Sunday, 25 June 2017

शिक्षक डायरी : इस ईद पर कुछ बातें

फ़िरोज़ 

उस दिन मैं स्कूल में छुट्टी के बाद रुककर कुछ काम कर रहा था। एक शिक्षक साथी, जिनसे बहुत पुरानी और अच्छी जान-पहचान है, मेरे पास आये और हमेशा की तरह हालचाल लेने लगे। मैंने उनके साथ कई बरस काम किया है और हम दोनों की अकसर विभिन्न मुद्दों पर बातचीत होती रहती है। एक-दूसरे के घर भी आना-जाना हुआ है, हालाँकि कम और काम से ही। वो मुझसे कुछ स्नेह रखते हैं इसका अंदाज़ा इस बात से भी होता है कि वो दो-तीन बार बहुत ज़ोर देकर मुझे अपने गाँव चलने के लिए कह चुके हैं। वहाँ उनका एक स्कूल चलता है जिसे वो मुझे दिखाना चाहते हैं। उस दिन उन्होंने मुझसे कलमे (इस्लामी शपथ या विश्वास का कथन) के बारे में पूछा और फिर हँसते हुए बोले कि क्या जाने कब, हालात को देखते हुए, जान बचाने के लिए इन चीज़ों की ज़रूरत पड़ जाए। या शायद मैंने ही/भी इस तरह की टिप्पणी की। यक़ीनन यह हम दोनों का एक डरा हुआ मज़ाक था। इसके बाद उन्होंने ख़ुद ही राजस्थान में एक-दो दिन पहले हुई पहलू ख़ान की सामूहिक हत्या पर अफ़सोस जताते हुए कहा कि भीड़ ने बहुत ग़लत किया और उसे एक-दो थप्पड़ मारकर भी छोड़ सकते थे। मुझे समझ नहीं आया कि इसका क्या मतलब निकालूँ मगर शायद मैंने क़ानून को अपने हाथ में लेने के चलन की निंदा करते हुए बात टालनी चाही। इसके बाद, क्योंकि स्कूल का समय हो गया था, वो ज़्यादा देर नहीं रुके। बाद में मैंने सोचा तो उनके कथन में एक विरोधाभास नज़र आया - गाय को लेकर हो रही हत्याओं पर सहानुभूति जताने के साथ उन्मादी हिंसा के समर्थन का। आख़िर वो कौन-सी भीड़ है जो ठंडे दिमाग़ से, सोच-विचार करके ये 'न्यायसम्मत' व 'शन्तिपूर्ण' फ़ैसला करेगी कि जो इंसान उसके निशाने पर है उसे एक-दो थप्पड़ मारकर छोड़ दिया जाये? वो भी तब जबकि गाय को लेकर न सिर्फ़ जगह-जगह फाँसी की माँग करने वाले नारे लिखे जा रहे हैं, बल्कि राज्य सरकारें ख़ुद एक-से-बढ़कर-एक अनुचित व दमनकारी क़ानून पारित कर रही हैं तथा मुख्यमंत्रीगण भी हिंसा के समर्थन में एक-दूसरे को पछाड़ने वाले वक्तव्य देने की होड़ में लगे हैं। ऐसे में उकसाई हुई भीड़ में से किसी के एक-दो थप्पड़ मारने का मतलब ही है बाक़ी लोगों को उस बेबस इंसान पर टूट पड़ने का खुला निमंत्रण देना। कुछ लोग, ख़ासतौर से वो जो उन वर्गों से आते हैं जिन्होंने क़त्लेआम नहीं झेला है, भीड़ के चरित्र से अनभिज्ञ होने का सुखद संयोग पाल सकते हैं। मगर अफ़सोस इस बात का ज़्यादा हुआ कि एक शिक्षक साथी द्वारा उन्मादी भीड़ की घृणा-आधारित हिंसा को कुछ स्तर तक जायज़ ठहराया जा रहा था। फिर मुझे लगा कि ये इतना अजीब नहीं है, बल्कि मूल्य के हद तक हिंसा की स्वीकृति हमारे स्कूलों की संस्कृति का हिस्सा भी तो है। यहाँ इस विश्लेषण में जाने की तैयारी नहीं है कि फिर स्कूलों की संस्कृति