Monday, 3 March 2014

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा आयोजित अधिवेशन पर शिक्षकों के अनुभव

यह लेख कुछ शिक्षक  साथियों ने तालीम की लड़ाई के लिए लिखा है इसलिए इसे हम तालीम की लड़ाई से साभार दे रहे हैं। ……… संपादक मंडल 

14 व 15 जनवरी 2014 को दिल्ली में क्रमशः अशोक होटल और विज्ञान भवन में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने शिक्षा अधिकार कानून के तीन साल पूरे होने पर एक राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया था। इस अधिवेशन के घोषित उद्देश्य निम्नलिखित थे- 2010 से 2013 तक कानून लागू होने से हुई प्रगति का आंकलन करना; चुनौतियों पर नजर डालना और श्रेष्ठ उदाहरणों से सीख लेना तथा; ऐसे सुझाव देना जिससे कि विशेषकर सबसे वंचित तबकों के बच्चों के लिये शिक्षा का मुफ्त व अनिवार्य अधिकार समयबद्ध रूप से हासिल हो जाये। अधिवेशन को आयोग ने युनिसेफ के साथ मिलकर/आर्थिक सहयोग से आयोजित किया था। हालांकि, इस रपट में हम अपने उन अनुभवों व अवलोकनों को साझा करेंगे जिनसे हमें भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बताये जा रहे व गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री के नेतृत्व की शिक्षा-विरोधी समझ का परिचय मिला। मगर अधिवेशन पर भी कुछ साफ टिप्पणी करना जरूरी है। आयोजन स्थल अपने आप में आयोग की जन-प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिये मजबूर करता है। क्या आमजन से इस कदर कटे हुए ही नहीं, बल्कि उनको अपमानित-शोषित करने में सहायक स्थलों पर जनता की मेहनत के पैसों की फिजूलखर्ची और अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों की पूंजी से परोसे गये पांचसितारा भोजन- पहले दिन का डिनर स्पष्टतः युनिसेफ द्वारा प्रयोजित था- के सहारे भारत के लोगों के हकों पर कोई ईमानदाराना चर्चा की जा सकती है? यह रोचक और महत्वपूर्ण है कि अशोक होटल के माहौल के मुकाबले विज्ञान भवन में प्रतिभागी शिक्षकों व अन्य लोगों की भागीदारी व हस्तक्षेप न सिर्फ कहीं अधिक रहा, बल्कि उसमें एक रवानी, आत्मविश्वास व जनपक्षधरता भी दिखी। इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रथम और सेंटर फाॅर सिविल सोसाइटी जैसे नवउदारवादी नीतियों के पैरवीकार एन.जी.ओ. के वक्ता व मुख्य प्रतिभागी दूसरे दिन नदारद रहे जबकि उनका नाम परिचर्चा के प्रतिभागियों की सूची में था। हो सकता है कि इसके पीछे का कारण उनके द्वारा मंच से रखे गये विचारों-प्रस्तावों को मिला तीखा विरोध हो, या यह भी हो सकता है कि जब उनकी पहुंच सीधी योजना-आयोग और वित्त तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालयों तक हो तो निष्प्रभावी, दिखावटी व भ्रमित करने वाले ऐसे आयोगों के समक्ष अपनी बात रखना उनके लिये शायद वक्त की बरबादी हो।
