Thursday, 24 October 2013
Monday, 14 October 2013
रिपोर्ट: नवउदारवाद के प्रायोजित शोध
फिरोज अहमद
अक्तूबर 8 की शाम 6 बजे नयी दिल्ली स्थित Constitution Club के Deputy Speaker Hall में प्रोफ़ेसर कार्थिक मुरलीधरन ने एक व्याख्यान दिया। प्रोफ़ेसर के नाम के साथ उनका परिचय देने के लिए 'UC San Diego and NCAER, NBER, J-PAL ' लिखा हुआ था। शीर्षक था '' सरकार के स्कूलों की तुलना में भारत में निजी स्कूलों कार्य कैसा है? आंध्र प्रदेश स्कूल चॉयस प्रोजेक्ट से सबूत और शिक्षा अधिकार कानून के clause 12 के लिए इसके निहि तार्थ'' कार्थिक खुद अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और मंच की अध्यक्षता कर रहे श्री शेखर ( NCAER ) के अलावा मुख्य अतिथि श्री मोंटेक सिंह अहलुवालिया ( योजना आयोग के उपाध्यक्ष ) भी इसी क्षेत्र से थे। मंच पर चौथी शख्सियत सुश्री रुक्मिणी बनर्जी की थी जोकि ASER ( असर ) से सम्बन्ध रखती हैं जिसके आंकड़ों-परिणामों का इस्तेमाल लगातार सार्वजनिक स्कूली व्यवस्था को सुदृढ़ करने या सुधारने के लिए नहीं बल्कि बदनाम करके खत्म करने के लिए हो रहा है। यह व्याख्यान NCAER ( National Council for Applied Economic Research ) ने J-PAL ( Abdul Latif Jameel Poverty Action Lab ) और ASER (Annual School Evaluation Report ) के सहयोग से आयोजित किया था। इस चार-साला शोध को अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, Legatum Foundation, Legatum Institute और DFID ( Department of International Development) तथा विश्व-बैंक के आर्थिक सहयोग से अंजाम दिया गया था। इसे आंध्र-प्रदेश सरकार की इजा ज़त व प्रशासनिक मदद भी प्राप्त थी।
ये अपने-आप नवउदारवादी ताकतों की जुर्रत दर्शाता है कि देश की शि क्षा नीति की दिशा तय और क्रिया न्वित करने के लिए मुक्त-बाज़ार के सिद्धांतकारों, अर्थशास्त्रियों की 'विशेषज्ञता ' को जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है । इसी तर्ज पर, पूरे व्याख्यान में, उसके सीमित दृष्टिकोण के अनुरूप,शिक्षा, संविधान, बराबरी और न्याय जैसे शब्द पूर्णतः नदारद थे। कहीं-कहीं तो मंच पर बैठे श्री मोंटेक सिंह ने अपनी सरकारी नुमाइंदगी को धता बताकर अपनी असली निष्ठा दर्शाते हुए वक्ता को टोककर, बल्कि उनसे आगे बढ़कर उन 'तथ्यों' को रेखांकित करने की ज़िम्मेदारी निभाई जिनसे सार्वजनिक स्कूली व्यवस्था की बदहाली-नाकामी और 'कम फीस लेने वाले निजी स्कूलों' की श्रेष्ठता का 'खुलासा' किया जा सके! व्याख्यान के बाद जो सवाल-जवाब हुए उनमें भी सुश्री रुक्मिणी ने सुझाव दिया कि इक्कीसवीं सदी सार्वजनिक-निजी की बहस बेमानी होगी क्योंकि अब तो बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपनी पसंद के कोर्स मुक्त-बाज़ार से प्राप्त कर रहे हैं और असल में तो इसी क्षेत्र में स्वतंत्र चयन प्रदर्शित हो रहा है। यह साफ़ है कि व्याख्यान व इसकी परिचर्चा इस समझ से पूरी तरह कटी हुई थी कि शिक्षा अगर अधिकार है - जैसाकि सिर्फ संविधान की भावना या जनांदोलनों का ही आग्रह नहीं है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और शिक्षा अधिकार कानून की सरसरी व्याख्या से भी प्रकट होता है - तो फिर निजी संचालकों के कम या ज्यादा फीस वाले स्कूलों के लिए जगह ही कहाँ बचती है। वर्तमान शासक-वर्ग विश्व-बैंक की नीतियों का कितना समर्पित कर्मचारी है यह मंच पर उपस्थित मुख्य-अतिथि की इस विषय पर चुप्पी व अन्य मुद्दों पर उनके उकसावे की सक्रीयता ने ही साफ़ कर दिया।
शोध में दो प्रश्नों को प्रमुखता से निशाना बनाया गया था - (1) सभी अन्य कारकों को बराबर रखते हुए, निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से अधिक प्रभावी हैं या कम? (2) शिक्षा अधिकार कानून के clause 12 के तहत आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों ( EWS ) के विद्यार्थियों के निजी स्कू लों में लिए जाने से उन विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा जो पहले ही से इन निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं?
