प्रत्यक्ष निरीक्षण पर आधारित बिंदुओं को दरकिनार करना अटपटा लग सकता है। वस्तुतः नई ACR में कक्षा का निरीक्षण करके कार्य योजना, पाठ प्रस्तुति व चित्रकला जैसी गतिविधियों का मूल्याँकन करना अनावश्यक समझा गया है। इस अनुपस्थिति से नई मूल्याँकन रपट में सीखने-सिखाने को लेकर कक्षाई अंतःक्रिया के प्रति रुचि व समझ की कमी का पता चलता है। यह ग़ैरमौजूदगी ऊपर उल्लिखित दूसरे बिंदु को भी पुष्ट करती है जिसके अनुसार परीक्षा परिणाम तो महत्वपूर्ण हैं लेकिन (उसके लिए भी) शिक्षण की असल प्रक्रिया को देखने की ज़रूरत नहीं है। दूसरी तरफ़, यह आने वाले समय में स्कूल निरीक्षकों की ढलती संख्या व भूमिका की नीति का संकेत भी हो सकता है।
5. ACR के नए स्वरूप में कक्षा तृतीय तक विषयों में 60% से अधिक अंक लाने वाले विद्यार्धियों के अनुपात और चौथी-पाँचवीं के लिए मेधावी छात्रवृत्ति पाने वालों के अनुपात को 5 अंकों का मूल्य दिया गया है। परिणाम-आधारित यह मूल्याँकन न केवल शिक्षण की प्रक्रिया की चुनौती से ध्यान हटाता है - जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया - बल्कि एक ऐसी चीज़ के लिए शिक्षकों को ज़िम्मेदार ठहराता है जिसको कई आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियाँ प्रभावित करती हैं। मेधावी परीक्षा को तरजीह देने के दुष्परिणामों से भी हम वाक़िफ़ हैं। इनमें नियमित पाठ्यचर्या की अनदेखी व पर्तिस्पर्धा की अस्वस्थ संस्कृति को प्रोत्साहन प्रमुख हैं। नए ACR में इस नीतिगत अनदेखी के कम-से-कम दो उदाहरण और मिलते हैं; एक तो विद्यालय छोड़कर जाने वाले बच्चों की संख्या के लिए शिक्षक का 4 अंकों का मूल्याँकन रखा गया है और दूसरे, शिक्षक के प्रयास द्वारा बढ़े दाख़िलों की संख्या को मूल्याँकन के लिए 5 अंक दिए गए हैं। इस तरह, लगभग 20% मूल्याँकन अंक ऐसी चीज़ों के लिए निर्धारित किये गए हैं जिनपर शिक्षक का कोई बस नहीं है। चाहे वो परीक्षा-परिणाम हो, बच्चों का स्कूल से बाहर हो जाना हो या स्कूल में दाख़िला लेना हो, अपवाद स्वरूप ही शिक्षक अपनी व्यक्तिगत हैसियत में इनके लिए एकल रूप से ज़िम्मेदार होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जबकि किसी ख़ास प्रसंग में यह संभव है कि कोई छात्र किसी शिक्षक के कारण स्कूल छोड़ दे या उसमें प्रवेश ले ले, सामान्य तौर पर ये समाजशास्त्रीय परिघटनाएँ हैं। हमारे देश में अधिकतर बच्चों का स्कूल इसलिए छूट जाता है कि उनके परिवार आर्थिक रूप से अस्थिर जीवन जीते हैं, उन्हें विस्थापित कर दिया जाता है, उनके स्कूल में पर्याप्त संसाधन नहीं होते, स्कूल नज़दीक व सामाजिक रूप से सुलभ नहीं होता है आदि। इसके अलावा, ऐसे अन्यायपूर्ण व शिक्षा के चरित्र से असंगत मूल्याँकन बिंदु शिक्षकों के बीच में अनुचित भेदभाव रचते हैं। ज़ाहिर है कि सभी शिक्षक एक-समान स्थितियों में काम नहीं कर रहे हैं। ऐसे में उनपर परिणाम, छात्रवृत्ति, 'ड्राप-आउट' व दाख़िलों में बढ़ोतरी की समान मूल्याँकन शर्तें थोपना बेहद