Thursday, 9 April 2015

शिक्षक संघों के समक्ष चुनौतियाँ

 आज के दौर के विश्वव्यापी चरित्र को पहचानकर सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर हो रहे हमलों के प्रति सचेत रहकर उनका प्रतिरोध करना हमारे शिक्षक संगठनों की ज़िम्मेदारी है। ऐसे में जबकि पूँजीवाद की अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय, बाज़ारू संस्थाएँ लगातार सरकारों पर यह दबाव बना रही हैं कि वो शिक्षा को जनाधिकार व समानता के हक़ का मुद्दा नहीं बल्कि अपने क़ानूनों में उनके मनमाफिक फेरबदल करके व्यापार में मुनाफा कमाने के लिए वैधानिक रूप से उपलब्ध कराएँ, शिक्षकों को सामूहिक रूप से समाज के प्रति अपनी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता दिखानी होगी। शिक्षक संघों को गणतांत्रिक, जनवादी संगठनों की भूमिका निभाते हुए शिक्षक साथियों को भी व्यापक रूप से इस खतरे के बारे में जागरूक करना चाहिए। असल में सभी नवउदारवादी हमले सीधे तौर पर अंजाम नहीं दिए जाते और इसलिए अक्सर इन्हें पहचानने में हम ग़च्चा खा जाते हैं। निजी मुनाफे और पूँजीवादी बाजार की कुछ चालें तो इतनी लुभावनी लग सकती हैं कि हमें वो नेक, सुधारवादी हस्तक्षेप की तरह प्रतीत होती हैं। जबकि इतिहास गवाह है कि दुनियाभर में एक भी देश ऐसा नहीं है जहाँ मज़बूत, बढ़िया व बराबरी की सार्वभौमिक शिक्षा व्यवस्था को खड़ा करने में राज्य की केंद्रीय भूमिका न रही हो और ऐसा भी कोई देश नहीं है जहाँ निजी ताक़तों के सहारे यह काम अंजाम दिया गया हो। साथ ही इन निजी मुनाफे की शक्तियों के चरित्र और हितों की माँग ही यह है कि वो शिक्षा को गणतांत्रिक और वैज्ञानिक-तार्किक उसूलों पर निर्मित नहीं कर सकतीं। वो 'शिक्षा' को आकर्षक पैकिंग में परोसते ही इसलिए हैं कि उसके जनविरोधी चरित्र से हमारा ध्यान हटा रहे और समाज में निज-स्वार्थ व अलगाव के मूल्य मज़बूत होते रहे जिससे कि संसाधनों के स्वामित्व पर न सवाल उठें और न ही उनकी सत्ता के खिलाफ व सामूहिक स्वामित्व के लिए लोग एकजुट हों। 
 हमारी लड़ाई अपने वर्गीय स्वार्थ के लिए नहीं है बल्कि एक समतामूलक, न्यायसम्मत, सुंदर और प्रबुद्ध समाज के निर्माण के लिए है। अपने विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा करना हमारा फ़र्ज़ है और उनके साथ खड़े होना हमारे काम का हिस्सा है। जब समाज के अन्य मेहनतकश वर्गों के साथियों को यह भरोसा होगा कि शिक्षकों और उनके संघर्ष की ज़मीन, उनके मूल्य और उद्देश्य एक ही हैं तभी सिर्फ हमारी अलग-थलग पड़ने वाली लड़ाइयाँ साझे आंदोलनों में तब्दील होकर मज़बूती प्राप्त करेंगी। क्या पूरे सत्र छात्राओं का वज़ीफ़ा न आना, वर्दी न बँटना, सर्दियाँ बीत जाने के बाद जर्सी के पैसों का बँटना आदि शिक्षकों के सामने सवाल नहीं खड़ा करता है? अगर मिड-डे-मील के तहत बच्चों का हक़ मारा जाता है, जनता के पैसों को झूठे रिकॉर्ड बनाकर हड़प लिया जाता है, सप्लायर की सहूलियत के हिसाब से न कि शिक्षकों-समुदायों की ज़रूरतों के अनुसार RH (रेस्ट्रिक्टेड हॉलिडे) की तारीख तय की जाती हैं, और इन सभी मक्कारियों के एवज़ में शिक्षकों को बलि का बकरा बनाया जाता है तो क्या यह शिक्षक संगठनों के सामूहिक शोध और रोष का विषय नहीं है? अगर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों व क़ानून के विरुद्ध जाकर बच्चों व अभिभावकों पर आधार कार्ड जैसे ग़ैर-ज़रूरी दस्तावेज़ों के लिए ऐसे दबाव बनाए जाते हैं जोकि उन्हें परेशान भी करते हैं और शिक्षा से वंचित भी कर सकते हैं तथा साथ ही शिक्षकों के समय व ऊर्जा को भटकाकर शिक्षण से बाधित भी करते हैं तो क्या यह बुद्धिजीवी वर्ग की ज़िम्मेदारी नहीं है कि इनका विरोध करे? क्या सरकारी स्कूलों के भवनों के निर्माण से लेकर उनके रख-रखाव में बरती जाने अनियमितताओं के कारण विद्यार्थियों की शिक्षा में पड़ने वाली क्रूर रुकावटों को समस्या बनाकर कार्रवाई की माँग करना शिक्षक संगठनों का काम नहीं होना चाहिए? अगर इस तरह का भ्रष्टाचार शिक्षक संगठनों की लड़ाई का मुद्दा नहीं बनेगा तो सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी या तो खतरनाक घोषित भवनों में हफ्ते में तीन-तीन दिन पढ़ने को मजबूर होते रहेंगे या फिर उन्हें अन्य स्कूलों में ग़ैर-मुनासिब समय व माहौल में 'एडजस्ट' होना पड़ेगा, विद्यार्थियों की संख्या और उनके परीक्षा-परिणामों में गिरावट आती रहेगी, शिक्षक-अभिभावक अविश्वास बढ़ता रहेगा, खुद शिक्षक प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने को विवश होते रहेंगे और इतने पर भी व्यवस्था की नाकामी (असल में अन्याय) का पूरा दोष शिक्षकों को नाकारा बताकर और शिक्षकों व अभिभावकों को आपस में लड़ाकर छुपाया जाता रहेगा। 