इन दोनों प्रश्नों से ही शोध के दर्शन व रुझान का पता चल जाता है। ऐसे प्रायो जित शोधों में, प्रोफ़ेसर कार्थिक के इन दावों के बावजूद कि प्रस्तुत विश्लेषण उनके अपने हैं और प्रायोजकों का उनसे कोई लेना-देना नहीं है, यह तय होता है कि कौन-से प्रश् नों को खड़ा नहीं किया जायेगा - जो परिघटना के वृहद् व मौलिक का रकों की पड़ताल करें - और इनके बनिस्बत किन प्रश्नों को उछालकर प्रायोजकों के एजेंडे को बढ़ाया जायेगा। इस शोध में प्रभावशीलता का जो पैमाना सामने रखा गया है वह एक मुनीम की नफा-नुकसान की बही से अधिक कुछ नहीं है जिसमें योगदान अर्थ के फूहड़ मायने तक सीमित है और फल चुनिन् दा विषयों में परीक्षा की जांच से प्राप्त अंकों तक। स्पष्ट है कि राष्ट्र-निर्माण, नागरिक चेतना, न्याय के प्रति समर्पण, तार्किकता, संवेदनशीलता, स्थानीय जुड़ाव आदि व्यापक आयामो की संकल्पना इस नवउदारवादी चि ंता में शामिल नहीं की जा सकती। बल्कि ये तो इसके चरि त्र के ही प्रतिकूल हैं। दूसरी ओर, शोध की प्रेरक चिंता है कि निजी स् कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थियों पर इन 'चॉयस' वाले विद्यार्थियों के आने से कुछ दुष्परिणाम तो नहीं होंगे ! ( और ये बड़ी उदारता से साबित करता है कि दुष्परिणाम नहीं हुए। ) शोध में विद्यार्थियों से जिन स्कूलों को छुड़वाकर उन्हें निजी स्कूलों में प्रवेश दिलाया गया है, उन स्कूलों, उनके विद्यार्थियों और शिक्षकों पर इसके क्या परिणाम होंगे इसकी चिंता से शोध कोई सरोकार व्यक्त नहीं करता है। ज़ाहिर है कि जब शोध RTE कानून के clause 12 की वका लत करने के मकसद से किया जायेगा तो ये प्रश्न उठ भी नहीं सकते।
यह आश्चर्यजनक है कि ऐसे बेहूदा शो ध प्रस्ताव को आंध्र-प्रदेश सरकार ने मंजूरी दे दी जिसकी योजना में ही बच्चों और सरकारी स्कूलों को गि नी पिग्स की तरह एक प्रयोग में इस्तेमाल करना था । विश्व-बैंक व इसकी पिट्ठू संस्थाओं से तो हम उम्मीद नहीं करते कि वो मेहनतकश वर्गों के बच्चों की गरिमा, उनके इंसान होने की प्रतिष्ठा और सार्वजनिक शिक् षा की रक्षा के लिए उचित समझ-नी यत का परिचय देंगे पर जब चुनी हुई सरकारें नवउदारवाद के दबाव में काम करेंगी तो उनसे भी ऐसी अपेक्षा रखना बेमानी हो गा।
इस शोध में ही प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार जिन 90 गाँवों में 'वाउचर' - जिसे वहाँ छात्रवृत्ति कहा गया - का प्रयोग किया गया उनमें 60% माता-पिता ने ही इसमें आवेदन किया और फिर लॉ टरी में चुन लिए गए 60% लोगों ने इस 'लाभ' को अस्वीकार कर दिया! बाक़ी बचे विद्यार्थियों में से भी लगभग 20% चार साल के भीतर वापिस चले गए। यानी, कुल आबादी के करीब 80% हिस्से ने इस प्रयोग को ही नकार दिया ! पर व्याख्यान में इन महत्वपूर्ण तथ्यों का कोई विश्लेषण प्रस्तुत नहीं किया गया। शोध के मुताबिक जिन विद्यार्थियों को निजी स्कूलों में दाखिल किया गया उनके तेलुगु व गणित के स्तर में सरकारी स्कूलों में 'रह गए' विद्यार्थियों के मुकाबले कोई फर्क नहीं दिखा - शायद नकारात्मक ही रहा। जबकि अंग्रेजी, पर्यावरण अध्ययन व हिंदी - जोकि वहाँ के सरकारी स्कूलों में उस स्तर पर एक विषय नहीं है - में तुलनात्मक बढ़ोतरी पाई गई। यह ग़ौर करने योग्य है कि सुश्री रुक्मिणी ने इसपर जो टिप्पणी की भी वो कुल मिलाकर यह थी कि जब ये पता है कि पढ़ना ( साक्षरता के अर्थ में ) इतना महत्वपूर्ण पक्ष है तो फिर शोधों में पर्यावरण अध्ययन जैसे विषयों पर क्यों बेकार में ध्यान दिया जा रहा है! तेलुगु - जोकि शायद शोध में शामिल अधिकतर बच्चों की मातृभाषा होगी - और गणित में निजी स्कूलों के तुलनात्मक रूप से कम प्रभाव 'प्रभाव' को भी यह कहकर खारिज किया गया कि निजी स्कूल तो वैसे भी समय-सारणी में इन विषयों को कम स्थान देते हैं। अंततः साबित यह हुआ कि जब कम समय देकर भी वो सरकारी स्कूलों की लगभग बरा बरी कर पा रहे हैं तो यहाँ भी उनकी प्रभावशी लता अधिक हुई! और वक्ता के अनुसार ( निजी स्कूलों की प्रभावशीलता के विपरीत जा रहे ) गणित व तेलुगु के जिन परिणामों ने उन्हें उलझाया था उनकी तह में जाने पर उन्हें जो उक्त विश्लेषण प्राप्त हुआ वो ही उनके शोध का eureka ( खोज का विस्मयकारी ) क्षण था! व्याख्यान के बाद चर्चा के समय प्रोफ़ेसर कार्थिक ने इस 'रोचक' तथ्य को कि हिंदी निजी स्कूलों में पढ़ाई जा रही है और सरकारी स्कूलों में नहीं इस समझ से विश्लेषित किया कि यह श्रम बाज़ार के विस्तार से जुड़ा पहलू है। मातृभाषा यानी स्थानीय श्रम बाज़ार, हिंदी यानी राष्ट्रीय श्रम बाज़ार और अंग्रेजी यानी अंतर्राष्ट्रीय श्रम बाज़ार में काम करने के अवसर। इस कथन से उन्होंने इस बात की भी पुष्टि कर दी कि नवउदारवाद हर व्यक्ति को, चाहे वो विश्वविद्यालय का प्रोफ़ेसर क्यों न हो, बाजारू और पूँजी के मुनाफे के उत्पादन में लगे श्रम के रूप में देखता है। और इस दर्शन के सिद्धांतकार तक इसमें अपनी भूमिका को लेकर स्पष्ट हैं कि वो भी पूँजी के अधीन हैं व उसे अपना श्रम बेचकर जीविका कमा रहे हैं। ऐसे शोधों से ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो इसकी पड़ताल करें, निदान सुझाना तो दूर, कि सरकारी स्कूलों में किन संरचनाओं व नी तियों के तहत शिक्षकों का अध्यापन ( 'संपर्क समय' ) नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। शोध के अनुसार शिक्षण की गुणवत्ता के लिए शिक्षक योग् यता न तो अनिवार्य शर्त है और न ही पर्याप्त। ऐसे में क्योंकि निजी स्कूलों के शिक्षक कुल मिलाकर (क) कम वेतन में (ख) अधिक प्रयास करते हैं और (ग) उनका शिक्षण समय भी ज्यादा होता है, तो उनके स्कूलों की प्रभावशीलता अपने-आप बेहतर हुई। इस परिस्थि ति के लिए प्रोफ़ेसर कार्थिक मुख्य का रक निजी प्रबंधन को मानते हुए कहते हैं कि दरअसल शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं व नियामक संस् थाओं - शायद उनका अभिप्राय CBSE, NCTE आदि से था - का स्कूलों पर न्यूनतम मा पदंडों के पालन की शर्त लगाना अतार्किक व व्यर्थ है। उन्हें तो सिर्फ एक शर्त रखनी चाहिए कि स्कूल पा रदर्शी रूप से अपनी पूरी स्थिति घोषित कर दें ताकि एक समाज/देश ( मुक्त बाज़ार ) के अभिभावक ( खरीदार ) समुचित, पूर्व जानकारी से लैस होकर विभिन्न स्कूलों के बीच चुनाव कर सकें। फिर योग् यता X प्रयास को गुणवत्ता का सूत्र बताकर प्रोफ़ेसर कार्थि क ने स्वयं ही अपने द्वारा योग् यता की अनिवार्यता पर लगाये गए प् रश्न को नकार दिया।
शिक्षा को पण्य वस्तु बनाकर उसके बाज़ार को गरम करने का काम ऐसे नवउदारवादी 'शोधकर् ता' व 'विद्वान' ही कर सकते हैं जिन्होंने एक सुन् दर, समाजवादी, समतामूलक व भ्रातृत्व के मूल्यों पर आधा रित समाज का सपना न देखा है, न देखना जानते हैं और न देखना चाहते हैं। इनकी मं शा यही है कि अन्य लोग भी यह सपना न देखें और संस्कृति व राजव् यवस्था भी पूँजीवाद के मानवद्रो ही, कुरूप मूल्यों से संचालित हो।
जो कुछ तालिकाएँ उन्होंने प्रदर्शि त कीं उनमें से एक बयाँ कर रही थी कि 80% सरकारी स्कूलों में इस्तेमाल मे ं लाया जा रहा पुस्तकालय है जबकि निजी स्कूलों के लिए यह आंकड़ा 10% से भी कम था पर क्योंकि इस नवउदारवादी दर्शन में काम की चीज़ वही है जो महज़ साक्षर बनाने में योगदान देती दिखे, सो इस आधार पर पुस्तकालय स्कूलों का एक नाहक का अंग और सरकार के लिए फजूलखर्च साबित होता है!
