Tuesday, 14 July 2015

ग़रीबों के बर्ताव को सुधारने की शिक्षा

30 जून के द हिन्दू में 'टीचिंग द पुअर टू बिहेव' शीर्षक से जी संपत (संपथ?, G Sampath) का एक लेख छपा था। प्रस्तुत है उसके लगभग पूरे हिस्से का नज़दीकी अनुवाद। 
विश्व बैंक (वर्ल्ड बैंक) की 2015 की वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट (डब्लू डी आर) का शीर्षक है 'मानस, समाज और व्यवहार' (माइंड, सोसायटी एंड बिहेवियर)। इस सवाल का जवाब कि आखिर एक बैंक को इनसे क्या मतलब है, दो शब्दों का है: व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र (बिहेवियरल इकोनोमिक्स)। इस रपट में विश्व बैंक सरकारों को विकास की नीतियों में व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र अपनाने की सलाह पर बल देता है। रपट इस बात को दर्ज करती है कि अबतक सार्वजनिक क्षेत्र में अपनाई जाने वाली नीतियों का विश्लेषणात्मक आधार वो सामान्य अर्थशास्त्रीय सिद्धांत रहे हैं जिनमें यह मान्यता है कि व्यक्ति अपने सर्वश्रेष्ठ हित के अनुसार तार्किक आर्थिक कर्ता के रूप में व्यवहार करते हैं। मगर असल दुनिया में लोग अक़्सर अतार्किक तरीके से व्यवहार करते हैं और हमेशा अपने सर्वश्रेष्ठ आर्थिक हित के अनुसार बर्ताव नहीं करते। 

