Sunday, 23 October 2016

व्यर्थ जाती रावण की कुर्बानियाँ

अर्जुन 

लेखक दिल्ली विश्विद्यालय में एम एड के विद्यार्थी हैं , यह लेख इन्होंने दशहरे के अगले दिन भेजा  था पर कुछ कारणों से इसे उस समय प्रकाशित नहीं किया जा सका।  ........  संपादक 


अन्य वर्षों की तरह एक बार फिर आज हिंदू समाज दशहरा मना रहा है और यह सोचकर हर्ष और उल्लास से भरा हुआ है कि एक बार फिर ‘अच्छाई’ ने ‘बुराई’ पर विजय प्राप्त कर ली है | इसके प्रतीकात्मक रूप से कई अर्थ निकाले जा सकते हैं जैसे कि आज समाज में प्रचलित बुराइयाँ एक साल के लिए पीछे रह गई हैं, विशेषकर तब तक जब तक कि एक नया दशहरा नहीं आ जाता |  
दशहरा मनाने के पीछे लोग अपने अलग-अलग तर्क दे सकते हैं, जो किसी की नज़रों में सही भी हो सकते हैं | लेकिन दशहरा मनाए जाने और रावण को फूके जाने के बाद की स्थिति मुझे निराश करती है | यह स्थिति मेरे अंदर कई ऐसे सवालों को जन्म देती है जिनके जवाब मैं नहीं खोज पाता हूँ | क्या सच में इस दशहरे के बाद समाज में प्रचलित बुराइयाँ कम हो जाएंगी? क्या सच में लोग अपनी जाति के कुँए से बाहर आकर सोच पाएंगे? क्या सच में भ्रूण हत्या जैसे बुराई पर विजय पा ली जाएगी? क्या आए-दिन औरतों के साथ हो रहे यौन शोषण व बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाएं कल से ख़त्म हो जाएंगी? क्या सच में गाय और राष्ट्रवाद जैसी खोखली बहसों से देश आगे निकल जाएगा? 
या फिर कल भी ‘जाति’ समाज के एक हिस्से पर अत्याचार का कारण बनी रहेगी? या फिर कल भी honor killing जैसी घटनाओं से धरती लाल होती रहेगी? या फिर कल भी रंगों और जानवरों के नाम पर इंसानों की हत्याएँ की जाती रहेंगी?        
अगर कल भी सब ऐसा ही रहेगा जैसा आज है तो मेरे लिए दशहरे का कोई मतलब नहीं है और ना ही मेरे जैसे करोड़ों युवाओं के लिए होना चाहिए | कई प्रचलित परंपराओं ने भारतीय मानस को जिस आत्मतुष्टिकरण (सच्चाई को अनदेखा करके खुद को संतुष्ट करने) की नीति का पंगु बना दिया है, उसके चलते यह देश ना आज बदला है और ना कल बदलेगा | भारतीय समाज की बुराई रावण के पेट में नहीं है जिसे राम के बाण मारने से ख़त्म किया जा सके | ये बुराइयां तो हम सबमें हैं, हमारे अंदर हैं | हम इन्हीं से लथपथ हैं | जरूरत है तो जागरूक होकर देखने की, पहचानने की और आत्म-विश्लेषण करने की | ये बुराइयां हममें इतनी रच-बस गई हैं कि हम बिना सोचे-समझे और प्रश्न खड़े किए इन्हें जिए चले जा रहे हैं | आज ज़रूरी है कि हम अपने अंदर की इन सभी बुराइयों को आग दें | 
हम पुतले फूंककर बुराईयाँ ख़त्म करने के विचार से खुश हो जाते हैं, लेकिन हम अपने अंदर के जाति रुपी अहंकार का पुतला नहीं फूंकते जिसने सदियों से समाज को टुकड़ों में बाँट रखा है | हम उस पुत्र प्राप्ति की लालसा का पुतला नहीं फूंकते जिसने इस पितृसत्तात्मक समाज की इमारत को कई मंजिला ऊँचा कर दिया है | हम उस सोच का पुतला नहीं फूंकते जो आज भी औरतों को वस्तु के रूप में देखती है | 
जब तक हम इन सब के पुतले नहीं फूंकेंगे तथा अंधविश्वास और आत्मतुष्टिकरण की नीति से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक चाहे हम कितने ही रावणों की कुर्बानियां दे दें, अच्छाई की विजय का भ्रम बना रहेगा | उस सवेरे की उम्मीद व्यर्थ होती रहेगी जिसकी तलाश में हमने हज़ारों रातें खोई हैं | 

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