दिल्ली के स्कूलों में शिक्षक होने के नाते हम दिल्ली नगर निगम के चुनावों पर टिप्पणी करने से ख़ुद को रोक नहीं सकते/को बाध्य हैं। स्थानीय निकाय के इन चुनावों में भी हम भारतीय लोकतंत्र की उसी बीमारी के लक्षण देख रहे हैं जिसके बारे में डॉक्टर अंबेडकर ने चेताया था। दो बड़े दलों के इश्तेहार उनके स्थानीय प्रत्याशियों का परिचय नहीं करा रहे, बल्कि अधिनायकवादी केंद्रीय नेता के नाम और चेहरे पर वोट माँग रहे हैं। उधर एक अन्य प्रमुख दल भी अपना नायक खड़ा करने की कोशिश में लगा है। फिर, हमें यह भी बता दिया गया है कि इस लोकतंत्र में इन दलों की नज़र में चुनाव लड़ने के लिए सबसे ज़रूरी क़ाबिलियत धन-दौलत है। सोने पर सुहागा यह है कि इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि हमारा समर्थन जीतने के बाद डर या लालच के चलते हमारा नुमाइंदा दल नहीं बदलेगा। फिर भी, वफ़ादार वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में हम न सिर्फ़ लोकतंत्र के इस जश्न का डंका पीटते हैं, बल्कि स्कूलों में विद्यार्थियों को भी इसकी महिमा के गुणगान में दीक्षित करते हैं।
Wednesday, 30 November 2022
निगम चुनाव से नदारद निगम स्कूल के सवाल
Monday, 28 November 2022
दिल्ली के सरकारी विद्यालय का एक दिन और दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की शिक्षा नीतियाँ
I. बहिष्करण की संस्कृति : सबसे कमज़ोर तबके को बाहर निकालती दाखिले की नीतियाँ
मई – जून, 2022 के महीनों में दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में दाखिले चल रहे हैं। कई अभिभावक अपने बच्चे का दाखिला करवाने के लिए, जो कागज़ बन पड़े, सारे लेकर स्कूल आ जाते हैं। अकसर उनके मन में यह डर होता है कि न जाने कौन सा कागज़ कम पड़ जाए और बच्चे को दाखिला देने से मना कर दिया जाए। आख़िर उन्होंने अपने पड़ोस में सुन रखा होता है कि ‘दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दाखिला मिलना आसान नहीं है’।
जिनके पास आधार या पते का पक्का कागज़ नहीं होता, वो तो अकसर यह सोचकर स्कूल ही नहीं आते कि बिना आधार के बच्चे को दाखिला नहीं मिलेगा! भले ही कानून कुछ भी कहे, व्यवहार में तो उन्होंने यही देखा होता है!
स्कूल पहुँचने पर एक टीचर– या कभी-कभी दरवाज़े पर खड़े गार्ड ही- पेरेंट्स को यह बता देते हैं कि ‘सरकरी स्कूल में दाखिले के लिए उन्हें खुद ऑनलाइन फॉर्म भरना होगा। उन्हें आता है तो खुद भर लें नहीं तो किसी जानकार की मदद से या पैसे देकर इंटरनेट कैफ़े से फॉर्म भरवा लें’।
अभिभावक हैरान होकर पूछते हैं कि अगर उनका ऐसा कोई रिश्तेदार/पड़ोसी नहीं है, तो वो क्या करें? कैफ़े वाले कितने पैसे लेंगे? विडंबना यह है कि कोई अभिभावक यह नहीं पूछता कि ‘जो अभिभावक ऑनलाइन फॉर्म नहीं भर सकते वो स्कूल में आकर ऑफलाइनफॉर्म क्यों नहीं भर सकते? सारे नियम-कानून उसी को ध्यान में रखकर क्यों बनाए जाते हैं, जिसके पास पहले से ही सब कुछ होता है!
इस दौरान एक अभिभावक आकर कक्षा 10 में दाखिले के बारे में पूछती है। स्कूल बताता है कि दसवीं के फॉर्म तो मई के पहले हफ़्ते में ही ख़त्म हो गए। जिन बच्चों ने फॉर्म भरा था, उनका एंट्रेंसटेस्ट भी हो चुका है। अभिभावक परेशान होकर पूछती हैं ‘मई में तो सत्र लगभग शुरु ही होता है और दसवीं के दाखिले बंद भी हो गए! कृपया कुछ करिए नहीं तो मेरी बेटी का साल बर्बाद हो जाएगा।‘ विडंबना यह है कि कोई अभिभावक यह नहीं पूछती कि ‘जब मेरी बच्ची नौवीं पास है तो टेस्ट किस चीज़ का? 1 हफ़्ते में दाखिले शुरु करके बंद करने का क्या मतलब है?’