( संभव है कि शोध में ऐसे और उदाहरण हों पर अभी 60 पृष्ठ का पूरा शोधपत्र हाथ नहीं लगा है और यहाँ व्याख्यान तथा बांटे गए 4 पृष्ठ के सार को ही आधार बनाकर टिप्पणी की गई है। )
व्याख्यान के अंत में जिस तरह श्री शेखर ने सवाल पूछने के लिए हाथ खड़ा किये हुए लोगों में से प्रश्नकर्ताओं को छाँटा उसमें भी सांठगाठ झलक रही थी। उदाहरण के लिए, कम फीस वाले स्कूलों के किसी राष्ट्रीय समूह की प्रतिनिधि ( मुखिया ? ), 'असर' की एक वरिष्ठ सदस्या और हरियाणा में एक NGO चलाने वाले व्यक्ति को सवाल पूछने के लिए 'चुना गया' था। चुनना ही तो मुक्त-बाज़ार का कलमा है! ( अगर यह मात्र एक संयोग था तो भी इससे आयोजित सभा के 'प्रथम श्रोताओं' के संस्थाई चरित्र का पता चलता है। ) फिर भी वहाँ उपस्थित दिल्ली प्रशासन के शिक्षा निदेशक महोदय ने कुछ ऐसी जानकारी साझा करने की ज़िम्मेदारी निभा दी जिनसे व्याख्यान में किये गए कुछ दावों पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए। जैसे, शोध के आग्रह के विपरीत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार बढ़ रहा है; एक निरपेक्ष परीक्षा व्यवस्था ( CBSE ) से तो पहले ही सरकारी-निजी स्कूलों की तुलना हो जाती है और जब निजी स्कूल भी शिक्षकों को कानून-सम्मत पूरी तनख्वाह देने को बाध्य हैं तो सरकारी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले उनके एक-तिहाई या एक-छठवें वेतन को प्रभावशीलता का नीति के लिए अनुकरणीय पैमाना बनाने का प्रश्न उठाना ही नाजायज़ है। यह सच है कि हमने प्रोफ़ेसर के जवाब सुनने की ज़हमत नहीं उठाई। वैसे, वो पहले ही कह चुके थे कि मापदंड बनाकर लागू करवाना अतार्किक व अनुचित है। ( पर सरकार को शिक्षा अधिकार कानून के clause 12 के लिए जो केंद्रीकृत मापदंड बनाने की अनुशंसा उनके शोध में निहित है उसे मूर्त रूप देने के सरकारी आमन्त्रण को स्वीकार करके वो जल्दी ही एक तीन-सूत्रीय रूपरेखा प्रस्तुत करने जा रहे हैं - जिसका सार उन्होंने श्रोताओं से साझा भी किया। यहाँ हमें उस आलोचना की सत्यता का प्रमाण मिलता है कि नवउदारवादी मुक्त-बाज़ार व्यवस्था में राज्य की भूमिका सिमटती नहीं है बल्कि, सैद्धांतिक स्तर पर उसे निरपेक्ष और नेपथ्य-स्थित बता-जता के, पूँजी के पक्ष में विशेष प्रकार से परिवर्तित कर दिया जाता है। )
अक्तूबर 8 की शाम 6 बजे नयी दिल्ली स्थित Constitution Club के Deputy Speaker Hall में प्रोफ़ेसर कार्थिक मुरलीधरन ने एक व्याख्यान दिया। प्रोफ़ेसर के नाम के साथ उनका परिचय देने के लिए 'UC San Diego and NCAER, NBER, J-PAL ' लिखा हुआ था। शीर्षक था '' सरकार के स्कूलों की तुलना में
व्याख्यान के अंत में जिस तरह श्री शेखर ने सवाल पूछने के लिए हाथ खड़ा किये हुए लोगों में से प्रश्नकर्ताओं को छाँटा उसमें भी सांठगाठ झलक रही थी। उदाहरण के लिए, कम फीस वाले स्कूलों के किसी राष्ट्रीय समूह की प्रतिनिधि ( मुखिया ? ), 'असर' की एक वरिष्ठ सदस्या और हरियाणा में एक NGO चलाने वाले व्यक्ति को सवाल पूछने के लिए 'चुना गया' था। चुनना ही तो मुक्त-बाज़ार का कलमा है! ( अगर यह मात्र एक संयोग था तो भी इससे आयोजित सभा के 'प्रथम श्रोताओं' के संस्थाई चरित्र का पता चलता है। ) फिर भी वहाँ उपस्थित दिल्ली प्रशासन के शिक्षा निदेशक महोदय ने कुछ ऐसी जानकारी साझा करने की ज़िम्मेदारी निभा दी जिनसे व्याख्यान में किये गए कुछ दावों पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए। जैसे, शोध के आग्रह के विपरीत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार बढ़ रहा है; एक निरपेक्ष परीक्षा व्यवस्था ( CBSE ) से तो पहले ही सरकारी-निजी स्कूलों की तुलना हो जाती है और जब निजी स्कूल भी शिक्षकों को कानून-सम्मत पूरी तनख्वाह देने को बाध्य हैं तो सरकारी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले उनके एक-तिहाई या एक-छठवें वेतन को प्रभावशीलता का नीति के लिए अनुकरणीय पैमाना बनाने का प्रश्न उठाना ही नाजायज़ है। यह सच है कि हमने प्रोफ़ेसर के जवाब सुनने की ज़हमत नहीं उठाई। वैसे, वो पहले ही कह चुके थे कि मापदंड बनाकर लागू करवाना अतार्किक व अनुचित है। ( पर सरकार को शिक्षा अधिकार कानून के clause 12 के लिए जो केंद्रीकृत मापदंड बनाने की अनुशंसा उनके शोध में निहित है उसे मूर्त रूप देने के सरकारी आमन्त्रण को स्वीकार करके वो जल्दी ही एक तीन-सूत्रीय रूपरेखा प्रस्तुत करने जा रहे हैं - जिसका सार उन्होंने श्रोताओं से साझा भी किया। यहाँ हमें उस आलोचना की सत्यता का प्रमाण मिलता है कि नवउदारवादी मुक्त-बाज़ार व्यवस्था में राज्य की भूमिका सिमटती नहीं है बल्कि, सैद्धांतिक स्तर पर उसे निरपेक्ष और नेपथ्य-स्थित बता-जता के, पूँजी के पक्ष में विशेष प्रकार से परिवर्तित कर दिया जाता है। )
Friday, 27 September 2013
फोटो : दिल्ली सरकार द्वारा सेवानिवृति में 5 साल विस्तार दिए जाने के विरोध में प्रदर्शन
| 14 सितम्बर के विरोध प्रदर्शन का बैनर |
| विचार विमर्श करते शिक्षक साथी |
| मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार के नाम खुला पत्र का पोस्टर |
| क्रांतिकारी गीत गाते साथी |
| प्रेम चंद , महासचिव, आल इंडिया पब्लिक सर्वेंट फेदरेसन |
| सत्येन्द्र नागर, संयोजक, नगर निगम शिक्षक संघ , शाहदरा दक्षिणी |
राघवेन्द्र प्रपन्ना, व्याख्याता,महर्षि बाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, दिल्ली विश्विद्यालय
|
| Add caption |
Friday, 20 September 2013
ज्ञापन- उप-राज्यपाल को दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के पश्चात पांच साल सेवा विस्तार दिए जाने के फैसले के खिलाफ
माननीय उप-राज्यपाल दिनांक : 14 सितम्बर, 2013