व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र मनोविज्ञान, नृविज्ञान, समाजशास्त्र व संज्ञानात्मक विज्ञान की मदद लेकर लोगों के सोचने और निर्णय लेने के तरीकों के बारे में और अधिक यथार्थवादी मॉडल बनाता है। जहाँ ये निर्णय आर्थिक दृष्टिकोण से ग़लत हैं, सरकारें वहाँ नागरिकों को सही निर्णय लेने की तरफ नीतियों के सहारे हल्के-से धकेल कर हस्तक्षेप कर सकती हैं। 
                                 ऐसा लग सकता है कि इन सब बातों में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। मगर समस्या तब पैदा होती है जब हम देखते हैं कि व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्री अपना ध्यान सिर्फ ग़रीबों के बर्ताव पर देते हैं। आज की तारीख में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि ग़रीबी उन्मूलन के लिए ग़रीबों के व्यवहार को नियंत्रित करना अर्थ के शीर्ष पर कब्ज़ा जमाए तबकों के व्यवहार को नियंत्रित करने से बेहतर विकल्प है। निश्चित है कि शीर्ष पर विराजमान वर्ग के व्यवहार को पूरी तरह तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता है - विशेषकर 2008 के आर्थिक संकट के बाद तो बिल्कुल नहीं। 
इस अर्थशास्त्र की दूसरी मान्यता यह है कि ग़रीब अमीर से कम समझदार हैं - इसे शोध पर आधारित एक नई 'खोज' की तरह प्रस्तुत किया जाता है और रपट भी इसे जुगाली करके पूर्णतः उगलती है। यह एक खतरनाक और राजनैतिक रूप से ग़लत विचार है। ज़ाहिर है कि इसे सीधे शब्दों में बयान नहीं किया गया है। इसे यूँ बयान किया गया है कि 'ग़रीबी का संदर्भ' व्यक्ति के मानसिक संसाधनों को कम कर देता है जिसके परिणामस्वरूप वो, खासतौर से उनकी तुलना में जो इस संदर्भ में स्थित नहीं हैं, एक खराब निर्णय लेने वाला साबित होता है। 
इन मान्यताओं का समर्थन करने के लिए कई शोध अध्ययनों को उद्धृत किया गया है। रपट में उल्लिखित एक ऐसा ही अध्ययन भारतीय गन्ना किसानों पर किया गया था जोकि वर्ष में एक बार, फसल कटाई के बाद, आय प्राप्त करते हैं। यह पाया गया कि किसानों का आमदनी से पहले का आई क्यू स्कोर बाद के स्कोर से दस अंक कम था! अर्थात, आदर्श स्थिति में उन्हें फसल कटाई से पहले महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय नहीं लेने चाहिए। व्यवहार पर ग़रीबी से पड़ने वाले असर के बारे में इस अंतर्दृष्टि से नीति निर्माण के लिए निहितार्थ तय होते हैं। उदाहरण के लिए, राज्य द्वारा कैश को 'उचित समय' पर या प्राप्तकर्ताओं के तर्कसंगत व्यवहार दर्शाने की शर्त पर ट्रांसफर किया जा सकता है।
रपट पूर्ण विश्वास से कहती है कि ग़रीबी से मानस का निर्माण होता है। इस मान्यता के बाद आज के चोटी के व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्रियों के लिए यह स्थापित करना मुश्किल नहीं रह जाता कि ग़रीब इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि उनकी ग़रीबी उन्हें ऐसे तरीकों से सोचने व बर्ताव करने से रोकती है जो उन्हें ग़रीबी से बाहर ले जा सकते हैं। 
इस प्रकार ग़रीबी-उन्मूलन का केंद्र व उसकी ज़िम्मेदारी राज्य द्वारा नीति बनाने, रोज़गार, शिक्षा व स्वास्थ्य उपलब्ध कराने से हटकर ग़रीबों के व्यवहार-परिवर्तन पर डाल दी जाती है। ग़रीबी के संरचनात्मक कारण - बढ़ती असमानता व बेरोज़गारी - और पूँजी के मालिकों का व्यवहार इस बहस से ग़ायब कर दिए जाते हैं, तथा सार्वजनिक क्षेत्र की नीति की चिंता का विषय नहीं रह जाते।
इस संदर्भ में यह याद रखना वाजिब होगा कि 80 के दशक से शुरु होकर व 90 के दशक तक सम्मान और वित्तीय समर्थन हासिल करने तक अर्थशास्त्र की इस समझ का शास्त्रीय विकास नवउदारवाद के उठान के समानांतर चला है। इस क्षेत्र के सभी प्रमुख अर्थशास्त्रियों को इस रपट में बहुतायत से उद्धृत किया गया है। 
सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के लिए बाजार के नेतृत्व वाले समाधानों को प्रस्तुत करना नवउदारवादी सोच का एक आधारभूत उसूल है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि अक़्सर ग़रीबी बाजार की विफलता का ही लक्षण होती है। मुक्त-बाजार के विचारक ग़रीबी व अन्य सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का कारण राज्य के हस्तक्षेप से बाजार में उत्पन्न विकार को ही मानते हैं। विश्व बैंक की रपट को शक्ल देने वाले अर्थशास्त्रियों को इसी आधार पर चुना जाता है कि वो इस सिद्धांत में विश्वास रखते हों। 