और इस तरह शुरु होता है आम इंसान का दिल्ली के सरकारी स्कूलों के जटिल और इलीटिस्ट चरित्र की सच्चाई से रूबरू होने का सफर। जो सरकार घरबंदी और कामबंदी के दौरान निजी विद्यालय छोड़कर आए बच्चों को दाखिला देकर यह विज्ञापन कर रही थी कि “सरकारी स्कूल बने पेरेंट्स की पहली पसंद”, वो गरीबों के बच्चों को दाखिला देने में इतनी आनाकानी क्यों करती है? जो स्कूल यह नहीं जानते कि मज़दूर परिवारों की क्या समस्याएं हैं, वो मज़दूरों के बच्चे की ज़रूरतों को कैसे समझ पाएँगे?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी हर बच्चे को रेगुलर स्कूल पढ़ाना ज़रूरी नहीं समझती। तभी बिंदु 3.5 में कक्षा 3,5 और 8 में ही बच्चों को ओपन से पढ़ाने की बात कहती है। अभी तक तो सरकार के ऊपर 14 साल तक के हर बच्चे को स्कूली शिक्षा देने का दबाव था। लेकिन नई नीति के बाद वो दबाव भी खत्म हो जाएगा। यह नीति कक्षा 12 तक की रेगुलर स्कूली शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के बजाय कक्षा 10 में ही बच्चों को स्कूल छोड़ने (exit option) का प्रावधान भी देती है (बिंदु 4.2)।
स्कूलों में न तो कक्षा IX-XII के बच्चों के लिए पर्याप्त कमरे हैं और न ही पर्याप्त शिक्षक हैं। फिर भी 2020 में भी इस देश की शिक्षा नीति ने अपने बच्चों को यह गारंटी नहीं दी कि कक्षा 12 तक की शिक्षा को अनिवार्य बनाएँगे, बारहवीं तक हर 30 बच्चों के लिए एक कमरा और शिक्षक देंगे बल्कि यह नीति उन्हें तीसरी, पाँचवी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं ओपन से करने में रास्ते सुझाती है।
II. मंदबुद्धि बनाने की संस्कृति : न्यूनतम उद्देश्य बना अधिकतम ; अब सरकारी स्कूल सिर्फ साक्षरता और गणना सिखाने के केंद्र हैं
स्कूल में एडमिशन चार्ज देखने वाली शिक्षिका अपनी कक्षा को पढ़ाना छोड़ एडमिशन के काम करना जारी रखती है। आख़िर सरकारी स्कूल की शिक्षिका स्कूल में ‘सिर्फ़’ पढ़ाने थोड़ा ही आती है। भले ही प्राइवेट स्कूलों में एडमिशनकरने, फ़ीस इकठ्ठा करने, डाटा भरने, बच्चे लाने-ले जाने आदि के लिए प्रशासनिक स्टाफ रखा जाता हो लेकिन सरकारी स्कूलों में अतिरिक्त स्टॉफ रखकर पैसा बर्बाद नहीं किया जाता। इसलिए सभी काम शिक्षकों से ही करवाया जाता है।
अभी स्कूल लगे 1 घंटा ही हुआ होता है कि खबर आती है कि अभी आधे घंटे में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शपथ खाते हुए बच्चों की फोटो भेजो और दो घंटे में प्लास्टिक के उपयोग के खिलाफ़ बच्चों से पोस्टर बनवाकर फोटो और रिपोर्ट भेजो। शिक्षक तुरंत आकाओं के आदेश पालन में लग जाते हैं। कुछ बच्चे भी मदद करने में लगा लिए जाते हैं। पूरे स्कूल में (रोज़ की तरह) आपाधापी मच जाती है। शिक्षक लगे रहते हैं और बच्चे अपनी कक्षाओं में बैठकर समय काटते हैं।
बचे हुए समय में पढ़ाई भी होती है। पिछले चार सालों से सरकारी विद्यालयों में कक्षा 3-9 के लिए पढ़ाई का मतलब “मिशन बुनियाद” है। मिशन बुनियाद का मतलब है कक्षा 3-9 के बच्चों को सिर्फ धाराप्रवाह हिंदी पढ़ना और जमा-भाग सिखाना।
दसियों साल की कोशिशों के बाद दिल्ली सरकार को एनजीओज़ का यह ज्ञान समझ आ गया कि “सरकारी स्कूलों के बच्चों को हिंदी पढ़ना और जमा-घटा करना नहीं आता इसलिए उनकी कक्षा की पढ़ाई बंद करो और सिर्फ साक्षरता और जमा-घटा सिखाओ। क्योंकि बच्चों को ढंग से हिंदी पढ़नी-लिखनी नहीं आती इसलिए इन बच्चों को बढ़िया कहानियाँ पढ़ाना, विज्ञान-इतिहास-भूगोल की बातें सिखाना बेकार है। इन्हें दिन-रात सिर्फ़ साक्षर बनाओ।
