Thursday, 2 October 2014

शिक्षक डायरी : हमारे स्कूलों की बाल सभाएं

                                                                                      फ़िरोज़ अहमद



हमारे स्कूल में कई दफ़ा शनिवार को दैनिक सभा के बाद कुछ देर की बाल-सभा होती है। इसका स्वरूप पारम्परिक ही होता है - यानी कुछ छात्राएँ एक-एक करके कोई कविता, गीत आदि सुनाती हैं। मुझे नहीं पता कि अन्य स्कूलों में बाल-सभाओं का चरित्र कैसा है पर अपने स्कूल की 'मंचनवादी' सभाओं को देखते हुए ( और आयोजित करते हुए भी ) मुझे अपने बी एड के उन शिक्षक की आलोचनात्मक टिप्पणी याद आ जाती है कि मंच पर तथाकथित सांस्कृतिक प्रदर्शन करना मात्र स्कूल की सभाओं का मक़सद नहीं होना चाहिए। ( शायद वो यह कहना चाहते थे कि सभाओं का औचित्य विमर्श व संवाद को सार्वजनिक जीवन की लोकतान्त्रिक आदत बनाना है - अन्यथा तो वे कला को समाज के सरोकारों से काटकर अकादमिक-बौद्धिक संसार को ख़तरनाक रूप से अराजनैतिक बनाने का काम ही करेंगी। स्कूल की श्रेष्ठ संकल्पना में विद्यार्थी सभाओं में क़िस्से-कहानी तो सुनाएँगे ही मगर साथ ही इनका स्वरूप ऐसी बैठकों का होगा जिनमें वो स्कूली व व्यापक मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखेंगे और स्वस्थ बहस करने की आदत डालेंगे। ) क्योंकि विद्यार्थियों की संख्या बड़ी है इसलिए ऐसी सभा के लिए उपयुक्त मौसम के अलावा माइक का सही होना भी अनिवार्य शर्त है। अधिकतर छात्राएँ जोड़ी में या तीन-चार तक के समूह में प्रस्तुति देती हैं। ( इस स्कूल में केवल छात्राएँ पढ़ती हैं। ) यह रोचक है कि अधिकतर छात्राओं की प्रस्तुति में स्कूल का प्रत्यक्ष योगदान नहीं के बराबर होता है फिर भी किताबों की कविताएँ काफ़ी लोकप्रिय मालूम पड़ती हैं। ख़ासतौर से ऐसी कविताएँ जिनके बारे में एक वर्ग में यह आलोचना व्यक्त की जाती है कि इनमें नैतिकतावादी मूल्य नहीं हैं। दूसरा बड़ा हिस्सा ( अगर पहला नहीं तो ) 'देशभक्ति/देशप्रेम' से जुड़े गीतों का होता है। स्कूलों में स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवसों पर होने वाले आयोजनों में विद्यार्थियों की नियमित शिरकत की वजह से ऐसा होना स्वाभाविक भी है। बल्कि सच तो यह है कि चाहे राष्ट्रीय त्योहार हों या स्कूलों की आबादी के हिसाब से लोकप्रिय धार्मिक/स्थानीय/अन्य उत्सव हों, इन सभी में वयस्क कर्मचारियों से ज़्यादा उत्साह बच्चों में दिख रहा होता है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हमारे स्कूलों में पढ़ने वाले मज़दूर वर्ग के बहुत से बच्चे ख़ासतौर से राष्ट्रीय त्योहारों पर अपने 'बेहतरीन' कपड़ों में स्कूल आते हैं। तीसरा नंबर धार्मिक आस्था से जुड़े गीतों का आता है। पहले मैं ऐसे सांस्कृतिक तत्वों को हतोत्साहित करता था - क्लास में शिद्द्त से और स्कूली स्तर पर कम-ज़्यादा - पर अब यह सोचकर इनसे समझौता कर लिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की ये प्रस्तुतियाँ निश्छल होती हैं, उन्हें कम-से-कम अभिव्यक्ति के अभ्यास का मौक़ा देती हैं और अंततः स्कूलों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को क़ायम रखने की वैधानिक ज़िम्मेदारी राज्य के कर्मचारी होने के नाते शिक्षकों की है, विद्यार्थियों की नहीं। फिर धार्मिक विश्वास के ये गीत/प्रार्थनाएँ स्कूल की दिनचर्या का औपचारिक हिस्सा नहीं हैं, केवल किसी विद्यार्थी की, किसी अवसर पर, कोई तात्कालिक प्रस्तुति हैं जिनमें हिस्सा लेना, जिन्हें सराहना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है। ( पर क्या ऐसे मासूम कार्यक्रम दूसरों में धीरे-धीरे एक अलगाव की भावना नहीं पनपाएँगें? क्या इनसे एक ख़ास क़िस्म का माहौल नहीं बनेगा जोकि सांस्कृतिक रूप से स्कूलों की एकतरफ़ा छवि बरक़रार रखेगा? विशेषकर तब जब इन मासूम प्रस्तुतियों के ख़तरनाक पाठों पर शिक्षकों द्वारा भी स्वीकृति की एक मासूम चुप्पी बरती जाएगी। ) 
उस दिन भी जब मैंने माइक पर विद्यार्थियों को कुछ सुनाने के लिए आमंत्रित किया तो हमेशा की तरह कुछ क्षणों के प्रारम्भिक संकोच/आपसी फ़ैसले के बाद मंच पर एक लम्बी लाइन लग गई। ऐसे में अक़सर हमें लाइन में लगे अंतिम कुछ विद्यार्थियों और बाद में मंच पर आना चाह रही छात्राओं को 'अगली बार' का दिलासा देकर वापस भेजना पड़ता है। वैसे स्कूल में विद्यार्थियों की कुल संख्या के हिसाब से हम ईमानदारी से लाइन के लम्बे होने की ख़ुशफ़हमी नहीं पाल सकते - पाँच प्रतिशत विद्यार्थी ही तो मंच पर आते हैं और उनमें से भी अधिकतर चौथी-पाँचवीं के ही होते हैं। हाँ, एक चीज़ है जिसका श्रेय हम ले सकते हैं और वो यह है कि हमारी निरंतर ऐलानिया कोशिश रहती है कि वे अपनी-अपनी भाषा में कुछ प्रस्तुत करें। इसे मजबूरी को भुनाना भी कहा जा सकता है क्योंकि, जैसाकि मैंने ऊपर बताया, हमारी तरफ़ से उनको तैयार करने में कोई उल्लेखनीय योगदान वैसे भी नहीं होता है! जब चौथी कक्षा के विद्यार्थियों को आमंत्रित किया गया तो उनमें से मंच पर आई एक छात्रा ने वैष्णों देवी को सम्बोधित एक गीत सुनाया जिसमें बहन भाई पाने की प्रार्थना करती है। भजन के भाव से मैं तो विचलित हो ही रहा था पर उस दिन सुखद यह रहा कि मंच पर साथ खड़े एक साथी भी मेरे प्रतिक्रिया देने से पहले ही उस दौरान मुझसे बोले कि ऐसी चीज़ों से ही विस्फोट हो जाता है। कई कारणों से मुझे लगा कि वो धर्मनिरपेक्षता की मेरी समझ जानते हुए गीत के आस्था-विशेष से जुड़े होने की बात कर रहे थे। इस तात्कालिक अनुमान में मैं ग़लत भी हो सकता हूँ। मैंने गीत के लैंगिक विमर्श पर ही उनकी बात में बात जोड़ी और फिर गीत के ख़त्म होने पर माइक लेकर छात्रा की तारीफ़ करते हुए प्रार्थना के भाव पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी कर दी। हमेशा की तरह मैंने महसूस किया कि ऐसे मौक़ों पर जितना सटीक मुझे बोलना चाहिए था , फ़ौरी प्रतिक्रिया देने के उतावलेपन में और कुशलता की कमी के कारण मैं अपनी बात फ़ूहड़ ढंग से ही रख पाया।   