दिल्ली सरकार
राजनिवास, राजनिवास मार्ग
दिल्ली-110054
विषयः दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के पश्चात पांच साल सेवा विस्तार दिए जाने के फैसले के खिलाफ ज्ञापन
महोदय,
शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) के अवसर पर इस बार दिल्ली सरकार ने शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 वर्ष करने की घोषणा की है। हम उम्मीद कर रहे थे कि शिक्षकों की रिक्तियों के कारण सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिए शिक्षकों की भर्ती की और बड़ी संख्या में अनियमित कार्यरत शिक्षकों को नियमित करने की घोषणा की जायेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सेवानिवृत्ति की उम्र को 65 वर्ष तक विस्तारित करना नई भर्ती पर रोक लगाना भी है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नए शिक्षकों की भर्ती दिल्ली के छात्रों की शिक्षा के लिए आवश्यक शर्त है। दिल्ली में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल खोलने की जरूरत है। आज शैक्षिक अर्हता और प्रशिक्षण पाए ऊर्जावान युवा लोगों की एक बड़ी संख्या स्कूलों में अपना योगदान देने की राह देख रही है। शिक्षक दिवस पर बड़े पैमाने पर शिक्षको की नियमित भर्ती की घोषणा से दिल्ली की सरकारी स्कूल व्यवस्था में बेहतर शैक्षिक माहौल बनता और समाज में आशा का संचार होता। हम मांग करते हैं कि इस सन्दर्भ में नियमित शिक्षकों की भर्ती के अभियान की घोषणा जल्द से जल्द की जाए।
संविधान के तहत सामाजिक न्याय के आधार पर नए शिक्षकों की भर्ती से समाज के वंचित तबकों को अधिकार-सम्मत प्रतिनिधित्व मिलता। आमतौर पर जिस उम्र के लोगों को सेवानिवृत्ति की उम्र विस्तार की कथित सुविधा दी गयी है, उनमें दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों की भागीदारी बहुत कम है। नयी भर्ती की प्रक्रिया के टलने से दिल्ली सरकार के घोषित सामाजिक न्याय के उद्देश्य को फलीभूत करने में रूकावट आएगी। कृपया इस विरोधाभासी स्थिति को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
पुनश्चः
हम मांग करते हैं कि
1 सेवानिवृत्ति की उम्र विस्तारित न की जाए।
2 सेवानिवृत्त शिक्षकों को पेंशन, पारिवारिक सुरक्षा व अन्य गतिविधियों के लिए सुविधाएं प्रदान की जाएं।
3 प्रत्येक सत्र में नए शिक्षकों की नियुिक्त की व्यवस्था की जाए।
4 अनियमित व संविदा शिक्षकों को नियमित किया जाए।
5 नए सरकारी स्कूलों का निर्माण किया जाए और छात्रों को सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जाएं।
6 स्कूलों में स्वयं सेवी संस्थाओं के प्रवेश को रोका जाए।
7 शिक्षकों को गैरशैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाए।
फिरोज अहमद राजेश
लोक शिक्षक मंच के लिए
बी आठ नीलकंठ अपार्टमेंट
संतनगर, बुराड़ी
दिल्ली-110084
संलग्नकः हस्ताक्षर अभियान की मूल काॅपी
दिल्ली सरकार
राजनिवास, राजनिवास मार्ग
दिल्ली-110054
विषयः दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के पश्चात पांच साल सेवा विस्तार दिए जाने के फैसले के खिलाफ ज्ञापन
महोदय,
शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) के अवसर पर इस बार दिल्ली सरकार ने शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 वर्ष करने की घोषणा की है। हम उम्मीद कर रहे थे कि शिक्षकों की रिक्तियों के कारण सार्वजनिक स्कूल व्यवस्था में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिए शिक्षकों की भर्ती की और बड़ी संख्या में अनियमित कार्यरत शिक्षकों को नियमित करने की घोषणा की जायेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सेवानिवृत्ति की उम्र को 65 वर्ष तक विस्तारित करना नई भर्ती पर रोक लगाना भी है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नए शिक्षकों की भर्ती दिल्ली के छात्रों की शिक्षा के लिए आवश्यक शर्त है। दिल्ली में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल खोलने की जरूरत है। आज शैक्षिक अर्हता और प्रशिक्षण पाए ऊर्जावान युवा लोगों की एक बड़ी संख्या स्कूलों में अपना योगदान देने की राह देख रही है। शिक्षक दिवस पर बड़े पैमाने पर शिक्षको की नियमित भर्ती की घोषणा से दिल्ली की सरकारी स्कूल व्यवस्था में बेहतर शैक्षिक माहौल बनता और समाज में आशा का संचार होता। हम मांग करते हैं कि इस सन्दर्भ में नियमित शिक्षकों की भर्ती के अभियान की घोषणा जल्द से जल्द की जाए।
संविधान के तहत सामाजिक न्याय के आधार पर नए शिक्षकों की भर्ती से समाज के वंचित तबकों को अधिकार-सम्मत प्रतिनिधित्व मिलता। आमतौर पर जिस उम्र के लोगों को सेवानिवृत्ति की उम्र विस्तार की कथित सुविधा दी गयी है, उनमें दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों की भागीदारी बहुत कम है। नयी भर्ती की प्रक्रिया के टलने से दिल्ली सरकार के घोषित सामाजिक न्याय के उद्देश्य को फलीभूत करने में रूकावट आएगी। कृपया इस विरोधाभासी स्थिति को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
पुनश्चः
हम मांग करते हैं कि
1 सेवानिवृत्ति की उम्र विस्तारित न की जाए।
2 सेवानिवृत्त शिक्षकों को पेंशन, पारिवारिक सुरक्षा व अन्य गतिविधियों के लिए सुविधाएं प्रदान की जाएं।
3 प्रत्येक सत्र में नए शिक्षकों की नियुिक्त की व्यवस्था की जाए।
4 अनियमित व संविदा शिक्षकों को नियमित किया जाए।
5 नए सरकारी स्कूलों का निर्माण किया जाए और छात्रों को सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जाएं।
6 स्कूलों में स्वयं सेवी संस्थाओं के प्रवेश को रोका जाए।
7 शिक्षकों को गैरशैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाए।
फिरोज अहमद राजेश
लोक शिक्षक मंच के लिए
