Wednesday, 9 March 2016

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: मायने, चुनौतियाँ व सवाल


आज जब संस्कृति के बहुत-से पक्षों की तरह महिला दिवस को भी पूँजीवाद व बाज़ार की ताक़तें अपने चंगुल में लेने की कोशिशें कर रही हैं, यह ज़रूरी है कि इसके जनवादी मूल और इतिहास को फिर से याद तथा स्थापित किया जाये। इतिहास की एक व्याख्या के अनुसार इस दिवस की जड़ें बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में संयुक्त राज्य अमरीका में चले आंदोलनों में ढूँढी जा सकती हैं। यह वो समय था जब श्वेत पृष्ठभूमि की सुविधा-सम्पन्न, मध्यम-वर्गीय और अमीर महिलायें अपने मत देने के राजनैतिक अधिकार की माँग रख रही थीं। इन महिलाओं का आग्रह उस वक़्त और व्यवस्था पर काबिज़ वर्ग-नस्ल के हितों के अनुकूल। अपने लिए वोट का अधिकार माँगते हुए उन्होंने दलील दी कि श्वेत, शिक्षित व संपत्तिवान होने के आधार पर उनका दावा मज़बूत है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस विभाजनकारी माँग के बरक़्स महिला मज़दूर संगठनों ने 8 मार्च 1908 को न्यू यॉर्क में एक ज़ोरदार जुलूस निकाला। इन महिला मज़दूर संगठनों की माँग थी कि सभी महिलाओं को, चाहे वो श्वेत हों या अश्वेत, शिक्षित हों या अशिक्षित, संपत्तिवान हों या सम्पत्तिहीन, मत देने का बराबर का राजनैतिक हक़ होना चाहिए। इस लोकतान्त्रिक व क्रांतिकारी आयोजन को बाद में, 1910 में, अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन में कामगार महिला दिवस के रूप में प्रस्तावित किया गया। यह भी महत्वपूर्ण है कि रूसी बोल्शेविक क्रांति की एक चिंगारी 8 मार्च 1917 को सड़कों पर उतरी महिला मज़दूरों के आंदोलन से प्राप्त हुई थी जब प्रथम विश्व-युद्ध की विभीषिका के संदर्भ में 'रोटी और शान्ति' की माँग तथा नारे के साथ महिलाएँ महँगाई व युद्ध के ख़िलाफ़ एकजुट हुईं थीं। बीसवीं सदी में समाजवादी मुल्क़ों की स्थापना के साथ-साथ इस दिवस को एक व्यापक पहचान मिलती गई और फिर अंततः 1977 में आकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसे मान्यता दे दी। ज़ाहिर है कि महिला आंदोलन का आधार एक तरफ़ पितृसत्ता को चुनौती देते हुए पुरुषों के समान राजनैतिक हक़ों को प्राप्त करने की लड़ाई में था, तो दूसरी तरफ़ यूनियन बनाने, काम के घंटे कम करने, वेतन बढ़ाने, कार्य-परिस्थितियाँ बेहतर करने जैसी मज़दूर माँगों के समाजवादी संघर्षों व आदर्श के चरित्र में था। 
अन्य देशों का इतिहास यह भी बताता है कि जब अधिकतर शिक्षक महिलायें थीं और अधिकारी पुरुष तो पितृसुलभ फ़ैसले थोपना आम बात थी। महिलाओं को शादी करने पर नौकरी से निकाल दिया जाता था, फिर यह हक़ जीतने पर उन्हें गर्भ ठहरने पर निकाला जाने लगा, और इस लड़ाई को जीतने के बाद उन्हें असमान वेतन पर रखा जाने लगा। ये सभी संघर्ष शिक्षक संगठनों की सामूहिक ताक़त से लड़े गए। अगर आज भी निजी स्कूलों में महिला शिक्षक कई हक़ों से महरूम हैं तो इसका एक कारण इन संस्थानों का अलोकतांत्रिक, मुनाफ़ाखोर चरित्र है और दूसरा कारण साथियों के संगठित होने के रास्ते में उपस्थित परेशानियाँ हैं। हालाँकि स्वयं सार्वजनिक व्यवस्था में, जिसमें हमारे स्कूल भी शामिल हैं, बढ़ते ठेकाकरण व अनियमतीकरण ने महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा तथा पूर्व में जीते गए अधिकारों के सामने एक गंभीर ख़तरा पैदा कर दिया है। 
स्कूलों व व्यापक समाज में भी हम दो विपरीत लगने वाले व्यवहार देख सकते हैं - एक तरफ़ लड़कियों को 'गुड़िया', 'नन्हीं कली', 'लाडली', 'लक्ष्मी', 'देवी' आदि कहकर बुलाना और दूसरी तरफ़ औरतों को निशाना बनाती भद्दी गालियाँ। मगर शायद यह विरोधाभास नहीं है बल्कि उस मानसिकता का सहज परिणाम है जिसमें लड़कियों को नाज़ुक व सुरक्षा के दायरे के पिंजरे में क़ैद करके देखा जाता है। इसी मानसिकता के फलस्वरूप हम स्कूलों तक में छात्र-छात्राओं से अलग-अलग अपेक्षाएँ रखते हैं, उनसे अलग-अलग ढंग से पेश आते हैं और उन्हें अलग-अलग तरह की ज़िम्मेदारियाँ सौंपते हैं। राज्य के स्तर पर भी यह रूढ़िवादी रवैया