Friday, 28 July 2023

G20 और हमारे शहर: हम शिक्षक क्या बतलाएँ और किसके गुण गाएँ?


संपादकीय टिप्पणी: इस वर्ष G 20 की अध्यक्षता व मेज़बानी की बारी तय क्रमानुसार भारत को मिली। ऐसा होना था कि विश्वविद्यालयों से लेकर हमारे स्कूलों तक को G 20 के बारे में कार्यक्रम आयोजित करने के आदेश दिए जाने लगे। शैक्षिक परिसरों की दीवारों पर G 20 से जुड़े चित्र सजने लगे, सूचना व प्रदर्शन पट्ट पर इस ख़ास समूह की जानकारी पेश की जाने लगी और शिक्षक व विद्यार्थी विभिन्न भाव-भंगिमाएँ अपनाकर इन आदेशों का पालन करने में जुट गए। न स्कूलों की पाठ्यचर्या का ख़याल रखा गया और न ही विद्यार्थियों की उम्र के संदर्भ में उनकी समझ या ज़रूरत का। एक तरफ़ इन आदेशों के पीछे परोक्ष रूप से महिमामंडन तथा बचकाने व बेबुनियाद गर्व को पोषित करने की मंशा झलकी, वहीं दूसरी तरफ़ आपाधापी में व अफ़सरशाही के बोझ तले पिस रहे स्कूलों के माहौल ने यह सुनिश्चित किया कि ये कार्यक्रम/गतिविधियाँ सतही, दिखावटी एवं रूटीन क़िस्म की रहेंगी। यह परिघटना उस प्रशासनिक संस्कृति का ही एक अन्य ताज़ा उदाहरण है जिसमें स्कूलों को सरकारी ही नहीं, बल्कि दलगत और व्यक्तिवादी प्रचार के वैध स्थल मान लिया गया है। साथ ही, शिक्षकों को स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने वाले बौद्धिक कर्मी की तरह नहीं, बल्कि महज़ आदेशपालन करने वाले सरकारी कर्मचारी के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि इन कार्यक्रमों/गतिविधियों में न्यूनतम तथ्यों से न्यूनतम ईमानदारी बरतने की कोशिश भी दिखाई नहीं देती है। गहरा और आलोचनात्मक शैक्षणिक व्यवहार तो बहुत दूर की बात है। जबकि इस स्थिति के लिए ख़ुद हुक्मरान ज़िम्मेदार हैं, इसके लिए शिक्षक को दोष नहीं दिया जा सकता है। बहरहाल, अभी हमें दो महीने और G-20 के नेतृत्व के एहसास के साये तले गुज़ारने होंगे। इस बीच ये फ़रमान अपने चरम पर पहुँच सकते हैं। जैसे G 20 से जुड़े आदेश हमारी स्कूली व्यवस्था के अकादमिक खोखलेपन व बर्बादी को और उजागर करते हैं, वैसे ही इस स्वयंभू समूह की गौरवशाली मेज़बानी के पीछे की सच्चाई इस लोकतंत्र में लोगों की औक़ात की हक़ीक़त बयान करती है। प्रस्तुत है G 20 की नेतृत्वशाली मेज़बानी से पीड़ित देश के नागरिकों की त्रासदी पर रौशनी डालती एक जनसुनवाई की संक्षिप्त रपट। उम्मीद है कि शिक्षक साथी इसे अपने शैक्षणिक कर्म को गहराई देने में मददगार पाएँगे। 



22 मई को नई दिल्ली के सुरजीत भवन में भारत में जबरन बेदख़ली के ज्वलंत मुद्दे को संबोधित करती एक जन सुनवाई आयोजित की गई थी। इसे विभिन्न विषयों पर काम करने वाले संगठनों ने साथ आकर, कंसर्नड सिटिज़न्स [फ़िक्रमंद नागरिक] के नाम से आयोजित किया था। इस जन सुनवाई का उद्देश्य देशभर में की जा रही, व ख़ासतौर से किसानों, रेहड़ी-पटरी वालों, कूड़ा बीनने वालों तथा बस्तियों के निवासियों को निशाना बना रही, उन अन्यायपूर्ण बेदखलियों पर रौशनी डालना था जिन्हें G20 सम्मेलन की तैयारियों और शहरों के सौंदर्यीकरण के तहत अंजाम दिया जा रहा है। जबकि G20 की मेज़बानी को लेकर पैदा की जा रही चमक-धमक, चकाचौंध और गर्व की भावना सत्ता द्वारा 'विकास' की कहानी के प्रचार के रूप में सामने लाई जा रही है, इस जन सुनवाई से वो सच सामने आया जिसे सावधानीपूर्वक छुपाया जाता है - बुलडोज़रों द्वारा घरों को मिट्टी में मिलाने की क्रूर कहानी।   

जहाँ G20 को 'राष्ट्रीय गर्व' के रूप में पेश किया जा रहा है, ऐसा लगता है कि सरकार अपने ही [देश के] लोगों, विशेषकर ग़रीबों, के ख़िलाफ़ पक्षपात करती है। नागपुर से आए जम्मू आनंद ने कहा, "एक न्यायाधीश ने हाल ही में कहा कि G20 के तहत Civil (सिविल) 20 का एक विशाल आयोजन होगा और इसलिए नागपुर के लोगों को अनुशासन में रहना होगा।" उनका यह इशारा ही स्थानीय प्रशासन के लिए नागपुर के सम्मान को बचाने के लिए क़दम उठाने के लिए काफ़ी था। पुलिस आयुक्त ने आदेश जारी किया कि चौराहों पर एक भी भिखारी नज़र नहीं आना चाहिए। 'ग़रीबी हटाओ' के बदले अब वो 'ग़रीबी छुपाओ' कर रहे हैं। नागपुर में हुए C20 के उद्घाटन के अवसर पर हमने बस्तियों को लोहे की चादरों के पीछे छुपाए जाते और 'हरियाली' का अहसास देने के लिए ज़मीन पर प्लास्टिक की घास लगाए जाते देखा। ज्यूरी [जन सुनवाई की पीठ] के सदस्य हर्ष मंदर ने कहा, "एक शहर कामकाजी हाथों के बिना एक दिन भी नहीं चल सकता, मगर हम इन्हें कोई जगह नहीं देना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि ये लोग अलादीन के जिन्न की तरह रहें, बस हमारी सेवा के लिए प्रकट हो जाएँ और फिर ग़ायब हो जाएँ।"   

लोगों ने प्रशासकों द्वारा बेदखलियों में बरती गई असीम क्रूरता की गवाहियाँ दीं। दिल्ली के [यमुना किनारे स्थित] बेला एस्टेट की पूजा ने कहा, "हमें अपना सामान उठाने के लिए 3 घंटे दिए गए जिसमें यह काम लगभग नामुमकिन था। 29 अप्रैल को हुए बेदख़ली अभियान के चलते बहुत-से विद्यार्थियों की बोर्ड परीक्षा छूट गई। एक महीने के अंतराल में हम पर तीन बार बुलडोज़र चलाए गए। चूँकि पानी के बिना ज़िंदा नहीं रहा जा सकता है, इसलिए उन्होंने पहले हैंडपंप तोड़े ताकि हमें फ़ौरन वहाँ से जाना पड़े। अपने मकानों को बचाने के लिए बच्चों को परीक्षाएँ छोड़नी पड़ीं। अब हम फ़्लाईओवर के नीचे रह रहे हैं।”

बस्ती सुरक्षा मंच के अब्दुल शकील के शब्दों में, “तुग़लक़ाबाद की बेदख़ली तो इतनी क्रूर थी कि हममें से उन लोगों को भी इस स्तर का अनुभव नहीं था जो दशकों से बेदखलियों से जूझ रहे हैं। पुलिस ने बस्ती को घेर लिया, जैमर लगा दिए गए ताकि कोई वीडियो न भेज पाए, कार्यकर्ताओं के फ़ोन छीन लिए गए, आसपास के होटलों व दुकानों को बंद करवा दिया गया और पूरी बस्ती दो दिन में ढहा दी गई।”

राजेंदर रवि के शब्दों में, “यह सिर्फ़ उनके मकानों का विनाश नहीं है; यह उनके इतिहास, उनकी जड़ों और उन रिश्तों का भी विनाश है जो उन्होंने उस जगह के साथ बनाए थे।”

इंदुप्रकाश के शब्दों में, “31 जनवरी को बाग़वानी विभाग....[मूल रपट में भाषा स्पष्ट नहीं है] कि सराय काले ख़ाँ इलाक़े के पास वाली जगह के G20 से जुड़े सौंदर्यीकरण के रास्ते में जो निराश्रित गृह (बेघरों का बसेरा) आ रहा है उसे तोड़ देना चाहिए। अतः बहुत जल्दी एक आदेश जारी करके बेघरों के इस बसेरे को ज़मींदोज़ कर दिया गया।”

