Sunday, 28 August 2016

शिक्षक डायरी: हमारे स्कूलों के पास फ़ंड क्यों नहीं है?

विद्यालय की निजता को ध्यान में रखते हुए, इस आपबीती लिखने वाले शिक्षक साथी के नाम को नहीं दिया जा रहा है.......       संपादक 

मैं निगम के जिस स्कूल में पढ़ाता हूँ पिछले कुछ दिनों के उसके एक घटनाक्रम को साझा करना चाहता हूँ। पिछले कई वर्षों का अनुभव है कि, चाहे वो किसी भी दल के रहे हों, हमारे स्कूल में निगम पार्षद कभी भी विद्यार्थियों या शिक्षकों की ख़ैर-ख़बर लेने नहीं आते हैं। हाँ, किसी बड़े समारोह में ईद के चाँद की तरह कभी-कभार दर्शन दे देते हैं। वैसे यह तथ्य भी शायद अन्य साथियों से छुपा नहीं होगा कि जब हमारे जन-प्रतिनिधि (या अधिकारी-गण भी) हमारे स्कूलों में, अपने लाव-लश्कर के साथ तशरीफ़ लाते हैं तो तन-मन-धन के साथ स्कूल उनकी सेवा में लग जाता है। तन बच्चों की मेहनत का भी हो सकता है, मन शायद ही किसी का होता हो और धन पर मैं कुछ नहीं कह सकता कि वो कहाँ से आता है और कहाँ को जाता है। तो ऐसे ही किसी मौक़े पर जब निगम पार्षद के समक्ष स्कूल की एक-आध समस्या रखी गई - जिसमें कर्मचारी की कमी के कारण सफ़ाई व्यवस्था मुख्य थी - तो उन्होंने बड़ी-ही उत्साहित करने वाली सलाह दी कि अन्य सभी समस्याओं का भी ब्यौरा बनाकर उन्हें लिखित में दे दिया जाये। ज़ाहिर है कि समस्याओं की एक लंबी सूची तैयार करके बहुत उम्मीद के साथ उनको पेश कर दी गई। हालाँकि परिणाम वही ढाक के तीन पात रहा लेकिन इसके कुछ समय बाद विभाग से निरीक्षण का एक सबक़ ज़रूर प्राप्त हुआ। वैसे इतने सालों में स्कूल में अकादमिक निरीक्षण का अनुभव एक-दो बार ही हुआ है। इस बार दफ़्तर से जो अधिकारी निरीक्षण के बहाने आये थे उन्होंने सभी शिक्षकों को दफ़्तर में बुलाया और बताया कि पार्षद महोदय की ओर से विभाग को स्कूल की शिकायत मिली है जिसे उन्होंने, अगले साल आ रहे चुनावों के मद्देनज़र, व्यक्तिगत रूप से अपने ख़िलाफ़ विभाग की ग़लत मंशा के रूप में लिया है। बीते समय में ख़ुद शिक्षक रहे होने का उदाहरण-सहित हवाला देते हुए उक्त अधिकारी ने स्टाफ़ को नेक सलाह दी कि क्योंकि विभाग के पास वैसे भी फ़ंड नहीं है तो सभी शिक्षक अपनी-अपनी जेब से 50-100 रुपये देकर दो दिन के अंदर वॉटर-कूलर ठीक करा लें। 