उदाहरण के तौर पर, 2000-01 की रपट का, जिसका शीर्षक था 'ग़रीबी पर प्रहार' (अटैकिंग पॉवर्टी), मूल ड्राफ्ट रवि कांबूर (Ravi Kanbur) द्वारा तैयार किया गया था जिन्हें जोसफ स्टिग्लिट्ज़ (Joseph Stiglitz) लाये थे। इस ड्राफ्ट में मुक्त बाजार के सुधारों से पहले ग़रीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा ढाँचे खड़े करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि इन दोनों ही महानुभावों को रपट के आने से पहले ही विश्व बैंक बाहर का रास्ता दिखा चुका था! अंतिम रपट में सामाजिक सुरक्षा के ढाँचों को पहले खड़ा करने की जगह श्रम-सुधारों के साथ खड़ा करने की बात दर्ज की गई! 
विश्व बैंक के इतिहास के इस उल्लेख का प्रयोजन यह दर्शाना है कि मुक्त-बाजार विचारधारा को अपनाने से विश्व बैंक के अर्थशास्त्रियों को एक 'संज्ञानात्मक कर' चुकाना पड़ता है जिसके चलते वो ग़रीबी को ऐसे कोणों से नहीं देख पाते जिनसे इस विचारधारा का विरोधाभास हो। 
मुक्त बाजार के संदर्भ में कीन्स (Keynes) के सामाजिक सुरक्षा उपायों को सार्वजनिक नीति के एजेंडे से हमेशा के लिए बहिष्कृत किया जा सकता है। मगर इससे बढ़ती असमानता से उपजने वाले सामाजिक और राजनैतिक परिणामों से निपटने की समस्या जस-की-तस बनी रहती है। बढ़ता असंतोष राजनैतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है। आखिर बाज़ारों के काम करने के लिए और उसमें बिकने वाली वस्तुओं के नियमित व निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए यह ज़रूरी है कि बहिष्कृत जन को तमीज़ से रहना सिखाया जाए। यही वो बिंदु है जहाँ व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र प्रवेश करके मदद करता है। 
                              ग़रीबों के व्यवहार को बदलने के लिए उसे समझना ज़रूरी है। यही वो समझ है जिसे व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्री सूत्रों में बाँधकर ज्ञान का रूप देने का वादा कर रहे हैं। रपट अवश्य ही स्वीकारती है कि अमीर, अर्थशास्त्री और विश्व बैंक के कर्मचारी भी संज्ञानात्मक भ्रम में मुब्तिला हो सकते हैं। 
मगर अपने 230 पृष्ठों में रपट कहीं व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र से प्रेरित नीतिगत हस्तक्षेप का एक भी ऐसा काल्पनिक उदाहरण तक प्रस्तुत नहीं करती जिसका निशाना, उदाहरणार्थ, अरबपति निवेशक हों। इसके बावजूद कि ग़रीबों की तुलना में यह एक ऐसा वर्ग है जो किसी देश की आर्थिक दशा व दिशा पर कहीं अधिक प्रभाव रखता है। एक ग़रीब किसान के वित्तीय निर्णयों को नज़दीक से नियंत्रित करने से कहीं ज़्यादा फायदेमंद और निश्चित परिणाम इन निवेशकों के व्यवहार को बदलने से प्राप्त हो सकते हैं। (उदाहरण के लिए, उन्हें ऐसे नियंत्रित करके कि वो अपनी अरबों की पूँजी सट्टा बाजार में लगाने के बजाए उत्पादक क्षेत्र में लगाएँ।)
इस पूरी रपट में व्यवहार (behaviour) और कर्म (action) की संकल्पनाओं के समान इस्तेमाल से एक भ्रामक समझ व्याप्त है। 'व्यवहार' की शब्दावली अपने मूल और सटीक रूप में जानवरों के संदर्भ में और वस्तुओं के वैज्ञानिक अवलोकनों में प्रयुक्त होती है। व्यवहारों का अध्ययन पैटर्न तलाशने के लिए किया जाता है। जिस हद तक इंसान भी जानवर हैं उस हद तक यह कहा जा सकता है कि वो भी व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। मगर जो चीज़ उन्हें इंसान बनाती है वह उनकी व्यवहार के पैटर्न से परे जाने की ही क्षमता है। अन्य शब्दों में, उनके कर्म करने की क्षमता।
राजनैतिक सिद्धांतकार हाना अरेन्ड्ट (Hannah Arendt) अपनी कृति द ह्यूमन कंडीशन में तीन प्रकार की गतिविधि की बात करती हैं - श्रम, कार्य और कर्म। इन तीनों में जो चीज़ कर्म को रेखांकित करती है वह इसका राजनैतिक चरित्र है। जब व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र ग़रीबी को 'संज्ञानात्मक कर' की तरह निरूपित करता है तो वह 'कर्म', अर्थात ग़रीब की राजनैतिक क्रिया को सूत्र से खारिज करता है। 
जैसे-जैसे लोकतान्त्रिक राष्ट्र-राज्य अपने वजूद को भूमंडलीय वित्तीय बाजार, WTO जैसी अलोकतांत्रिक संस्थाओं और GATTS जैसे व्यापर समझौतों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए पुनरानुकूलित कर रहे हैं वैसे-वैसे वे अनिवार्यतः अपने ही नागरिकों की आकांक्षाओं के प्रति कम ज़िम्मेदार होते जाएँगे। चूँकि खुला दमन हमेशा सबसे कामयाब या सस्ता नीतिगत विकल्प नहीं होता है इसलिए आर्थिक रूप से बहिष्कृत वर्गों को वैचारिक स्तर पर पालतू बनाने के तौर-तरीके ढूँढना लाज़मी हो गया है। ग़रीबों के मानस और व्यवहार पर केंद्रित ज़ोर इसी चिंता का परिणाम है।
जिस हद तक व्यवहार-संबद्ध अर्थशास्त्र ग़रीबी में स्थित लोगों पर अपना ध्यान केंद्रित करता है - और यही धारा इस वर्ष की वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट में हावी है - यह नवउदारवाद के राजनैतिक प्रबंधन के तरकश का सबसे नया तीर ही है। 

( द हिन्दू , 30 जून, 2015 से साभार )
           

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