ज्यूरी सदस्या पामेला फ़िलीपोस ने कहा, “बुलडोज़र का [ऐसा] अति हिंसक इस्तेमाल निश्चित ही राज्य की क्रूरता और निष्ठुरता का प्रत्यक्ष प्रतीक है। यह सुनना दुखद है कि कैसे फेरीवालों को अतिक्रमणकारियों की तरह, बस्ती के बाशिंदों को अवैध लोगों की तरह और बेघरों को नशाख़ोरों की तरह देखा जाता है।”

यह बात कई गवाहियों में उभर कर सामने आई कि G20 कैसे उन काम-धंधों पर एक अभिशाप की तरह आया है जो पहले-से ही सबसे ज़्यादा असुरक्षा व अनिश्चितता की हालत में हैं। इंदौर के आनंद लखन के शब्दों में, “उनके लिए G20 एक आयोजन हो सकता है, हमारे लिए तो यह ग़रीबों पर एक आफ़त है। राहुल वर्मा के पास इंदौर के नक्षत्र गार्डन के निकट एक गैराज था। चूँकि G20 प्रतिनिधिमंडल आने वाला था, इसलिए उनका गैराज हटा दिया गया। उन्हें एक ऐसी जगह बसाया गया जहाँ उनके गैराज के लिए धंधे की कोई संभावना नहीं थी। ऐसी हैं पुनर्वास की सच्चाइयाँ। वो अवसाद में चले गए और अंततः उन्होंने आत्महत्या कर ली।”

भुज के मोहम्मद के शब्दों में, “हमें बताया गया था कि G20 के चलते रोज़गार के नए अवसर खुलेंगे और पर्यटन बढ़ेगा। स्थानीय अख़बारों में ऐसी रपटें थीं। मगर जिस तरह से G20 के नाम पर बेदखलियाँ और नाकाबंदियाँ टूट पड़ीं, ग़रीबों के लिए वो एक क़हर था। भुज में तो फेरीवाले प्रतिनिधिमंडल के दौरे के लिए दस दिनों तक काम बंद करने के लिए भी राज़ी हो गए। मगर जब वो वापस गए तो उनमें से बहुतों को एक महीने के अंदर हटा दिया गया।”

बेला एस्टेट की रेखा के शब्दों में, “वो हम थे जिन्होंने महामारी [कोरोना] के दौरान [इस शहर को] भोजन, दूध, सब्ज़ियाँ उपलब्ध कराईं। और अब वो हमारी ज़मीनें और आजीविकाएँ छीन रहे हैं। जब भी शहर में कोई बदलाव होता है तो शहरी ग़रीब को ही सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है।”

तुग़लक़ाबाद की रीना के शब्दों में, “मेरे पति ई-रिक्शा चलाते हैं। तोड़फोड़ के बाद अब कोई बिजली नहीं है। वो अपनी गाड़ी कैसे चार्ज करेंगे? मैं दस दिनों से भूख हड़ताल पर हूँ। क्या मेरी बात सिर्फ़ इसलिए नहीं सुनी जा रही है क्योंकि मैं ग़रीब हूँ?”

फेरीवालों के राष्ट्रीय महासंघ के संदीप ने उन फेरीवालों की बदहाली के बारे में बात की जिनकी आजीविका सौंदर्यीकरण के नाम पर ख़त्म हो रही है। कुछ लोगों का कहना है कि क्या मेहमानों के आने पर हम अपने घर साफ़ नहीं करते हैं। "मगर क्या कभी भी इस सफ़ाई का मतलब बूढ़ों और सबसे लाचार सदस्यों को घर से बाहर निकालना होता है?" उनका कहना था, “G20 से पहले कभी भी सड़क विक्रेताओं पर बुलडोज़र नहीं चले थे, मगर G20 में यह होता दिख रहा है।”

रेहड़ी-पटरी वालों की आजीविकाओं पर हो रहे इन हमलों के बारे में सुनते हुए ज्यूरी सदस्य आनंद याग्निक ने सवाल किया कि अगर प्रधानमंत्री यह बोल सकते हैं कि वो चायवाले हैं, तो हम सड़कों [की पटरियों] पर सामान क्यों नहीं बेच सकते। 

उन्होंने कहा, “सुबह से इन ज़ुल्मों और बेदखलियों के बारे में सुनने से ऐसा लग रहा है कि G20 आयोजन संविधान से भी ऊपर का कार्यक्रम बन गया है जिसे क़ानून पर नहीं चलना है। G20 की बदौलत उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय के आदेशों को पलटकर एक तरह से संविधान को अस्थाई रूप से स्थगित करना अविश्वसनीय है। हम इसे क्या कहें, अमृत काल या राक्षस काल?”

लैंड कनफ्लिक्ट वॉच (ज़मीन के टकराव पर नज़र) के पृथ्वीराज ने कहा, "भारत [सरकार को] को G20 की अध्यक्षता नवंबर में मिली और दिल्ली में लोगों को अचानक नोटिस मिलने लगे।" उन्होंने कहा कि हालिया बेदखलियों में कुछ पैटर्न्स (सिलसिले) दिखते हैं और कुछ [लोग/वर्ग] दूसरों से ज़्यादा असुरक्षित हैं। “जबकि महरौली में 700 नोटिस जारी किए गए और 25 मकान ढहाए गए; वहीं तुग़लक़ाबाद में लगभग 1500 नोटिस जारी किए गए और लगभग 3000 मकान ढहाए गए क्योंकि यहाँ के निवासी ज़्यादा असुरक्षित [सामाजिक-आर्थिक रूप से कमज़ोर] थे।" उनके अनुसार दोनों ही जगहों पर तुलनात्मक रूप से अधिक सम्पन्न लोगों के मकानों/अपार्टमेंट को [तोड़ने से] छोड़ दिया गया। 

ज्यूरी सदस्या बीना पल्लीकल ने कहा, "राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) के दौरान 2010 में भी इन्होंने [सत्ताधारियों ने] SC/ST बजट से 700 करोड़ रुपये लेकर विशाल स्टेडियम बनाए थे। उस वक़्त भी बेदखलियाँ और तोड़फोड़ हुई थीं। आज सरकारें बदल गई हैं, मगर ज़मीनी हक़ीक़त वही है।" 

टिकेंद्र पंवार ने सत्तावादी नेताओं की सौंदर्यीकरण के प्रति सनक की बात की - नेपोलियन, हिटलर और अब भारत में उनके वंशज। उन्होंने कहा, “1990 के दशक में जब ज़मीन का मुद्रीकरण हुआ, तब ग़रीबों को रुकावट की तरह देखा गया। इस प्रकार इस तकनीकी-केंद्रित मॉडल में मेहनतकश वर्ग को हाशिये पर डालना [सत्ता के लिए] ज़रूरी था। ग़रीबों को शहर पर अपना हक़ वापस लेना होगा।”

ग़ाज़ीपुर के लैंडफ़िल (कूड़े के टीले) के पास कूड़ा बीनने वालों की बस्ती के शाह आलम की गवाही के संदर्भ में [ज्यूरी सदस्य] हर्ष मंदर ने कहा कि हम ऐसा भारत नहीं चाहते हैं जहाँ किसी का घर आठ बार जलाया जाए और हर बार उसे राख से शुरुआत करनी पड़े। इसे बदलना होगा।  

ज्यूरी सदस्यों ने कहा कि वो सभी गवाहियों के विश्लेषण के बाद, एक हफ़्ते के अंदर, इस ट्रिब्यूनल (जन अदालत) के आधार पर एक रपट तैयार करेंगे। उन्होंने G20 से जुड़ी बेदखलियों और ग़रीबों के ख़िलाफ़ हिंसा को तत्काल रोकने की माँग की।   

इस जन सुनवाई की पीठ के ज्यूरी सदस्य: वरिष्ठ पत्रकार पामेला फ़िलीपोस, दलित मानव अधिकारों का राष्ट्रीय अभियान (नैशनल कैंपेन फ़ॉर दलित ह्यूमन राइट्स) की बीना पल्लीकल, शिमला के पूर्व उप-महापौर (डिप्टी मेयर) टिकेंद्र पंवार, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर  तथा गुजरात उच्च न्यायालय के वकील आनंद याग्निक 


