Tuesday, 2 December 2014

पर्चा : भोपाल गैस काण्ड और नन्हीं कली


आज से 30 साल पहले, 3 दिसंबर 1984 के दिन, भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी के रासायनिक खाद के कारखाने में जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसमें लगभग 3,000 इंसान उसी समय मारे गए और 20,000 से भी ज्यादा लोग धीरे-धीरे कुछ वर्षों के भीतर मारे गए। हजारों लोग हमेशा के लिए बीमार-विक्लांग हो गए और सैकड़ों बच्चे पैदा होने से पहले ही मर गए या विक्लांग पैदा हुए। आजतक कंपनी ने कारखाने व उसके आसपास के इलाके की सफाई करने की जिम्मेदारी नहीं निभाई है। इसका नतीजा यह है कि कारखाने के पास की जमीन व पानी भी प्रदूषित हो चुका है और लोगों की सेहत के लिए खतरा बना हुआ है।
हादसे के 26 साल बाद, 2010 में भोपाल की एक अदालत ने कारखाने के आठ मालिकों व अफ़सरों को विभिन्न धाराओं (घोर लापरवाही, गैर-इरादतन हत्या आदि) के तहत  दोषी करार देते हुए 2 साल की सजा सुनाई। हालांकि इनमें से किसी को भी एक दिन भी जेल में नहीं गुजारना पड़ा क्योंकि उन्हें जमानत मिल गई और आज मुकदमा अगली अदालत में चल रहा है। उन दोषियों में केशब महिन्द्रा प्रमुख थे। उस समय वे यूनियन कार्बाइड इण्डिया के चैयरमेन थे। बाद में यूनियन कार्बाइड कम्पनी को डाउ कैमिकल्स नाम की एक अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने खरीद लिया और हादसे की जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ना चाहा। मुआवजे की लड़ाई के दौरान डाउ कैमिकल्स की जन-संपर्क अधिकारी ने बयान दिया, ‘‘आप सचमुच में इससे ज्यादा नहीं कर सकते। एक भारतीय ख्के जीवन,  के लिए पांच सौ डाॅलर ख्लगभग 25-30 हजार रूपये, काफी अच्छी रकम है।’’ 
भोपाल गैस काण्ड के बारह साल बाद, 1996 में केशब महिन्दा एज्यूकेशन ट्रस्ट (के.सी.एम.ई.टी.) ने ‘नन्हीं कली’ नाम का एक दान आधारित कार्यक्रम शुरू किया। यही कार्यक्रम अब नंदी फाउंडेशन नामक संस्था के साथ भारत व दुनिया भर से अमीर व रईस लोगों से पैसे इकट्ठा करके चलाया जाता है।
नन्हीं कली में छात्राओं को कुछ सामान दिया जाता है मगर इसके बदले में कई छात्राओं को बेइज्जती का सामना करना पड़ा। जब कुछ छात्राएं इस टयूशन को छोड़ना चाहती थी तो कभी-कभी उन्हें जबरन रोक लिया जाता था और उन्हें इस तरह के शब्द सुनने पड़ते थे - सामान वापिस कर दे....सामान लेने तो आ गई आदि। इसमें ट्यूटर्स का दोष नहीं है। जब प्राइवेट कम्पनियां ऐसे कार्यक्रम चलाती हैं तो नीचे काम करने वालों पर एक जबरदस्त दबाव बनाती हैं जिससे उनके बर्ताव में भी बदलाव आ सकता है। दान से चल रहे किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यक्रम में हमारा अपमान तो होना ही है क्योंकि उनके मालिक मेहनतकश लोगों को इज्जत-बराबरी से देखना ही नहीं जानते।
स्कूल में जब कोई शिक्षक अपनी छात्राओं को समझाते थे कि इस तरह के कार्यक्रम से उनकी पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है तो कंपनी के अफसरांे ने झूठा इलजाम लगा दिया कि वो छात्राओं के नाम काटने की धमकी व सजा दे रहे हैं। इसी तरह जब स्कूल में 1500 में से सिर्फ सौ-दौ सौ छात्राएं ट्यूशन के लिए रूकती थीं तब कंपनी अपनी रिपोर्ट में दावा करती थी कि स्कूल की सारी छात्राएं उनके कार्यक्रम में शामिल हैं।