का व्यापक समाज से कैसा रिश्ता है, हालाँकि कुछ लोगों का मानना है कि शान्ति व सद्भाव के स्व-मोहित दावों के बावजूद हमारे समाज में भी हिंसक सांस्कृतिक तत्वों का ही वर्चस्व है। उदाहरण के लिए, तथाकथित मुख्यधारा के दो प्रमुख त्योहार किसी की हत्या के जश्न भी हैं, जिन्हें हम बच्चों को बिना सवाल किये हस्तांतरित ही नहीं करते बल्कि स्कूलों की पाठ्यचर्या में महिमामंडित भी करते रहते हैं। हममें से बहुत-से साथी शारीरिक दंड को बच्चों की भलाई, अनुशासन, अधिगम, मूल्यों आदि के नाम पर जायज़ मानते हैं। दैनिक सभा के स्थल पर अक़सर स्कूली दिन की शुरुआत ही कुछ विद्यार्थियों के सामूहिक अपमान या सार्वजनिक पिटाई से होती है।  हममें से वो साथी जो ख़ुद हाथ नहीं उठाते हैं लेकिन कुछ ख़ास/छँटे हुए/मॉनिटरनुमा/'पालतू' विद्यार्थियों को इस काम के लिए इस्तेमाल व तैयार करते हैं, विश्लेषण के लिए एक अलग चुनौती प्रस्तुत करते हैं। यहीं से हमारे स्कूलों में बच्चों को ये सबक़ अच्छी तरह मिल जाते हैं: जिसकी लाठी उसकी भैंस; बिना जाँच किये, आरोपित को बचाव का मौक़ा दिए बिना, सबूतों की परवाह किये बग़ैर कार्रवाई करना त्वरित न्याय है और; हिंसा, मारना-पीटना भी न्याय का ही हिस्सा है, उचित है। वैसे मुख्यधारा की फ़िल्में तो ये संदेश कई वर्षों से देती आ रही हैं कि 'इंसाफ़' करने के लिए क़ानून अपने हाथ में लेना पड़ता है, सड़क पर हिंसा करनी होती है, जान लेनी होती है। इस तरह हम बच्चों के दिलोदिमाग़ पर असल में घृणा, विवेकहीन क्रोध और बदले की मदांधता को इंसाफ़ के पर्याय के रूप में स्थापित कर रहे होते हैं। फिर क्या ताज्जुब है कि मौक़ा मिलने पर मालूम होता है कि उन्हें ये पाठ ख़ूब अच्छे से याद हो गए हैं। वैसे william golding के मशहूर उपन्यास lord of the flies जैसी रचनायें भी हैं जो यह दिखाने की कोशिश करती हैं कि इंसान में हिंसा के बीज कहीं गहरे पड़े हुए हैं और बचपन भी इनसे अछूता नहीं है। इसी तरह यहूदियों के नाज़ी नरसंहार पर hannah arendt की the banality of evil के उपनाम से मशहूर शोधात्मक रपट भी है जिसमें उन्होंने दिखाया है कि हिंसा कोई अपवाद या पराई स्थिति नहीं है बल्कि इस असभ्यता का सामान्य, रोज़मर्रा का हिस्सा है। शायद मैं इस तरह के प्रयास पहले भी करता रहा हूँ लेकिन वो न्याय के मूलभूत उसूलों की ख़ूबसूरती की तरफ़ ध्यान खींचने के लिए होता था, मगर पिछले कुछ महीनों से अधिक सायास होकर स्कूल में सभा में या क्लास में lynching के ख़तरे और इसकी क्रूरता-भयावहता को लेकर प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से बात करने लगा हूँ। आज इसकी बहुत ज़रूरत महसूस हो रही है। कल कहीं हमारे पढ़ाये हुए विद्यार्थी तो उस भीड़ का हिस्सा नहीं बन जायेंगे, या उसका समर्थन तो नहीं करेंगे, उसकी हिंसा से सहानुभूति तो नहीं जतायेंगे?