प्लास्टिक प्रदूषण, उद्योग और आर्थिक नीति

                                                                                                                                                  स्वाथि सेषाद्रि
संपादकीय टिप्पणी: पिछले कुछ वर्षों से हम स्कूलों में प्लास्टिक के इस्तेमाल के विरुद्ध तरह-तरह के जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते आ रहे हैं। विद्यार्थियों को विभिन्न समस्याओं के प्रति जागरूक बनाना निश्चित ही स्कूलों और शिक्षा की ज़िम्मेदारी बनती है। मगर हाल के समय में हमारे द्वारा स्कूलों में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के पीछे हमारे अपने अकादमिक विवेक या शिक्षणशास्त्रीय निर्णय की भूमिका नहीं रही है, बल्कि ऊपर से थोपे और तय किए गए आदेशों की छाप रही है - कार्यक्रम कब और कैसे आयोजित करने से लेकर संदिग्ध की तरह सबूत के तौर पर उसकी फ़ोटो-वीडियो बनाने तक। इन कार्यक्रमों में समझ व सहमति के बिना दिलाई गई शपथ, चित्रकला, कविता पाठ, संबोधन आदि शामिल हैं। इन कार्यक्रमों के आदेशों में न केवल स्कूलों की दिनचर्या व पाठ्यचर्या की तिरस्कारपूर्ण अनदेखी निहित होती है, बल्कि अक़सर ये स्कूलों में उपलब्ध संसाधनों की हक़ीक़त से भी परे होते हैं। एक तरफ़ हम विद्यार्थियों को प्लास्टिक व पन्नी के ख़तरों तथा निजी इस्तेमाल के ख़िलाफ़ सचेत कर रहे होते हैं, दूसरी तरफ़ हमें अच्छी तरह पता होता है कि, छोटी उम्र के विद्यार्थी तो दूर, हम ख़ुद आसमान से उतरी इन शपथों को व्यवहार में उतारने में असमर्थ हैं। न ही ऐसे कार्यक्रम हमें इस विरोधाभास को सामने लाने की इजाज़त देते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था (निवेश, उत्पादन, क्रय-विक्रय आदि) के केंद्र में ही प्रकृति का संतुलन या संसाधनों का संयमित-समान इस्तेमाल नहीं, बल्कि निजी मुनाफ़े और तथाकथित विकास की होड़ है। इन कार्यक्रमों द्वारा यह मासूम 'शिक्षा' दी जाती है कि विभिन्न अन्य 'समस्याओं' की तरह प्लास्टिक प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार भी हम व्यक्तिगत तौर पर हैं व इसका समाधान भी हमारे व्यक्तिगत सुधरे हुए आचरण में है। इस तरह बहुत-ही सफ़ाई और सुविधाजनक तरीक़े से व्यवस्था का सवाल भी अदृश्य कर दिया जाता है और अर्थव्यवस्था पर काबिज़ धन्ना सेठों के अपराधों को भी। उम्मीद है कि शिक्षा नहीं बल्कि शासन के नज़रिये से तय किए गए इन प्लास्टिक-विरोधी कार्यक्रमों के आदेशों को एक बोझिल लाश की तरह उठाने को मजबूर हम शिक्षकों को यह लेख 'समस्या' को व्यापक आर्थिक-नीति के संदर्भ में देखने व सत्ता से सही सवाल पूछने में मदद करेगा।                                                                                                                  

इन दिनों संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के तहत एक वैश्विक प्लास्टिक्स संधि पर समझौता वार्ताएँ चल रही हैं। यह संधि प्लास्टिक प्रदूषण संकट का एक समाधान हो सकती है। इस संधि के बिंदुओं व अमल को लेकर सरकारों के बीच में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समझौता समितियों की पाँच बैठकें होनी हैं। इनमें से दूसरी बैठक 29 मई से 2 जून तक पैरिस में हुई थी।   

इस संधि का उद्देश्य है जीवाश्म ईंधनों को निकालने से लेकर पेट्रोकैमिकल्स तैयार करने के लिए परिष्कृत करने, प्लास्टिक उत्पादन, उपभोग, कूड़े के व्यापार व निपटारे तक, प्लास्टिक के पूरे 'जीवनकाल' में फैले प्रदूषण को समाप्त करना। जबकि अभी तक प्लास्टिक को महज़ इस्तेमाल के बाद कचरे की समस्या के रूप में देखा गया है।  

ऐसा पिछले साल मार्च में आयोजित संयक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA) में प्रस्ताव 5/14 अपनाने के बावजूद हुआ है। इस प्रस्ताव में साफ़ तौर से प्लास्टिक निर्माण उद्योग को प्लास्टिक प्रदूषण संकट के स्रोत के रूप में चिन्हित किया गया था।   

अगर इस प्रस्ताव के आधार पर कोई संधि तैयार होती है तो इससे कुछ ख़ास तरह के प्लास्टिक के उत्पादन में कटौती और अंततः रोक में कामयाबी मिलेगी। 

भारत व प्लास्टिक्स संधि 

भारत सरकार यह शेख़ी बघारती है कि 2019 में UNEA की पाँचवीं बैठक में उसने एक-बार-इस्तेमाल-होने-वाले प्लास्टिक्स (सिंगल-यूज़ प्लास्टिक्स) के ख़िलाफ़ प्रस्ताव की अगुआई की थी। मगर 2022 में जब विश्व के [विभिन्न देशों के] नेता वैश्विक प्लास्टिक्स संधि के अनिवार्य स्वरूप पर समझौता वार्ता कर रहे थे, भारत [सरकार] ने इसे ऐच्छिक रखने की वकालत की।  

विभिन्न सरकारों की अंतर्राष्ट्रीय समझौता समिति के पहले सत्र में भारत [सरकार] ने सऊदी अरब व चीन जैसे उन देशों का साथ दिया जिनका आग्रह था कि संधि वार्ताओं में फ़ैसले बहुमत के बदले सर्वसम्मिति से लिए जाएँ। [जोकि निश्चित ही, किन्हीं परिस्थितियों में, एक उचित लोकतांत्रिक तरीक़ा होता है।] इसके अलावा, भारत [सरकार] ने इस सत्र में कोई प्रतिनिधिमंडल तक नहीं भेजा और केवल ऑनलाइन भागीदारी की। 

समझौता वार्ता की दूसरी बैठक में भी भारत [सरकार] ने संधि के संभावित तत्वों - उद्देश्य, प्रमुख ज़िम्मेदारियाँ, नियंत्रण के उपाय व स्वैच्छिक दृष्टिकोण - पर कोई प्रस्तुतिकरण नहीं दिया। 

भारत [सरकार] के विरोधाभासी हित 

संधि के उद्देश्यों का एक नतीजा पेट्रोरसायनों, विशेषकर पॉलीमर्स व मिलाए जाने वाले ज़हरीले तत्वों, के उत्पादन पर अधिकतम सीमा लगाने के रूप में भी सामने आ सकता है। मगर यह उस वक़्त हो रहा है जब सरकार व उद्योग दोनों ही भारत में पेट्रोकैमिकल्स को लेकर बेहद उत्साहित हैं। 

सरकार विदेशी मुद्रा कमाने की नीयत से यह उम्मीद करती है कि देश पेट्रोकैमिकल उत्पादन के क्षेत्रीय केंद्र के रूप में उभरेगा। इस तरह ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में वर्तमान पेट्रोकैमिकल नीति व [तैयार की जा रही] वैश्विक प्लास्टिक्स संधि के घोषित उद्देश्यों के बीच विरोधाभास है। 

दिसंबर में पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत के पेट्रोकैमिकल बाज़ार में विकास की बहुत गुंजाइश है। उनके शब्दों में, "भारत में पेट्रोकैमिकल बाज़ार इस समय लगभग 190 अरब डॉलर का है, जबकि विकसित देशों की तुलना में पेट्रोकैमिकल उत्पादों की हमारी प्रति व्यक्ति खपत बहुत कम है। यह फ़र्क़ माँग में बढ़ोतरी व निवेश के मौक़ों के लिए काफ़ी संभावना प्रदान करता है।"

अधिक हाल में, 20 मई को एशिया पेट्रोकैमिकल इंडस्ट्री कांफ्रेंस में रसायन व खाद मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा, "भारत वैश्विक स्तर पर पेट्रोकैमिकल्स की नई मंज़िल के रूप में उभरने को तैयार बैठा है।" 

इसी सम्मेलन में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के एक वरिष्ठ अफ़सर ने कहा कि भविष्य में तेल की नई माँग में वृद्धि में 70% तक का योगदान कैमिकल्स का होगा। यह ध्यान देने योग्य है कि भारतीय रसायन उद्योग में लगभग 71.9% हिस्सा अलकली रसायनों का है (अप्रैल-जुलाई 2021 के आँकड़े), जबकि 2019 में प्रमुख प्राथमिक पेट्रोरसायनों के कुल उत्पादन में लगभग 59% हिस्सा पॉलीमर्स का था।  