बी आठ नीलकंठ अपार्टमेंट
संतनगर, बुराड़ी
दिल्ली-110084
संलग्नकः हस्ताक्षर अभियान की मूल काॅपी
Tuesday, 17 September 2013
रिपोर्ट: शिक्षकों के सेवा-विस्तार की उम्र बढ़ाने के विरोध में प्रदर्शन
दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों के सेवा विस्तार की उम्र 65 तक बढाने के फ़ैसले के विरोध में लोक शिक्षक मंच द्वारा 14 सितम्बर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन आयोजित किया गया. प्रदर्शन लगभग 10 बजे सरकार के फैसले के खिलाफ जोशीले नारों की हुँकार से शुरु हुआ। मंच संचालन की ज़िम्मेदारी राजेश ने निभाई। उन्होंने उपस्थित साथियों को अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया। राजीव (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने विभिन्न देशों के सेवानिवृत्ति सम्बन्धी आंकड़े रखकर यह साबित किया कि कैसे सरकार का उक्त फैसला तर्कसंगत नहीं है। उनका मत था कि शिक्षण के कार्य में विशेष कौशल के अतिरिक्त ऊर्जा की भी ज़रूरत होती है जोकि, उन्हें लगता है, उम्र के साथ प्रभावित होने लगती है। इसके बाद राजेश की अगुवाई में लोक शिक्षक मंच के साथियों द्वारा 'तू जिंदा है...' गीत गाकर उत्साह प्रवाहित किया गया।
एक अध्यापक तरुण कुमार ने पहले की सेवानिवृत्ति की उम्र, 58 वर्ष, को सही ठहराया। उनका कहना था कि आजकल तरह-तरह की बीमारियों से जल्दी ग्रस्त होने की सम्भावना बढ़ गई है जिस कारण भी सरकार का यह फैसला ग़लत है।
डॉ. जी. पी. ध्यानी ( पी.जी.टी , दिल्ली सरकार ) ने कहा कि इस निर्णय से युवा-वर्ग के हित प्रभावित होंगे। उन्होंने आश्चर्य जताया कि जिस निर्णय से सरकार की वित्तीय हालत भी नहीं सुधरेगी, उसे नियमित शिक्षकों की पदोन्नति और अतिथि शिक्षकों की नियमित नियुक्ति की संभावनाओं की बलि देकर कैसे लिया गया। उनका मानना था कि यह एक विशेष समूह की सलाह पर लिया गया ग़लत फैसला है। उन्होंने प्रदर्शन के आयोजकों का ध्यान देर से सूचना देने और तालमेल की कमी की ओर भी खींचा।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय ने अपनी राय रखते हुए कहा कि ऐसे में जब प्रशिक्षित युवक-युवतियां उपलब्ध हैं, इस फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता। उनका कहना था कि इससे बराबरी और समाजवाद के मूल्यों की अनदेखी हुई है। मंच के साथियों ने 'इसलिए राह संघर्ष की हम चुने' गीत गाकर आन्दोलन के प्रेरक मूल्यों को सामने रखा।
गौरव (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने फैसले को राजनैतिक स्टंट बताया। उन्होंने कहा कि इससे युवा साथियों का मनोबल गिरेगा और वे शिक्षण छोड़कर दूसरे विकल्पों की तलाश करेंगे जिससे कि शिक्षकों की संख्या व गुणवता दोनों में कमी आएगी। निर्णय के पक्ष में दिए जाने वाले आंकड़ों और तर्कों को उन्होंने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनका वज़न तभी है जब स्कूलों में पूर्ण नियुक्तियां हों। इस मुद्दे पर उन्होंने व्यापक संवाद और एकजुटता की ज़रूरत को रेखांकित किया।
ज्योति (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर अधिकतर शिक्षक हमसे सहमत हैं और स्थल पर उपस्थिति से समर्थन आंकना ग़लत होगा।
राजेश ( लोक शिक्षक मंच ) ने प्रदर्शन के राजनैतिक चेतना के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा कि परिणामों से परे यह संघर्ष जारी रखने की परंपरा का भी निर्वाह है। उनका विश्लेषण था कि छठे वेतन आयोग से बढ़ी तनख्वाहों से शिक्षकों के संघर्ष करने की परम्परा को तोड़ने की कोशिश की गयी है।यहाँ उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को कॉरपोरेट घरानों और उनके NGOs को सौंप कर बर्बाद करने की राजनीति पर ध्यान खींचते हुए दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को निजी संस्थाओं को 'गोद' देने के फैसले के खिलाफ मंच द्वारा लड़ाई लड़ने की मंशा ज़ाहिर की और अन्य उपस्थित साथियों को इसमें भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।
वही GSTA के जिला संयोजक ने नयी पीढ़ी के उदासीन रवैये पर निराशा प्रकट की। उन्होंने कहा कि वे शिक्षक संघ की भूमिका के प्रति सीमित सोच रखते हैं जिस कारण वे अपने व्यापक हितों की रक्षा में एकजुट नहीं हो पा रहे। उन्होंने यह मानने से इंकार किया कि बढ़े वेतन कमज़ोर आन्दोलन के लिए ज़िम्मेदार हैं। NGOs के विरोध से भी वे सहमत नहीं थे। फैसले को सरकार की साज़िश बताते हुए उन्होंने इसके विरुद्ध अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत और अपनी मंशा बताई।
ज्योति (सदस्य ,लोक शिक्षक मंच) ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर अधिकतर शिक्षक हमसे सहमत हैं और स्थल पर उपस्थिति से समर्थन आंकना ग़लत होगा।
राजेश ( लोक शिक्षक मंच ) ने प्रदर्शन के राजनैतिक चेतना के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा कि परिणामों से परे यह संघर्ष जारी रखने की परंपरा का भी निर्वाह है। उनका विश्लेषण था कि छठे वेतन आयोग से बढ़ी तनख्वाहों से शिक्षकों के संघर्ष करने की परम्परा को तोड़ने की कोशिश की गयी है।यहाँ उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को कॉरपोरेट घरानों और उनके NGOs को सौंप कर बर्बाद करने की राजनीति पर ध्यान खींचते हुए दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को निजी संस्थाओं को 'गोद' देने के फैसले के खिलाफ मंच द्वारा लड़ाई लड़ने की मंशा ज़ाहिर की और अन्य उपस्थित साथियों को इसमें भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।