क्योंकि ये एनसीआरटी किताबें पढ़ने के लायक नहीं है इसलिए इनके लिए हम अलग किताबें तैयार करके आपको देंगे। हम इन्हें इतनी आसान कहानियाँपढ़ाएँगे कि इनके दिमाग़ पर कोई ज़ोर ही न पड़े। ऐसी कहानियाँ जिनमें न हाव-भाव होगा, न लॉजिक; न सच्चाई से जुड़ाव होगा, न कल्पना की उड़ान; न सर्वनाम निकलते होंगे, न कहानी का कोई मतलब निकलता होगा। आख़िर इन सब गुणों से भरी किताबें न बच्चे समझ पाते हैं और न शिक्षक समझा पाते हैं।“
मेंटर शिक्षक कक्षाओं में बैठकर जाँच कर रहे हैं कि मिशन बुनियाद में कहीं कोई शिक्षक अपने ढंग से तो नहीं पढ़ा रहा, जितना कहा गया है उससे ज़्यादा तो नहीं पढ़ा रहा, कक्षा की किताब से तो नहीं पढ़ा रहा। एक शिक्षक यह पूछना चाहती है पर पूछ नहीं पाती कि “बीएड में तो हम यह पढ़ते थे कि अच्छी विषयवस्तु बच्चों को ऊपर उठने में मदद करती है, यहाँ तो पूरी पढ़ाई ही नीचे आ गई है। क्या बढ़िया विषय-वस्तु के बिना बढ़िया शिक्षा की नींव रखी जा सकती है? सरकार ने कभी इतनी ताकत और निरीक्षण कक्षानुसार पढ़ाई करवाने में क्यों नहीं लगाया जितना इस साक्षरता प्रोग्राम में लगा रही है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का तो मिशन ही देशभर के स्कूलों को शिक्षा के बजाय साक्षरता केंद्र बनाना है। नीति का बिंदु 2.2 कहता है, “शिक्षा प्रणाली की सर्वोच्च प्राथमिकता 2025 तक प्राथमिक विद्यालय में सार्वभौमिक मूलभूत साक्षरता और संख्या-ज्ञान प्राप्त करना होगा.. सभी प्राथमिक और उच्चतर प्राथमिक विद्यालयों में सार्वभौमिक मूलभूत साक्षरता और संख्या-ज्ञान के लिए राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की सरकारें, 2025 तक प्राप्त किए जा सकने वाले चरण-वार कार्यों और लक्ष्यों की पहचान करते हए और उसकी प्रगति की बारीकी से जांच और निगरानी करते हए अविलम्ब एक क्रियान्वयन योजना तैयार करेंगी।”
मध्य प्रदेश में मिशन अंकुर, बिहार में मिशन आधार, गुजरात में प्रिय बालक जैसे फंक्शनल साक्षरता और गणना प्रोग्राम भी ज़ोर-शोर से चल रहे हैं। बस एक बार ये सरकारी स्कूलों के बच्चे साक्षर बन जाएँ, उसके बाद ज़रूरत लगे तो आगे पढ़ें, नहीं तो अपना आठवीं या दसवीं का सर्टिफिकेट लेकर कोई काम सीख लें। आख़िर जितना जल्दी ये काम-धंधा सीखेंगे, उतनी जल्दी देश के काम आएँगे।
III बेदख़ल करने की संस्कृति : अधिकतम बच्चों को नहीं मिलते ‘टारगेटेड’ वजीफ़े
स्कूली दिन के तीसरे घंटे में आर्डर आता है कि सभी कक्षा अध्यापिकाएँ जल्द से जल्द अपने बच्चों के खाते चेक करवाएँ कि उनके खातों में विभिन्न ग्रांट और वजीफों के पैसे आए हैं या नहीं। अगले दिन सभी बच्चों को पासबुकअपडेट करवाकर लाने को कहा जाता है। कई कोशिशों के बाद आधे बच्चे पासबुक लाते हैं और आधे बच्चे यह शिकायत करके रह जाते हैं कि बैंक वाले पासबुकअपडेट करने के लिए बार-बार चक्कर लगवा रहे हैं या उनका खाता लॉक हो गया क्योंकि न्यूनतम बैलेंस नहीं बचा था।
शिक्षक आपस में बात करते हैं कि “वैसे भी वजीफ़े कितने ही बच्चों को मिल पाते हैं? न जाने कितने अभिभावक तो कभी जाति प्रमाण पत्र ही नहीं बनवा पाते। जो जाति प्रमाण पत्र बनवा लेते हैं, उनमें से ज़्यादातर के पास आय प्रमाण पत्र नहीं होता। सबसे ग़रीब अभिभावक आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ कहाँ से जुटा पाएगा? कहाँ जाएगा बच्चों के हक़ का वो पैसा जो उन्हें नहीं मिलेगा?’
