Wednesday, 8 August 2012


शिक्षा अधिकार का सचPDFPrintE-mail
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Tuesday, 07 August 2012 11:27
नरेश गोस्वामी 

जनसत्ता 7 अगस्त, 2012: मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा अधिकार के कार्यान्वयन के लिए स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग को बजट की निर्धारित राशि का केवल साठ फीसद दिया गया है। इसका मतलब यह है कि शिक्षा अधिकार योजना को इस साल पंद्रह हजार करोड़ रुपयों की कमी पडेÞगी। योजना की जरूरतों और बजटीय आबंटन के इस अंतर को देखते हुए संसदीय समिति ने आशंका जताई है कि इस संकट के कारण शिक्षा अधिकार को पूरी तरह और सही समय पर लागू करना दिक्कततलब रहेगा।
समिति के अनुसार, मंत्रालय के स्कूली शिक्षा विभाग ने स्कूलों में आधारभूत संरचना मुहैया कराने और अध्यापक-छात्रों का सही अनुपात कायम करने के लिए चालीस हजार करोड़ रुपयों की मांग की है। जबकि बजट में इसके वास्ते कुल साढ़े पचीस हजार करोड़ रुपए निर्धारित किए गए थे। इसी असंगति के चलते स्कूली शिक्षा विभाग को कई योजनाओं में कांट-छांट करनी पड़ रही है। शिक्षा अधिकार को लेकर केंद्र के अलावा राज्य सरकारों के सरोकार का अंदाजा भी इस बात से लगाया जा सकता है कि कानून पर अमल करने के लिए धन जुटाने का जो फार्मूला तय किया गया था उसमें बारह राज्यों ने अभी तक अपना हिस्सा नहीं दिया है। गौरतलब है कि राज्यों पर आयद यह रकम पिछले साल ही लगभग पंद्रह सौ करोड़ पहुंच गई थी।
यह हश्र उस कानून का हो रहा है जिसे दो साल पहले ऐतिहासिक और युगांतरकारी बताया जा रहा था। विधेयक से लेकर कानून बनने तक सरकार और नागरिक समाज इसे लेकर इस कदर मुदित थे कि अधिकार के प्रावधानों को समग्रता में देखने के बजाय उसके केवल एक-दो पहलुओं पर खयालगोई करते रहे। बात करने का अंदाज ऐसा था गोया यह कोई बुनियादी अधिकार है जिसे भारी जद््दोजहद के बाद हासिल किया गया है। निस्संदेह यह एक जनपक्षधर कदम था, लेकिन इतना आमूल भी नहीं कि उसकी अपूर्णताओं को नजरअंदाज कर दिया जाए। अगर शिक्षा का अधिकार सरकार के लिए वाकई इतना प्राथमिक था तो उसका आकलन कैसे गड़बड़ा गया कि तैयारियों के निमित्त कितने धन की जरूरत होगी और वह कैसे जुटाया जाएगा। गौरतलब है कि इस कानून को पूरी तरह लागू करने के लिए तीन साल का समय दिया गया था। प्रावधानों के मुताबिक इस वक्फे में स्कूलों में कमरों के निर्माण, लड़कियों के लिए शौचालय और पानी का इंतजाम पूरा हो जाना चाहिए।