उन्हें अलग-अलग तरह के विषय पढ़ने के मौक़े उपलब्ध कराने में साफ़ उजागर होता है। फिर हमारे कार्यक्रमों में बाज़ार द्वारा परोसी जा रही लड़कियों के प्रति अपमानजनक रचनायें भी शामिल होती हैं जिसे लड़कियों को आत्मसात कराकर अपनी पराधीनता, अपने दोयम दर्जे में गर्व/ख़ुशी महसूस करना सिखाया जाता है। अक़्सर हमारे कार्यक्रमों में, चाहे वो अनौपचारिक हों या सरकारी स्तर के औपचारिक, छात्राओं को (ही) स्वागत, गान आदि में प्रदर्शन की वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इन कार्यक्रमों में हम जाने-अनजाने रंग-रूप के भेदभावपूर्ण व बाज़ारवादी मूल्यों को बढ़ावा दे रहे होते हैं। इसी कड़ी में, इसे नज़रंदाज़ करते हुए कि ऐतिहासिक रूप से धर्म व राज्य की सत्ता का पुरुष-प्रधान चरित्र लोकतांत्रीकरण की राह में एक बाधा है, हम रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक मान्यताओं आदि पर सवाल नहीं उठाते हैं। क्या 'पराई होना', 'डोली में विदा होना', 'दो घरों की इज़्ज़त होना' जैसी पितृसत्तात्मक व रूढ़िबद्ध छवियों को प्रश्नांकित किये बिना बराबरी की बात करना सार्थक है? क्या लड़कियाँ 'बेटी', 'पत्नी', 'माँ', 'बहन', 'बहू' के अलावा कोई स्वतंत्र वजूद नहीं रखतीं? आख़िर हमें सुरक्षा की कीमत चारदीवारी की क़ैद में रहकर क्यों चुकानी होगी जब हमारे सामने आज़ादी और बराबरी के खुले आसमान की मंज़िल है?      
लैंगिक पूर्वाग्रहों तथा रूढ़ियों के संदर्भ में शायद हमें स्कूलों के अंदर अपने कामों, ज़िम्मेदारियों व नेतृत्व की भूमिकाओं को लेकर भी विचार करने की ज़रूरत है। क्या हम अपने आचरण, अपनी स्कूली व्यवस्था में समानता और लोकतान्त्रिक व्यवहार को अपनाये बिना अपने विद्यार्थियों में ये मूल्य संप्रेषित कर सकते हैं? क्या हमें POCSO जैसे क़ानूनों की पर्याप्त जानकारी है? क्या हमारे स्कूलों में, कार्यालयों में यौन-उत्पीड़न की घटनाओं, शिकायतों को सम्बोधित करने के लिए क़ानून-सम्मत समितियाँ हैं? क्या हम उन्हें ज़रूरी मानते हैं? क्या यूनियन में शिक्षिकाओं की भागीदारी व प्रतिनिधित्व का वर्तमान स्तर और स्वरूप इसके लोकतान्त्रिक चरित्र पर कुछ प्रश्न खड़े नहीं करता है?
                      असल में, एक स्तर पर, औरतों को सस्ते व सुविधाजनक श्रम के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। जनगणना से लेकर तमाम तरह के सर्वे में कितनी आसानी से हम अपने घर का सारा काम करने वाली महिला को Housewife/'काम नहीं करती' के ख़ानों में डाल देते हैं! राज्य मशीनरी भी मिड-डे-मील से लेकर आँगनवाड़ी तक का समाज का महत्वपूर्ण काम औरतों के श्रम के सहारे अनियमित व सस्ते तरीके से निपटा देती है। वहीं हमारी छात्रायें अपने घरों का काम करने के साथ-साथ बचपन से ही - विडंबना देखिये! - 'चूड़ी बनाने' जैसे शोषणकारी श्रम में पिसने लगती हैं। यही व्यवस्था उनके बड़े होने पर फिर उन्हें सस्ते श्रम के रूप में कारखानों व कम्पनियों के मालिकों के मुनाफ़े के लिए इस्तेमाल करती है। 
आज जब महिला दिवस पर 'कमाल की औरत' या 'होनहार औरत' की छवि परोसी जा रही है, हमें यह याद करने की ज़रूरत है कि यह Women's Day है, Woman's Day नहीं। अर्थात यह दिन औरतों का सामूहिक दिवस है, अकेली औरत का उत्सव नहीं, जैसा कि मुख्यधारा के मीडिया में प्रस्तुत किया जा रहा है।नारी की मुक्ति में सबकी मुक्ति है और सबकी मुक्ति में नारी की मुक्ति है। नारी आंदोलन को ताक़त देने वाले, बहनापे के गीत के बोलों में  
                   दरिया की क़सम 
                   मौजों की क़सम 
                   ये ताना-बाना बदलेगा 
                   तू ख़ुद को बदल
                   तू ख़ुद को बदल 
                   तब ही तो ज़माना बदलेगा 
                       
                   तू चुप रहकर 
                   जो सहती रही 
                   तब क्या यह ज़माना बदलेगा 
                   तू बोलेगी 
                   मुँह खोलेगी 
                   तब ही तो ज़माना बदलेगा  

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