एक अन्य सवाल प्रतिभागियों को बुलाने की प्रक्रिया को लेकर उठाया जाना चाहिए। अधिवेशन में विभिन्न राज्यों से सरकारी स्कूलों के शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन समिति व पंचायत के प्रतिनिधियों को बुलाया गया था पर इनके चयन का तरीका लोकतांत्रिक नहीं था। उचित यह होता कि पर्याप्त समय पूर्व सार्वजनिक प्रचारों के माध्यम से इनकी व अन्य लोगों- अभिभावकों सहित- की सहभागिता आमंत्रित की गई होती। कुल मिलाकर चर्चा खुली हुई जिसका प्रमाण यह है कि रह-रहकर श्रोताओं-प्रतिभागियों,विशेषकर शिक्षकों ने समान स्कूल व्यवस्था की जरूरत बताई। इसका असर यह हुआ कि मंच से भी कुछ वक्ताओं और संचालकों ने इस विचार का समर्थन किया, भले ही वो सुव्याख्यायित न रहा हो।
आयोग की अध्यक्षा ने अपने समापन वक्तव्य में पूर्व-प्राथमिक से 18 साल तक की उम्र के लिये शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की स्पष्ट वकालत की और साफ शब्दों में कहा कि अयोग इसे अपनी रपट में प्रस्तावित करेगा। अधिवेशन को चार चर्चा समूहों में बांटा गया था और हमारी शिरकत ‘लर्निंग प्रोसेसेस ऐंड आउटकम्स (सीखने की प्रक्रियायें और परिणाम)  में रही क्योंकि विभिन्न नवउदारवादी ताकतों द्वारा इस विषय पर गलत व खतरनाक समझ परोसकर सार्वजनिक शिक्षातंत्र को नेस्तनाबूत करने की नीतियों की जमीन तैयार की जा रही है और उन्हें राज्य के स्तर पर तेजी से प्रश्रय भी मिल रहा है।
अब आते हैं गुजरात से आये प्रतिनिधिमंडल के व्यवहार व तैयारी पर। यह उल्लेखनीय था कि पहले दिन, सुबह की चाय के समय, गुजरात की स्कूली शिक्षा पर एक छः पृष्ठों की रंग-बिरंगी, आंकड़ों व फोटोयुक्त (जिसमें मुख्यमंत्री की 5 फोटो थी)  पुस्तिका सब कुर्सियों पर रख दी गई। फिर, उसी दिन आउटकम्स वाले समूह की चर्चा की शुरूआत उसी राज्य की पॉवर प्वाइन्ट प्रस्तुति से शुरू हुई। अन्य कोई राज्य इस तरह की प्रचारी तैयारी से नहीं आया था। इस तैयारी को खतरे का संकेत मानते हुये भी, क्यों छटपटाहट व उतावलेपन के रूप में देखना उचित होगा, यह जाहिर हो गया। गुजरात राज्य की प्रस्तुति में एक जगह कुछ विद्यार्थियों के नामों के साथ उनके अंकों की तालिका दर्शाई गई थी। इसे लेकर सवाल उठाना स्वाभाविक था और ऐसा ही हुआ भी। अन्यों के अलावा चर्चा में संचालक ने ही प्रस्तुति के फौरन बाद इसे निजता का उल्लंघन का उदाहरण बताकर प्रस्तुतिकर्ता को आरोपित किया। यह रेखांकित करने की जरूरत है कि प्रस्तुतिकर्ता और कोई नहीं गुजरात के प्राथमिक शिक्षा के प्रधान सचिव थे जिन्हें उस आलोचना के बाद भी बात समझ नहीं आ रही थी! प्रस्तुति में एक और जगह ‘प्रार्थना’ को विद्यार्थियों के सतत् व समग्र मूल्यांकन का अंग दिखाया गया था। इसको लेकर जब सवाल खड़ा किया गया कि प्रार्थना जैसी चीज को विद्यार्थियों के आंकलन का आधार नहीं होना चाहिए क्योंकि यह अंतःकरण का दायरा है, तो इसको भी गुजरात से आये प्रतिभागियों को समझाने में निराशा ही हाथ लगी। चर्चा के बीच में अवकाश के समय में गुजरात से आये कुछ शिक्षकों के साथ बातचीत के दौरान एक का कथन हैरान-परेशान करने वाला था। उन्होंने अपनी बाजू दिखाते हुए कहा, ‘‘यहां से काटूंगा तो मोदी निकलेगा।’’ यानी वो कहना चाह रहे थे कि उनकी रग-रग में मुख्यमंत्री समाये हैं और वो उनके प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। जिस राज्य व्यवस्था में सरकारी शिक्षकों का मानस इस तरह अधिनायकवाद-व्यक्तिवाद की चपेट में आ जायेगा, वहां हमें आलोचनात्मक शिक्षा की उम्मीद छोड़नी पड़ेगी। यह शिक्षा के लिय बेहद चिंताजनक है कि शिक्षकों की विचारशीलता, गरिमा, स्वतंत्रत चिंतन को इस कदर गिरवी रख दिया जाये। शिक्षण बौद्धिक कर्म है और इसे किसी व्यक्ति के प्रति मानसिक गुलामी करके अंजाम देना असंभव है। यह समझ में आ गया था कि अन्य राज्यों के बनिस्बत गुजरात के प्रतिनिधिमंडल को एक अलग ही ढंग से चुनकर भेजा गया था। वो आये नहीं, भेजे गये थे और उनका व्यवहार उसी परिपाटी में था। इस माहौल में गुजरात के बच्चों की शिक्षा का किन अंधेरों में दम घोंटा जा रहा है, यह शोचनीय है। प्रतिनिधिमंडल ने अपनी प्रस्तुति में बहुत गर्व से कहा कि उन्होंने अपने स्कूलों के लिये पचास लाख से अधिक रुपए एकत्रित किये हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह रकम राज्य ने नहीं दी है बल्कि ‘उन्होंने’ कुछ रईसों-सेठों से दान-चंदे में जमा की है। इसके अच्छे परिणाम एवं सबूत के तौर पर उन्होंने अपने फोन पर एक फोटो दिखाते हुये कहा कि उनके स्कूल में प्रत्येक बच्चे के पास टैबलेट है। इस परिघटना को हमने उस पुस्तिका से समझा जिसमें जगह-जगह तालिकायें ये जश्न मना रहीं थीं कि गुजरात में स्व-निर्भर विद्यालयों की श्रेणी तेजी से बढ़ रही है। जाहिर है कि जब स्थानीय सामंतों या पूंजीपतियों का धन दान-चंदे के रूप में स्कूलों को दिया जायेगा तो उसकी शैक्षिक-राजनैतिक कीमत भी वसूली जायेगी। स्कूलों का स्वरूप सार्वजनिक नहीं रहेगा, वे अनुग्रहीत रहेंगे, उनके मैदानों, हाॅलों का नामकरण शोषकों के नाम पर होगा और शिक्षकों-स्कूलों की स्वायत्तता खत्म करते हुये उन जनविरोधी ताकतों-वर्गों पर वहां कोई सवाल खड़े नहीं किये जा सकेंगे। यह अनायास नहीं था कि सेंटर फाॅर सिविल सोसाइटी के वक्ता पार्थ शाह ने अपने अभिभाषण में गुजरात सरकार की इस नीति की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी कि वहां निजी स्कूलों को कानून के फुजूल के मापदण्डों के आधार पर नहीं वरन् मुख्यत (85 प्रतिशत) विद्यार्थियों के परीक्षा-परिणामों के आधार पर ही मान्यता-स्वीकृति मिलती है! इस अनुभव ने हमें आगाह कर दिया है कि कम-से-कम शिक्षा को लेकर भावी प्रधानमंत्री बताये जा रहे व्यक्ति की नीतियों व उनके नेतृत्व की समझ कितनी खतरनाक है। इसमें निजता, आलोचनात्मक चिंतन व अंतःकरण की स्वतंत्रता का उल्लंघन, शिक्षकों की बौद्धिक स्वायत्तता पर हमले, स्कूलों की समग्र समझ तथा उसके भौतिक मापदण्डों को और कमजोर करना तथा राज्य द्वारा अपनी संवैधानिक व जनप्रतिबद्ध वित्तीय जिम्मेदारी से पलायन को तेज करना शामिल है।
उपरोक्त से यह भी समझ में आता है कि क्यों इस नेतृत्व को न सिर्फ धार्मिक उग्रता, घृणा, हिंसा की ताकतों से एक नैसर्गिक बल मिल रहा है, बल्कि क्यों राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शक्तियां बेसब्री से इसके अधिष्ठित होने का ढोल पीट रही हैं। लोकपक्षधर ही नहीं बल्कि शिक्षा मात्र से सरोकार रखने वाले सभी प्रगतिशील संगठनों व लोगों को इस खतरे का एकजुट होकर मुकाबला करना होगा।

1 comment:

  1. एक महीने में पता चल जाएगा कि यही माहौल अब पूरे हिन्दोस्ताण में फैलाया जाएगा या नहीं - वाकई आने खतरे की गंटी तो है।

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