(यह समझना मुश्किल है कि वॉटर कूलर को ही क्यों चुना गया जबकि एक तो वो समस्याओं की सूची में बहुत नीचे थे और दूसरे न तो वो आजतक चले हैं और न ही ठीक होने पर दो वॉटर कूलरों से दोनों पालियों के लगभग 2500 विद्यार्थियों का कोई भला होने वाला है। एक साथी ने याद दिलाया कि कुछ साल पहले ये वॉटर कूलर किसी निजी संस्था (NGO) से उपलब्ध कराये गए थे। उसके बाद से न तो उक्त संस्था ने रखरखाव की कोई ज़िम्मेदारी निभाई है और लगता है कि विभाग की तरफ़ से भी उसपर कोई दबाव नहीं डाला गया है। वैसे भी RO व कूलर जैसी 'विकासवादी' मशीनें न सिर्फ़ आपराधिक मात्रा में बिजली-पानी बर्बाद करती हैं, बल्कि सार्वजनिक जल सप्लाई के प्रति समाज में एक ग़लत सन्देश प्रेषित करके उसके मानकों पर सन्देह पैदा करती हैं व इन मानकों को उच्च-स्तर पर लागू रखने का जन-दबाव कम करती हैं। हाँ, इनसे पानी का निजीकरण ज़रूर होता है, विलासी व मेहनतकश वर्गों के बीच में पीने वाले पानी तक को लेकर बेहूदा खाई और गहरी होती है तथा इन मशीनों की कम्पनियों का बाज़ार फलता-फूलता है। अव्वल तो शैक्षिक संस्थानों सहित किसी भी सरकारी स्थल पर इन मशीनों को लगाने की इजाज़त ही नहीं होनी चाहिए। हमारे स्कूल में इनसे सिर्फ़ जगह घिरी है और आये दिन पानी के अनियंत्रित बहाव व सफ़ाई की समस्या ही पैदा हुई है। निःसन्देह स्कूल के लिए तो ये सफ़ेद हाथी साबित हुए हैं।)
 
इसके साथ ही प्रधानाचार्या से यह लिखित आश्वासन लिया गया कि वो दो दिन के अंदर स्कूल की सभी समस्याओं का समाधान कर देंगी। कुछ शिक्षकों ने ज़रूर यह कहकर आपत्ति व्यक्त की कि यह विभाग की ज़िम्मेदारी है और इससे आगे के लिए एक ग़लत परंपरा का निर्माण होने का ख़तरा है मगर शायद प्रधानाचार्या की नाज़ुक स्थिति और शराफ़त को देखते हुए विरोध तीखा स्वर नहीं ले पाया। इस तरह के व्यवहार में निश्चित ही हमारे व्यक्तिगत दब्बूपने और रीढ़विहीन होने के अलावा शिक्षक संघ व उसके प्रतिनिधियों में हमारा अविश्वास भी झलकता है। यह अपने-आप में बच्चों, समाज और पाठ्यचर्या में नैतिकता की कमी का रोना रोने की हमारी समझ पर भी सवाल खड़े करता है। आख़िर बिना साहस के नैतिक कैसे हुआ जा सकता है? और जब हम ख़ुद ही, संख्याबल, शिक्षा व संगठन की ताक़त से लैस होने के बावजूद, नैतिक साहस प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं तो यह उम्मीद किस तरह कर सकते हैं कि हमारे हाथों से बच्चे नैतिकता का पाठ ग्रहण कर लेंगे? शायद नैतिकता से हमारा मतलब भीड़ के साथ चलना और ताक़तवर के प्रति समझौतावाद व समर्पण की भावना का विकास करना ही हो। वर्ना, ऐकला चलो के साहस व विवेक के बिना नैतिकता का नहीं, सिर्फ़ भेड़चाल व परंपरा के प्रति नतमस्तक होने का ही निर्वाह किया जा सकता है। ख़ैर, यह एक अलग मुद्दा है।
 