अनुचित है। अगर कहीं स्कूल बंद होने की कगार पर हैं, आसपास की आबादी घट गई या सामाजिक रूप से सरकारी स्कूल के लिए बदल गई है, पड़ोस में खेत उजाड़ दिए गए हैं, बस्तियाँ ढहा दी गई हैं या कारख़ाने बंद हो गए हैं तो फिर शिक्षक संख्या के घटने-बढ़ने में क्या भूमिका अदा कर सकते हैं? सिवाय इसके कि वो अपनी सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में आकर संगठित व आंदोलित हों और अर्बन नक्सल का ख़िताब पायें। हाँ, इसके लिए उन्हें क्या मिलेगा यह कहना मुश्किल है, लेकिन ACR में कोई अंक तो नहीं मिलेंगे। इसी तरह, हर स्कूल के परिवेश, पड़ोस के समुदाय की आर्थिक-सामाजिक ही नहीं बल्कि भाषाई व शैक्षिक परिस्थिति भी अलग-अलग होती है। कहीं दी गई पाठ्यचर्या के हिसाब से पढ़ाना आसान होता है, कहीं बेहद मुश्किल। ऐसे में इन अनिश्चित व असमान अवयवों को ACR में मूल्याँकन के लिए इस्तेमाल करना शिक्षकों के साथ समग्र रूप में व उनके बीच में बड़े वर्ग के साथ बेईमानी है। क्या इस बात पर ग़ौर किया गया है कि जब ऐसे मूल्याँकन का शिक्षकों, प्रधानाचार्यों आदि की सेवा-परिस्थितियों व लाभों पर नकारात्मक असर नज़र आना शुरु होगा तब संभावित दंड/नुक़सान से बचने के लिए चुनौतीपूर्ण बच्चों व स्कूलों से दूर रहने, उनसे बचने के हथकंडे भी अपनाये जायेंगे? ऐसे में हम पिछली ACR के उस बिंदु की सराहना करते हैं जिसमें क्षेत्रीय व वार्ड स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों व परीक्षाओं में विद्यार्थियों की हिस्सेदारी के लिए प्रधानाचार्यों का 10 अंकों का मूल्याँकन तय था, मगर यह परिणाम-आधारित नहीं था। 
6. शिक्षण की स्वायत्तता ख़त्म करके उसे एक निर्धारित ढर्रे पर चलाने के स्पष्ट संकेत ACR के नए स्वरूप में मिलते हैं। तीन उदाहरण उल्लेखनीय हैं - नैतिक शिक्षा को, पहले की तरह अव्याख्यायित न छोड़कर, 'निर्धारित कार्यक्रम' के अनुसार संपन्न कराने, साप्ताहिक डायरी को पाठ्यक्रम के अनुसार तैयार करने व सप्ताह में लिए जाने वाले श्रुतलेखों की न्यूनतम संख्या के ज़िक्र। इस तरह से तक़रीबन 10-15% मूल्याँकन शिक्षक को स्कूल/कक्षा में तयशुदा व्यवहार करने को बाध्य करता है। यह शिक्षकों के बौद्धिक कर्म में सीधा हस्तक्षेप ही नहीं बल्कि उसपर एक हमला है। ऊपर के उस बिंदु से यह पूरी तरह मेल खाता है जिसमें न सिर्फ़ शिक्षक की स्वायत्तता को नकारा गया है बल्कि शिक्षण को एक बौद्धिक कर्म के रूप में भी नहीं देखा गया है। तय रूपरेखा के अनुसार नैतिक शिक्षा देने की बात करना तो नैतिकता व विवेक के साथ भी धोखा है क्योंकि नैतिकता बहस और तर्क करने व कठिन सवाल खड़े करने की सार्वजनिक, ईमानदार व निर्भीक क़वायद की माँग करती है। इस निर्देश में एक डर काम कर रहा है जो स्कूलों के माध्यम से समस्त समाज व सोच को अपने कब्ज़े में लेकर एक साँचे में डालना चाहता है। तेज़ी से उभरते इस केंद्रीकृत व तानाशाही विधान में शिक्षक को बुद्धिजीवी के रूप में बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। उसे