Tuesday, 17 September 2013

रिपोर्ट: शिक्षकों के सेवा-विस्तार की उम्र बढ़ाने के विरोध में प्रदर्शन


                                                                                                                                                                         
दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों के सेवा विस्तार की उम्र 65 तक बढाने के फ़ैसले के विरोध में लोक शिक्षक मंच द्वारा 14 सितम्बर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन आयोजित किया गया. प्रदर्शन लगभग 10 बजे सरकार के फैसले के खिलाफ जोशीले नारों की हुँकार से शुरु हुआ। मंच संचालन की ज़िम्मेदारी राजेश ने निभाई। उन्होंने उपस्थित साथियों को अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया। राजीव (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने विभिन्न देशों के सेवानिवृत्ति सम्बन्धी आंकड़े रखकर यह साबित किया कि कैसे सरकार का उक्त फैसला तर्कसंगत नहीं है। उनका मत था कि शिक्षण के कार्य में विशेष कौशल के अतिरिक्त ऊर्जा की भी ज़रूरत होती है जोकि, उन्हें लगता है, उम्र के साथ प्रभावित होने लगती है। इसके बाद राजेश की अगुवाई में लोक शिक्षक मंच के साथियों द्वारा 'तू जिंदा है...' गीत गाकर उत्साह प्रवाहित किया गया। 
एक अध्यापक तरुण कुमार ने पहले की सेवानिवृत्ति की उम्र, 58 वर्ष, को सही ठहराया। उनका कहना था कि आजकल तरह-तरह की बीमारियों से जल्दी ग्रस्त होने की सम्भावना बढ़ गई है जिस कारण भी सरकार का यह फैसला ग़लत है। 
डॉ. जी. पी. ध्यानी ( पी.जी.टी , दिल्ली सरकार ) ने कहा कि इस निर्णय से युवा-वर्ग के हित प्रभावित होंगे। उन्होंने आश्चर्य जताया कि जिस निर्णय से सरकार की वित्तीय हालत भी नहीं सुधरेगी, उसे नियमित शिक्षकों की पदोन्नति और अतिथि शिक्षकों की नियमित नियुक्ति की संभावनाओं की बलि देकर कैसे लिया गया। उनका मानना था कि यह एक विशेष समूह की सलाह पर लिया गया ग़लत फैसला है। उन्होंने प्रदर्शन के आयोजकों का ध्यान देर से सूचना देने और तालमेल की कमी की ओर भी खींचा।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय ने अपनी राय रखते हुए कहा कि ऐसे में जब प्रशिक्षित युवक-युवतियां उपलब्ध हैं, इस फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता। उनका कहना था कि इससे बराबरी और समाजवाद के मूल्यों की अनदेखी हुई है। मंच के साथियों ने 'इसलिए राह संघर्ष की हम चुने' गीत गाकर आन्दोलन के प्रेरक मूल्यों को सामने रखा।
गौरव (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने फैसले को राजनैतिक स्टंट बताया। उन्होंने कहा कि इससे युवा साथियों का मनोबल गिरेगा और वे शिक्षण छोड़कर दूसरे विकल्पों की तलाश करेंगे जिससे कि शिक्षकों की संख्या व गुणवता दोनों में कमी आएगी। निर्णय के पक्ष में दिए जाने वाले आंकड़ों और तर्कों को उन्होंने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनका वज़न तभी है जब स्कूलों में पूर्ण नियुक्तियां हों। इस मुद्दे पर उन्होंने व्यापक संवाद और एकजुटता की ज़रूरत को रेखांकित किया।
ज्योति (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर अधिकतर शिक्षक हमसे सहमत हैं और स्थल पर उपस्थिति से समर्थन आंकना ग़लत होगा।
राजेश ( लोक शिक्षक मंच ) ने प्रदर्शन के राजनैतिक चेतना के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा कि परिणामों से परे यह संघर्ष जारी रखने की परंपरा का भी निर्वाह है। उनका विश्लेषण था कि छठे वेतन आयोग से बढ़ी तनख्वाहों से शिक्षकों के संघर्ष करने की परम्परा को तोड़ने की कोशिश की गयी है।यहाँ उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को कॉरपोरेट घरानों और उनके NGOs को सौंप कर बर्बाद करने की राजनीति पर ध्यान खींचते हुए दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को निजी संस्थाओं को 'गोद' देने के फैसले के खिलाफ मंच द्वारा लड़ाई लड़ने की मंशा ज़ाहिर की और अन्य उपस्थित साथियों को इसमें भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।
वही GSTA के जिला संयोजक ने नयी पीढ़ी के उदासीन रवैये पर निराशा प्रकट की। उन्होंने कहा कि वे शिक्षक संघ की भूमिका के प्रति सीमित सोच रखते हैं जिस कारण वे अपने व्यापक हितों की रक्षा में एकजुट नहीं हो पा रहे। उन्होंने यह मानने से इंकार किया कि बढ़े वेतन कमज़ोर आन्दोलन के लिए ज़िम्मेदार हैं। NGOs के विरोध से भी वे सहमत नहीं थे। फैसले को सरकार की साज़िश बताते हुए उन्होंने इसके विरुद्ध अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत और अपनी मंशा बताई।  
राजीव ( निगम शिक्षक ) ने संविदा पर शिक्षकों को रखने की नीति की आलोचना करते हुए इसे शिक्षा के पतन और शिक्षा व्यवस्था के विनाश के लिए दोषी करार दिया। उनका मानना था कि ठेके की इस व्यवस्था से शासन-प्रशासन की निरंकुश हुकूमत कायम रहती है। सुरजीत सिंह रावत ( भूतपूर्व सैनिक तथा वर्तमान में निगम शिक्षक ) ने मुद्दे की अहमियत स्वीकारते हुए इस बात पर अफ़सोस जताया कि शिक्षक की नौकरी पाने का इंतज़ार करते वो युवा जो इससे सीधे प्रभावित हैं बड़ी संख्या में प्रदर्शन में नहीं आये। उन्होंने कुछ NGOs के सकारात्मक पक्षों का हवाला दिया। उन्होंने फैसले पर रची अपनी एक व्यंगात्मक कविता प्रस्तुत की।