कॉस्टिक सोडा एक प्रमुख अलकली रसायन है और यह बेहद ज़हरीले प्लास्टिक पॉलीमर, PVC (पॉलीविनाइल क्लोराइड), के उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। 

अरबों दाँव पर लगे हैं 

[मंत्री] पुरी के अनुसार पेट्रोकैमिकल्स के माध्यम से भारत में 87 अरब डॉलर [लगभग 7,134 अरब या 7 लाख करोड़ रुपये] से ज़्यादा के निवेश की संभावना है। 2021 में FICCI (फ़ेडेरेशन ऑफ़ इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री) ने, तटीय महाराष्ट्र पर 40 अरब डॉलर की रत्नागिरी रिफ़ाइनरी ऐंड पेट्रोकैमिकल्स लिमिटेड सहित आठ परियोजनाओं को मिलाकर, इसी स्तर के निवेश का अंदाज़ा लगाया था।  

2021 तक 17.1 अरब डॉलर के निवेश के साथ 11 पेट्रोकैमिकल्स परियोजनाएँ अस्तित्व में थीं। अभी इसका पाँच गुना निवेश होना तो बाक़ी है। 

उत्पादन को आउटसोर्स करना 

यह आँकलन इंटरनैशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की रपट 'पेट्रोकैमिकल्स का भविष्य' में दिए उस आँकड़े से मेल खाता है जिसके अनुसार 2050 तक प्रमुख रसायनों का उत्पादन यूरोप में कम हो जाएगा, उत्तरी अमरीका में स्थिर हो जाएगा और पश्चिमी एशिया में बढ़ेगा जहाँ अधिकांश उत्पादन एशिया प्रशांत क्षेत्र में होगा।   

IEA के अनुसार प्राथमिक रसायनों में इथाइलीन, प्रोपाइलीन, बेंज़ीन, टॉउलीन, मिश्रित ज़ाइलीन, अमोनिया और मेथानॉल शामिल हैं जिनका इस्तेमाल प्रमुख प्लास्टिक्स, कृत्रिम फ़ाइबर आदि बनाने में होता है।  

जहाँ अपनी बड़ी आबादी के कारण एशिया प्रशांत क्षेत्र में यक़ीनन बड़े बाज़ार हैं, हक़ीक़त यह भी है कि पेट्रोकैमिकल्स की प्रति व्यक्ति खपत यूरोप व उत्तरी अमरीका में कहीं ज़्यादा है। इस तरह एशिया प्रशांत क्षेत्र, जिसके पेट्रोकैमिकल उत्पादन में भारत का हिस्सा सबसे बड़ा है, विकास के नाम पर इस उद्योग का स्वागत करेगा और नतीजतन विकसित देशों [की सेवा] के लिए [पेट्रोरसायनों व प्लास्टिक रूपी] ज़हर को संभालेगा व इसका लेनदेन करेगा।   

विश्व के कुल पेट्रोकैमिकल्स का 99% हिस्सा जीवाश्म ईंधन से उत्पादित होता है। वैश्विक स्तर पर पेट्रोकैमिकल उद्योग कुल उद्योग-क्षेत्र के 18% व कुल दहन के 5% कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है। 

अपने पूरे जीवन-काल के दौरान प्लास्टिक्स का कार्बन प्रभाव (कार्बन फ़ूटप्रिंट) बेहद संकटपूर्ण स्तर का होता है और 2050 तक यह ईंधन के रूप में कोयला इस्तेमाल करने वाले लगभग 1,640 बिजली संयंत्रों के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर हो जाएगा।   

टेक्नोलॉजी के स्तर पर 80% रिफ़ाइनरी तो पहले-से ही कच्चे तेल से ऊर्जा व पेट्रोरसायनों के उत्पादन का काम कर रही हैं। हाल ही में हरित ('ग्रीन') रिफ़ायनरीज़ नाम से तकनीकी नवाचार का ढोल पीटा जाना शुरु हुआ है। इसका मतलब यह बताया जाता है कि इन रिफ़ायनरीज़ को चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा आंशिक रूप से अक्षय स्रोतों से प्राप्त की जाएगी। यह एक मिथ्या के अलावा कुछ भी नहीं है क्योंकि कोई भी ऐसी चीज़ जो जीवाश्म ईंधन जलाती है या उन्हें चारे के रूप में इस्तेमाल करती है 'हरित' नहीं हो सकती है।   

बड़े खिलाड़ी लाभ में रहेंगे 

यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि मुट्ठीभर बड़े खिलाड़ी मुनाफ़ा काटने की स्थिति में हैं। भारत में पेट्रोरसायन उद्योग का स्वरूप अल्पाधिकारी (ओलिगोपोलिस्टिक) [यानी बाज़ार केवल कुछ कंपनियों के कब्ज़े में] है। कच्चे तेल की 11 रिफ़ायनरीज़ हैं और इनके नीचे पेट्रोरसायन व मिश्रणों के लगभग 40 उत्पादक।  

इन 11 में से 3 बहुत बड़े खिलाड़ी - रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, इंडियन पेट्रोकैमिकल्ज़ कॉर्पोरेशन लिमिटेड और गैस अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड - पूरे मैदान पर छाए हुए हैं। इनमें भी अकेले रिलायंस देश के कुल पेट्रोकैमिकल पॉलीमर उत्पादन का 70% हिस्सा तैयार करती है और कम घनत्व वाली पॉलीइथाइलीन (LDPE) जैसे पॉलीमर के उत्पादन में एकाधिकारवादी स्थिति में है। यानी, पेट्रोकैमिकल उत्पादन की अधिकतम सीमा तय होने या इसमें गिरावट आने की स्थिति में इन कंपनियों को सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा।  

प्लास्टिक उपभोग के संदर्भ में भारत [सरकार] ने इसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के उद्देश्य से कुछ कमज़ोर प्रयास किए हैं। अगस्त 2019 को सिंगल-यूज़ प्लास्टिक्स के ख़िलाफ़ एक राष्ट्रीय आंदोलन का आह्वान किया गया। अक्टूबर 2021 में उद्घाटित स्वच्छ भारत मिशन 2.0 में भी प्लास्टिक सहित अन्य कूड़े के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।  

अंत में, पिछले वर्ष 1 जुलाई को भारत [सरकार] ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक्स पर प्रतिबंध की घोषणा की। ख़ुद उद्योग जगत की स्वीकारोक्ति के अनुसार, यह प्रतिबंध कुल प्लास्टिक खपत के केवल 2%-3% को निशाना बनाता है। कुछ ख़ास तरह के सिंगल-यूज़ प्लास्टिक्स पर प्रतिबंध ही संभवतः प्लास्टिक उपभोग को नियंत्रित करने की एकमात्र [ईमानदाराना] कोशिश है। 

हालाँकि यह प्रतिबंध भी सड़क विक्रेता व छोटे दुकानदारों जैसे अनौपचारिक क्षेत्र में प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने पर केंद्रित है, जबकि तेज़ी से बढ़तीं उपभोक्ता वस्तुओं की निर्माता कंपनियाँ सिंगल-यूज़ प्लास्टिक्स के एक ख़तरनाक रूप सैशे (पाउच) को धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जा रही हैं। 

अनमने उपाय 

यह देखते हुए कि भारत में हर साल 35 लाख टन प्लास्टिक कूड़ा पैदा होता है और यह मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है, सरकार द्वारा उठाए गए क़दम अनमने-से लगते हैं और प्लास्टिक्स प्रदूषण की समस्या की जड़ को निशाना नहीं बनाते हैं।  

उदाहरण के लिए, पुनः उपयोग की व्यवस्था करने की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं। इस स्थिति को निर्माताओं को ज़िम्मेदार बनाने की कमज़ोर नीति [यानी उन्हें ज़िम्मेवार नहीं ठहराना] से जोड़ कर देखने से यह साफ़ होता है कि तेज़ी से बढ़तीं उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियाँ प्लास्टिक्स प्रदूषण संकट निर्मित करने के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह बरी हो जाती हैं, जबकि उनका मुनाफ़ा रात-दिन बढ़ता रहा है।   

पेट्रोकैमिकल उद्योग का केंद्र बनने की चाहत, तबाही की ओर ले जाने वाले अति-उपभोक्तावाद [ख़रीदो ख़रीदो, और ख़रीदो] के साथ गठजोड़ और प्लास्टिक उपभोग के सार्थक विकल्प तैयार करने के प्रति उदासीनता, सब सरकार की नीति का ज़ोर साफ़ करते हैं।   

प्लास्टिक्स पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले अहम अंतर्राष्ट्रीय तत्व हैं और उस जलवायु संकट को बनाने में भी महत्त्वपूर्ण रूप से ज़िम्मेदार हैं जो अंततः लोगों को प्रभावित करेगा। 