आपस में ज़रूर लगभग सभी शिक्षकों ने इस प्रस्ताव से अपनी सैद्धान्तिक असहमति व शिकायत जताई लेकिन उक्त अधिकारी की तरह ही हममें से कई लोगों ने ख़ुद को यह कहकर मना लिया कि ये पैसा तो बच्चों के भले के लिए ही इस्तेमाल होगा। यह विरोधाभास भी हममें से कइयों के दिमाग़ में उपजा होगा कि हम जो शिक्षण करते हैं वो भी बच्चों के भले के लिए होता है और उनके भले के लिए ही सार्वजनिक कोष से एक पूरा-का-पूरा अमला खड़ा किया गया हैं। अधिकारी की तरफ़ से यह चिर-परिचित तर्क भी दिया गया कि जब हम शिक्षक इतने-उतने हज़ार कमा रहे हैं तो फिर इस तरह के योगदान में कोई समस्या नहीं है। एक साथी ने इसका एक निजी जवाब भी इसी चिर-परिचित अंदाज़ में दिया कि अधिकारी तो हमसे भी ज़्यादा कमा रहे हैं तो फिर वो ही इस तरह के ख़र्चे क्यों नहीं वहन कर लेते। यह तर्क वैसे भी बेहूदा और सामंती है कि हम शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों पर अपनी निजी कमाई ख़र्च करके अपनी भलमनसाहत सिद्ध करनी होगी। एक तो यह सोच विद्यार्थियों को राज्य के साधिकार, सम्मानित नागरिक मानने के बजाय उन्हें भलाई की भावना के सुपुर्द करके बेसहारा घोषित करती है, वहीं इसमें शिक्षकों की पेशागत भूमिका का भी अपमान है। पेशागत फ़र्ज़ व क़ानूनी ज़िम्मेदारी को ताक पर रखकर दान-पुण्य की बात करने का अर्थ है सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूर, नाकाम व अविश्वसनीय बनाने की कोशिश करना। ताज्जुब है कि जो काम संवैधानिक ज़िम्मेदारी के तहत विभाग को करना है उसे कर्मचारियों की भलाई की भावना के सर मढ़ा जा रहा है। यह उदाहरण है कि नव-उदारवाद के तहत कैसे समाज में व्याप्त सामंती मूल्यों का 'नैतिक' सहारा लेकर विद्यार्थियों को राज्य द्वारा उनके इंसानी व तालीमी हुक़ूक़ बाइज़्ज़त उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें दया के पात्र बनाकर कमज़ोर करने की कोशिश की जाती है। फिर आपस में यह बात भी उठी कि हममें से कई साथी न सिर्फ़ अपने शिक्षण के लिए बल्कि अपने विद्यार्थियों के प्रति एक स्नेह के नाते भी अपनी जेब से कुछ-न-कुछ ख़र्च करते रहते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वो ख़र्च स्वैच्छिक होता है और इसलिए स्वतन्त्रता का आभास देता है। उसमें हम ख़ुशी महसूस करते हैं और उसमें विद्यार्थियों के प्रति प्रेम की बराबरी व एक जीवंत रिश्ते का भाव होता है, सम्बंधों की ऊँच-नीच वाली विषमता का नहीं। (इस जबरिया दान से उपजी खीझ ने शायद यह समझ भी पैदा की हो कि कोई नारा या कर्म किसी की नज़र में कितना ही पावन या श्रेष्ठ क्यों न हो, दबाव व डर की ज़बरदस्ती न सिर्फ़ उसका नैतिक तत्व छीन लेती है बल्कि लोगों में उसके प्रति एक चिढ़ व विकर्षण भी पैदा करती है।)
 
कुछ दिनों तक तो इस दिशा में किसी प्रकार का पैसा इकट्ठा नहीं किया गया लेकिन प्रधानाचार्या को इस बाबत विभागीय दफ़्तर से लगातार फ़ोन आते रहे। आखिर एक दिन एक विद्यार्थी के हाथ एक काग़ज़ सभी कक्षाओं में घुमाया गया जिसपर वॉटर कूलर ठीक कराने के लिए शिक्षकों से 100 रुपये का सहयोग देने की अपील की गई थी और साथ में यह आश्वासन भी दिया गया था कि फ़ंड आने पर पैसे वापस कर दिए जायेंगे। जब काग़ज़ मेरे पास पहुँचा तो उसपर एक-दो कक्षाओं के शिक्षकों को छोड़कर - जो शायद उस दिन अनुपस्थित रहे हों - सभी क्लासों के शिक्षकों के योगदान के हस्ताक्षर दर्ज थे। मैंने भी भेड़चाल चली। मुझे नहीं पता कि फ़ंड कब आएगा और कैसे उसमें से हमारा भुगतान किया जायेगा। अनुभव बताता है कि अगर फ़ंड आएगा तो हमारा उधार चुकाने के लिए निश्चित ही कुछ फ़र्ज़ी बिल बनाने पड़ेंगे। अगर फ़ंड नहीं आएगा तो फिर उन तौर-तरीक़ों का ही सहारा बचता है जिन्हें स्कूल में 'ग़दर' फ़ंड का नाम देकर विद्रोह के उदात उद्देश्यों, कर्मों और भावना का मज़ाक उड़ाया जाता है। मेरे दिमाग़ में भी एक बार के लिए यह विचार आया कि अगर पैसा वापस नहीं होता है तो स्कूल द्वारा सत्र के अंत/आरंभ में विद्यार्थियों से पुस्तकें वापस लेकर उन्हें कबाड़ का काम करने वाले को बेचने की जो एक मजबूरी-भरी परंपरा है, अपनी कक्षा के स्तर पर उसे इस्तेमाल करके मैं अपनी भरपाई तो कर ही सकता हूँ। दोबारा इस विषय में सोचने पर शर्म भी आई और यह भी समझ आया कि अगर 'ऊपर' से इस तरह की दबंगई उगाही की जाती है तो 'नीचे' के अदना-से लोगों की नैतिक शक्ति भी क्षणभर में काफ़ूर हो सकती है।
 
