Thursday, 27 February 2014

शिक्षक डायरी : मिड डे मील - कुछ अनुभव

लेखक शिक्षक साथी ने अपना नाम इस अनुभव के साथ न देने का अनुरोध लोक शिक्षक मंच से किया था जिसे हमने स्वीकार किया अतः हम इस अनुभव के साथ लेखक का नाम नही दे रहे हैं। ……संपादक

आज जब मुझे मिड डे मील पर कुछ लाइनें लिखने के लिए कहा गया तो मन में प्रथम प्रश्न यही था कि इस बारे में क्या लिखा जाए। वैसे तो बतौर मिड डे मील के द्वितीय इंचार्ज के रूप में मुझे mcd के एक स्कूल में दो साल से ऊपर हो गये हैं। अनुभव इतना है कि अगर मैं एक पेशेवर लेखक होता तो शायद एक किताब इस विषय पर लिखी जा सकती थी। ख़ैर, एक अध्यापक (वो भी सरकारी सामुदायिक संस्था का) होने के नाते मुझे समझ नहीं आ रहा है कि इस योजना के किस पहलू को उठाऊँ। किसी भी बड़ी योजना के नफ़ा व नुकसान दोनों पहलू होते हैं या कहें कि कुछ महत्ता व कुछ खामियाँ होती हैं। ख़ैर इन बातों को विराम देते हुए मैं आपके सामने इस योजना के फायदों को छोड़कर कुछ खामियों की चर्चा करना चाहूंगा। पिछले दो साल के दौरान मेरा अनुभव ये कहता है कि इस योजना से न केवल बच्चे (जिन्हें पोषणयुक्त भोजन मिलना चाहिए) बल्कि अध्यापक ,खाना सप्लाई करने के लिए ngo द्वारा प्रयुक्त गाड़ीवान ,खाना वितरण करने वाली /वाले
कर्मचारी भी प्रभावित होते हैं। सरसरी तौर पर मैं इस योजना की खामियों का ठीकरा सरकार पर फोड़ना चाहूंगा। सरकार पहले तो भ्रष्टपूर्ण तरीके से ngos का चयन करती है। ngos से, जिनको मिड डे मील पकाने व वितरण का जिम्मा सौंपा जाता है, सांठ-गांठ करते हुए शायद घूस तक भी ली जाती है। इसके अलावा ये बड़े ओहदे वाले अधिकारी इन ngos से मासिक /वार्षिक सांठ-गांठ भी रखते हैं।  मेरे यहाँ (स्कूल में) कई बार उपस्थित बच्चों की संख्या से कम बच्चों का खाना आया है जबकि खाना प्राप्त करने वाले बच्चे पूरे दिखाए जाते हैं। खाना कम होने की बात जब ngo प्रमुख के सामने रखी जाती है तो उसका जबाब होता है, "सर जी आज-आज काम चला लो, कल से बढ़ा कर भेजूंगा।" अगर  खाना थोड़ा (यानि 100 -150 बच्चों का) कम है तो काम चला भी लिया जाता है। मगर अंतर ज्यादा होने पर जब उसे और खाना उतारने के लिए मजबूर किया जाता है तब उसका जबाब "सर बिस्कुट बंटवा देना, मैं  पैसे भेज दूंगा" सुनना पड़ता है व ऐसा कई बार करना भी पड़ता है। मगर हद तब होती है जब पहले दिन ये बातें होने के बाद अगले दिन भी खाना उपस्थित बच्चों से कम का भेजता है। तो मजबूरन उससे तू-तू मैं-मैं करनी पड़ती है। ngo के संचालक का फिर यही जबाब होता है, "सर बिस्कुट बंटवा देना"। मगर अगर सख्ती की जाती है तथा गाड़ी वाले को पूरा खाना देने व उतारने के सम्बन्ध में चेतावनी दी जाती है तो मिड डे मील सप्लायर ngo के संचालक अगले दिन गाड़ीवान बदल देते हैं। नया गाड़ीवान नया होने की ताकीद देकर पल्ला झाड़ना शुरू करता है। जब तक उसकी समझ में सारा खेल आता है तब तक मिड डे मील ngo