मैंने महसूस किया कि मेरे उस छोटे-से कथन के बाद पास खड़े हुए उन्हीं साथी ने जो ताली बजाई वो सिर्फ़ उस छात्रा के गीत के लिए नहीं थी। ऐसा मुझे इसलिए भी लगा क्योंकि उसके गीत के दौरान या शायद उसके बाद उन्होंने हाल ही में राजस्थान में घटी उस घटना का ज़िक्र भी चिंतित स्वर में किया जिसके बारे में खबरों में यह बताया गया कि एक दो साल की बच्ची को दफ़नाने के बाद उसकी क़ब्र को समाधि रूपी दैवी स्थल की पहचान दे दी गई। मेरे लिए यह अप्रत्याशित इसलिए भी था क्योंकि इन्हीं साथी से मैं 'लाडली' योजना के बारे में यह सुन चुका था कि इसका उद्देश्य लड़कियों की शादी के लिए पैसे उपलब्ध कराना है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उनके बारे में मेरे विचारों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया है बल्कि मुझे लगातार यह लग रहा है कि व्यक्तियों, वर्गों और समाजों में उथल-पुथल चल रही होती है और इस दौरान हमारे विचार-समूह कई बार असंतुलित, अव्यवस्थित होते हैं जिनसे किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव नहीं भी होता है। 
ख़ैर! मुझे माइक पर दो शब्द बोलकर ही संतोष नहीं हुआ और मैंने अपनी क्लास में पहुँचकर चर्चा आगे बढ़ाई। ( जिसेकि भाषण पिलाना भी कह सकते हैं। ) बात करने में मुझे इस बात से मदद मिली कि उस छात्रा की बहन मेरी क्लास में पढ़ती है। ( यह जानना भजन के बोलों और भाव को एक और संदर्भ दे गया कि वो तीन बहनें हैं और उनका कोई भाई नहीं है। तीसरी भी हमारे ही स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है। ) मेरे सवालों की दिशा और निशाना भाँपते हुए मेरी क्लास की छात्रा का बचाव की भावना में कहना था कि उसकी बहन को उक्त भजन उसके मम्मी-पापा ने नहीं सिखाया है बल्कि वो उसने 'आंटी के फ़ोन' से सीखा है। अपनी क्लास से वक़्त निकालकर मैं उस छात्रा की क्लास में भी गया। इस तरह के 'बातचीत' के अवसर आने पर हमेशा की तरह मैंने सोचा था कि उक्त क्लास की शिक्षिका से अपनी चिंता ज़ाहिर करके उन्हें अपने स्तर पर इसे कक्षा व विद्यार्थी के समक्ष उठाने के लिए छोड़ दूँगा। मगर फिर हमेशा की तरह वही हुआ कि उक्त कक्षा अध्यापिका ने मुझसे ही 'समझाने' के लिए कहा और मैं भी हमेशा की तरह अपने को रोक नहीं पाया। रोचक यह था कि उन्हें मामले की जानकारी इसलिए नहीं थी क्योंकि स्वास्थ्य कारणों से वो सभा में उपस्थित नहीं रह पा रही हैं और जैसे ही उन्होंने यह सुना कि मैं उनकी कक्षा की छात्रा द्वारा सुनाए गए गीत पर कुछ बोलना चाहता हूँ तो उनको फ़ौरन यह लगा की ज़रूर यह गीत के धार्मिक विश्वास के संदर्भ में होगा! मैंने जल्दी से उन्हें बताया कि मेरी आपत्ति प्रार्थना द्वारा लैंगिक असमानता को पुनर्बलित करने को लेकर है। लेकिन इस बीच वो ( शायद मेरी छवि के कारण गीत के धार्मिक स्वभाव को लेकर ) और मैं ( अपनी उसी छवि को 'संतुलित' बनाने के चक्कर में भावना आहत न करने की हड़बड़ी में ) यह बोल चुके थे कि ऐसे गीत घर में गाए जा सकते हैं, मगर स्कूल में नहीं! स्कूल में अक़्सर ऐसे मौक़े आते हैं जब हमें गर्म लोहे पर चोट करनी होती है और हम चूक ही नहीं जाते बल्कि अपने औज़ारों को बोथरा कर देते हैं। फिर हम इन चुनौतियों से हमेशा एक क़दम पीछे चल रहे होते हैं - अगली चुनौती फिर हमें ग़ैरहाज़िर पाती है। उनकी कक्षा से भी मैं घिसे-पिटे संवाद बोलकर निकल गया। जब अपनी कक्षा में वापस आकर सवाल-जवाब का सिलसिला आगे बढ़ाया तो समय की अधिक उपलब्धता के कारण भी कुछ इत्मीनान से प्रक्रिया को अंजाम देने की स्थिति में था। 