यह भी कम विचित्र नहीं है कि इस बार के बजट में जब शिक्षा की आबंटन राशि में अठारह फीसद का इजाफा किया गया था तो मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा था कि अर्थव्यवस्था के मुश्किल दौर में इस वृद्धि का स्वागत किया जाना चाहिए। आखिर मंत्रालय किस बिना पर इस राशि को पर्याप्त मान रहा था कि तीन-चार महीनों के फेर में ही उसका आकलन गलत साबित हो गया।
जाहिर है कि इसे सिर्फ तकनीकी गलती नहीं माना जा सकता। यह खर्च के गणित की नासमझी नहीं बल्कि जन सरोकारों को आधे-अधूरे ढंग से निपटाने की प्रवृत्ति है। इसलिए इस हीलाहवाली को सिर्फ सरकार के मत्थे मढ़ने के रिवायती तरीके के बजाय उन वृहत्तर कारणों की शिनाख्त की जानी चाहिए जिनके चलते शिक्षा जैसे अधिकार को इस तरह काट-छांट दिया जाता है कि जब कोई उसे बुनियादी अधिकार बताता है तो कोफ्त होती है।
याद करें कि शिक्षा अधिकार कानून को लेकर जो उत्साहपरक माहौल बना था उसकी जड़ में कहीं यह जन-कल्याणकारी आश्वस्ति थी कि सरकार सिर्फ पूंजी, कॉरपोरेट और निजी हितों की संरक्षक नहीं है बल्कि उसे देश के गरीबों की भी चिंता है। और यह भी कि उसने निजी स्कूलों को कानून के दायरे में लाकर अपने जनपक्षधर होने का सबूत दिया है। यहां हमारा आशय कानून के उस प्रावधान से है जिसके तहत निजी स्कूलों को अपनी क्षमता की पचीस फीसद सीटों पर गरीब और वंचित वर्गों के बच्चों को दाखिला देना होगा। लेकिन इसी के साथ यह भी याद करें कि कानून बनते ही शिक्षा में निजीकरण के पैरोकार किस तरह संगठित हो गए थे और उन्होंने इस कानून को उच्चतम न्यायलय में चुनौती दे डाली थी कि यह उनके शिक्षण संस्थाएं चलाने के अधिकार का हनन है। गनीमत यह रही कि न्यायालय ने यह दलील नहीं मानी। इसी साल जब उसका यह फैसला आया कि कुछ अपवादों को छोड़ कर कानून सभी तरह के स्कूलों पर लागू होगा तो उसे एक बार फिर जनता की जीत बताया गया।
तब यह बात एक बार फिर बिसरा दी गई कि सिर्फ छह से चौदह साल के बच्चों को शिक्षा का अवसर देकर कोई कानून कैसे बुनियादी अधिकार की श्रेणी में रखा जा सकता है? क्या बचपन सिर्फ इसी अवधि के बीच फलता-फूलता है? क्या इससे पहले और बाद के वर्षों में बच्चों को शिक्षा की जरूरत नहीं होती? जिन्होंने यह सोचने और कहने की जुर्रत की कि सिर्फ आठ साल की स्कूली शिक्षा के बाद बच्चों का