देश के नेतृत्व को फ़ैसले लेते वक़्त शायद लोगों और हमारे ग्रह की चिंता करने की ज़रूरत है, नाकि निजी मुनाफ़े और विशाल निर्माण को देश के विकास का पर्याय मानने की।  

स्वाथि सेषाद्रि सेंटर फ़ॉर फ़ाइनेंशियल अकॉउंटबिलिटी में डायरेक्टर (प्रोग्राम्स) व टीम लीड (तेल व गैस) के पद पर कार्यरत हैं। यह लेख As Negotiation on Global Plastics Treaty Gets Underway, India Should Reconsider Contradictory Stance शीर्षक के साथ मूल रूप से स्क्रॉल  - Scroll.in - पर 11 जून को प्रकाशित हुआ था।

Monday, 24 April 2023

साल 2022-23 और इतिहास की कक्षा: दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की एक बारहवीं कक्षा की झलक


 2021-22 में छात्राओं के इस समूह ने कक्षा XI में प्रवेश किया। लॉकडाउन के दौरान इनकी कक्षा X की पढ़ाई न के बराबर हुई थी। कक्षा XI शुरु होने के कुछ महीनों बाद ही नियमित पढ़ाई शुरु हो पायी थी। टर्म II में छात्राओं ने इटली में मानवतावादी विचारों के उदय, ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत (अब यह अध्याय एनसीईआरटी ने 'रैशनलाइज़' कर दिया है) और उत्तर अमरीका में यूरोपीय साम्राज्यवाद के कारण मूल निवासियों के विस्थापन पर थोड़ा समय गुज़ारा था। और लगभग दो साल बाद इतना ही समय एक-दूसरे के साथ गुज़ारा।

अप्रैल 2022 से कक्षा XII की पढ़ाई शुरु हुई। लम्बे समय बाद नियमित रूप से किताब पढ़ने, कक्षा में सवाल-जवाब करने, प्रश्न-उत्तर लिखने का समय मिलने लगा। (यह तुलनात्मक है क्योंकि अब दिल्ली सरकार के स्कूलों में पढ़ाने का समय मुश्किल से ही मिल पाता है।) दोस्तियों को भी बनने का समय मिलने लगा।

उत्तर-पूर्व जिले की इस कक्षा में हिन्दू:मुस्लिम छात्राओं का अनुपात 70:30 है (सैक्शन ए में विद्यार्थियों का चयन उत्तम परिणाम और अंग्रेजी माध्यम के आधार पर होता है) जबकि पूरे स्कूल में छात्राओं का ये अनुपात लगभग 50:50 है।

 

इन दिनों पाठ 3 'बंधुत्व, जाति तथा वर्ग' का परिचय चल रहा था

हमारी कक्षा में गेस्ट के रूप में एक युवा महिला वकील आईं थीं। छात्राएँ उनसे अलग-अलग तरह के सवाल पूछ रही थीं। अचानक एक छात्रा ने पूछा, 'मैम ग़लत बात बोलने के लिए मौलवी क्यों गिरफ़्तार है जबकि नुपुर शर्मा भागी हुई है?'

इससे पहले कि वो जवाब दे पाती, बात आगे बढ़ चुकी थी। एक अन्य छात्रा ने जवाब दिया, 'नुपुर शर्मा ने वही बोला जो सच था।' चंद मिनटों में कक्षा में कुछ शब्द सुनाई दिए, 'ज़बान संभालकर बात करो', 'फोड़ देंगे-मार देंगे', 'मस्जिदों के नीचे शिवलिंग होगा तभी तो बोल रहे हैं', 'इनके मदरसों में यही होता है'। राज्य से पूछा गया सवाल, एक-दूसरे की तरफ़ मुड़ चुका था।

8 सालों में इस शिक्षिका के लिए लड़कियों की भाषा में ऐसा 'इनका-उनका', हिंसा और प्रत्यक्ष सांप्रदायिक कड़वाहट का यह पहला अनुभव था। लेकिन इस पल ने कक्षा को आगे के सत्र के लिए मुक्त भी कर दिया।

कभी-कभी शिक्षकों के पास न उदास होने का समय होता है और न निराश होने का हक़। जिस पेड़ पर मीठे फल लगें, वो पेड़ सींचना अभी बाकी था। उस कक्षा में सिर्फ़ एक सवाल पूछकर बात ख़त्म की गई - कक्षा में कितने विद्यार्थियों को लगता है कि ऐसे सवालों पर बात होनी चाहिए? ज़्यादातर विद्यार्थियों ने कहा, 'होनी चाहिए'। कितनी छात्राएं चाहती हैं 'हम इस विवाद की पड़ताल करें और जानें कि मौलवी ने क्या कहा और नुपुर शर्मा ने क्या कहा?' अब कुछ विद्यार्थियों ने चुप्पी रखी।

स्कूल का दिन ख़त्म होने से पहले पता लगा कि जिस छात्रा ने नुपुर शर्मा वाला सवाल शुरु किया था, उसे कुछ शिक्षिकाओं से विवादित टॉपिक उठाने के लिए डाँट पड़ चुकी थी। एक शिक्षिका ने यह कहकर चिंता जता दी थी कि 'यह इनका (मुस्लिम बहुल) इलाका है, कहीं कोई बात न हो जाए।'

क्लास और शिक्षिका बेचैन थे। कुछ और न सूझने पर शिक्षिका ने अंतिम पीरियड में छात्राओं से अपने अनुभव लिखने को कहा। सवाल थे, 'आज हमारी कक्षा में क्या हुआ? आपको क्या सही लगा और क्या सही नहीं लगा?' 26 में से 18 छातत्राओं ने यह लिखा कि उन्हें कक्षा में एक-दूसरे के धर्म पर कही गई बातें अच्छी नहीं लगीं। उनके शब्दों में, "एक दूसरे के धर्म को ग़लत समझा, किसी की कम्युनिटी के बारे में नहीं बोलना चाहिए, लड़ाई की बात नहीं करनी चाहिए, लड़ाई न करके बात ख़त्म करो"; एक छात्रा ने लिखा, "मौलवी ने ग़लत बोला नाकि नुपुर शर्मा ने"। चार छात्राओं ने लिखा कि वो इस मुद्दे पर बात करना नहीं चाहेंगी (हालांकि अगले कुछ दिन चर्चा हुई)। एक छात्रा ने घटना का कोई ज़िक्र नहीं किया और गेस्ट के आने की ख़ुशी जताई।

पर इन 18 छात्राओं के विचार उन शब्दों का शोर कम नहीं कर पा रहे थे जो क्लास में बोले जा चुके थे। अगला दिन गुज़र गया। कक्षा का माहौल सामान्य लगा। शिक्षिका चाहती थी कि विद्यार्थी इतिहास बोध, वस्तुपरकता और सौहार्द को जाँचे और सीखें। लेकिन कैसे?

दो दिन बाद, कक्षा में बात शुरु हुई।

पहले सवाल पर लौटते हुए शिक्षिका ने पूछा - छात्रा का सवाल 'नुपुर शर्मा को क्यों गिरफ़्तार नहीं किया?' किससे था? हमने पहचाना कि वो राज्य से था। फिर हमने उसे हिन्दू मुस्लिम के बीच का सवाल क्यों बनाया? हमने बात की कि जब छात्र शिक्षक से और नागरिक राज्य से सवाल पूछते हैं तो वो उन सवालों से कैसे अलग होते हैं जो छात्र या नागरिक एक-दूसरे से पूछते हैं।

इसके बाद इस दिन हम अपनी पाठ्यचर्या पर वापस लौट आए।

तीसरे दिन हमने 'मौलवी और नुपुर शर्मा' के उपलब्ध बयानों पर बात की।

कक्षा में पहला सवाल था, 'मान लें कि हमारी कक्षा ही समाज है। इन पाँच बच्चों को लगता है 'यहाँ पहले मंदिर था' और दूसरे पाँच बच्चों का कहना है 'यहाँ मंदिर नहीं था और मस्जिद है'; तो आप इस विवाद को कैसे सुलझाएंगे?' चर्चा लम्बी गई। सब साथ में स्रोत सोच रहे थे।

कक्षा में दूसरा सवाल था, 'क्या शिवलिंग की पूजा करने के लिए किसी पर तंज़ कसा जा सकता है?' हमने पिछले डेढ़ साल में पढ़े शिकारी, मेसोपोटामियाई, रोमन, अरब बेदुई, वैदिक, पौराणिक आदि समाजों के देवी-देवताओं को याद किया और इस कड़ी में शिवलिंग और कामाख्या मंदिर में योनी की पूजा के तथ्य को स्थापित किया। कई बार भारतीय संस्कृति की विविधता के उदाहरण गृह-विज्ञान की कक्षा से चलकर इतिहास की कक्षा में क्लाइमैक्स पलट देने वाली एंट्री लेते थे।

कक्षा में तीसरा सवाल था, 'क्या 1400 साल पहले कम उम्र की लड़कियों के विवाह बड़ी उम्र के पुरुषों से होते थे? अगर हाँ, तो ये उस समाज के बारे में क्या बताता है? क्या हम अन्य समाजों में भी ज़्यादा उम्र के अंतर वाले, बहुपत्नी राजनीतिक विवाह जानते हैं? क्या आज यह सोच सिर्फ़ भारत में बदली है या लगभग सब जगह बदल रही है?'