वैसे ख़ासतौर से प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थियों के संदर्भ में एक चिंता यह भी रहती है कि सही राजनैतिक चेतना व अभिव्यक्ति को बढ़ाने के प्रयास में हम उनके बालपन के सहज उत्साह को निष्ठुरता से कुचल न दें। शायद धार्मिक भावना के विरुद्ध बोलने के डर के अलावा सभा और उसकी कक्षा दोनों जगह आलोचना से पहले छात्रा/गीत की तारीफ़ करने का एक कारण यह भी था। साथ ही दूसरी कक्षा में जाकर उसके विद्यार्थी को उसके शिक्षक के सामने कुछ 'समझाने' में एक सत्ता के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का संकोच भी काम करता है। आख़िर कल आपकी बारी भी आ सकती है। मैंने देखा भी कि जब मैं उस छात्रा की कक्षा में अपनी बात कह रहा था तो वह सर नीचे करके बैठी थी। ( इस कारण भी कि मेरे उन तीनों बहनों के साथ दोस्ताना संबंध हैं और वो भी मेरे साथ खुलकर बोलती-चालती हैं व सहज विश्वास जताती हैं, उसकी उस 'आपराधिक' मुद्रा ने मुझे और ग्लानियुक्त दुविधा में डाल दिया। )
अपनी कक्षा में छात्राओं के साथ 'संवेदनशील' मुद्दों पर बात करते रहने की आदत के कारण और 'अपने इलाक़े' में सहज शिक्षकीय दादागीरी बरतने के अधिकार से लैस होने के एहसास की वजह से भी कक्षा में इस विषय पर विस्तार से पूछताछ करना सम्भव था। अन्य सवालों व बातचीत के बीच मैंने उनसे पूछा कि अगर कोई भजन में व्यक्त भाव के अनुसार बेटे की चाह रखे और फिर बेटी पैदा हो जाए तो उसका ( परिवार का ) रवैया क्या होगा। मैं चर्चा को लड़कियों को परिवार में उपेक्षित महसूस कराने वाले अनुभवों की ओर ले जाना चाह रहा था। एक-एक करके कई जवाब आते गए - 'मार देते हैं', 'अस्पताल में गिरा देते हैं', 'नदी में बहा/डुबो देते हैं', 'फेंक देते हैं', 'छोड़ आते हैं', 'बेच देते हैं', 'रिश्तेदार को गोद दे देते हैं' आदि। क्योंकि अर्जुन की तरह मेरा निशाना सिर्फ़ अपनी अपेक्षित, सूक्ष्म बात पर लगा हुआ था इसलिए इन जीने-मरने के मोटे उदाहरणों को मैं यह कहकर ख़ारिज करता गया कि ऐसा बहुत कम होता है। आख़िरकार मेरे कुछ और इशारा करने पर एक छात्रा ने यह कहकर मुझे संतुष्ट कर ही दिया कि अनचाही होने पर बेटी के साथ जो व्यवहार परिवार में होगा उसमें निहित उपेक्षा उसकी हिम्मत तोड़ देगी। मुझे नहीं मालूम कि जो संभावित प्रतिक्रियाएँ छात्राओं ने गिनाईं उनका स्रोत क्या था - फ़िल्में-धारावाहिक, समाचार, सरकारी प्रचार या अपने अनुभव। ये छात्राएँ 7-9 साल की हैं।