एक शिक्षक ने अपने नगर निगम स्कूल में एडमिशन के दौरान किए गए अध्ययन में पाया कि “2020-21 में हुए दाख़िलों में से 118/472 (25%) अनुसूचित जाति व 158 (33%) पिछड़े वर्ग की पृष्ठभूमियों से थे। यानी, प्रवेश लेने वालों में से लगभग 60% बच्चियाँ इन वर्गों से थीं। वहीं, इनमें से 10% के पास भी जाति प्रमाणपत्र नहीं था।“
एक अन्य विद्यालय पर नज़र डालें तो 2021-22 में कक्षा 9-12 के कुल विद्यार्थियों में 7.5% एससी और 2.5% ओबीसी विद्यार्थी नामांकित थे। क्योंकि इनमें से केवल 9% एससी और 22% ओबीसी पृष्ठभूमि के बच्चे आय प्रमाण पत्र जमा करा पाए इसलिए केवल इन्हें वजीफ़ा मिला। यानी 91% एससी और 78% ओबीसी बच्चों को कोई वजीफ़ा नहीं मिला।दिल्ली के आंकड़ें बताते हैं कि 2021-22 में कक्षा 11-12 के एससी पृष्ठभूमि के 6242 विद्यार्थियों ने पोस्टमैट्रिक वजीफ़े का फॉर्म भरा लेकिन 41% की याचिका ख़ारिज कर दी गई। इसका सबसे बड़ा कारण आय प्रमाण पत्र की कमी थी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का भी यही मानना है कि वज़ीफ़े उन्हीं बच्चों को दिए जाने चाहिएँ जो merituous/इनके योग्य हैंजैसाकिबिंदु 6.4 एवं6.16 मेंस्पष्टहोताहै। कभी स्टेशनरी का पैसा पाने के लिए बच्चों के कक्षा परिणाम देखे जाने की शर्त डाल दी जाती है, कभी विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों को वजीफ़ा देने से पहले न्यूनतम उपस्थिति की शर्त डाल दी जाती है और कभी दस्तावेज़ों की सूची बढ़ा दी जाती है। वज़ीफों को लेकर नीति का पक्ष साफ़ है –जनख़र्च से हाथ खींचना।
IV विज्ञापन की संस्कृति : गैर बराबरियों को ‘अवसर’ बताकर बेचना
छुट्टी की घंटी बजती है और विद्यार्थी गलियारों के पोस्टर पार करते हुए निकलते हैं:
- “दिल्ली के हैप्पीनेसकरिकुलम (खुशी की पाठ्यचर्या; कक्षा VIII तक) ने लाखों बच्चों को सिखायाखुशरहना”। आख़िर जब बच्चे यह सीख जाएँगे कि ‘कभी शिकायत नहीं करनी चाहिए’ तो खुश ही रहेंगे।जब बच्चे यह सीख जाएँगे कि‘अगर तुम ख़ुश नहीं हो तो यह तुम्हारी कमी है नाकि तुम्हारे समाज की’तोअपनीहालतकेलिएखुदकोहीज़िम्मेदारठहराएँगे।
- “एंटरप्रेन्यूरकरिकुलम (निजी धंधे की पाठ्यचर्या; कक्षा IX-XII)दिल्लीकेबच्चोंकोनौकरीलेनेवालानहींनौकरीदेनेवालाबनाएगी”।जबयुवाठेलालगाकर,ऑटोचलाकर, अर्बनक्लैपआदिसेघर-घरजाकरसेवाप्रदानकरके 10-15,000 कमाएंगेतोयहसोचकरखुशहोनासीखेंगेकिकम-से-कमहमकिसीकीनौकरीतोनहींकररहे।नौकरीलेनेवालेबनगएतोसरकारकेसामनेपक्कीनौकरियोंकेलिएआंदोलनखड़ेकरें।