संचालक नया गाड़ीवान ढूंढ लेते हैं। खैर, ये तो खाना कम होने की बात है। अक्सर जो खाना आता है उसमें सब्जी में पिछले दिन दोपहर की पाली वाले स्कूल की मीनू की सब्जी मिक्स होती है। उदाहरण के लिए, अगर मेरे स्कूल में सुबह के समय मीनू में पूरी व आलू की सब्ज़ी है तथा पिछले दिन दोपहर की पाली के मेनू में दाल-चावल है, तो बची हुई दाल आलू की  सब्ज़ी में मिक्स होती है। हालाँकि खाने के स्वाद में कोई फर्क नहीं होता। पूड़ी के आइटम में अक्सर पूरी सख्त होती है। शिकायत पर जबाब मिलता है कि पूड़ी तो मशीन बनाती है या आगे से शिकायत का मौक़ा नहीं आएगा परन्तु समस्या जस-की-तस रहती है। मेरे स्कूल में कुछ समय से अध्यापक /अध्यापिकाएं भी mcd के आदेश के बाद से खाना चख रहे हैं और पूड़ियों के सन्दर्भ में उनकी राय भी यही है कि वे सख्त होती हैं। मगर समस्या का इलाज शायद मुश्किल है क्योंकि जिस ngo, सूर्या चेरिटेबल, से मेरे स्कूल में खाना आता है वह 1,46,100 बच्चों का मिड डे मील बनाता है। जाहिर है, इतने बच्चों का खाना बनाने में कम-से-कम 8 से 10 घंटे तो लगते ही होंगे। तो पूड़ियाँ 8 -10 घंटों के बाद सख्त होंगी ही, चाहे वो कितनी ही बढियां क्यों न बनी हों। आगे चलें तो इस योजना की अतार्किकता का शिकार खाना वितरण करने वाले कर्मचारी भी हैं। मेरे स्कूल में 4 महिलाएं खाना बांटती हैं, जबकि मेरे ही विद्यालय भवन में कुछ समय से अस्थायी तौर पर चल रहे एक अन्य mcd स्कूल में 2  खाना बाँटने वाली कर्मचारी हैं। दोनों ही स्कूलों में खाना बाँटने वाली कर्मचारियों को अलग-अलग मेहनताना दिया जाता है। सरकार द्वारा कोई दिशा-निर्देश न देने के कारण सप्लायर ngo संचालक अपनी मर्जी से भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं। मेरे स्कूल में खाना बाँटने वाली महिला को 466 रूपये मिलते हैं जबकि दूसरे स्कूल की महिला को 500 रूपये मिलते हैं। शिकायत करने पर ngo मालिक कहता है, "जी दूसरे स्कूल से ज्यादा हाजिरी आती है,आपके से कम आती है।" जब कठोरता से कुछ समय पहले ये बात मैंने ngo संचालक के सामने उठाई तो उनका जबाब था कि अब तो दीवाली से सरकार ही इनके पैसे बढ़ाने वाली है। वैसे तो मैंने हर प्रमुख बात रखने की कोशिश की है, फिर भी जल्दबाज़ी में कोई तथ्य /खामी छूट गई हो तो मैं खेद प्रकट करता हूँ। साथ ही, मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि यदि विद्यालय प्रशासन तथा अभिभावक एकता का परिचय देते हुए इस योजना की खामियों को दूर करने की ठान लें तो शायद ही इसमें कोई खामी रहे। अंत में मैं ये स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैंने उपर्युक्त तथ्यों में अपने सहयोगियों के असहयोगात्मक रवैये, मिड डे मील की ज़िम्मेदारी सम्भालने के कारण मुझ पर पड़ती निजी वित्तीय परेशानियों तथा कुछ अपनी खामियों के बारे में नहीं लिखा है।           

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