वही GSTA के जिला संयोजक ने नयी पीढ़ी के उदासीन रवैये पर निराशा प्रकट की। उन्होंने कहा कि वे शिक्षक संघ की भूमिका के प्रति सीमित सोच रखते हैं जिस कारण वे अपने व्यापक हितों की रक्षा में एकजुट नहीं हो पा रहे। उन्होंने यह मानने से इंकार किया कि बढ़े वेतन कमज़ोर आन्दोलन के लिए ज़िम्मेदार हैं। NGOs के विरोध से भी वे सहमत नहीं थे। फैसले को सरकार की साज़िश बताते हुए उन्होंने इसके विरुद्ध अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत और अपनी मंशा बताई।
राजीव ( निगम शिक्षक ) ने संविदा पर शिक्षकों को रखने की नीति की आलोचना करते हुए इसे शिक्षा के पतन और शिक्षा व्यवस्था के विनाश के लिए दोषी करार दिया। उनका मानना था कि ठेके की इस व्यवस्था से शासन-प्रशासन की निरंकुश हुकूमत कायम रहती है। सुरजीत सिंह रावत ( भूतपूर्व सैनिक तथा वर्तमान में निगम शिक्षक ) ने मुद्दे की अहमियत स्वीकारते हुए इस बात पर अफ़सोस जताया कि शिक्षक की नौकरी पाने का इंतज़ार करते वो युवा जो इससे सीधे प्रभावित हैं बड़ी संख्या में प्रदर्शन में नहीं आये। उन्होंने कुछ NGOs के सकारात्मक पक्षों का हवाला दिया। उन्होंने फैसले पर रची अपनी एक व्यंगात्मक कविता प्रस्तुत की।
एक वक्ता जगदीश ममगइ ने कहा कि उन्होंने पाया कि वो लोग भी जो इसका समर्थन कर रहे हैं बातचीत और समझाने के बाद पुनर्विचार करते हैं। सरकार की संविदा व outsourcing की नीतियों में खोट मानते हुए उन्होंने कहा कि इनसे केवल शिक्षक ही नहीं सभी कामगार वर्ग प्रभावित हो रहे हैं जिस कारण एक बड़ी लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है।
सतिन्द्र नागर ( संयोजक , MCTA, शाहदरा दक्षिण ) ने मुद्दे को उठाने के लिए मंच को धन्यवाद दिया। नयी शिक्षा नीतियों को विदेशी ताकतों से संचालित मानते हुए उन्होंने इनकी भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि शिक्षकों में नए नेतृत्व की ज़रूरत है जोकि तात्कालिक लाभ के परे जाकर सरकार के फैसलों को परख पाए। उनकी राय थी कि उम्र के साथ कार्यक्षमता घटती है। उन्होंने भी प्रदर्शन में उपस्थित नौजवान साथियों की संख्या पर अफ़सोस जताया।
साथी प्रेमचंद (महासचिव ,इंडियन पब्लिक सर्विस एम्प्लोई फेदरेसन ) ने लोक शिक्षक मंच को धन्यवाद दिया कि उसने इस मुद्दे को उठाकर तमाम संगठनों पर दबाव बनाया कि वो अपनी स्थिति स्पष्ट करें। उनका कहना था कि आन्दोलनों में संख्या के अलावा माहौल बनाने की भूमिका भी निभानी ज़रूरी होती है। उन्होंने माना कि जो लोग सरकार के इस फैसले का इसलिए समर्थन करते हैं कि उन्हें खुद पुनर्नियुक्त होकर परिवार के प्रति अपनी शेष ज़िम्मेदारी निभाने का मौक़ा मिलेगा, वे व्यापक स्तर पर नयी पीढ़ी के हितों से इसके अंतर्विरोधों को नज़रंदाज़ करते हैं। सरकार की नव-उदारवादी नीतियों में ठेका व्यवस्था की धुन को पहचानते हुए उन्होंने अपील की कि इसके खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई को अपने व्यक्तिगत हितों के लिए संघर्ष की तरह देखा जाये। उन्होंने कहा कि न सिर्फ इन नीतियों के खिलाफ सतत संघर्ष करना होगा बल्कि इनका स्वरूप ही ऐसा है कि लड़ाई खुद हमें मजबूर करेगी। सेवानिवृत्ति के बाद ठेके पर फिर नियुक्त होने से कर्मचारियों के विरोध और संघर्ष की क्षमताओं के कुंद होने की संभावनाओं की तरफ भी उन्होंने ध्यान दिलाया।
नरेन्द्र कुमार ( SC/ST शिक्षक संघ, शाहदरा दक्षिणी ) ने इस बात की ओर इशारा किया कि शिक्षकों के कई गुटों द्वारा इस फैसले का समर्थन न करने का कारण उनके नेतृत्व के निजी स्वार्थों से जुड़ा हुआ है। युवा वर्ग की नौकरियों और पदोन्नति की संभावनाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ को शिक्षण संस्थानों में ले जाने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि NGOs के कॉरपोरेट चरित्र और एजेंडे के कारण स्कूली व्यवस्था में इनके बढ़ते हस्तक्षेप को संदेह से ही देखा जाना चाहिए। उन्होंने आशा से कम उपस्थिति पर अफ़सोस जताया।
अध्यापिका अंजलि भारद्वाज ने इस फैसले को रोज़गार के कम होते अवसरों और अपराध की बढ़ती घटनाओं से जोड़ कर देखने को कहा। विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते क्रम को समाज में व्याप्त हताशा और कुंठा का परिणाम मानते हुए उनका कहना था कि ये नीतियाँ एक साजिश के तहत लागू की जा रही हैं ताकि हालात इतने बिगड़ जाएँ कि साम्राज्यवादी ताकतों को देश की कमान मिल जाये। आगे की लड़ाई में सहयोग देने के आश्वासन के साथ उन्होंने अपनी बात समाप्त की। इसके बाद मंच के साथियों ने 'ले मशालें चल पड़े हैं... ' गीत गाकर उम्मीद का जज़्बा और विश्वास जगाया ।
एक वक्ता जगदीश ममगइ ने कहा कि उन्होंने पाया कि वो लोग भी जो इसका समर्थन कर रहे हैं बातचीत और समझाने के बाद पुनर्विचार करते हैं। सरकार की संविदा व outsourcing की नीतियों में खोट मानते हुए उन्होंने कहा कि इनसे केवल शिक्षक ही नहीं सभी कामगार वर्ग प्रभावित हो रहे हैं जिस कारण एक बड़ी लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है।
सतिन्द्र नागर ( संयोजक , MCTA, शाहदरा दक्षिण ) ने मुद्दे को उठाने के लिए मंच को धन्यवाद दिया। नयी शिक्षा नीतियों को विदेशी ताकतों से संचालित मानते हुए उन्होंने इनकी भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि शिक्षकों में नए नेतृत्व की ज़रूरत है जोकि तात्कालिक लाभ के परे जाकर सरकार के फैसलों को परख पाए। उनकी राय थी कि उम्र के साथ कार्यक्षमता घटती है। उन्होंने भी प्रदर्शन में उपस्थित नौजवान साथियों की संख्या पर अफ़सोस जताया।