- “दिल्ली के बच्चे देशभक्ति पाठ्यचर्या पढ़कर बनेंगे कट्टर देशभक्त”। क्योंकि ‘मध्यवर्गीय देशभक्ति’ बच्चों को देशसेइतनाप्यारकरनासिखाएगीकिउन्हेंदेशमेंमौजूदगैर-बराबरीजैसीसमस्याएँनज़रहीनआए।जैसेउन्हेंअपनेहीस्कूलों में ठेके पर काम कर रहे गार्ड, सफ़ाई कर्मचारी, शिक्षक और आईटी सिर्फ़भारतीय नज़र आएँगे, परेशान मज़दूर नहीं।
NEP 2020 काबिंदु 4.28 कहताहैबच्चोंकोछोटीउम्रसेही‘सहीकामकरनाऔरनैतिकनिर्णयलेना’सिखायाजाएगा।नीतिकेऐसेकईप्रावधानपाठ्यचर्या को छोटे-छोटे ग़ैर-विषयगतकोर्सों में बाँटकर इसका शिथिलीकरण करनेऔरबिनागहनअकादमिकजाँच-पड़तालकेनितनएकोर्सडालनेकोबढ़ावादेतेहैं।
- “कक्षा 8 पास बच्चे स्कूल्सऑफ़एक्सीलेंस में दाखिले के लिए एंट्रेंसटेस्ट का फॉर्म भरें”। क्योंकि सभी सरकारी स्कूलों में समान ढाँचे और गुणवत्ता वाली शिक्षा देने से काफ़ी सस्ता है कुछ स्कूलों को चमकाकर उनका विज्ञापन करना।
Sunday, 4 September 2022
पत्र: विद्यालय निरीक्षण में नौकरशाही के बढ़ते गैर-पेशेवर और अपमानजनक व्यवहार के विरोध में
स्कूलों में जातिगत भेदभाव और हिंसा को ख़त्म करना है तो द्रोणाचार्य के नहीं, सावित्रीबाई फूले के दिखाए रास्ते पर चलना होगा
Tuesday, 24 May 2022
हमें दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बढ़ते ठेकाकरण के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठानी होगी!
संविधान
के वादों और उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक के तमाम 'अच्छे' फ़ैसलों
के बावजूद नियुक्तियों में ठेकाकरण को लेकर ज़मीनी हक़ीक़त बिगड़ती जा रही है। दिल्ली
के संदर्भ में हम 6 नवंबर 2013 को आए सोनिया गाँधी व अन्य बनाम दिल्ली सरकार व
अन्य केस (जोकि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में संविदा पर काम करने वाले
पैरा-मेडिकलस्टाफ़ द्वारा दायर किया गया था) को याद कर सकते हैं। इसमें फ़ैसला देते
हुए प्रदीप नंद्रजोग व वीकामेस्वरराओ की दिल्ली उच्च-न्यायालय की पीठ ने सरकार
द्वारा ठेके पर नियुक्तियाँ करने की नीति को एक धोखा बताया था। अदालत ने सरकार को
बढ़ती आबादी को संज्ञान में लेकर विभिन्न विभागों में पदों की संख्या को निर्धारित
करने का निर्देश दिया था और ऐसा न करने को उसकी प्रशासनिक नाकामी माना था। इसके
अलावा, अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि वो एक-बार की राहत प्रदान करने के
लिए ठेके पर रखे कर्मचारियों को पक्का करने की नीति लाए। समान काम के लिए समान
वेतन के सिद्धांत व संविधान में बेगार पर पूर्णतः रोक का हवाला देते हुए अदालत ने
न सिर्फ़ वेतन के मुद्दे पर संविदा कर्मचारियों के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था, बल्कि
ऐसे कर्मचारियों के लिए छुट्टियों के समान अधिकार को भी सुरक्षित किया था। इसके
उलट, आज स्थिति क्या है?