जब यह सवाल आया कि आज के नज़रिए से अतीत को जज करने के क्या फायदे और नुकसान होते हैं, तो हम अपने अध्याय के और नज़दीक जा सके जिसमें हम 'विवाह के ब्राह्मणीय व गैर-ब्राह्मणीय नियम ' पढ़ रहे थे।

आज की कक्षा का अंत इस टिप्पणी से हुआ कि अगर हम, बच्चे, इन जटिल सवालों पर आराम से बात कर सकते हैं तो वयस्क इतना ग़ुस्सा और हिंसा क्यों कर रहे हैं।

अगले 2-3 दिन पाठ्यचर्या जारी रही। इसलिए भी क्योंकि आगे का रास्ता नहीं समझ आ रहा था। दिमाग़ में 'इनके-उनके' घूम रहे थे पर कहीं से तो शुरु करना था।

लगभग एक हफ़्ते बाद कक्षा में तीन कहानियाँ कही गईं। पहली जर्मनी के नाज़ीवाद की, दूसरी दक्षिण अफ्रीका के नस्लभेद की और तीसरी श्री लंका के सिंहली वर्चस्व की। बोर्ड पर तीनों कहानियों के लिए दो सूचियाँ बनाई गईं - 1.किन साक्ष्यों के आधार पर इन राज्यों पर यह इल्ज़ाम है कि इन्होंने अपनी जनता के बीच भेदभाव किया? और 2. राज्य ने ऐसा क्या तर्क दिया कि देश की बहुसंख्या ने यह भेदभाव होने दिया?

1933-38 के बीच पास हुए कानूनों की वो सूची पढ़ी गई जो एक-एक करके यहूदियों के घर, सम्पत्ति, पेशे, स्कूल, अस्पताल, सार्वजनिक स्थल का अधिकार और अंततः जीने का अधिकार छीन रहे थे। अब नाटक करते हुए शिक्षिका ने कहा, 'शायद आपको यह सुनकर अच्छा न लगे, लेकिन क्या आप जानते हैं, जर्मनी प्रथम विश्व युद्ध में यहूदियों की वजह से हारा, ये देशद्रोही, ये लालची हैं, हमसे घुलते-मिलते नहीं, हमारी पवित्र नस्ल को गन्दा कर रहे हैं। ये गद्दार है और इसलिए हम इन्हें जर्मनी का नहीं मानते।'' छात्राएँ टेंशन में लगीं। सवाल था कि क्या कोई नस्ल गद्दार या लालची हो सकती है? क्या कुल 0.75% यहूदी जर्मनी की सभी समस्याओं का कारण हो सकते थे? 

अब हमने दूसरी कहानी पढ़ी।

1940-50s में श्रीलंकन राज्य द्वारा बनाए गए ऐसे कानूनों की सूची पढ़ी जिनसे तमिलियन लोगों की नागरिकता छिन गई और सिंहली भाषा और बौद्ध धर्म को प्राथमिकता दी गई। नाटक करते हुए शिक्षिका ने कहा, 'शायद आपको यह सुनकर अच्छा न लगे लेकिन हमारी मजबूरी समझिए। श्रीलंका सिन्हलियों का देश है। तमिलियन भारत से आए थे। उनके पास भारत है। सिंहली बौद्धों के पास श्रीलंका के अलावा और कोई देश नहीं है। आप बताइए क्या हम ग़लत हैं?' छात्राएँ चुप थीं। सवाल कई थे; चूंकि तमिलियन श्रीलंका के मूल निवासी नहीं हैं तो क्या श्रीलंका सिर्फ़ सिन्हलियों का देश माना जाए तमिलियन का नहीं? या क्या श्रीलंका सिन्हलियों का ज़्यादा है और तमिलियन का कम? किसी को उस देश का कहलाने के लिए कितना पुराना होना चाहिए? क्या कक्षा XI में दाखिला लेने वाली छात्रा का इस कक्षा पर उतना ही अधिकार है जितना कि कक्षा VI में दाखिला लेने वाली छात्रा का या कम? अगर आज श्रीलंकाई तमिल भारत आ जाएँ तो क्या यहाँ उनके लिए ज़मीन और नौकरियाँ इंतज़ार कर रही हैं या उन्हें यहाँ शरणार्थी बनकर रहना होगा?

इस सवाल का अभाव अब खल रहा है, फिर तो किसी इंसान को मज़दूरी करने के लिए किसी अन्य राज्य और देश में जाना ही नहीं चाहिए क्योंकि उसे कभी वहाँ का माना ही नहीं जाएगा। फिर भी लोग क्यों जाते हैं या तमिलियन क्यों गए थे? या उन्हें जाना पड़ता है।

अब तीसरी कहानी पढ़ी गई।

हमने 1950s में दक्षिण अफ्रीका राज्य द्वारा बनाए गए ऐसे कानूनों की सूची पढ़ी जिनके बाद गोरे और अश्वेत दक्षिण अफ्रीकियों के अलग जनसंख्या रजिस्टर बनाए गए। उनके वाहन, स्कूल, नौकरियाँ, मोहल्ले, वोट अलग कर दिए गए। आपसी दोस्तियाँ ख़त्म और शादियाँ गैर-कानूनी कर दी गईं। नाटक करते हुए शिक्षिका ने कहा, 'शायद आपको यह सुनकर अच्छा न लगे, लेकिन यही ईश्वर की मर्ज़ी थी। ईश्वर भी अपने रेवड़ को अलग-अलग रखता है। ईश्वर ने हमारी नस्ल को यह ज़मीन चुन कर दी है और हमें यह ज़िम्मेदारी दी है कि हम पिछड़ गई पीढ़ियों को अंधकार से निकाल सकें। इसी में सबका भला था।' छात्राएँ मौन असहमति व्यक्त कर रही थीं। सवाल था कि क्या मनुष्य प्रजाति में कोई नस्ल बेहतर और कोई कमतर, कोई साफ और कोई गंदी हो सकती है। फिर राज्य ने ऐसे कानून क्यों बनाए?

कक्षा का अंत इस बात से हुआ, 'ये तीनों कहानियाँ बताती हैं कि जब हर देश में एक से ज़्यादा समुदाय होते ही हैं तो ये झगड़े कितने सच्चे हैं?

एक दौर ऐसा आ सकता है जब कि दो प्रमुख समुदायों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाकर प्रस्तुत किया जाए। नफ़रत और डर के तर्क भी दे दिए जाएँगे। हम कहाँ खड़े होना चाहेंगे?'

अगले कुछ दिन कुछ और सवाल भी आए:

अगर पूरी दुनिया को 7-8 टुकड़ों में बाँट दें और अलग-अलग देश बना दें और एक देश में एक ही धर्म के लोग रहने लगें तो क्या झगड़े ख़त्म हो जाएँगे? (तुरंत जवाब आया, फिर वो किसी और चीज़ पर लड़ेंगे।)

अगर सारे इंसान अफ्रीका से निकले तो सबका एक ही धर्म, एक ही भाषा क्यों नहीं हुई?

अगर सबसे पुराने मानव कंकाल अफ्रीका में मिले हैं, तो क्या आज अफ्रीका के लोगों को इस बात का घमंड होना चाहिए कि वो इंसानी नस्ल के जनक हैं?

हम हिन्दू मुस्लमान पैदा होते हैं या बनते हैं?

हम अपने व्हाट्सऐप्प ग्रुप खुद चुनते हैं या हम इनमें चुन लिए जाते हैं?

 

हमने अध्याय 4 (विचारक, विश्वास और इमारतें) के अंत में प्रश्न किए।

क्या वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज की परम्परा थी? या वर्ण व्यवस्था पर सवाल उठाना भारतीय समाज की परम्परा थी? या ये दोनों?

क्या वैदिक/बौद्ध/जैन/हिन्दू/भौतिकवादी/ईसाई/इस्लाम/सिख आदि मत भारतीय समाज की परम्परा है? या इनके बीच का समन्वय भारतीय समाज की परम्परा हैं? या इनके बीच का संघर्ष भारत की परम्परा है? या ये सभी हमारी परम्परा हैं?