      
मुझे याद है कि अपने विद्यार्थी दिनों में मैं अक़सर स्कूल में ऑमलेट ले जाता था। कभी-कभार कबाब भी ले गया। मैं केंद्रीय विद्यालय में पढ़ा हूँ और मुझे याद नहीं आता कि किसी भी साथी या शिक्षक ने इस बाबत मुझसे ऐतराज़ जताया हो। गोश्त नहीं ले जाने का व्यावहारिक कारण यही रहा होगा कि उसे ठंडा खाने में मज़ा नहीं है। इधर जब से मैं पढ़ा रहा हूँ खान-पान को लेकर कई बार पूर्वाग्रहों का साक्षी रह चुका हूँ। कभी कुछ विद्यार्थी (व कुछ शिक्षक भी) अंडा-माँस के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं, छी-छी करने लगते हैं। ऐसे में मुझे उन्हें सख़्त लहजे में समझाना पड़ता है। ये भी याद आता है कि एक-दो बार दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों से ही पता चला कि उनके शिक्षक/शिक्षिका ने उन्हें स्कूल के शिक्षा-विद्या-सरस्वती के स्थल होने का हवाला देकर टिफ़िन में अंडा/माँस लाने से मना किया है। वैसे ये आतंक स्कूलों तक ही सीमित नहीं है। जिस संस्थान से मैंने शिक्षण की पढ़ाई की है वहाँ विविधता, बहु-सांस्कृतिकता व निर्पेक्षता के पाठ तो पढ़ाये जाते हैं और उनपर चर्चा-शोध भी होते हैं लेकिन केंद्रीय स्तर के उस सार्वजनिक स्थल की कैंटीन में अंडा-ऑमलेट तक नहीं मिलता है। और यह कोई अपवाद नहीं है बल्कि परंपरा की श्रेष्ठता का दक़ियानूसी व जातिगत लबादा पहने अधिकतर उच्च-शिक्षा संस्थानों का यही हाल है। ऐसे में जबकि किताबों में एक-दो पाठ हैं जिनमें माँस के व्यंजन का ज़िक्र है, ये शिक्षक साथी उनसे कैसे ग़ुज़रते होंगे? कुछ शिक्षक साथी हैं जिनकी आपसी चर्चा से पता चलता है कि वो माँस के शौक़ीन हैं और कभी-कभार मिलजुलकर दावत भी उड़ाते हैं। कक्षा में जब भी विद्यार्थियों से उनके अपने या पारिवारिक खान-पान को लेकर सर्वे किया है यह बात साफ़ निकलकर सामने आई है कि न सिर्फ़ पूर्णतः शाकाहारी अल्पमत में हैं बल्कि विश्वास में लेने पर पोर्क व बीफ़ खाने वालों के हाथ भी उठते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद स्कूल के माहौल में माँस एक सामान्य, सहज रूप में उपस्थित नहीं है। क्लास में मैं ख़ुद भी इस तरह की चर्चा करता तो हूँ तथा मुर्ग़े के माँस को चिकन, बकरे को मटन और गाय-भैंस को बीफ़ कहते हैं ये बिना किसी आपत्ति के लिखाया भी है, लेकिन अब पूर्व की तरह तसल्ली नहीं होती। पर्यावरण अध्ययन की किताब मे देश-दुनिया की विविधता को लेकर तरह-तरह के जीवों के खाये जाने का उल्लेख किया गया है मगर इन प्रगतिशील पाठों में भी गाय तो दूर भैंस व सूअर तक का नाम उस हैरतंगेज़ सूची में शामिल नहीं है। तो इस संदर्भ में कि देश की लगभग 70% आबादी माँसाहारी है (कई प्रांतों में 90% से भी अधिक), बहुत-से राज्यों व समुदायों में गाय-भैंस का माँस भी सामान्य रूप से खाया जाता है और हमारा संविधान वैयक्तिक स्वतंत्रता तथा निर्पेक्षता को प्रतिबद्ध है, क्या कारण है कि राज्य-सरकारें मिड-डे-मील में अंडा बाँटने का विरोध करती हैं व किताबों से लेकर आपसी व्यवहार में हमारे स्कूलों में एक ख़ास आग्रह की संस्कृति थोपी जाती है?  