सरकारी मुलाज़िम होने के नाते महज़ एक अनुशासित, मूक व विवेकहीन आदेशपालक बनकर रहना है। ऐसा नहीं है कि इसका फ़ायदा केवल सरकारें उठायेंगी। शिक्षक व शिक्षण की यह बाह्य-संचालित संकल्पना शिक्षा को बाज़ार की वस्तु बनाकर व्यापार करने वाली देशी-विदेशी कंपनियों के भी काम आएगी। उनके लिए व्यावसायिक एवं घटिया स्तर की तयशुदा पाठ-योजनाओं, टेस्ट, शिक्षण सामग्री आदि को शिक्षकों पर लादना व कक्षाओं में घुसाना आसान हो जायेगा। 
7. पिछले और वर्तमान ACR स्वरूपों में एक फ़र्क़ यह भी है कि अब स्व-मूल्याँकन का कोई स्थान नहीं है। इसके पहले लिखाई व स्वास्थ्य को शिक्षक द्वारा ख़ुद भी, अंकों के निर्धारण के बिना, मूल्याँकित किया जाता था और इन दो तत्वों का प्रधानाचार्य द्वारा भी मूल्याँकन (अंकों में) होता था। इस रोचक तथ्य का घोषित कारण तो ज्ञात नहीं है मगर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि एक तो इससे शिक्षक अपने बारे में कोई मूल्यपरक घोषणा कर पाते थे और फिर यह किसी प्रकार के भेदभावपूर्ण मूल्याँकन के प्रति एक तरह का उपाय भी था। आख़िर, कोई पूछ सकता था कि लिखाई व सेहत को लेकर उसके व प्रधानाचार्य के मूल्याँकन के बीच में इतना ज़्यादा अंतर् क्यों है। इस बदलाव के बदले, हमारा मानना है कि शिक्षकों के लिए स्व-मूल्याँकन व साथियों के मूल्याँकन को भी समुचित महत्व देना चाहिए। इससे न सिर्फ़ आत्मविश्वास, जवाबदेह होने का अहसास, कर्ता का बोध आदि बढ़ता है बल्कि एक पेशागत क़ाबीलियत को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
ऐसा भी नहीं है कि पिछले ACR में कोई कमी नहीं थी और नई में तारीफ़ के क़ाबिल कुछ भी नहीं है। दरअसल, आधुनिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था में हम यह उम्मीद करते हैं कि पिछली ग़लतियाँ दोहराई नहीं जाएँगी और भले ही सबकुछ ठीक न हो, समग्र रूप से बेहतर समझ और इंसाफ़ की एक मोटी रेखा तो दिखाई देगी। तो, इसके बावजूद कि पिछली रपट के स्वरूप में भी अभिभावकों व स्टाफ़ से अधिक उच्च-अधिकारियों के साथ संबंध मधुर होने पर ज़ोर था या फिर नए स्वरूप में पुस्तकालय, पर्यावरण के प्रति जागरूकता व शिक्षक-अभिभावक बैठकें कराने जैसे सकारात्मक तत्वों पर बल दिया गया है, हमारे पास नई ACR से निराश होने व इसका विरोध करने के पर्याप्त कारण हैं। यह सच है कि शिक्षकों को हतोत्साहित करने के लिए ACR के स्वरूप में विशिष्ट बदलाव किये गए हैं, मगर हमें याद रखना चाहिए कि अलग-अलग तरीक़ों से ऐसा सार्वजनिक क्षेत्र के सभी कर्मचारियों के साथ हो रहा है।   