1. आज दिल्ली सरकार के स्कूलों में लगभग 20,000 गेस्ट शिक्षक कार्यरत हैं। गेस्ट शिक्षकों को न तो समान काम का समान वेतन मिलता है, न वैतनिक छुट्टी, न स्वास्थ्य सुरक्षा, और न पेंशन लाभ आदि। गेस्ट शिक्षक सालों-साल इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था में काम करते रहते हैं और फिर एक दिन छाँटकर बाहर कर दिए जाते हैं। व्यवस्था द्वारा जनित इस गैर-बराबरी को बढ़ाने में विभाग भी कोई कसर नहीं छोड़ता। जहाँ विभागीय जाँच में स्थायी शिक्षक को ससपेंशनऑर्डर देकर अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है, वहीं गेस्ट शिक्षक को सीधा टर्मिनेशनऑर्डर थमा दिया जाता है। जब सरकारें ख़ुद अदालती आदेशों, अपने ही बनाए क़ानूनों व उस संविधान का उल्लंघन करती हैं जिसके नाम पर वो शपथ लेती हैं (तभी तो सालों-साल 'समान काम का समान वेतन' नहीं देतीं), तो फिर जनता को किस मुँह से नियम-कानूनों का पाठ पढ़ाती हैं या जनता पर हुक्म चलाती हैं?
2. स्कूलों में NSQF (राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क) के तहत रखे गए वोकेशनल शिक्षकों व प्रशासनिक काम करने वाले IT स्टाफ़ की भर्तियाँ प्राइवेट कंपनियाँ करती हैं। औने-पौने वेतनों पर समान काम कर रहे ये कर्मचारी बेहद असुरक्षित समूह हैं।
3. आज सरकारी स्कूलों में अधिकतम सफाई कर्मचारी और गार्ड्स भी ठेके पर काम कर रहे हैं। सरकार की नाक के नीचे इनके ठेकेदार प्रत्येक कर्मी की तनख्वाह से प्रति माह हज़ारों रुपए काटकर अपनी जेबें भर रहे हैं लेकिन कोई भी सरकार इस भ्रष्टाचार की न तो जाँच करती है और न ही भर्तियाँ अपने हाथ में लेती है। कर्मी बताते हैं कि उन्हें कोई पे-स्लिप भी नहीं मिलती जिससे वे अपनी पूरी तनख्वाह जाँच सकें और जिन कच्ची नौकरियों को पाने के लिए वो ठेकेदारों को हज़ारों रुपए घूस देने पर मजबूर हैं, उन नौकरियों में उन्हें बीमारी तक में एक दिन की छुट्टी नहीं मिलती। एक छुट्टी के बदले सीधे 500 रुपए तक काट लिए जाते हैं। इनके सर पर नौकरी से निकाल दिए जाने की तलवार हमेशा लटकी रहती है। जो सरकारें ठेकेदारों को स्कूलों में घुसा दें और अपने कर्मचारियों की भर्ती तक ख़ुद न कर सकें, वो किस शासन मॉडल की ढींग हाँकती हैं?
4. हमारे स्कूलों में खाना बाँटने वाली महिलाओं की हालत तो और भी ख़राब है जिनकी देहाड़ी तक मार ली जाती है। जिन आँगनवाड़ियों से खेलकर बच्चे हमारे स्कूलों तक पहुँचते हैं, उनमें काम करने वाली वर्कर्स और हेल्पर्स तो बार-बार सड़कों पर उतरकर ये कह कर रही हैं कि सरकार उनसे बेगार करवाती है। काम करवाते समय तो सरकार उनके 24 घंटों पर अपना हक़ जमाती है लेकिन तनख्वाह देते समय उन्हें 'मज़दूर' तक नहीं मानती बल्कि 'वॉलंटियर' बताकर न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं देती।
साफ़ है, पहले जनता को बेगारी उन्मूलन क़ानून बनवाने के लिए आंदोलन करने पड़े और अब इन कानूनों को लागू करवाने के लिए आंदोलन करने होंगे।5. जब सरकारी स्कूलों का पूरा ढाँचा मज़दूर की मेहनत के शोषण पर खड़ा है, तो भला इन स्कूलों में पढ़ने वाले मज़दूरों के बच्चे क्या सीख रहे हैं? यही कि किताबों में सिखाए जाने वाले संवैधानिक अधिकार झूठे और कागज़ी हैं। तभी तो सरकारी स्कूल तक में मज़दूर कानूनों का पालन नहीं होता। शायद हमारे विद्यार्थी अपने स्कूलों से यह भी सीख रहे हैं कि बड़े होकर जब वो मज़दूर बनेंगे तो उन्हें भी इन्हीं परिस्थितियों में कच्ची, असुरक्षित नौकरियों में खटना होगा।