हम सोच सकते हैं कि उन बच्चों पर क्या ग़ुज़रती होगी जिन्हें अपने खान-पान के चलन को चोरों की तरह छुपाना पड़ता है और उसका नाम आने पर तिरस्कार-घृणा का निशाना बनना पड़ता है। हम यह भी पूछ सकते हैं कि आख़िर क्यों सूअर पर (या बैल या भैंस पर भी) निबंध नहीं लिखाये जाते और क्यों गाय के निबंध को एक ख़ास तरह से ही लिखाया जाता है। वैसे तो ये सवाल पूछना बेमानी है कि दो लोगों द्वारा आठ लोगों के वैयक्तिक हक़ों का उल्लंघन करना ज़्यादा ग़लत है या आठ लोगों द्वारा दो लोगों के हक़ों का उल्लंघन, लेकिन क्योंकि खान-पान को लेकर शिक्षा में पारंपरिक व क़ानून में तेज़ी से उभारी जाती हुई संस्कृति पहली स्थिति के ज़्यादा नज़दीक है इसलिए यह हमें hegemony की परिघटना (किसी संस्कृति का सत्ता के बल पर वर्चस्व व ख़ुद दमित वर्गों द्वारा उसके बोध को आत्मसात करना) को बढ़िया से समझने का उदाहरण पेश करती है। 

उपरोक्त उलझनों से जूझते हुए छुट्टियाँ ग़ुज़ारने लखनऊ पहुँचा तो एक हल्के-फुल्के अध्ययन का ख़ाका दिमाग़ में था। शुरु में जो देखा वो अंदाज़े के अनुरूप था। शहर में गोश्त की बहुत-सी दुकानें बंद थीं। गोश्त के व्यंजनों वाले होटलों पर भी वो चहल-पहल नहीं थी। हालाँकि राज्य सरकार के आदेश को लगभग दो महीने हो चुके थे और इस बीच उच्च न्यायालय के निर्देश से क़साइयों को राहत मिली थी व उनका हौसला बढ़ा था। मुझे जिस बात का सबसे गहरा सदमा पहुँचा वो मेरे घर के पड़ोस का बदला हुआ दृश्य था। हमारी कॉलोनी के बग़ल में एक बस्ती है जिसमें मुख्यतः दलित पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं। कॉलोनी के गेट से चंद क़दमों की दूरी पर, सड़क के ठीक किनारे मुर्ग़े की कई अस्थाई दुकानें लगती थीं। इस बार वो सब बंद थीं। उनमें वो दुकान भी थी जिसपर बरसों से मैं एक लड़की को काम करते हुए देखता आया हूँ और जिसके बारे में बड़े गर्व से अपने दोस्तों, रिश्तेदारों व विद्यार्थियों को बताता आया हूँ। पता करने पर मालूम हुआ कि उन लोगों ने कुछ दिन तक तो अपना काम बंद रखा और पिछले दो-तीन हफ़्तों से उन्होंने सड़क से थोड़ा हटकर पक्के ढाँचे में अपनी दुकानें लगानी शुरु कर दी हैं। उनमें से एक-दो लोगों से बात की तो उन्होंने काफ़ी माली नुक़सान होने की और ग्राहकों में कमी आने की शिकायत साझा की, लेकिन साथ ही इसे सरकार की लाइसेंस आदि को लेकर नियमों की सख़्ती के रूप में भी व्यक्त किया। ये अफ़सोस की बात है कि अपने ही ख़िलाफ़ इस्तेमाल किये जा रहे प्रशासनिक नियमों को वो संदेह का लाभ दे रहे थे। इसमें सरकार के दमनकारी चरित्र का एहसास भी था।  