एक वक्ता जगदीश ममगइ ने कहा कि उन्होंने पाया कि वो लोग भी जो इसका समर्थन कर रहे हैं बातचीत और समझाने के बाद पुनर्विचार करते हैं। सरकार की संविदा व outsourcing की नीतियों में खोट मानते हुए उन्होंने कहा कि इनसे केवल शिक्षक ही नहीं सभी कामगार वर्ग प्रभावित हो रहे हैं जिस कारण एक बड़ी लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है।
सतिन्द्र नागर ( संयोजक , MCTA, शाहदरा दक्षिण ) ने मुद्दे को उठाने के लिए मंच को धन्यवाद दिया। नयी शिक्षा नीतियों को विदेशी ताकतों से संचालित मानते हुए उन्होंने इनकी भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि शिक्षकों में नए नेतृत्व की ज़रूरत है जोकि तात्कालिक लाभ के परे जाकर सरकार के फैसलों को परख पाए। उनकी राय थी कि उम्र के साथ कार्यक्षमता घटती है। उन्होंने भी प्रदर्शन में उपस्थित नौजवान साथियों की संख्या पर अफ़सोस जताया।
साथी प्रेमचंद (महासचिव ,इंडियन पब्लिक सर्विस एम्प्लोई फेदरेसन ) ने लोक शिक्षक मंच को धन्यवाद दिया कि उसने इस मुद्दे को उठाकर तमाम संगठनों पर दबाव बनाया कि वो अपनी स्थिति स्पष्ट करें। उनका कहना था कि आन्दोलनों में संख्या के अलावा माहौल बनाने की भूमिका भी निभानी ज़रूरी होती है। उन्होंने माना कि जो लोग सरकार के इस फैसले का इसलिए समर्थन करते हैं कि उन्हें खुद पुनर्नियुक्त होकर परिवार के प्रति अपनी शेष ज़िम्मेदारी निभाने का मौक़ा मिलेगा, वे व्यापक स्तर पर नयी पीढ़ी के हितों से इसके अंतर्विरोधों को नज़रंदाज़ करते हैं। सरकार की नव-उदारवादी नीतियों में ठेका व्यवस्था की धुन को पहचानते हुए उन्होंने अपील की कि इसके खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई को अपने व्यक्तिगत हितों के लिए संघर्ष की तरह देखा जाये। उन्होंने कहा कि न सिर्फ इन नीतियों के खिलाफ सतत संघर्ष करना होगा बल्कि इनका स्वरूप ही ऐसा है कि लड़ाई खुद हमें मजबूर करेगी। सेवानिवृत्ति के बाद ठेके पर फिर नियुक्त होने से कर्मचारियों के विरोध और संघर्ष की क्षमताओं के कुंद होने की संभावनाओं की तरफ भी उन्होंने ध्यान दिलाया।
 नरेन्द्र कुमार ( SC/ST शिक्षक संघ, शाहदरा दक्षिणी ) ने इस बात की ओर इशारा किया कि शिक्षकों के कई गुटों द्वारा इस फैसले का समर्थन न करने का कारण उनके नेतृत्व के निजी स्वार्थों से जुड़ा हुआ है। युवा वर्ग की नौकरियों और पदोन्नति की संभावनाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ को शिक्षण संस्थानों में ले जाने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि NGOs के कॉरपोरेट चरित्र और एजेंडे के कारण स्कूली व्यवस्था में इनके बढ़ते हस्तक्षेप को संदेह से ही देखा जाना चाहिए। उन्होंने आशा से कम उपस्थिति पर अफ़सोस जताया।
अध्यापिका अंजलि भारद्वाज ने इस फैसले को रोज़गार के कम होते अवसरों और अपराध की बढ़ती घटनाओं से जोड़ कर देखने को कहा। विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते क्रम को समाज में व्याप्त हताशा और कुंठा का परिणाम मानते हुए उनका कहना था कि ये नीतियाँ एक साजिश के तहत लागू की जा रही हैं ताकि हालात इतने बिगड़ जाएँ कि साम्राज्यवादी ताकतों को देश की कमान मिल जाये। आगे की लड़ाई में सहयोग देने के आश्वासन के साथ उन्होंने अपनी बात समाप्त की। इसके बाद मंच के साथियों ने 'ले मशालें चल पड़े हैं... '  गीत गाकर उम्मीद का जज़्बा और विश्वास जगाया ।        
 राघवेन्द्र प्रपन्न ( प्राध्यापक, महर्षि बाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, दिल्ली विश्विद्यालय ) ने कहा कि एक तरीका इस फैसले को ऐसे देखने का है जोकि आक्षेप तक रुक जाता है जबकि ज़रूरत है कि दोष का निर्धारण सही ढंग से किया जाये। इसके लिए बड़ी तस्वीर को समझकर राजनैतिक विश्लेषण की ज़रूरत है। उन्होंने बताया कि कैसे PPP के ज़रिये, पीछे के रास्ते से, बिना संवैधानिक प्रक्रिया अपनाये, सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से पलट रही हैं।  उन्होंने कहा कि नियमित शिक्षकों के कैडर को खत्म करने की शुरुआत तो 1990 के दशक में नव-उदारीकरण की नीति अपनाने से ही हो गई थी। इसमें ठेका व्यवस्था एक चरण है। उनका विश्लेषण था कि सरकार के इस फैसले से इन नीतियों द्वारा और आघात पहुँचाने के लिए अनुकूल समय मिलेगा। शिक्षक साथियों को संबोधित करते हुए उन्होंने उस षड्यंत्र के प्रति सचेत रहने को कहा जिसके तहत शिक्षण को ग़ैर-पेशेवर काम में बदलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में शिक्षा और शिक्षण का लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के मंचों से तय हो रहा है जिनका उद्देश्य यह है कि शिक्षकों की पहचान बौद्धिक वर्ग के बदले मात्र दिए गए पैकेज को लागू करने वाले कर्मचारी की रह जाये। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पीअरसन नाम की कंपनी का उल्लेख किया जोकि CCE जैसी योजनाओं के स्वरूप को प्रायोजित तथा तय कर रही है।
  