साथी प्रेमचंद (महासचिव ,इंडियन पब्लिक सर्विस एम्प्लोई फेदरेसन ) ने लोक शिक्षक मंच को धन्यवाद दिया कि उसने इस मुद्दे को उठाकर तमाम संगठनों पर दबाव बनाया कि वो अपनी स्थिति स्पष्ट करें। उनका कहना था कि आन्दोलनों में संख्या के अलावा माहौल बनाने की भूमिका भी निभानी ज़रूरी होती है। उन्होंने माना कि जो लोग सरकार के इस फैसले का इसलिए समर्थन करते हैं कि उन्हें खुद पुनर्नियुक्त होकर परिवार के प्रति अपनी शेष ज़िम्मेदारी निभाने का मौक़ा मिलेगा, वे व्यापक स्तर पर नयी पीढ़ी के हितों से इसके अंतर्विरोधों को नज़रंदाज़ करते हैं। सरकार की नव-उदारवादी नीतियों में ठेका व्यवस्था की धुन को पहचानते हुए उन्होंने अपील की कि इसके खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई को अपने व्यक्तिगत हितों के लिए संघर्ष की तरह देखा जाये। उन्होंने कहा कि न सिर्फ इन नीतियों के खिलाफ सतत संघर्ष करना होगा बल्कि इनका स्वरूप ही ऐसा है कि लड़ाई खुद हमें मजबूर करेगी। सेवानिवृत्ति के बाद ठेके पर फिर नियुक्त होने से कर्मचारियों के विरोध और संघर्ष की क्षमताओं के कुंद होने की संभावनाओं की तरफ भी उन्होंने ध्यान दिलाया।
नरेन्द्र कुमार ( SC/ST शिक्षक संघ, शाहदरा दक्षिणी ) ने इस बात की ओर इशारा किया कि शिक्षकों के कई गुटों द्वारा इस फैसले का समर्थन न करने का कारण उनके नेतृत्व के निजी स्वार्थों से जुड़ा हुआ है। युवा वर्ग की नौकरियों और पदोन्नति की संभावनाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ को शिक्षण संस्थानों में ले जाने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि NGOs के कॉरपोरेट चरित्र और एजेंडे के कारण स्कूली व्यवस्था में इनके बढ़ते हस्तक्षेप को संदेह से ही देखा जाना चाहिए। उन्होंने आशा से कम उपस्थिति पर अफ़सोस जताया।
अध्यापिका अंजलि भारद्वाज ने इस फैसले को रोज़गार के कम होते अवसरों और अपराध की बढ़ती घटनाओं से जोड़ कर देखने को कहा। विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते क्रम को समाज में व्याप्त हताशा और कुंठा का परिणाम मानते हुए उनका कहना था कि ये नीतियाँ एक साजिश के तहत लागू की जा रही हैं ताकि हालात इतने बिगड़ जाएँ कि साम्राज्यवादी ताकतों को देश की कमान मिल जाये। आगे की लड़ाई में सहयोग देने के आश्वासन के साथ उन्होंने अपनी बात समाप्त की। इसके बाद मंच के साथियों ने 'ले मशालें चल पड़े हैं... ' गीत गाकर उम्मीद का जज़्बा और विश्वास जगाया ।
राघवेन्द्र प्रपन्न ( प्राध्यापक, महर्षि बाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, दिल्ली विश्विद्यालय ) ने कहा कि एक तरीका इस फैसले को ऐसे देखने का है जोकि आक्षेप तक रुक जाता है जबकि ज़रूरत है कि दोष का निर्धारण सही ढंग से किया जाये। इसके लिए बड़ी तस्वीर को समझकर राजनैतिक विश्लेषण की ज़रूरत है। उन्होंने बताया कि कैसे PPP के ज़रिये, पीछे के रास्ते से, बिना संवैधानिक प्रक्रिया अपनाये, सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से पलट रही हैं। उन्होंने कहा कि नियमित शिक्षकों के कैडर को खत्म करने की शुरुआत तो 1990 के दशक में नव-उदारीकरण की नीति अपनाने से ही हो गई थी। इसमें ठेका व्यवस्था एक चरण है। उनका विश्लेषण था कि सरकार के इस फैसले से इन नीतियों द्वारा और आघात पहुँचाने के लिए अनुकूल समय मिलेगा। शिक्षक साथियों को संबोधित करते हुए उन्होंने उस षड्यंत्र के प्रति सचेत रहने को कहा जिसके तहत शिक्षण को ग़ैर-पेशेवर काम में बदलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में शिक्षा और शिक्षण का लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के मंचों से तय हो रहा है जिनका उद्देश्य यह है कि शिक्षकों की पहचान बौद्धिक वर्ग के बदले मात्र दिए गए पैकेज को लागू करने वाले कर्मचारी की रह जाये। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पीअरसन नाम की कंपनी का उल्लेख किया जोकि CCE जैसी योजनाओं के स्वरूप को प्रायोजित तथा तय कर रही है।
विभा सिंह ( पूर्व सचिव, नगर निगम शिक्षक संघ ) ने भी लोक शिक्षक मंच को फैसले के विरोध में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए बधाई दी। उनका कहना था कि इस लड़ाई में संविदा शिक्षकों के हित तो हैं ही, पदोन्नति की घटती सम्भावना के कारण नियमित शिक्षकों के हित भी शामिल हैं। सेवानिवृत्त शिक्षकों के हितों से सहानुभूति जताते हुए उन्होंने कहा कि पुनर्नियुक्ति की कई शर्तें उनके खुद के भी खिलाफ हैं और वो इस फैसले का स्वागत इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे इन शर्तों से अनजान हैं। प्रदर्शन में नौजवानों की कम उपस्थिति का कारण उन्होंने उनका शिक्षक के पद की गरिमा को न समझना बताया। उन्होंने अपील की कि इस फैसले को पार्टी लाइन के परे जाके देखें।
फ़िरोज़ ( लोक शिक्षक मंच ) ने अंत में प्रदर्शन में भाग लेने वाले सभी साथियों का मंच की ओर से धन्यवाद किया और उनके द्वारा की गई आलोचनाओं और सुझावों पर ग़ौर करने का आश्वासन दिया। दिल्ली सरकार के इस फैसले के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा निगम के 50 स्कूलों को PPP के तहत दिए जाने वाले फैसले को पलटवाने की लड़ाई लड़ने के इरादे की घोषणा के साथ प्रदर्शन समाप्त हुआ। प्रदर्शन के बाद एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई और उप-राज्यपाल, दिल्ली सरकार को एक ज्ञापन सौंपा गया जिसमें सैंकड़ों शिक्षकों, शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों व अन्य लोगों के हस्ताक्षर संलग्न थे और दिल्ली सरकार के फैसले के विरोध के कारणों को प्रस्तुत करके उसे वापिस लेने की मांग की गई।
आय - व्यय का ब्यौरा
कुल आय :
सभा में उपस्थित साथियों से प्राप्त - 2100
मंच के एक साथी से प्राप्त - 1000
कुल प्राप्ति - 3100
कुल व्यय :
माइक -टेंट - 4000
पर्चे - 400
बेनर -280
अन्य - 246
कुल खर्च - 4926

Saturday, 7 September 2013
पर्चा: शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाए जाने के खिलाफ