क्या भला हो जाएगा, उन्हें सनातन सिरफिरे कह कर चुप कर दिया गया।         
असल में देश में शिक्षा की आम स्थिति पर नजर डालें तो शुरुआती धुंधलके के बाद यह साफ होने लगता है कि शिक्षा में निजीकरण की हिमायत करने वाले स्वार्थ समूहों और भारतीय राज्य के चरित्र में कोई खास अंतर नहीं रह गया है। अगर निजीकरण के समर्थक सार्वभौम शिक्षा अधिकार को पहले ही कदम पर सफल होते नहीं देखना चाहते तो खुद सरकार भी अपनी जन-प्रतिबद्धताओं और दबावों के लिहाज से उतना ही करना चाहती है जिससे न आम जनता उसके   विरोध में जाए और न ही वह लॉबी बिफर जाए जो देश के संसाधनों पर परंपरा और कानूनी ढांचे के तहत नियंत्रण करती आई है। गहराई से देखें तो निजी शिक्षा के पैरोकारों द्वारा कानून बनते ही न्यायालय की शरण में जाना विरासत और कानून से मिले उस संरक्षण की ही प्रतिक्रिया थी। इस वर्ग को लगता है यह देश और उसके संसाधन नैसर्गिक रूप से उसी के हैं, जबकि देश के वंचितों को यह नहीं लगता कि वे कुछ भी अधिकार से मांग सकते हैं।
बहुत-से लोगों को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब निजी स्कूल खुलेआम इस कानून का उल्लंघन करने की हिमाकत नहीं करेंगे, लेकिन यह बात कौन नहीं जानता कि शिक्षा के निजीकरण से मुनाफा कूटने वाली लॉबी इस मसले को किसी न किसी बहाने खुद कानून की ही प्रक्रिया में फंसाए रख सकती है। गौर करें कि जैसे-जैसे भारत भौगोलिक अभिव्यक्ति (अंग्रेज प्रशासक ऐसा ही सोचते थे) से उठ कर एक राष्ट्र के रूप स्थिर होता गया है वैसे-वैसे देश के अभिजन समूहों की ताकत बढ़ती गई है।
नतीजतन, इससे पहले कि दुर्बल नागरिक समझ पाएं कि यह देश उनका भी है, अभिजन समूह सत्ता पर अपनी पकड़ और मजबूत करके विकास और प्रगति के मुहावरे गढ़ लेते हैं। देश के रोजमर्रा के लोकतंत्र में ऐसे मुहावरों का जाप चलता रहता है। वर्चस्वशाली समूह संविधान के संकल्प दोहराते हुए ठीक ऐसा करते जाते हैं कि बराबरी, साधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे और कमजोर वर्गों को आर्थिक रूप से सबल बनने वाली प्रक्रियाएं मजबूत न होने पाएं। अलग से कहने की जरूरत नहीं कि वर्गीय विशिष्टता के आग्रह से उपजी यह मानसिकता रातोंरात खत्म होने वाली नहीं है। 
गौर से देखें तो शिक्षा अधिकार को मुकम्मल तौर पर लागू करने में सिर्फ धन की कमी एकमात्र समस्या नहीं है। उसके सामने सबसे बड़ी बाधा नवउदारवाद का वह तर्क और नीतिगत माहौल है जो आर्थिक स्वार्थ-समूहों ने अपने पक्ष में खड़ा किया है और जिसमें शिक्षा किसी भी अन्य व्यवसाय की तरह एक आर्थिक उपक्रम यानी मुनाफे का धंधा बन गई है। अब स्कूलों का विज्ञापन इस तरह किया जाता है गोया किसी होटल या रिसोर्ट की सुविधाओं का बखान किया जा रहा हो। देश के छोटे-बडेÞ नगरों और उनसे लगे इलाकों में खुल रहे उच्चवर्गीय स्कूलों को देख कर और सतत प्रचार के चलते निम्नवर्गीय मानस भी इस खुशफहमी का शिकार हो सकता है कि जैसे पूरा देश अमेरिका बन जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी संस्थाएं समाज में विषमताओं को गहराने का काम कर रही हैं। नवउदारवाद जनकल्याण के कार्यों को अर्थव्यवस्था पर गैर-जरूरी बोझ मानता है।
पिछले दो दशक में इस सोच के चलते सरकार ने भी जैसे यह मान लिया है कि शिक्षा का कोई सार्वभौम और समान ढांचा जरूरी नहीं है। जिसकी जैसी हैसियत है उसके लिए वैसे स्कूल उपलब्ध हैं। जो महीने में पांच हजार का खर्च वहन कर सकते हैं वे अपने बच्चों को वातानुकूलित और कथित अंतरराष्ट्रीय स्तर वाले स्कूलों में भेज सकते हैं और जिनके पास साधन नहीं हैं उनके लिए सरकारी और गली-मुहल्लों के निम्नवर्गीय स्कूल हैं। कहना न होगा कि भारत जैसे विषमतापूर्ण समाज में बेहतर हैसियत के लोग संसाधनों का बड़ा हिस्सा डकार जाना चाहते हैं। और ऐसा करते हुए उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि देश-समाज के आम बच्चों को किस तरह की शिक्षा मिल रही है।
बहरहाल, अगर सरकार समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है, जो कि सिद्धांतत: उसका दायित्व भी है, तो फिर सवाल उठता है कि उसे समान शिक्षा प्रणाली लागू करने से कौन रोकता है? और यहीं से यह सवाल राज्य की प्राथमिकताओं तक जाता है। आखिर अब जिस शिक्षा अधिकार को संविधान के 21-ए में वर्णित जीवन के अधिकार के समकक्ष दर्जा दिया गया है वह लोकतंत्र के छह दशकों तक क्यों नीति-निर्देशक तत्त्वों में दबा रहा?
लोक में सरकार का एक अर्थ यह भी होता है कि वह जो चाहे कर सकती है। अगर बुनियादी शिक्षा उसके लिए वाकई कोई सरोकार है तो न उस पर होने वाले व्यय के आंकड़ों में गफलत होती और न धन की कमी पड़ती। एक आधे-अधूरे अधिकार को लेकर भी जब सत्ता का रवैया यह है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि जनता के बाकी मसले उसके एजेंडे में कहां होंगे!

(जनसत्ता से साभार) 

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