इन दुकानदारों ने बताया कि इस काम के लिए पक्की जगह लेने में कितनी मुश्किल व कितना ख़र्चा है - एक तो ज़मीन-प्लॉट के मालिक किराये पर जगह देते नहीं या फिर महँगी देते हैं, और अगर अपनी जगह भी हो तो अड़ोस-पड़ोस की दुकान वाले ऐतराज़ जताते हैं। इसी बस्ती में दूसरी तरफ़ कुछ पोर्क की दुकानें हैं। उनमें से एक पर तो अभी भी बंदी की प्रशासनिक सील लगी हुई है। इन दुकानों में न सिर्फ़ पोर्क मिलता है, बल्कि बनता भी है और ग्राहकों द्वारा खाया भी जाता है। उन्होंने बताया कि उनकी दुकानें क़रीब महीने से ज़्यादा समय तक बंद रहीं और फिर उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही खुल पाईं।  जिन तीन दुकानों पर मैं गया उन सबसे पता चला कि उन्होंने बहुत नुक़सान झेला है तथा ग्राहक भी पहले से कम हो गए थे। जब सड़क-पार स्थित मंदिर की ओर इशारा करते हुए मैंने उन्हें बताया कि सरकार एक नियम का हवाला दे रही है जिसके अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल के 100 मीटर के दायरे में कोई गोश्त की दुकान नहीं हो सकती तो उन तीनों ने ही यह कहते हुए सख़्त ऐतराज़ जताया कि उनका काम और दुकान पहले से है जबकि मंदिर बाद में बना है। इस बारे में अधिक बातचीत होने पर, जिसमें मेरा इशारा ख़ुद हिन्दू कही जाने वाली संस्कृतियों के बीच खान-पान की विविधता की तरफ़ था, दुकान की एक महिला ने माना कि पिछले दिनों पुलिस ने एक दुर्गा मंदिर में बंगाली समुदाय को बकरा काटने से रोक दिया था। यह भी सोचने की बात है कि जब कोई धार्मिक स्थल पूर्व-स्थित गोश्त की दुकान या होटल के नज़दीक बन ही गया है तो क्या इससे यह स्वयंसिद्ध नहीं हो जाता कि उक्त स्थल के कर्ता-धर्ता लोगों को ख़ुद ही कोई आपत्ति नहीं है, वरना वो उनके क़रीब निर्माण ही नहीं करते। पोर्क के दुकानदार प्रशासन व सरकार की राजनीति के ज़्यादा मुख़ालिफ़ नज़र आये और उनकी अभिव्यक्ति भी पैनी थी। उदाहरण के लिए, उनमें से एक ने खान-पान को लेकर उत्तर-पूर्व, केरल व ग़ैर-ब्राह्मणिक धर्मों की उदारता की प्रशंसा की और दूसरे ने राज्य सरकार के इस क़दम को मुख्यमंत्री के सवर्णीय आग्रह से जोड़ा। उन्होंने इन बंदिशों से किसानी व चमड़े के काम पर पड़ने वाले नुक़सान का भी ज़िक्र किया। पोर्क की इन दुकानों में मैंने समाज के सबसे दबे-कुचले वर्ग के मज़दूरों को आते और खाते देखा। दुकानदारों का कहना था कि अगर वो अपने नुक़सान की भरपाई क़ीमत बढ़ाकर करेंगे तो उन्हें ये ख़तरा है कि उनकी बिक्री कम हो जायेगी और नियमित ग्राहक छूट जायेंगे। बूचड़ख़ाने के