विभा सिंह ( पूर्व सचिव, नगर निगम शिक्षक संघ ) ने भी लोक शिक्षक मंच को फैसले के विरोध में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए बधाई दी। उनका कहना था कि इस लड़ाई में संविदा शिक्षकों के हित तो हैं ही, पदोन्नति की घटती सम्भावना के कारण नियमित शिक्षकों के हित भी शामिल हैं। सेवानिवृत्त शिक्षकों के हितों से सहानुभूति जताते हुए उन्होंने कहा कि पुनर्नियुक्ति की कई शर्तें उनके खुद के भी खिलाफ हैं और वो इस फैसले का स्वागत इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे इन शर्तों से अनजान हैं। प्रदर्शन में नौजवानों की कम उपस्थिति का कारण उन्होंने उनका शिक्षक के पद की गरिमा को न समझना बताया। उन्होंने अपील की कि इस फैसले को पार्टी लाइन के परे जाके देखें। 
फ़िरोज़ ( लोक शिक्षक मंच ) ने अंत में प्रदर्शन में भाग लेने वाले सभी साथियों का मंच की ओर से धन्यवाद किया और उनके द्वारा की गई आलोचनाओं और सुझावों पर ग़ौर करने का आश्वासन दिया। दिल्ली सरकार के इस फैसले के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को PPP के तहत दिए जाने वाले फैसले को पलटवाने की लड़ाई लड़ने के इरादे की घोषणा के साथ प्रदर्शन समाप्त हुआ। प्रदर्शन के बाद एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई और उप-राज्यपाल, दिल्ली सरकार  को एक ज्ञापन सौंपा गया जिसमें सैंकड़ों शिक्षकों, शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों व अन्य लोगों के हस्ताक्षर संलग्न थे और दिल्ली सरकार के फैसले के विरोध के कारणों को प्रस्तुत करके उसे वापिस लेने की मांग की गई।

आय - व्यय का ब्यौरा 

कुल आय :
सभा में उपस्थित साथियों से प्राप्त - 2100
मंच के एक साथी से प्राप्त             - 1000

कुल प्राप्ति                                  - 3100

कुल व्यय :
माइक -टेंट                                  - 4000
पर्चे                                             - 400
बेनर                                            -280
अन्य                                           - 246

कुल खर्च                                      - 4926 

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