हम लोगों को सोचना चाहिए कि जो प्राइवेट कम्पनियां (वेदान्ता, रिलायन्स, भारती एयरटेल.. आदि) किसानों-आदिवासियों की जमीनें हथिया रही हैं, अपने कारखानों में श्रम कानूनों का पालन नहीं कर रही हैं, ठेके पर मजदूरी करवा रही हैं और पर्यावरण को बेतहाशा नुकसान पहुंचा रही हैं, वो शिक्षा में - जिसमें उनकी कोई समझ व सरोकार नहीं है - अपनी दरियादिली क्यों दिखा रही हैं? वहीं दूसरी तरफ, मुआवजे के मुकदमे में कंपनी ने वह उदारता नहीं दिखाई जिसका इनके मालिक अपने दिखावी कार्यक्रमों में दावा करते हैं।
हमें यह भी समझना होगा कि आज के दौर में सरकारें ऐसे कार्यक्रमों व प्राइवेट कम्पनियों को इसलिये भी बढ़ावा दे रही हैं ताकि सरकारी स्कूलों को सुधारने, मजबूत करने की जिम्मेदारी से पीछा छुड़़ा सकें। आज जिस सामाजिक दायित्व की नीति के तहत ये देशी-विदेशी कंपनियां इस तरह के कार्यक्रम चला रही हैं उनसे सिर्फ इनकी करतूतों पर पर्दा डालने का मकसद ही पूरा नहीं होता है बल्कि इनका टैक्स भी बचता है। सबसे खतरनाक तो यह है कि ऐसे कार्यक्रमों से सरकारें अपनी जवाबदेही व जिम्मेदारी से बरी हो जाती हैं। दानदाताओं की पुण्य और परोपकार कमाने की भावनाओं के सहारे चलने वाले कार्यक्रमों से सबके लिए बराबरी, इज्ज़त की साझी व्यवस्था की उम्मीद भी खत्म हो सकती है। इससे समाज में व्यक्तिवाद, स्वार्थ व अलगाव की भावना बढ़ेगी। हम यह सोचने लगंेगे कि जब हमारे बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम हो गया तो हम क्यों फिक्र करें कि सरकारी स्कूल कैसा चल रहा है। 
नन्हीं कली कार्यक्रम का मकसद ही हल्का है। सभी छात्राओं को जहां तक वो चाहें वहां तक पढऩे और जो वो करना चाहें वो करने का अवसर होना चाहिए। (मगर इसके लिए समाज को बराबरी पर खड़ा करना होगा।) वहीं दूसरी ओर ऐसे कार्यक्रमों के मालिकों की चाहत है कि छात्राएं दसवीं पास करके कोई छोटा-मोटा काम करने लग जायें। अब जहां चाहत ही कम होगी वहां स्तर तो स्वयं हल्का हो जायेगा। देशी-विदेशी कंपनियां अगर हमारे बच्चों के लिए कोई कार्यक्रम चलाने का दावा करती हैं तो उन्हें बराबरी का हक देने के लिए नहीं बल्कि इस नीयत से कि उनको अपने कारखानों-दुकानों में कम मेहनताने पर काम करने वाले समर्पित मजदूर मिल सकें।
भोपाल गैस पीडि़तों के इंसाफ की लड़ाई आज भी जारी है। अब यह फैसला हम पर है कि जिन पूंजीपतियों, कंपनियों के मालिकों, धन्ना सेठों का धर्म-ईमान ही मुनाफा है और जो मजदूरों, श्रम कानूनों और पर्यावरण के प्रति खुद एक खतरा हैं, हमें और हमारे बच्चों को इज्ज़त की नजर से नहीं देखते हैं, उनके चलाये जा रहे तरस पर आधारित कार्यक्रम को हम अपना समर्थन दें या न दें। क्या यह लोगों की आंखों में दान एवं पैसे की धूल झोंककर अपने लालच, झूठ, बेईमानी और जुल्म पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं है? 

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