 

आज पाठ 8 'किसान, जमींदार और राज्य' (मुग़ल काल) शुरु हुआ था

पाठ शुरु होने से पहले सवाल आ चुके थे, 'क्या मुग़ल भारतीय थे? क्या मुग़लों ने भारत को लूटा? क्या बाबरी मस्जिद राम मंदिर तोड़कर बनी थी?'

पहले सवाल के जवाब में विद्यार्थियों को उनके द्वारा पढ़े गए पाँच राज्यों के बीच तुलना करनी थीं; कुषाण राज्य, मौर्य राज्य, मोहम्मद ग़ौरी का राज्य, मुग़ल राज्य, ब्रिटिश राज्य। उन्हें बताना था कि वो किन राज्यों को देसी-विदेसी कहेंगे और क्यों और किन्हें भारतीय-औपनिवेशिक कहेंगे। हम पहचान रहे थे कि मुग़ल साम्राज्य ब्रिटिश साम्राज्य की तरह औपनिवेशिक नहीं था जो यहाँ से मुनाफ़ा कमाकर/लूटकर कहीं और भेजता था। अगला सवाल स्वाभाविक था, 'फिर मुग़लों को विदेशी क्यों कहा जाता है?'

बाबरी मस्जिद वाले सवाल के लिए दोस्तों ने स्रोत और हिम्मत दोनों ढुन्ढवाए। चर्चा की शुरुआत सवाल से हुई, 'अगर आप पुरातत्ववेत्ता होतीं तो कैसे ढूंढती कि क्या 500 साल पहले बाबरी मस्जिद राम मंदिर तोड़कर बनी थी? 500 साल पहले का घटनाक्रम कैसे पता करतीं?'

हाल में पढ़े विजयनगर साम्राज्य के पाठ ने मदद की। विजयनगर की खोज में इस्तेमाल हुए स्रोतों से सीखते हुए हमने सूची बनाई। क्या उस काल के राजकीय या क्षेत्रीय या यात्रियों द्वारा लिखे ग्रन्थ ऐसी किसी घटना का ज़िक्र करते हैं, क्या संबंधित अभिलेख मिले हैं? हमने तय किया कि इंटरनेट पर ढूंढने की कोशिश करेंगे कि किस तरह के स्रोत प्राप्त हुए हैं।

1-2 दिन बाद अपनी सीमाओं को पहचानते हुए हमने कक्षा में एएसआई की 2003 की रिपोर्ट को इस्तेमाल करने का फैसला किया और 574 पन्नों की रिपोर्ट के कुछ अंश पढ़े। शिक्षिका ने रिपोर्ट की अपनी रीडिंग से छात्राओं को बताया कि यह रिपोर्ट लिखती है, 'सोलहवीं शताब्दी की मस्जिद के आधार में बारहवीं शताब्दी के ढांचे, दीवार, स्तम्भ आधार, ईंटें, आदि मिले हैं।' इसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 'बाबरी मस्जिद की ज़मीन के नीचे गैर-इस्लामिक ढांचे के अवशेष मिले हैं'। (जैसे कोई मंदिर या बौद्ध स्थल?) एएसआई रिपोर्ट पर विभिन्न मत पर बात नहीं हुई।

अब सवाल यह उठता है कि 500 साल मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी या मंदिर पहले से टूटा हुआ था और उस स्थल पर मस्जिद बनाई गई।

सवाल को पुन: पूछा गया, 'अगर हमारी स्कूल की इमारत के नीचे अन्य पुरानी इमारत के सबूत मिलें तो क्या इससे यह भी साबित हो जाता है कि यह स्कूल उस इमारत को तोड़कर बनाया गया होगा या ऐसा भी हो सकता है कि जब यह स्कूल बना होगा तब पिछली इमारत पहले से टूटी हुई थी? हमने सर्वोच्च न्यायालय की इस बात को रेखांकित किया, 'एएसआई रिपोर्ट यह साबित नहीं करती कि पुरानी इमारत कैसे टूटी। उसके टूटने और मस्जिद के बनने के बीच 400 सालों के फ़र्क़ के बारे में भी हम नहीं जानते।'

यह सवाल नहीं आया, 'अगर एएसआई और सर्वोच्च न्यायालय को बाबर द्वारा मंदिर तोड़ने के सबूत नहीं मिले हैं तो फिर लोग किन सबूतों के आधार पर कहते हैं कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई?'

जो सवाल झाँक रहा था पर बाहर ही खड़ा रह गया वो था, 'अगर 500 साल पहले मंदिर तोड़ना ग़लत था तो 30 साल पहले मस्जिद तोड़ना क्या था?'

भले ही इतिहास को लेकर बच्चे कड़क को जाएँ लेकिन भविष्य को लेकर बहुत स्पष्ट होते हैं। भविष्य को लेकर इतनी बुलंद आवाज़ में बोले कि उन्हें ऐसे झगड़े नहीं चाहिए कि अन्य स्वर सुनाई नहीं पड़ा। शायद रहा हो।

 

इन दिनों '1857 का विद्रोह' अध्याय चल रहा था

एक छात्रा ने पाँच महीनों में पहली बार सवाल पूछा, 'मैम, आजकल वो जो केस चल रहा है, उसके बारे में लोग कह रहे हैं, मुस्लिम लड़के ने किया..लड़की को मारने वाला.. क्या ऐसा दूसरे देशों में भी होता है?'

उसके शब्दों में थोड़ी अस्पष्टता थी लेकिन भाव में नहीं। शायद वो यह जानना चाहती थी कि लोग ऐसा क्यों कह रहे हैं कि सिर्फ़ मुस्लिम ऐसा करते हैं। क्या और लोग ऐसी हिंसा नहीं करते? शिक्षिका ने कक्षा से पूछा कि वे इस केस के बारे में क्या जानते हैं और क्या जानना चाहेंगे। घटनाक्रम जानने के बाद सवाल-जवाब शुरु हुए। दो सवाल रखे गए:

i. इस हिंसक घटना के होने के पीछे क्या-क्या कारण हो सकते हैं?

ii. क्या यह ऐसी एकलौती घटना है?

पहले सवाल के जवाब में कक्षा ने मिलकर बोर्ड पर संभव कारणों को लिखा: यह घटना इसलिए हुई क्योंकि यह एक हिन्दू-मुस्लिम जोड़ी थी? या इसलिए क्योंकि लड़की हिन्दू और लड़का मुस्लिम था? या इसलिए क्योंकि हमारे समाज में अक्सर लड़के ग़ुस्से में लड़की को थप्पड़ से लेकर जान तक से मार देते हैं? या इसलिए क्योंकि लिव इन सम्बन्ध में होने के कारण लड़की अकेली और कमज़ोर थी? या कोई और कारण?

दूसरे सवाल के जवाब में एक छात्रा ने एक वीडियो का ज़िक्र किया जिसमें एक व्यक्ति ने 'लव जिहाद' के अनेक उदाहरण बताए थे और समझाया था कि मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों को फँसाते हैं। कुछ उदाहरण बॉलीवुड से थे। इसके बाद एक अन्य छात्रा ने कक्षा में पहली बार भाग लेते हुए बताया कि 'राशिद अली' नामक व्यक्ति का वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें उसने कहा है कि 'हमें बचपन से मारना सिखाया जाता है और आदमी 35 तो क्या 36 टुकड़े भी कर सकता है।' यह सुनकर कक्षा में उसकी बात के लिए घृणा उभरी। (हैरानी भी उभरी जब 2-3 दिन बाद हमें पता लगा कि वो व्यक्ति मुसलमान नहीं था बल्कि उसने नफ़रत फैलाने के लिए झूठी पहचान बनाकर वो वीडियो बनाया था।)

कक्षा का समय पूरा होने वाला था। आज की चर्चा का अंत इस सवाल से हुआ कि 'ऐसी हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए क्या करना चाहिए?' हमने बोर्ड पर लिखे कारणों के सामने उनसे उपजे उपाय लिखे। एक, हिन्दू और मुसलमान लड़के-लड़कियों को प्रेम सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए। दो, हिन्दू लड़की को मुसलमान लड़के से शादी नहीं करनी चाहिए। तीन, लड़कों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए कि वे किसी भी हालत में किसी भी लड़की पर हाथ नहीं उठा सकते, चाहे वो उनकी बहन हो या गर्लफ्रेंड या पत्नी या कोई अन्य। चार, लड़कियों को कभी लिव इन संबंधों में नहीं जाना चाहिए। पाँच, लिव इन संबंधों को समाज और कानून की सुरक्षा मिलनी चाहिए। अधिकतम मत तीसरे उपाय के साथ थे।

अगले दिन के लिए हमने तय किया कि गूगल पर जाकर चेक करेंगे कि क्या बॉलीवुड में हिन्दू-मुस्लिम शादियों के ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें लड़की मुस्लिम और लड़का हिन्दू हो। इस दिन दो बिंदु चर्चा में आए, क्या फ़र्क़ है जब सैफ अली खान ने करीना कपूर से शादी की और उसकी बहन सोहा अली खान ने कुनाल कपूर से शादी की? दूसरा, अलग धर्मों और अलग जातियों के लोगों के बीच प्रेम और शादी करना सही है या ग़लत? कुछ दिनों बाद हम अपने उस सवाल पर वापस लौटे - क्या ऐसे और भी केस होते हैं? इंडियन एक्सप्रेस की कतरनों से हमने छ: और केस पढ़े (चेन्नई, दिल्ली, मुंबई, गज़ियाबाद, जयपुर)। कुछ नए सवाल उभरे - जैसे, समाज में इतनी हिंसा क्यों है और इन घटनाओं को मीडिया ने उतना क्यों नहीं उठाया जितना श्रद्धा-आफ़ताब केस को?