पक्ष में एक तर्क यह था कि इससे जानवरों की चोरी में कमी आती है वरना कुछ लोग बाहर घूमते सूअर को पकड़कर काटकर बेच देते हैं, लेकिन इसके विरोध में ये भी कहा गया कि इससे आने-जाने पर ख़र्चा बढ़ेगा। मैं दो-तीन बकरे के गोश्त की दुकानों पर भी गया जोकि उस बस्ती से हटकर एक मुख्य बाज़ार में धार्मिक रूप से मिश्रित आबादी के बीच हैं। यहाँ मैंने दो लोगों से सरसरी व एक व्यक्ति से कुछ विस्तार से बातचीत की। उस दुकानदार ने बताया कि वो लोग बड़ी मुश्किल से दुकान खोल पा रहे हैं और बहुत नुक़सान उठा रहे हैं। पहले वो अपनी दुकान पर ही जानवर काट लिया करते थे लेकिन अब उन्हें दूर शहर से गोश्त लाना पड़ता है जिससे ख़र्चा भी बढ़ गया है। अव्वल तो जानवर मिल ही नहीं रहे हैं। अभी एक दिन पहले उनसे मिलने गया था तो स्थिति बेहतर बताई लेकिन सरकार के किसी हालिया वक्तव्य का उल्लेख करते हुए ये अंदेशा भी जताया कि ईद के बाद फिर प्रशासनिक दमन होगा। उन्होंने ये भी बताया कि गाँव-देहात में लोग बहुत परेशान हैं क्योंकि एक तो वहाँ न बूचड़ख़ाने हैं और न लाइसेंसयुक्त दुकानें और ऊपर से पुलिस भी वहाँ अधिक निरंकुश है, जबकि शहर में स्थिति कुछ बेहतर है। इसके अलावा मैंने कुछ होटल वालों से भी बात की। काम सबका कई हफ़्तों प्रभावित हुआ था। जैसे एक जगह कबाब बाहर नहीं बन रहे थे तो दूसरी जगह होटल जल्दी बंद हो जाता था। पुराने शहर में स्थित टुंडे कबाब की जिस मशहूर दुकान पर हमने खाना खाया वहाँ के एक कर्मचारी ने बताया कि कबाब मुर्ग़े का है, जबकि एक अन्य ने कहा कि मुर्ग़े का भी है और 'बड़े' का भी। ज़ाहिर है कि स्रोत बताने को लेकर कुछ आशंका थी। मेरे पड़ोस के बाज़ार के एक होटल वाले ने बताया कि उन्हें इलाक़े के लोगों से कोई परेशानी नहीं हुई है, बल्कि क़रीब के मंदिर के लोगों ने भी अनापत्ति पत्र पर उनकी दुकान के पक्ष में हस्ताक्षर कर दिए हैं व उस पत्र को उन्होंने अदालत में दाख़िल कर दिया है। लेकिन उन्होंने ये ज़रूर कहा कि कुछ बाहरी लोग, जिन्हें उन्होंने 'भगवा गमछे वाले' कहकर चिन्हित किया, कभी-कभार आकर मंदिर से नज़दीकी के नाम पर परेशान करते हैं। (ज़ाहिर है, मुर्ग़े के दुकानदारों की तरह उन्हें भी ये आत्मविश्वास नहीं था कि वो इस बात पर सवाल खड़ा करते कि अपना जायज़ काम करने के लिए उन्हें पड़ोसियों से अनुमति लेने के लिए क्यों कहा जा रहा है और अगर आज उन्होंने पक्ष लिया है तो कल का क्या ठिकाना है आदि।)   