अपने स्कूल के बारे में मैं यह भी जानता हूँ कि फ़ंड की कमी के चलते स्कूल के/की प्रमुख अपनी जेब से ख़र्चा करते/करती रहे/रही हैं। इस बारे में मैं ठीक से नहीं कह सकता कि ऐसे में उन्हें कब और कितना ख़र्चा नियमानुसार वापस मिलता रहा है। फ़ंड की ख़स्ताहाली का ताज़ा और वीभत्स उदाहरण तो यह भी है कि पिछले हफ़्ते स्कूल में चॉक तक नहीं थी और वो भी एक-दो दिन पहले प्रधानाचार्या ने अपनी जेब से मंगाई है। इसके अतिरिक्त हममें से कुछ शिक्षक तो पहले-से ही अपने लिए डस्ट-फ़्री चॉक ख़रीदते रहे हैं क्योंकि शायद फ़ंड की कमी के चलते जो चॉक आती भी है वो लेखन के लिए ख़राब और सेहत के लिए ख़तरनाक होती है। शिक्षा के लिए फ़ंड की यह स्थिति दिल्ली में है। बाक़ी हम सोच सकते हैं। वैसे, ज़रूरी नहीं कि सभी राज्यों में स्थिति ख़राब ही हो। कहने वाले कहते रहे हैं कि यह देश रामभरोसे चल रहा है। मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया था कि इसमें स्कूल भी शामिल हैं। या शायद यह कहना ठीक होगा कि यह स्कूलों को रामभरोसे छोड़कर जनता की नज़रों में उन्हें नाकाम सिद्ध करने की, शिक्षकों का मनोबल तोड़ने की और अंततः स्कूलों को निजी हाथों में सौंप कर इस प्रक्रिया को अंजाम पर पहुँचाने की योजना है। जिसका कोई नहीं ख़ुदा उसका हो या न हो, लेकिन अगर उसके लिए नियमित व मज़बूत सार्वजनिक व्यवस्था नहीं की गई तो वो जल्दी-ही ख़ुदा को ज़रूर प्यारा हो जायेगा। अगर यूँ ही चलता रहा तो हमारे स्कूलों का भी यही हश्र होगा।
 
इस पूरे घटनाक्रम ने स्टाफ़ को झकझोर दिया है। फिलहाल स्टाफ़ में इन निष्कर्षों पर आम सहमति बनी दिखती है कि अब स्कूल की किसी भी समस्या के समाधान या सहायता के लिए किसी जनप्रतिनिधि से (जिनके लिए प्रचलित मगर भ्रामक शब्द 'राजनेता' ही इस्तेमाल किया गया) संपर्क न किया जाये और न ही उन्हें स्कूलों के किसी कार्यक्रम में अपनी तरफ़ से आमन्त्रित किया जाये।  

आजकल जब कभी बैंक जाता हूँ तो विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों की भीड़ देखकर उनपर भी अफ़सोस होता है और बैंक कर्मचारियों पर भी। स्कूलों पर अलग दबाव है कि सभी विद्यार्थियों के 'आधार-युक्त' खाते खुलवाए जायें। सभी बेहाल हैं। सरकारों की ओर से यह ढिंढोरा पीटना जारी है कि इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी क्योंकि एक तो विद्यार्थी व उनके अभिभावक धोखा देकर एक से ज़्यादा जगह से लाभ हासिल कर लेते हैं और दूसरे हम शिक्षक बीच में आकर उनका हक़ मार लेते हैं। अब DBT अपनाये जाने के बाद से तो सरकारी पैसे की इस लूट में काफ़ी कमी आई होगी। पिछले कई वर्षों से शिक्षा के नाम पर उपकर भी लागू है। इस महाशक्ति का जीडीपी तो वैसे भी उछाल पर रहता है। नियमित नियुक्तियाँ हो नहीं रही हैं। इतना सब होने पर भी हमारे स्कूलों के पास फ़ंड क्यों नहीं है? 

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