एक बिंदु इससे अधिक पड़ताल की माँग करता हैं और विस्तृत नज़रिये की ज़मीन भी तैयार करता है। जहाँ पिछली ACR में 95% से अधिक की उपस्थिति पर अधिकतम 5 अंक मिलते थे और शून्य 75% से कम के लिए तय था, वहीं नई रपट में 81% से अधिक के लिए अधिकतम 5 तथा 20% से कम के लिए भी 1 तय है। इसी तरह, समग्र रूप से जो चार श्रेणियाँ तय थीं, उत्कृष्ट, बहुत अच्छा, अच्छा व साधारण, उनके न्यूनतम मापदंड क्रमशः 83% से 75%, 67% से 61%, 52% से 50% एवं 36% से शून्य ('50 से कम') कर दिए गए हैं। मूल्याँकन के इस पहलू को हम अधिक उदार कह सकते हैं लेकिन इसकी और सटीक व्याख्या करनी होगी। संभव है कि वार्षिक उपस्थिति व समग्र मूल्याँकन को लेकर ये पैमाने इस कारण शामिल हुए हों कि नई ACR को तैयार करने में प्रशासन के उन विभागों व अधिकारियों ने काम किया है जिन्हें स्कूली शिक्षा व्यवस्था की जानकारी नहीं है। वहीं अगर हम इस तथ्य पर ग़ौर करें कि कैसे नई ACR के अंतर्गत शिक्षकों के लिए लगभग 30% मूल्याँकन अंक तो वैसे भी पारिस्थितिक अनिश्चितता के घेरे में आते हैं एवं अनुचित माँग करते हैं तो हम इस नए स्वरूप की 'उदारता' के नक़ाब को उतार के फेंक सकते हैं। यह स्वरूप शिक्षाविदों या शिक्षा अधिकारियों द्वारा भी नहीं बल्कि उस DoPT द्वारा तैयार किया गया है जिसने निश्चित ही सातवें वेतन आयोग व नीति आयोग के आदेशानुसार कर्मचारियों के सालाना मूल्याँकन को उनके 'काम के तयशुदा परिणामों' (आउटकम्ज़) के आधार पर सख़्ती से कसने की नीति अपनाई है। ऐसा करके कर्मचारियों की प्रोन्नति के लिए ज़रूरी न्यूनतम मूल्याँकन मापदंड भी बढ़ा दिए गए हैं और प्रोन्नति की संभावना को दूर की कौड़ी बनाया जा रहा है। आज कार्य की कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे कई कर्मचारियों के सामने जबरन सेवा-निवृत्ति (वॉलन्टरी रिटायरमेंट) व बिना प्रोन्नति की उम्मीद के नौकरी के विकल्प मुँह उठाये खड़े हैं। उधर सरकार ने तय कर लिया है कि वो उच्च प्रशासनिक पदों पर निजी क्षेत्र से सीधे नियुक्तियाँ करेगी। कई लोग इसे संविधान के विरुद्ध बता रहे हैं ,मगर सरकार अपनी पूँजीवाद-परास्त तानाशाही के नशे में मदहोश है। इसी तर्ज पर, 'नाकाम' शिक्षकों के बदले स्कूलों में एनजीओ व कॉरपोरेट जगत के अप्रशिक्षित 'वालंटियर्स' को स्कूलों में पढ़ाने की ज़िम्मेदारी देने का चलन तेज़ी पकड़ता जा रहा है। नई शिक्षा नीति के ताज़े ड्राफ़्ट में गणित व पढ़ने के मौलिक कौशलों के विकास के लिए 'अधिगम के संकट' की दुहाई देते हुए एक राष्ट्रीय ट्यूटर्स एजेंसी निर्मित करने की बात की गई है। इस तरह सरकार की नाक के नीचे और उसकी शह से जो काम अब तक शिक्षा अधिकार अधिनियम के ख़िलाफ़ जाकर हो रहा था, अब उसे वैधानिकृत ढंग से किया जायेगा। इधर सार्वजनिक व्यवस्था के कर्मचारियों को प्रताड़ित करके, उनपर तरह-तरह से दबाव डालकर उन्हें हतोत्साहित करने की नीति अपनाई जा रही है; उधर निजी क्षेत्र की भलमनसाहत और कार्यकुशलता के क़सीदे रचकर उसे सार्वजनिक संसाधन कब्ज़ाने और हमारी ज़िंदगी तय करने वाली ग़ैर-जवाबदेह ताक़त सौंपी जा रही है। हम शिक्षकों को वार्षिक गोपनीय रपट के अन्यायपूर्ण मूल्याँकन मापदंडों व शिक्षा को पूँजी की गिरफ़्त में धकेलती अपमानजनक कुशिक्षा नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी होगी, वर्ना कल हमारी और हमारे पेशे, दोनों की रही-सही गरिमा भी नहीं बचेगी।