 

आज 'महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन' शुरु हुआ

कुछ छात्राएँ एक साल से सवाल पूछ रही थीं, 'जब आज़ादी की लड़ाई में अनेक लोगों का हाथ था तो सिर्फ़ गाँधी को ही सबसे ज़्यादा याद क्यों किया जाता है? उन्हें ही राष्ट्रपिता क्यों कहते हैं? उनकी फोटो नोट पर क्यों छापी जाती है?'

इसमें कुछ और सवाल भी जुड़ गए। गाँधी जी अच्छे थे या बुरे? अगर गाँधी जी इतने लोकप्रिय थे, तो प्रधान मंत्री क्यों नहीं बने? गाँधी जी खुद अंग्रेज़ों की शिक्षा लेकर आए थे तो उनकी सोच और व्यवहार कैसा था? गाँधी जी का 'main motive' (मुख्य मक़सद) क्या था? कहते हैं गाँधी जी बात-बात पर जेल चले जाते थे और उनके साथ जेल में अच्छा व्यवहार होता था। क्या यह सच है? भगत सिंह को फांसी क्यों हुई और आज लोग उन्हें क्यों याद करते हैं? गाँधी जी ने भगत सिंह की फांसी क्यों नहीं रोकी? गाँधी दुश्मनों से प्यार करने की बात क्यों करते थे?

कुछ सवाल अलग किस्म के थे: गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका क्यों गए? दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने गोरे-काले भेद को ख़त्म करने के लिए क्या किया? सत्याग्रह क्या होता है? आज़ादी की लड़ाई कैसे हुई? दाण्डी मार्च क्यों हुआ? चौरी चौरा क्या था? लोग गाँधी को इतना क्यों मानने लगे थे? और कौन से स्वतंत्रता सेनानी थे? आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं की क्या भूमिका थी? जब अंग्रेज़ भारत आए तो भारत के लोगों ने क्या किया? अंग्रेज़ों ने भारत में जो किया, क्या वो सब सही था या ग़लत?

पिछले सालों के मुकाबले गाँधी की मंशा और योगदान पर सवाल उठाते प्रश्न ज़्यादा भी थे और नए भी। पाठ 13 (महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन) विद्यार्थियों के सामने गाँधी के भाषण और लेख-पत्र रखकर उनकी प्राथमिकताओं की झलक देता है। पाठ यह समझा पाता है कि गाँधी का योगदान यह था कि उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ चल रही लड़ाई से ज़ ज़मींदार, किसान, मालिक, मज़दूर, 'हरिजनों', महिलाओं को जोड़ा। उसे राष्ट्रीय बनाया। और इतना कहकर रुक जाता है।

आज़ादी की लड़ाई के बारे में विद्यार्थियों की जिज्ञासा अक्सर इतने से संतुष्ट नहीं होती। उन्हें अन्य बहुत से लोगों, घटनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में जानना होता है।

अध्याय का अंत विभाजन के दिनों में गाँधी जी की यात्राओं और उनकी हिन्दू-मुस्लिम शांति और सौहार्द की अपील से होता है। और यहाँ से शुरु होता है अगला सफर: विभाजन को समझना। 'क्या बंटवारा गाँधी जी ने करवाया था? गोडसे ने गाँधी को गोली क्यों मारी? गोडसे ने गोली मारने के बाद हाथ क्यों जोड़े?'

ब्रिटिश भारत का बंटवारा क्यों हुआ? बहुत से विद्यार्थी यह सवाल सालों तक संभाले रखते हैं और इस सवाल का जवाब खोज पाना उनका हक़ है। फिर भी पहले दो साल सीबीएसई ने यह अध्याय कटवा दिया और अब एनसीईआरटी ने भी यह अध्याय हटा दिया। इसमें विभाजन के एक नहीं, अनेक कारणों को उजागर किया गया है। क्या विडंबना है! एक तरफ़ युवाओं को दिन-रात विभाजन सिखाया जा रहा है और दूसरी तरफ़ उन्हें विभाजन पढ़ने नहीं दिया जा रहा। शायद इसलिए ही वो खुद अपने कोर्स का निर्धारण कर रहे हैं।

 

एक दिन

हमने तय किया कि अब हम कुछ दिन वो खबरें क्लास में लाएँगे जो धर्म से इतर होंगी, जैसे लोगों के काम धंधों की, शिक्षा, इलाज की। शायद उन्हें घर में टीवी न्यूज़ चैनल पर ऐसी खबरें कम मिल पाईं।

फिर आई बीबीसी फ़िल्म और रामचरितमानस विवाद की ख़बर। बात हुई ..

शिक्षिका ने दो बड़े गोले बोर्ड पर बनाए। दोनों गोलों का एक हिस्सा ओवरलैप कर रहा था। एक हिस्से में लिखा - हिन्दू, एक में लिखा मुसलमान। दोनों गोलों के अंदर एक-एक छोटा गोला बनाया। उनके अंदर लिखा कट्टर हिन्दू, कट्टर मुस्लमान। बड़े गोले के बारे में शिक्षिका ने कहा, 'सभी धर्मों में ज़्यादातर लोग अपनी मान्यताओं को ज़रूरी मानते हैं। साथ में यह भी मानते हैं कि जैसे हमारी मान्यता, वैसे दूसरे की मान्यता, इसलिए उन्हें दूसरे के धर्म और मान्यताओं से कोई समस्या नहीं होती। ओवरलैपिंग हिस्से के बारे में कहा कि ये वो लोग होते हैं जो धार्मिक पहचान को निर्धारक नहीं मानते। इनके अनुसार हिन्दू-मुसलमान में मौलिक फ़र्क़ नहीं है। दोनों आस्तिक समुदायों के लोग एक जैसे ही होते हैं।

लेकिन हर समुदाय में एक हिस्सा ऐसा होता है (छोटा गोला) जो धार्मिक पहचान को इतना एक्सक्लुसिव/विशिष्ट मानता है कि इनके अनुसार यही पहचान सब कुछ है इसलिए अलग धर्म के लोग अलग ही होते हैं। वे दूसरे समुदाय को अपना प्रतिद्वन्द्वी या दुश्मन मानते हैं। इसलिए दुनिया में कुछ राष्ट्र धर्म के आधार पर बने भी।

हम कहाँ हैं और हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं, यह हमें तय करना होगा। हमें जाँचना होगा कि क्या धार्मिक पहचान हमारी सबसे मौलिक पहचान है जो हमें दूसरों से अलग करती है या अलग-अलग धर्मों, देशों के लोगों की एक-जैसी ज़रूरतें हैं, एक जैसी समस्याएँ हैं और एक जैसे सपने हैं।

(वास्तव में चर्चाएँ इससे बहुत कम स्पष्ट और व्यवस्थित हो पाती थीं)

 

जो बातें नहीं हो पाईं, उनमें से कुछ:

समय :

ऐसा क्यों था कि जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ़ नफ़रत और हिंसा 1920-40s के बीच बढ़ी?

ऐसा क्यों है कि आज भारत के मीडिया चैनल हिन्दू मुस्लिम विवाद ज़्यादा दिखाते हैं?

कार्यवाही:

अगर कोई हमारे सामने दूसरे के धर्म-जाति-क्षेत्र-लिंग के खिलाफ़ बात करे, तो हमें क्या करना चाहिए?

धर्म और राजनीति को अलग करने के लिए हमें क्या करना होगा?

नज़रिए :

एक साथ फ़िल्म देखना, एक रुका हुआ फैसला

पत्र :

कोई प्रेम से भरा पत्र पढ़ पाना