                    राज्य सरकार व केंद्र सरकार की कार्रवाई प्रत्यक्ष रूप से भले ही एक ख़ास धार्मिक पहचान वाले समुदाय को निशाना बनाकर की गई हो और व्यापक मीडिया में इसे देखा भी ऐसे ही गया है, सच तो यह है कि माँस से जुड़ी बंदिशों से सीधे-सीधे देश का एक बड़ा वर्ग प्रभावित हुआ है जो जातिगत रूप से दमित रहा है, श्रम के स्तर पर शोषित और जिसे तथाकथित राष्ट्रीय संस्कृति के पटल से अदृश्य रखा गया है। इसके अलावा कुछ बातें ऐसी थीं जो अलग-अलग जानवरों के गोश्त की दुकान चलाने वालों ने साझा रूप से व्यक्त कीं। उच्च न्यायालय के फ़ैसले से ताक़त लेते हुए सबने यह राय व्यक्त की कि बूचड़ख़ाने खोलने की ज़िम्मेदारी सरकार की है और जबतक वो ऐसा नहीं करती तबतक उसका नियम थोपना भी सही नहीं है। मैंने दो चरणों में बात की थी और पहली बार दुकानदारों ने यह बताया था कि उन्हें 4 जून को होने वाली किसी प्रशासनिक बैठक का इंतज़ार है व उससे कुछ उम्मीद है। लेकिन जब मैं बाद में गया तो उन लोगों ने बताया कि कुछ भी घटित नहीं हुआ था। सभी दुकानदारों ने नियमों को थोपे जाने को लेकर एक बड़ी चिंता बढ़ते आर्थिक ख़र्च की बताई। पोर्क के दुकानदारों ने अधिक लाचारी का इज़हार करते हुए कहा कि अगर उनपर AC, फ़्रिज रखने की शर्तें थोपी गईं तो उनके लिए रोज़ी-रोटी कमाना असंभव होगा। एक परिवार की एक लड़की ने ख़स्ताहाल पंखे की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि वो वैसे भी मुश्किल से ही ग़ुज़र कर पा रहे हैं। बाज़ार में स्थित दुकान के क़साई ने बताया कि फ़्रिज व काले शीशे के दरवाज़े पर ही वो अबतक 27,000 रुपये ख़र्च कर चुका है। (शहर की अन्य दुकानों पर भी मैंने कपड़े या चटाई के पर्दे पड़े देखे, जैसे कि उनके पीछे कोई शर्मनाक या गंदा काम किया जा रहा हो।) हाँ, कुछ ग़ैर-मुस्लिम दुकानदारों में इस विश्वास को लेकर एक असमंजस व खीझ की स्थिति भी दिखी कि सरकार ने गाय को (मुसलमानों के हाथों) कटने से रोकने के लिए कार्रवाई की जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें उठाना पड़ा। तमाम बातचीत में कुछ उत्साहवर्धक तत्व भी थे - एक दुकानदार ने बताया कि जो क़साई संगठन सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहा है उसमें हिंदू-मुस्लिम सभी पृष्ठभूमि के लोग हैं; उनके साथी ने (किसी इलाक़े का नाम लेते हुए) ये बात बहुत ज़ोर देकर कही कि '90% हिंदू इस फ़ैसले को उचित नहीं मानते हैं' और ये वैयक्तिक आज़ादी का मामला है, सिर्फ़ एक समुदाय से जुड़ा हुआ मसला नहीं है। किसी ने भी प्रकट रूप से साम्प्रदायिक विद्वेष की टिप्पणी नहीं की।
     
जहाँ मैं रहता हूँ उससे तीन किलोमीटर दूर एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। पिछले कुछ सालों से मैं यहाँ छुट्टियों में दो-चार दिन जाता रहा हूँ। इस बार गया था तो छोटे-बड़े अलग-अलग समूहों में मिलाकर लगभग तीस-पैंतीस विद्यार्थियों से lynching के मुद्दे पर बात की। ताज्जुब और अफ़सोस इस बात का हुआ कि शायद एक-दो विद्यार्थियों को छोड़कर कोई इस शब्द