किसी भी प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक संगठन को दो अन्य मौलिक ज़िम्मेदारियाँ भी उठानी पड़ती हैं। एक तो यह कि उसके अंदरूनी ढाँचे का समय-समय पर ईमानदारी से विश्लेषण करके यह परखा जाए कि उसमें समाज के सभी वर्गों की न्यायसम्मत भागीदारी है कि नहीं और वो भागीदारी सहज-स्वाभाविक है या महज़ चुनावी इस्तेमाल के लिए या वर्चस्वप्राप्त-सम्पन्न वर्गों की अनुकम्पा के रूप में है। अगर प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी समाज की विविधता के समानुपातिक नहीं है तो फिर अपने को प्रगतिशील-लोकतान्त्रिक कहने वाला कोई भी संगठन यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित-शोषित तबकों के सदस्य आगे आकर ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हैं - उसे अपने भीतर झाँककर अपने वर्गीय-वर्णीय-लैंगिक चरित्र पर सवाल भी खड़े करने होंगे और सक्रिय होकर उसे बदलना भी होगा, चाहे इसके लिए उसे पेशे के औपचारिक क्षेत्र से बाहर जाकर समाज व संस्कृति में ही हस्तक्षेप क्यों न करना पड़े। वैसे भी, सामाजिक-   
सांस्कृतिक परिवर्तन शिक्षा का मौलिक क्षेत्र है, कोई 'बाहर' का काम नहीं। दूसरे, यह कभी नहीं भूला जा सकता कि शिक्षकों की अपने पेशे के प्रति एक बौद्धिक ज़िम्मेदारी है। उदाहरण के तौर पर अभी कुछ दिन पहले हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ ने SCERT निदेशक से मिलकर छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के संदर्भ में परीक्षा पत्र की लम्बाई व समय की प्रतिकूलता पर अपना विरोध दर्ज किया जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन ने शिक्षाशास्त्र के सिद्धांतों के अनुकूल यह फैसला लिया कि भविष्य में पहली व दूसरी की मौखिक परीक्षाएँ ही होंगी। इसी तर्ज पर क्या इस विसंगति को चुनौती नहीं देनी चाहिए कि प्रथम दो कक्षाओं में विज्ञान और सामाजिक अध्ययन को दो अलग विषयों के रूप में रिज़ल्ट रजिस्टर में दर्ज कराया जाता है जबकि इनका समेकित रूप एक विषय 'परिवेश अध्ययन' का है? बल्कि अब तो पाँचवीं तक 'विज्ञान' नाम का कोई विषय है ही नहीं - पर्यावरण अध्ययन है - और सामाजिक अध्ययन को भी NCF 2005 की संकल्पना के विरुद्ध जाकर अनुचित रूप से पढ़ाया जा रहा है। या RTE Act के बाद रिज़ल्ट अप्रूवल जैसी अफसरशाही परम्परा का औचित्य ही क्या है जबकि इससे सिवाय कर्मकांड और ढकोसले के कोई मूल्य बल नहीं पाते? 
अगर अफसरशाही के अनुचित दबाव व माहौल में काम करते-करते हम इस स्थिति में पहुँचा दिए गए हैं कि सच्चाई के विरुद्ध जाकर, दिखावे के लिए अंकों-उपस्थितियों में फेरबदल करें (जोकि इसलिए और भी त्रासद है क्योंकि RTE Act के तहत अगली कक्षा में प्रोन्नति के लिए तो विद्यार्थियों को हमारी इस 'अनुकम्पा' की ज़रूरत ही नहीं है!) और बच्चों के दाखिले के लिए क़ानून, न्याय, समाज व स्वयं अपने हितों के विरुद्ध जाकर अभिभावकों से तरह-तरह के दस्तावेज़ों की माँग करें तो फिर मानना पड़ेगा कि इस व्यवस्था पर काबिज़ शक्तियों ने या तो हमारी रीढ़ छीन ली है या हमने सत्ता के चरित्र को खुद आत्मसात कर लिया है। अपनी रीढ़ वापस छीनकर खड़े होना और अपने चरित्र को उत्पीड़कों के पक्ष का नहीं बल्कि उनके खिलाफ, उत्पीड़ितों का पक्षधर बनाना हमारी गरिमा की माँग है। और यह लड़ाई हमें अकेले नहीं बल्कि सामूहिक रूप से संगठित होकर ही लड़नी होगी। अन्यथा शिक्षक संघ का औचित्य ही क्या है?    

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