6. जब इन सभी कर्मियों के बिना स्कूल एक दिन भी नहीं चल सकते तो सरकार इनकी पक्की नियुक्तियाँ क्यों नहीं करती? जबकि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अपने आदेशों में साफ़ किया है कि नियमित स्वरूप के काम के लिए नियमित नियुक्तियाँ होनी चाहिए। क्यों सरकार को कुछ सैकड़ों नियुक्तियाँ करने में सालों-साल लग जाते हैं, बार-बार पेपर लीक हो जाते हैं और धाँधलियाँ सामने आती रहती हैं? ऐसा नहीं है कि ये सरकारें निकम्मी हैं और पक्की नियुक्तियाँ करने में असमर्थ हैं। सच तो यह है कि ये मज़दूर-विरोधी सरकारें हैं जिनकी नीति ही है 'एक पक्के मज़दूर की तनख्वाह पर दो-तीन कच्चे मज़दूरों से काम करवाना'। जिस देश में 100 में से 93 लोग अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं (NSSO 2014), उस देश के मज़दूर को यह समझ लेना चाहिए कि ये मेहनतकश जनता की सरकारें नहीं हैं, बल्कि पूँजीपतियों की सरकारें हैं।
7. वैसे तो कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट 1970 कहता है कि इसका उद्देश्य 'कॉन्ट्रैक्टलेबर ख़त्म करना' है लेकिन यहाँ तो सरकारें ख़ुद ही सारे नियम-कानून तोड़कर अपने ही स्कूलों, अस्पतालों, बसों, दफ़्तरों में ठेकाकरण बढ़ा रही हैं। ऐसी सरकारें एक हाथ में पुलिस का डंडा और दूसरे हाथ में कानून का चाबुक लेकर मज़दूरों पर हमला करती हैं। आँगनवाड़ी कर्मियों की 38 दिन लम्बी हड़ताल तोड़ने के लिए भी तो केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार ने यही किया। एक तरफ ये सरकारें आँगनवाड़ी कर्मियों को कर्मचारी नहीं मानतीं, दूसरी तरफ़ इन्हीं सरकारों ने हड़ताल पर बैठी आँगनवाड़ी महिलाओं पर 'एस्मा' कानून लगा दिया जो कि असल में सरकारी कर्मचारियों को प्रदर्शन व हड़ताल करने से रोकने के लिए बनाया गया एक दमनकारी कानून है। जैसे ही इस कानून के लगाए जाने के कारण आँगनवाड़ी कर्मियों ने अपनी हड़ताल स्थगित की वैसे ही उन्हें सैकड़ों की संख्या में टर्मिनेशन लेटर्स भेजने शुरु कर दिए। यानी पहले कानून की मदद से हड़ताल तोड़ी, फिर डराना और नौकरी से निकालना शुरु कर दिया। अब हमें यह समझने के लिए और कौन-से सबूत चाहिए कि उद्योगपतियों की तरह सरकारें भी कम-से-कम तन्खवाह देकर मज़दूर से ज़्यादा-से-ज़्यादा काम करवाना चाहती हैं? यही सरकारें हर सरकारी सुविधा को प्राइवेट करने और हर सरकारी कंपनी को बेचने पर उतारू हैं। जब मीडिया, पुलिस और कानून उनका है, तो हम मज़दूरों के पास सिर्फ़ एक ही चीज़ बचती है, 'अपनी एकता'।
8. लेकिन यह एकता बनाना ही तो बहुत मुश्किल है। वर्ग-जाति-धर्म-नस्ल-लिंग में बँटे मज़दूर एकजुट कैसे हों? ऊपर से 4 नई श्रम संहिताओं (लेबरकोड) में तो कम्पनियों को मज़दूरों को ठेके पर रखने का कानूनी अधिकार मिल गया है। मैनेजमेंट को 60 दिन का नोटिस दिये बिना मज़दूर हड़ताल पर नहीं जा सकते और इतने दिनों में मालिक नए मज़दूरों का इंतज़ाम कर लेते हैं। जिन कारख़ानों में 300 तक मज़दूर हैं, पहले वहाँ मज़दूरों की छंटनी करने के लिए सरकार की इजाज़त की ज़रूरत पड़ती थी, पर इन नए लेबरकोड के आने पर अब इजाज़त के दिखावे की भी ज़रूरत नहीं होगी। (पहले यह संख्या 100 थी)।