से भी परिचित नहीं था। उस जगह के लिहाज़ से मुझे ज़रूर निराशा हुई लेकिन हम मान सकते हैं कि ये उनकी प्रथम भाषा का शब्द नहीं है और फिर वो इससे जुड़ी हालिया घटनाओं से वाक़िफ़ थे। सुकून की बात ये थी कि सिवाय एक-दो विद्यार्थियों के (जोकि विधि क्षेत्र में अध्ययन कर रहे थे!) जिन्होंने या तो एकबारगी इस हिंसा को आहत भावनाओं की प्रतिक्रिया कहकर सामान्य क़रार देने की शर्मिंदगी भरी कोशिश की या कोई स्पष्ट कथन नहीं दिया, लगभग हर विद्यार्थी ने lynching की घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा की। ज़्यादातर ने जो तर्क दिए वो 'क़ानून का राज', 'संविधान', 'न्याय-प्रक्रिया', 'अदालत' आदि के इर्द-गिर्द रचे गए थे। यह महत्वपूर्ण है कि उन्होंने वैयक्तिक आज़ादी को लेकर अपनी बात नहीं रखी। उन्मादी भीड़ (mob) का चरित्र समझाने के लिए मैंने उनमें से कइयों के साथ अपना व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया कि साइकिल चोरी करने के इल्ज़ाम में कुछ लड़कों के हाथों बुरी तरह पिट रहे व्यक्ति को जब मैंने नहीं मारने और पुलिस के हवाले करने की बात की तो कैसे वो लड़के मुझपर उस लहूलुहान व्यक्ति से मिले होने का आरोप लगाकर मुझे धमकाने लगे। (मैं अपने साथ वितरित करने के लिए कुछ पुस्तिकायें भी ले गया था, हालाँकि वो सारी इस विषय पर नहीं थीं। थोड़ा असहज महसूस करते हुए मैंने गौ-माँस पर प्रतिबंध लगाने वाले क़ानूनों पर PUDR द्वारा जारी पुस्तिका की तीन-चार प्रतियों को छुपाने के अंदाज़ में पकड़ा हुआ था। यह रोचक है कि जिस छात्र समूह ने वो किताबें न सिर्फ़ मेरे हाथ से लेकर देख लीं बल्कि यह कहकर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए उन्हें ले भी लिया कि वो उनकी बहस में काम आएँगी, उसमें सभी दलित पृष्ठभूमि के थे।) मैं सोचता रहा कि हमारे पास lynching के लिए अपनी भाषा का कोई शब्द क्यों नहीं है। क्या ये कोई विदेशी परिघटना है? या फिर इसका एक कारण भाषा के उस उच्च-वर्णीय चरित्र से जुड़ा है जिसमें शब्दों की स्थापना व उनकी मान्यता इसपर निर्भर करती है कि वो किसके अनुभव को, किसकी पीड़ा को ज़ुबान दे रहे हैं? इसलिए आपके पास गौहत्या शब्द तो है (बकरीहत्या, भैंसहत्या या सूअरहत्या नहीं) लेकिन इंसान की सामूहिक, सार्वजनिक, तमाशाई हत्या के लिए कोई शब्द नहीं। इसीलिए आपके पास गाय के माँस से जुड़े कामों को अपराध बनाने वाले सख़्त-से-सख़्त क़ानून तो हैं लेकिन उन्मादी भीड़ के शिकार इंसानों के लिए कोई क़ानून नहीं है। इसीलिए मुक़दमा मृत के ख़िलाफ़ दर्ज किया जाता है और हत्यारे गौरवान्वित-पुरस्कृत होते हैं। खैर आपको ईद की मुबारकबाद !!!!!!!!

                   

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