हालाँकि उनके जवाब सुनते हुए भी मैं भौंचक था पर सुकरातीय संवाद की धुन में मगन होने के कारण उस वक़्त मैं पूर्व-निर्धारित निष्कर्ष की ओर बढ़ता गया। बाद में उन हैरान-परेशान कर देने वाले जवाबों को जब फिर याद किया तो परिस्थिति की गंभीरता समझ आई। इतनी कम उम्र में ही मेरी छात्राओं को अपने लैंगिक अस्तित्व से जुड़ी उन सामाजिक परिघटनाओं के बारे में बख़ूबी पता है जिनके हिंसक तत्व के सामने मेरा शिक्षण केवल सतही 'जागरूकता' तक सिमट जाता है। मुझे अपनी उन दोस्तों की याद आ गई जिन्होंने इस बात से साफ़ इंकार किया कि उनके साथ जातिगत भेदभाव हुआ है और फिर उसी साँस में ऐसे कई वाक़ये भी गिना दिए जब अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर दोस्तों और कार्यस्थल के साथियों तक ने उनके मुँह पर अपमानजनक जातिगत टिप्पणियाँ की थीं! सच कहूँ तो मेरे लिए यह कोई नया सबक़ नहीं था बल्कि जबसे स्कूल में पढ़ा रहा हूँ तभी से यह देखता आ रहा हूँ कि पहली कक्षा में दाख़िल हुए बच्चे भी लैंगिक सामाजीकरण की एक मुकम्मल प्रक्रिया के प्रभाव से तैयार होकर ही आते हैं। हाँ, सबूतों की श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ गई। इन छात्राओं - लड़कियाँ कहने में एक अकादमिक/राजनैतिक संकोच होता है - के लिए उपेक्षा, तिरस्कार, परायापन आदि की दैनिक हिंसा जीवन का सामान्य हिस्सा है। सम्भवतः यहाँ भी यह विश्वास हो कि प्रत्यक्ष/प्रकट हिंसा वो है जो औरों के साथ घटती है। इसके बावजूद यह भी स्वीकारना होगा कि, शायद निजता के प्रति संभ्रांत वर्गों से अलग अनुभव-समझ रखने के कारण और कुछ हमारी कक्षा के माहौल के कारण भी, काफ़ी छात्राएँ ऐसी घटनाओं की जानकारी को साझा करती रहती हैं जिनसे पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जा सकती है। मगर क्योंकि मैं जानता हूँ कि इनको परिवार में सहज प्यार भी मिलता है ( और लैंगिक हिंसा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है ) इसलिए साधारण ज़िंदगी में छुपी कुरूपता को पहचानना, उसे नाम देना और फिर ललकारना एक चुनौतीपूर्ण काम लगता है। क्या सिर्फ़ यही काफ़ी नहीं था कि दुश्मन कहीं ताक़तवर, कहीं संगठित है कि अब हमें बताया जाता है कि वो अपनों में भी छुपा है? और तो और, अपने मायाजाल से एक प्रेतात्मा की तरह हमारे अंतस तक में प्रवेश करके वो हमें ही हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है!   

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