9. ऐसा नहीं है कि इस माहौल में परमानेंट शिक्षक सुरक्षित बच पाएँगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में नियमित नियुक्तियों को लेकर कोई गारंटी नहीं दी गई है, बल्कि नियुक्तियों की प्रक्रिया में इंटरव्यू प्रस्तावित करके पुराने घपलों व नित नई क़ानूनी अड़चनों को दावत दी गई है। एक ओर नियुक्तियों के बाद भी प्रोबेशन काल व ठेके की अवधियों को बढ़ाया गया है और दूसरी ओर प्रोन्नतियों के लिए शिक्षकों की 'प्रतिबद्धता' की जाँच करने की बात की गई है। जहाँ पहले प्रोन्नति के लिए शैक्षिक योग्यता, वरिष्ठता तथा सामाजिक न्याय के उसूलों जैसे पारदर्शी मानक मौजूद थे, अब 'परिणाम-आधारित योग्यता' जैसे अनिश्चित मापदंडों की बात की गई है। नतीजा यह होगा कि पक्की भर्तियों पर आए शिक्षकों का नियमितीकरण और उनकी पदोन्नति प्रशासन की मनमर्ज़ी की ग़ुलाम होगी।
10. एक तरफ मज़दूरों पर ये हमले तेज़ हो रहे हैं और दूसरी तरफ हमारे संगठन बेहद कमज़ोर हैं। हमें शिक्षकों की प्रतिनिधि यूनियन GSTA (गवर्नमेंट स्कूल टीचर्स एसोसिएशन) व MCTA (म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन टीचर्स एसोसिएशन) को मज़बूत करके सार्वजनिक शिक्षा पर हो रहे हर हमले को रोकना होगा। हमें माँग करनी होगी कि GSTA व MCTA के तुरंत चुनाव करवाए जाएँ और इन चुनावों में कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट शिक्षकों द्वारा वोट डालने का प्रावधान किया जाए। हमारी सांगठनिक ताकत (जिसके बल पर हम लड़ते व मोलभाव करते हैं) तभी बढ़ेगी जब गेस्ट व परमानेंट शिक्षक साथ में लड़ेंगे।
हमारी यूनियन्स को आईटी, गार्ड, सफाई कर्मचारियों, डीटीसी, पीडबल्यूडी, नर्स आदि की यूनियन्स के साथ मिलकर ठेकारकरण के खिलाफ़ मज़बूत आंदोलन खड़ा करना होगा।11. हमें सीखना होगा किसान आंदोलन से कि वे कैसे 1 साल तक बिना डरे और बिना बँटे लड़े। हमें सीखना होगा आँगनवाड़ी आंदोलन से कि कैसे मज़दूरों द्वारा प्रशासन की हर चाल को नाकामयाब किया जा सकता है – डीटीसी बस न बिठाए तो डीटीसी दफ़्तर पर धरना, महिला व बाल विभाग धमकाए तो उसके दफ़्तर का दरवाज़ा जाम करना, हड़ताली महिलाओं को अफसर धमकाए तो अफसर के ऊपर, मज़दूरों को अपने संवैधानिक अधिकारों का पालन करने से रोकने की शिकायत पर, एफआईआर दायर करना आदि। हमें सीखना होगा सीएए के खिलाफ़ सड़कों पर बैठी महिलाओं से कि संविधान को बचाती आवाज़ों को ‘देशद्रोही’ कहकर बदनाम करने वाली मीडिया से कैसे लड़ें।
हमारी माँगें –
1. ठेकाकरण की नीति ख़त्म की जाए।
2. सभी शिक्षकों, आईटी स्टाफ़, गार्ड, सफाई कर्मचारियों आदि को समयबद्ध ढंग से पक्का किया जाए। जब तक नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती तब तक ‘समान काम का समान वेतन’ के उसूल का सख़्ती से पालन किया जाए।
3. GSTA व MCTA के तुरंत चुनाव करवाए जाएँ।
4. GSTA में गेस्ट/कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों को भी सदस्यता दी जाए व उन्हें चुनावों में वोट डालने का अधिकार दिया जाए।
5. सभी आँगनवाड़ीवर्कर्स और हेल्पर्स को नियमित किया जाए और संघर्षरत आँगनवाड़ी कर्मियों को भेजे गए टर्मिनेशनलेटर्स तुरंत रद्द किए जाएँ।
6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति को रद्द किया जाए।