साथियों,
दिल्ली सरकार ने शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 65 वर्ष करने का फैसला किया है। लोक शिक्षक मंच सरकार के इस फैसले पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करता है। इस समय जहाँ दिल्ली ही नहीं वरन् देश भर में बड़ी संख्या में बेरोजगार युवक-युवतियाँ बी०एड०, बी० एल० एड० तथा ई०टी०ई० (डाइट) आदि शिक्षण प्रशिक्षण कोर्स करके सरकारी नौकरियों के इंतजार में हैं, सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ते ही आगामी वर्षों में होने वाली नई नियुक्तियों की संभावना खत्म हो जाएगी। दिल्ली में ही पिछले कई सालों से शिक्षकों के कई हजार पद खाली पड़े हैं और सरकार नियमित शिक्षकों की बहाली करने के बजाय इन्हें लगातार संविदा, अतिथि आदि, अनियमित व कम वेतन वाले पदों में परिवर्तित कर रही है। इस नीति से युवा पीढ़ी के भविष्य की संभावनाएं खतरे में पड़ जाएंगी। यह एक ही स्कूल व्यवस्था के भीतर गैर-बराबरी की कार्य-शर्तों पर काम करने वाले शिक्षकों के भिन्न वर्ग निर्मित कर शिक्षकों के बीच की एकजुटता को तोड़ने का प्रयास है। साथ ही सरकार की जनविरोधी शिक्षा नीतियों का प्रतिरोध करने की क्षमता को कुंद करने की भी साजिश है। इस निर्णय की हम इसलिए भी निंदा करते हैं क्योंकि इससे भावी व सेवानिवृत्त न होने वाले शिक्षकों के हितों के बीच आपसी टकराव पैदा होगा।
इस निर्णय को हम सरकार द्वारा अपनाई जा रही नवउदारवादी नीतियों के क्रम में देखते हैं, जिनका उद्देश्य सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करना है। इनके तहत सरकार अपने स्कूलों को तथाकथित स्वयं सेवी संस्थाओं, निजी व कॉर्पोरेट ताकतों को सौंपकर शिक्षा को बाजारू माल बनाना चाहती है। इसी कड़ी में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम 50 प्राथमिक स्कूलों को इन ताकतों को सौंपने का निर्णय भी ले चुकी है। यह सब कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा पोषित पी.पी.पी. की नीति की आड़ में हो रहा है। इस नीति का उद्देश्य दिल्ली ही नहीं वरन् देश के सभी शिक्षण प्रशिक्षण संस्थानों से निकले भावी शिक्षकों को निजी स्कूलों में पढ़ाने और एन.जी.ओ. में काम करने के लिए विवश करना है। इससे एक तरफ शिक्षा को बेच कर मुनाफा कमाने वाले निजी स्कूल प्रशिक्षित शिक्षकों को अपनी शोषण की शर्तों पर नियुक्त कर पाएंगे और नव शिक्षक समझौता करने को मजबूर होंगे। इस तरह पी.पी.पी. के तहत दिए जा रहे दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के 50 स्कूल और इस तरह के नित नए खुलते अन्य निजी स्कूलों की जरूरतों को पूरा किया जाएगा। यह नव-उदारवाद के तहत सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में जनता के संसाधनों से तैयार हो रहे शिक्षकों की मूल्यवान क्षमता को निजी पूंजी के अधीन चल रहे मुनाफा कमाने वाले स्कूलों को हस्तांतरित करने की साजिश है।
लोक शिक्षक मंच अपील करता है कि सरकार की इस जन विरोधी योजना का एकजुट होकर विरोध करें और दिल्ली सरकार से मांग करें कि इस फैसले को तत्काल प्रभाव से वापस ले। इस संदर्भ में होने वाले विरोध प्रदर्शन में आप अपनी सहभागिता प्रदर्शित करके सरकार को इस फैसले को वापिस लेने के लिए मजबूर करें।
विरोध प्रदर्शन
स्थानः जंतर मंतर, दिल्ली
दिनांक: 14 सितम्बर, 2013 (शनिवार)
समयः प्रातः 9:30 से 1:00 बजे तक
इस अभियान में आप सभी आमंत्रित हैं!
लोक शिक्षक मंच
सम्पर्कः lokshikshakmanch@gmail.com, 9968716544, 9911612445
ब्लागः lokshikshakmanch.blogspot.in
Tuesday, 3 September 2013
विज्ञप्ति: दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाये जाने के खिलाफ
लोक शिक्षक मंच दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 वर्ष तक बढाने पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करता है. इस समय जहाँ दिल्ली ही नहीं वरन देश भर में बड़ी संख्या में बेरोजगार युवक-युवतियां बी०एड० तथा ई०टी०ई० (डाइट) आदि शिक्षण-प्रशिक्षण कोर्स करके नौकरियों का इंतजार कर रहे हैं, ऐसे में सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ते ही आगामी वर्षों में होने वाली नई नियुक्तियों की संभावना खत्म हो जाएगी। दिल्ली में ही पिछले कई सालो से शिक्षकों के कई हजार पद खाली पड़े हैं और सरकार नियमित शिक्षकों की बहाली करने के बजाय इन्हें लगातार संविदा, अतिथि आदि अनियमित व कम वेतन वाले पदों में परिवर्तित कर रही है. इस नीति से युवा पीढ़ी के भविष्य की संभावनाएं और अधिक खतरे में पड़ जाएँगी। यह एक ही स्कूल व्यवस्था के भीतर गैर-बराबरी की कार्य-शर्तो पर काम करने वाले शिक्षकों के भिन्न वर्ग निर्मित कर शिक्षकों की एकजुटता को तोड़ने तथा सरकार की जनविरोधी शिक्षा नीतियों का प्रतिरोध करने की क्षमता को कुंद करने की साजिश है. इस निर्णय की हम इसलिए भी निंदा करते है क्योंकि इससे भावी व सेवानिवृत्त न होने वाले शिक्षकों के हितों के बीच आपसी टकराव पैदा होगा। इस निर्णय को हम सरकारों द्वारा अपनाई जा रही नवउदारवादी नीतियों के क्रम में देखते है जिनका उद्देश्य सार्वजानिक शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करना है. इनके तहत सरकार अपने स्कूलों को तथाकथित 'स्वयं सेवी संस्थाओं' तथा निजी व कॉर्पोरेट ताकतों को सौंपकर शिक्षा को बाजारू माल बनाना चाहती है. इसी कड़ी में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम अपने 50 स्कूल इन ताकतों को सौंपने का निर्णय भी ले चुका है. और यह सब कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा पोषित पीपीपी की नीति की आड़ में हो रहा है।
Subscribe to:
Posts (Atom)

